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अधिकार न मान बैठें सुविधाओं को / डॉ. दीपक आचार्य

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जिसको अपनी विद्या-बुद्धि और हुनर से जो कुछ भी अधिकार प्राप्त हैं उनका बखूबी निर्वाह करना चाहिए। अधिकारों का निर्भयतापूर्वक और मर्यादित उपयोग जरूर करें मगर इनके दुरुपयोग की अच्छा कभी न रखें।

जो लोग अपने-अपने अधिकारों की निर्धारित पटरी पर चलते रहते हैं उनके जीवन में अधिकारों और प्रतिष्ठा को लेकर किसी भी प्रकार का कोई संकट नहीं आता। ये लोग पूरी जिन्दगी अपने को प्राप्त अधिकारों का ही उपयोग करते हैं और  उसी में मस्त रहते हैं।

अपने अधिकारों के पालन के प्रति गंभीर रहें। दूसरों के अधिकारों के बारे में जो सोचता है वह जीवन भर दुःखी और सन्तप्त रहता है। कई बार हर प्रकार के अधिकार अलग-अलग तरह के लोगों के लिए होते हैं। कोई किसी का अधिकार नहीं छीन सकता यदि वह मर्यादित स्वभाव में जीने वाला हो, जिसके जीवन में आत्म अनुशासन हो तथा जो  न्याय पथ का अनुगामी हो।

सर्वाधिक संघर्षों, खिन्नताओं और विषमताओं की नौबत वहाँ आती है जहाँ कोई अपनी खाल से ज्यादा जिस्म पसारने लगता है, अपने दिमाग की क्षमताओं और कल्पनाओं से परे सोचने लगता है, अपने खोल की सीमाओं का व्यतिक्रम करने लगता है और दूसरों के अधिकारों को देख कर ईष्र्या या प्रतिस्पर्धा करने लगता है।

हर इंसान अपने लिए निर्धारित अनुशासन, मर्यादाओं और क्षमताओं का उल्लंघन करने लगता है तभी उसके लिए समस्याएं सामने आती हैं। जिसे जो अधिकार प्राप्त हैं उन्हीं में संतोष करना सीखना चाहिए।

ईश्वर और व्यवस्था ने हरेक इंसान को उसके बुद्धि-बाहू और दूसरे सभी प्रकार के बलों के अनुसार बनाया है और उसी के मुताबिक उन्हें पद, काम और स्थान सौंपे हुए हैं। मर्यादाएं सबके लिए हैं।

मर्यादाओं के मामले में कोई अलग नहीं है। सबकी अपनी-अपनी मर्यादाएं हैं जिनका पालन न केवल खुद के लिए अनिवार्य है बल्कि यह भी जरूरी है कि हम इसका पालन कराएं भी।  उन लोगों को भी सिखाएं जो मर्यादाओं का पालन करने से हिचकते हैं या जिन्हें शर्म आती है।

मर्यादा भंजकों को भी समझाएं कि मर्यादाओं का पालन करें। आजकल की तमाम समस्याओं का मूल मर्यादाहीनता है। हर कोई अपने आपको विशालकाय द्वीप की तरह मानने और महसूस करने-कराने लगा है।

इंसान कई प्रकार से व्यवहार करता है। कुछ लोग अहंकार मुक्त, सरल और सादगीपूर्ण होते हैं और ये अपने आपको तुच्छ मानकर जीते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि ये लोग ऊर्जावान नहीं हैं बल्कि सच तो यह है कि ये लोग सब कुछ होते हुए भी अपने आपको छोटा ही मानने देना चाहते हैं।

इस तरह के लोग संस्कारी परिवारों के होते हैं और इन्हें ईश्वर के प्रति अगाध आस्था और विश्वास भाव होता है। दूसरी तरह के लोग अपने आपको किसी न किसी एकाध घटना से दुष्प्रभावित होकर हीन मान लेते हैं और जिन्दगी भर हीनता बोध में जीते हुए जिन्दगी को जैसे-तैसे काटते रहते हैं।

