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ईबुक - सरहदों की कहानियाँ -9 / मज़बूत टाँका हुआ बटन - पोपटी हीरानंदाणी / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

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मज़बूत टाँका हुआ बटन

पोपटी हीरानंदाणी

मेरी भाग्यवान देखी है? हक़ीक़त में जैसे मिलिटरी का एक किरदार। उस दिन कहा था, "मुझे तुम्हारी यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगती।"

मैंने कहा था- "मेरी कोई भी बात तुम्हें अच्छी लगी है क्या?"

तब कहती है- "तुम हो ही उल्टे तो फिर मैं क्या करूँ?"

अब मैं हो गया उल्टा और वह हुई सुल्टी। खट-पट भी तो इतनी है

कि बस बात ही मत पूछो। ज़बान जैसे तेज़ धार वाली तलवार। मुझ जैसे छः फुट वाले को उसकी तीन इंची ज़बान लिटा देती है। दोस्त कहता है,

"जिस घर में मधुर वार्तालाप करने वाली औरत न हो उसे जंगल में बस जाना चाहिए।" सच, भला जंगल इस मेरे घर से किसी भी हाल में बदतर न होगा?

बराबर आग वन में भी लगती है। पर जब लगती है तो सब कुछ भस्म कर देती है न? यहाँ तो हरदम आग लगती रहती है। किसी न किसी कोने में आग के शोले उठते ही रहते हैं। इससे तो अगर घर छोड़कर निकल.... पर मैं निकलूँ तो क्यों निकलूँ? घर मेरा और मैं ही निकलूँ? क्यों न उसको ही निकाल दूँ? निकाल दूँ....? अपने बच्चों की माँ को निकाल दूँ? बच्चों का क्या होगा? घर का क्या होगा? लोग क्या कहेंगे? लोग!

लोगों को मारो गोली। ये ही तो थे जो कहते फिरते थे- "शादी क्यों नहीं करते?"

"मूमल का मुखड़ा कब दिखाओगे?"

"भगवती के शादी ब्याह के गीत कब गूँजेंगे?"

ये लो, मूमल ले आया, अब इस भाग्यवान सुराही के मुँह से जो यह ज़़हर उगलता रहता है, वह मेरे सिवा दूसरा कौन निगलता है?

 

मैं भी अजीब आदमी हूँ। इस तोती ने अपनी चोंच से कोंचते-कोंचते मेरे पंखों को इतना सपाट और चिकना बना दिया है कि मेरे पास सालों के

साल उसके साथ पिंजरे में रहने के सिवा और कोई रास्ता ही नहीं बचा है। पर सोचता हूँ कि मैं उससे इतना क्यों डरता हूँ? औरत से डर रहा हूँ। ऑफ़िस में तो मैं कड़कती आवाज़ में बात करता हूँ। वह ज़रीन कपाड़िया मुझसे कितना कतराती है? ड्राफ्ट लिखते वक़्त उसके हाथ काँपते हैं। सब चपरासी मुझसे डरते रहते हैं। मैं भी कहता हूँ भले ही डरते रहें.... इस ऑफ़िस में मेरा प्रभुत्व बना रहे.... वैसे घर में तो वह मुझे धमकाती रहती है। सच तो यह है कि उँगली से उठाती है और उँगली से बिठाती है। मेरे आत्मविश्वास को कुचलकर रख दिया है। बच्चे कुछ पूछते हैं तो कहता हूँ- "जाकर माँ से पूछो।" उस दिन फत्तू ने जब कोर्स के बारे में पूछा, तब भी माँ से पूछने के लिये कहा तो कितना चकित हुआ? कह दिया- "डैडी! ममी को कॉलेज अध्ययन के बारे में क्या पता?"

मैं भी क्या करूँ? कभी कुछ कहता ही नहीं हूँ कि मिलिट्री का क़ायदा लागू हो जाता है। फ़ारसी के जानकार सच कहते हैं कि शादी की पहली रात ही बिल्ली मारनी चाहिए नहीं तो फिर बीवी सर पर नाच करने लगती है।

तौबा.... तौबा... ज़बान की कैंची इतनी तेज़ चलाती है कि मेरा वजूद ही टुकड़ों टुकड़ों में कटकर दर्जी के चिथड़ों की तरह हो जाता है। इससे तो शादी न करता!

पर भाई, शादी करने का तो मेरा भी दिल था। मैं समझा, औरत क्या होगी खांड की डली होगी। उसके नरगिसी चेहरे पर महकती शबनम होगी जिससे हर वक़्त आस-पास सुगंध आती रहेगी। वह बात करेगी तो गीत झड़ने लगेंगे और मैं सुध-बुध भुलाकर उस मधुरता में मदहोश हो जाऊँगा। मुझे क्या पता कि यह बला मेरे पल्ले पड़ जाएगी।

भला शादी की तो हर वक़्त उसे कहते रहते- "मेरी चाशिनी.... मेरी रोशनी.... मेरी बुलबुल..... मेरी सोहनी....." बिलकुल मुरीद बनकर उसके पीछे क्यों फिरता रहा?

