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वजह / क़ैस जौनपुरी

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मैं एक वेटर हूं. 40 साल से लोगों को खाना परोसता हूं. बिना कुछ सोचे-समझे. क्योंकि आमतौर पर इसकी कोई ज़रुरत भी नहीं पड़ती. लोग आते हैं. खाना ...

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मैं एक वेटर हूं. 40 साल से लोगों को खाना परोसता हूं. बिना कुछ सोचे-समझे. क्योंकि आमतौर पर इसकी कोई ज़रुरत भी नहीं पड़ती. लोग आते हैं. खाना खाते हैं. और चले जाते हैं. हम भी ऑर्डर लेते हैं. खाना परोसते हैं. बिल देते हैं. पैसा लेते हैं. इसमें सोचने समझने की कभी ज़रुरत ही नहीं पड़ती. लेकिन आज एक ऐसा ग्राहक आया जिसने मुझे कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया.

मैंने नियम के मुताबिक सबसे पहले एक गिलास पानी दिया. उसने दो घूंट पानी पीने के बाद गिलास एक तरफ सरका दिया. वो हमारे रेस्‍टोरेण्‍ट को घूर कर देख रहा था. मैंने भी उसे पहले कभी नहीं देखा था. शायद अभी नया आया है इस शहर में.

फिर मैंने उसके सामने होटल का मेन्‍यू बुक रख दिया. उसने दो चार पन्‍ने पलटने के बाद मुझे इशारे से अपनी ओर बुलाया.

“ये पूड़ी-सब्‍जी में कितनी पूड़ी रहेगी?” उसके हाव-भाव से ऐसा लग रहा था जैसे वो सब्ज़ी खरीदने निकला हो. और सारी सब्ज़ियाँ देखने के बाद पूछा हो ‘एक किलो में कितनी चढ़ेगी?’ लेकिन वो यहाँ सब्ज़ी खरीदने नहीं आया था. वो आया था खाना खाने. और उसने मुझसे पूछा था ‘कितनी पूड़ियाँ रहेंगी एक प्लेट में?’

“पांच“ मैंने उसे बताया.
“ठीक है. फिर पूड़ी-सब्‍जी ले आईये.“ उसने अॉर्डर दिया. उसने ऑर्डर देने में इतनी जल्दी दिखाई जैसे उसे लगा हो की कोई उसे कहेगा की ‘ये सब्ज़ी मत खाओ. ये ख़राब है.’ मगर किसी के टोकने से पहले ही उसने ऑर्डर दे दिया था.
“कुछ और लेंगे साब?“ मैंने उससे पूछा.
“नहीं“ उसने जवाब दिया. ऐसा लगा जैसे वो पैसे गिन कर घर से निकला था और उसके पास सिर्फ पाँच पूड़ी खाने भर के पैसे थे.

मैं बेमन से अपने मालिक के पास आया.
“एक पूड़ी-सब्‍जी” मैंने अपने मालिक को बताया.
मालिक ने मुंह सिकोड़ते हुए उस ग्राहक को देखा और टोकन फाड़कर मुझे दिया. मेरे मालिक को इतने छोटे आर्डर के लिए टोकन फाड़ना भी ठीक नहीं लग रहा था. उसने मुझे भी घूरकर देखा.
अब वो ग्राहक कम पैसे खर्च कर रहा था तो मैं क्‍या करता. मगर मेरा मालिक तो मुझे ही जिम्‍मेदार समझ रहा था.

मेरे होटल में पूड़ी-सब्‍जी सुबह का नाश्ता है. लेकिन वो ग्राहक रात में खाना चाह रहा था. तब मेरे मालिक ने कहा था.
“दे दो. रात को ”पूड़ी-सब्‍जी” मांग रहा है. यूपी-बिहार से आया होगा.” उस ग्राहक ने पूड़ी-सब्जी का आर्डर क्या दिया. मेरे मालिक ने उस ग्राहक का पता भी बता दिया. लेकिन एक ग्राहक था दूसरा मालिक. मुझे दोनों की बात सुननी थीं.
“लेकिन मालिक! इस समय तो बनाना पड़ेगा” मैंने अपने मालिक से कहा.
“देखो...सुबह का बचा होगा...दे दो...अब 40 रुपये में आटा थोड़े ही खराब करुंगा.” मेरे मालिक ने पूरा अर्थशास्‍त्र इस्तेमाल कर दिया था इतनी ही देर में. मैं एक ग्राहक के साथ ऐसा नहीं करना चाह रहा था.