जबकि बहुत बड़ी संख्या में लोग हैं जो ज्ञान, प्रतिभा या हुनर में कुछ भी खास नहीं रखते। ये या तो औरों के दम पर उछलकूद करते हुए अपने आपको बड़ा सिद्ध करते रहते हैं अथवा अपने से अधिक अधिकारों की चोरी या छीना-झपटी अथवा दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए अपने आपको महान और शक्तिशाली सिद्ध करने के लिए हरचंद कोशिशों में जुटे रहते हैं।

इन सभी तरह के लोगों के बीच अधिकांश लोग उनमें शुमार हैं जो चाहे-अनचाहे प्राप्त हो जाने वाली सुविधाओं की वजह से अहंकारी हो जाते हैं और इन सुविधाओं के पीछे पागल होते हुए अपने आपको सुविधासम्पन्न बनाने के लिए सभी तरह के रास्तों को अपनाते रहते हैं।

इनमें गलत-सलत रास्ते भी शामिल हैं। आज अधिकांश लोग अपने  को प्राप्त अधिकारों और सुविधाओं से संतुष्ट नहीं हैं। ये लोग हमेशा अपने से ऊपर वालों के अधिकारों और सुविधाओं पर ललचायी दृष्टि रखते हैं और यह प्रयास करते हैं कि किसी तरह ये सुख-सुविधाएं और अधिकार उन्हें भी प्राप्त हो जाएं।

सुविधाएं प्राप्त हो जाना अलग बात है लेकिन अब लोग सुविधाओं को अधिकार समझ बैठे हैं और यही कारण है कि जब सुविधाएं प्राप्त नहीं हो पाती हैं तब कुलबुलाते हैं, परेशान हो उठते हैं और ऎसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे कि उनकी जिन्दगी का सब कुछ छीन लिया गया हो।

वर्तमान में अधिकांश लोगों की पीड़ाओं, तनावों और दुःखों का कारण यही है। हमारे जीवन से सरलता, त्याग, तपस्या, परिश्रम, सादगी और सहजता गायब हो गई है। हमें पग-पग पर सुविधा चाहिए और वह भी मुफत में।

हमें गाड़ी-घोड़े, माल-असबाब, जमीन-जायदाद, पद-प्रतिष्ठा आदि सब कुछ चाहिए लेकि बिना मेहनत किए। एक बार कोई इंसान किसी भी प्रकार से सुविधाओें और अधिकारों के मामले में सुविधाभोगी हो जाता है, उसके बाद उसका जीवन नाकारा हो जाता है।

वह इतना आरामतलबी हो जाता है कि अपने आपको लाट साहब समझने लगता है और लाटसाहबों से न कोई काम हो सकता है, न इन्हें काम आता है, यह हम सभी जानते हैं। लाट साहब केवल दर्शनीय, वंदनीय और अभिनंदनीय ही हुआ करते हैं। किसी काम-काज के नहीं होते।

समाज के खुले-पसरे खेत में ये बिजूकों की तरह जिन्दा हैं। हवाओं का इशारा पाकर डोलते रहते हैं। हवाएं जिधर का रूख करती हैं, उधर ये झुकते और मुड़ते रहते हैं। अपने दायरे में रहें, अपने को प्राप्त से अधिक सुख-सुविधाओं और अधिकारों की लालच न रखें।

इसके लिए पिछले दरवाजे से सब कुछ हासिल करने की बजाय हुनर और  प्रतिभा से हासिल करने के प्रयास करें और विधि  सम्मत रास्तों से आगे बढ़ने की कोशिश करें। इस मार्ग से क्रमोन्नत हुई सुख-सुविधाएं और अधिकार शाश्वत रहते हैं और इन पर कोई उंगली भी नहीं उठा सकता।

किसी भी कारण से हमें जो सुविधाएं मिल रही हैं वे स्थायी नहीं हैं इसलिए इनके प्रति मोहग्रस्त न रहें। सादगी और सरलता अपनाएं। दूसरे के अधिकारों को छीनने के प्रयास न करें। अपने अधिकारों की समझ रखें, दूसरों के अधिकारों की रक्षा भी करें और सम्मान भी।

 

डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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