सच.... उस वक़्त मुझे कितनी अच्छी लगती थी। पलकें झुकाकर तिरछी नज़र से मेरी ओर देखती थी तो मेरे सारे शरीर में विद्युत प्रवाहित होती थी। उसका दुपट्टा कंधों से खिसककर नीचे सरक आता था तो मेरी तमन्नाएँ ऊपर उभर आतीं.... उसका हाथ पकड़ता था तो वह शरमाकर कहती थी.... ‘छोड़ो ना, क्या कर रहे हो?’ बस.... मेरे दिल की उमंगों की तरंगें एक दूसरे के ऊपर लहराती बलखाती रहतीं.... एक अनोखी ख़ुशी की झाग मेरे दिल के किनारे चले आया करती। गर्म और तेज़ अरमानों की चमक मेरे मन पर फैल जाती थी।

पर अमा यार, जब मैं जवान था जवानी के रंगों के सामने इन्द्रधनुष के रंग भी पछाड़ खा जाते। जोबन की उस अवस्था में कड़वी मिठास और मीठी कड़वाहट, मिलना और तड़पाती ख़ुशी और बिछड़ने में सोज़ भरा सुख, न जाने क्या क्या महसूस किया है!

तो क्या अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ? अभी तो सिर्फ़ चालीस पार किये हैं। परदेस में चालीस के बाद ही जवानी की ऋतु शुरू होती है। पर दोष भी तो मेरा ही है, तब इतनी खुशामद न करता तो आज इतना सिर घूमा हुआ न होता।

पर अब भी वक़्त है, अगर डंडा उठेगा तो भला होगा... च....च...

क्या कह रहे हो? क्या करोगे आख़िर? क्या मारोगे उसे? बस इसी शराफ़त ने तो मार डाला है। अगर मुझ-सा कोई मर्द सामने होता तो उसके दाँत तोड़ देता, पर इस औरत जात के सामने....

पता नहीं ये औरतें ऐसी क्यों बनी हैं आख़िर? क्यों एक औरत में दो औरतें समाई हैं.... एक कोमल, दूसरी कठोर। एक फूल जैसी, दूसरी लोहे जैसी.... एक शीतल अग्नि और दूसरी जलता पानी.... ओह! दो विपरीत चीज़ें मिलेंगी तो ऐसा ही होगा।

हे मेरे भगवान! बड़ी समालोचना वाली नज़र होती है उनकी। उस दिन कह रही थी कि "चलो बांद्रा, मेरी मासी के पास।"

"अरे, मैं तुम्हारी मासी के पास चलकर क्या करूँगा?"

भला दो औरतें मिलती हैं तों बातें करती हैं फ़क़त अचार और पापड़ के बारे में, तक़रीरें करती हैं, भाजियों की मंहगाई पर और बहस करती हैं अनजाने लोगों की मंगनी और शादी की बातों पर।

मैंने कहा- "मैं बैठकर मैगज़िन पढ़ता हूँ।" तो मुँह फुलाकर बैठ गई

है। हैफ़ है हमारी मर्दानगी पर और शर्मिंदगी होती है हमारे मर्द होने पर। बस, अगर औरत ने दो आँसू टपका दिये तो हमने अपनी दाढ़ी दे दी उनके

हाथ में....!

कल बेचारा विश्नू आया था। छुटपन का दोस्त है, सहचर सखा। खाना खाकर निकल पड़े और जाकर अंधेरी में होतू के पास पहुँचे। पर अगर निकल गए तो क्या हुआ?

पर घर पहुँचे तो रात को दिन बनाकर रख दिया। बात का बतंगड़ हो गया। शादी की तो नल-दमयंती की तरह एक ही चादर में लिपटे से रहते। बस कहती है- "उस मुर्दार विश्नू से क्यों नहीं शादी कर ली?"

वह सुन्दर मेरी मासी का बेटा है। है पूरा घुमक्कड़, सचमुच पक्का बंडलबाज, पर कुछ भी कहो वह मन बहला जाता है। अगर थोड़ी व्हिस्की पीता है तो क्या हुआ? बोतल अगर पीता हूँ तो उसके मैक़े से तो नहीं ले आता?