मैंने अपने मालिक का मुंह देखा. मेरे मालिक ने मुझे देखा.
“क्‍या?” मेरे मालिक ने मुझसे ऐसे पूछा जैसे वो हर सवाल का जवाब दे देगा और जैसा मैं बोलूँगा वैसा ही मान लेगा. मैं समझ गया. ये मेरे मालिक का ‘ना’ कहने का पुराना तरीका था.
“कुछ नहीं“ मैंने जवाब दिया और वापस किचन में आ गया.
आज उस ग्राहक की किस्‍मत खराब थी और मेरे मालिक की किस्‍मत में 40 रुपये ज्‍यादा लिखे थे.
हमने पूड़ियों को दुबारा गरम किया जिससे पता न चले कि “ये ठण्‍डी और सुबह की पूड़ियां हैं.“ सब्‍जी को हम गरम कर नहीं सकते थे क्‍योंकि सब्‍जी बची ही नहीं थी. मालिक के कहे मुताबिक हमने थोड़ा सा चोखा साथ में रख दिया.
लेकिन ये क्‍या? ग्राहक तो देख के खुश हो गया. उसने बड़े मन से खाया. मुझे बड़ा अफसोस हो रहा था. जब उसने पांचो पूड़ियां खतम कर लीं तब मैंने अपनी ड्‌यूटी के मुताबिक उससे एक बार फिर पूछा.
“कुछ और लाऊं साब?”
“नहीं. अब बिल लाइए.“

मैं अपने मालिक के पास बिल लेने गया. मालिक बोला.
“अच्‍छा...! तो साब को 40 रुपए का भी बिल चाहिए?“
मैं चुपचाप रहा. मालिक ने बिल फाड़कर दिया. मैंने बिल को सौंफ की प्‍याली में रखकर ग्राहक की टेबल पर रख दिया. ग्राहक ने 50 का नोट बिल के साथ रख दिया.
मैंने बिल और नोट लेकर मालिक को दे दिया. मालिक ने 10 रुपए का नोट लौटाया जिसे मैंने वापस टेबल पर रख दिया. ग्राहक तब तक बची हुई सब्‍जी खतम कर रहा था.
मुझे टिप की उम्‍मीद नहीं थी इसलिए मैं अपने काम में लग गया.
ग्राहक ने टिश्यू पेपर से अपना हाथ पोछा. मेरे मालिक को यहां भी तकलीफ हुई.
“अच्‍छा...! तो टिश्यू पेपर भी चाहिए...?“

वो ग्राहक उठा और हाथ धोने के लिए वाश-बेसिन की ओर बढ़ा. जहां उसे हाथ धोने के लिए साबुन भी नहीं मिला. क्‍योंकि साबुन कई दिनों से खतम हो चुका था और मालिक आजकल-आजकल कर रहा था.
खैर... उसने पानी से ही हाथ धोया. वापस आते हुए बीच में उसे मैं मिल गया.
”सब्‍जी बहुत अच्‍छी बनी थी. इसका नाम ”पूड़ी-सब्‍जी” नहीं ”चोखा-पूड़ी” रखिए.”
ये बात उस ग्राहक ने कही थी. उसने मेरी पीठ पर अपना हाथ रखकर ये बात कही थी.
ये उसकी प्रतिक्रिया थी हमारे खाने के लिए. लेकिन उसकी इस प्रतिक्रिया ने हम सबको, मेरे मालिक को भी हैरान कर दिया. शिकायत के बजाए उस ग्राहक ने तारीफ की थी.

वो 10 रुपए अभी भी टेबल पर पड़े थे. हम सबने सोचा अभी हाथ धोकर आने के बाद ग्राहक उसे उठा लेगा. मगर उस ग्राहक ने वो 10 रुपये नहीं उठाए. और सीधा होटल से बाहर निकल गया.
उसने हमें उस 10 रुपए की टिप दी थी.
हम सबने आपस में कहा, ”क्‍या आदमी है यार? ऐसे आदमी रोज क्‍यूं नहीं आते?”
मेरे मालिक ने कहा, ”है कोई दिलदार आदमी.”

अपने मालिक के मुंह से ऐसी बात उस ग्राहक के लिए सुनकर मैं हैरान हो गया. अभी थोड़ी देर पहले ही जब वो ग्राहक हमारे रेस्‍टोरेण्‍ट में आया था. और जब उसने खाने का ऑर्डर दिया, तब यही मालिक कह रहा था,
“दे दो. रात को ”पूड़ी-सब्‍जी” मांग रहा है. यूपी-बिहार से आया होगा.”
यहाँ बात पूड़ी-सब्‍जी की नहीं थी. बात थी कीमत की.

वो ग्राहक जब आया तो हम सबने उसे एक साधारण ग्राहक ही समझा था जैसा कि हम समझते हैं और इसके अलावा कुछ और समझने की हमारे पास कोई वजह भी नहीं होती है.

उसने मुझे पूरे 25 प्रतिशत की टिप दी थी. ये मेरी जिन्‍दगी में अब तक का सबसे महंगा टिप था.
लेकिन उस ग्राहक ने हमारे साथ जो किया उसकी क्‍या वजह रही होगी?
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क़ैस जौनपुरी
qaisjaunpuri@gmail.com
+91 9004781786

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रचनाकार: वजह / क़ैस जौनपुरी
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