पर सुंदर का कहना तो उसे अच्छा ही नहीं लगता। अरे, अगर मेरी पत्नी है तो क्या हुआ? तुम्हारा पति हूँ तो क्या किसी का बिरादर, यार-दोस्त नहीं हुआ क्या? माँ और बहन को तो सहती ही नहीं, चाहे वे कितनी भी इससे अच्छी लय ताल में व्यवहार करें। यह बस उनकी कमियों और कमज़ोरियों की ओर ही नज़र धरेगी। उसका पति होने के नाते क्या सिर्फ़ उसकी ही जागीर बन गया? ख़ुद भले ही हज़ारों खर्च करके साड़ियाँ ले ले, पर मजाल है कि बहन के लिये कभी भूले से भी सौ डेढ़ की कोई चीज़ ख़रीदे। मेरी माँ को भी अगर कुछ देती है तो लेखा जोखा सुनाकर, दाम को दस गुना बढ़ाकर, फिर भी जैसे उस पर बहुत मेहरबानी करते हुए। पैसे मेरे और मेहरबानी उसकी। छाुल्म है! बैल की तरह पसीना बहाकर पैसे हम कमाएँ और वे उस कमाई के पैसे की मुफ़्त में मालकिन बनती हैं। अजीब माजरा है। सिर्फ़ मालकिन बनें तो ग़नीमत, पर मेरे समस्त हस्ती के हक़ वास्ते जैसे उसे सौंपे हुए हैं। मेरे समय पर और मेरे पैसे पर, मेरे आने पर और मेरे जाने पर, मेरे उठने बैठने और बातचीत पर भी उसका हक़ है। वह लीला है न? मोती की पत्नी, उसका तौर-तरीक़ा, चाल-ढाल कितना मधुर व मनमोहक है। बातचीत भी मेरी गोपी की तरह नहीं है। बात करती है, तो लगता है जैसे सुबह की हवा सैर को निकली हो। दो घड़ी जाकर उसके घर बैठो तो लगता है घुटन भरे कमरे से निकल कर किसी नीम के पेड़ की छाँव तले बैठा हूँ। कभी तो उसकी काट खाने वाली बातों से भागकर उनके पास जा बैठता था तो ऐसे लगता था जैसे अष्टमी की रात चाँद और तारों के नीचे किसी की मधुर बाँसुरी सुन रहा हूँ। पर उसे मेरी ख़ुशी क्यों रास आती? सच में परेशान कर दिया है। अभी चप्पल पहन कर दरवाज़े की तरफ़ जाऊँ तो सवालों से हमला शुरू कर देती है- "कहाँ जा रहे हो? मोती के घर में क्या मिलता है? इससे बेहतर है घर में बैठकर आराम करो।"

दिल कहता था कि कह दूँ- "मेरी हर बात में हस्तक्षेप क्यों करती हो? आराम जाने और मैं जानूँ, तुम क्यों बीच में परेशान होती हो?"

वह घूरती इस तरह थी जैसे ज़हर भरा तीर फेंक रही हो। आख़िर तो मैं भी आदमी हूँ कोई कीड़ा-मकोड़ा नहीं? अरे उस ईश्वर ने भी एक कहानी लिखी थी- ‘मरा हुआ मकोड़ा’। पर मैं वह मकोड़ा बनूँ? बेग़ैरत मर्द बनूँ?

यह तो होना ही नहीं है। गर्दन मरोड़ दूँगा.... मरोड़ कर फेंक दूँगा। पर भैये, ये है सच, बचपन में रिकार्ड प्लेयर पर सुना थाः

घोट चढ्हयो घोड़ीअ ते नास पितो बोड़े

सवा घड़ीअ वास्ते सजी उम्र थो लोड़े।

(मतलब : दूल्हा चढ़ा घोड़ी पे, सब कुछ दाँव पर लगाकर, सवा घड़ी के वास्ते उम्र भर भोगता है।)

बस खांड पर जमा कीड़े मकोड़े जैसी हालत है हम मर्दों की। अरे शायद धोबी बन गया हूँ। सोच रहा हूँ.... कुर्ता निकाल कर पहन लेता हूँ.

... मुश्किल से जाकर इतवार मिलता है.... आज लेट जाता हूँ....!

अरे पर इसका बटन तो टूट गया है.... कहता हूँ कि टाँक दे.... नहीं नहीं रहने दो बिचारी को.... भले आज़ादी का आनंद लेने दो.... नहीं तो ऐसा मजबूत टाँकेगी कि क्या कहूँ.... छेद से सुई पार करके चारों ओर धागा लपेटकर.

...सुई आर-पार.... धागा चारों ओर....

"अरे लेट क्यों गए हो? भाभी के पास चलना है। जल्द ही तैयार होकर आओ, नहीं तो कहोगे धूप में लेकर चली थी इसलिये सर में दर्द हो गया है...."

"आज छोड़ दो, तुम भाभी के पास होकर आओ। मैं बैठ जा...."

"नहीं....नहीं.... ऐसे कैसे होगा? सब के साथ थोड़े ही रिश्ता तोड़ दोगे.... उठो... कमीज़ पहनो...."

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ईबुक - सरहदों की कहानियाँ / / अनुवाद व संकलन - देवी नागरानी

 

Devi Nangrani

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

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