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काला मन, काली निगाह काली जुबाँ, काले काम / डॉ. दीपक आचार्य

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काला मन, काली निगाह

काली जुबाँ, काले काम

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

कोई कितना ही साँवला या गोरा हो, दिखने में कितना ही सुन्दर और आकर्षक हो।  अपने आपको आकर्षक दिखने-दिखाने के लाख जतन करता है, यह जरूरी नहीं कि उनके मन-मस्तिष्क और आभामण्डल में कालिख न हो। 

तन के रंग का मनःसौन्दर्य से किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं है। मन-मस्तिष्क का सीधा संबंध शरीर पर अनिवार्य रूप से प्रतिभासित होता है इसमें कोई शक नहीं। ब्यूटी और स्पॉ पार्लरों में घण्टों गुजारने वाले, सामान्य और केरलीय पंचकर्म के सहारे अपने आपको हमेशा जवाँ और खूबसूरत दर्शाने वाले, रंग-रंग और जात-जात के खिजाबों व डाई से केश सौन्दर्य पाने और कृत्रिम स्मार्ट बनने वाले सभी लोगों का मन शुद्ध और  सौन्दर्य से भरा हो ही, यह संभव नहीं है।

मौलिक सौन्दर्य का कोई मुकाबला नहीं। जो लोग मन के साफ होते है। जिनका दिमाग खुराफातों और षड़यंत्रों से दूर रहता है, उन लोगों का मनः सौन्दर्य ही इतना अधिक होता है कि वे स्वाभाविक रूप से ओज-तेज से परिपूर्ण रहते हैं और उन्हें किसी ब्यूटी पॉर्लर में जाने या ब्यूटीशियनों की बैसाखियों के सहारे अपने आपका वजूद बनाए रखने की कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ती।

मौलिक मनःसौन्दर्य वाले इंसान भी यदि किसी के बहकावे या भ्रम में आ जाने पर कॉस्मेटिक्स और ब्यूटी पॉर्लरों का सहारा ले लिया करते हैं उन्हें रसायनों के घातक परिणाम भुगतने भी पड़ते हैं।

आकर्षण जगा पाने की क्षमता वही सौन्दर्य रखता है जो कि मौलिक, स्वाभाविक और मनःसौन्दर्य से प्रतिबिम्बित होने वाला हो। क्योंकि यही तीन कारक हैं जो शरीर  से आकर्षण बिखेरने वाली रश्मियों और तरंगों का प्रस्फुटन करते रहते हैं और अपने आभामण्डल को इतना अधिक आकर्षक बनाए रखते हैं कि जिसकी निगाह हम पर पड़ती है या जो हमारे करीब आता है वह मोहपाश में बँध जाता है और यह अनुभव करता है कि वास्तव में यदि सौन्दर्य है तो यही है। 

जो लोग रसायनों के लेप और ब्यूटी पॉर्लरों के सहारे सौन्दर्य की चाहत को ही जिन्दगी का सबसे बड़ा सत्य, लक्ष्य और ध्येय मानकर चलते हैं उनमें यह भीतरी रश्मियां और तरंगें नहीं हुआ करती। इन लोगों को दूर से देखकर आभासी आकर्षण भले ही लगे, इन्हें देख कर हर किसी को लग ही जाता है कि ये लोग औरों को दिखाने और मोहपाश का घेरा बनाने के लिए दिखावटी सौन्दर्य लेकर आए हैं।

इनके प्रति मनुष्य के भीतर न कोई खिंचाव होता है, न कर्षण का भाव जगता है, न माधुर्य, प्रेम या आसक्ति का भाव जग पाता है। वासना का जगना स्वाभाविक है और ऎसा ही होता है।

बन-ठन कर सामने आने वाले लोगों का अहंकार भी इसी से पुष्ट होता है कि लोग उनके चेहरे-मोहरे और फीगर, कपड़ों-लत्तों और आभूषणों, जूतों और तमाम प्रकार की उस हर सामग्री की तारीफ करें जो उन्होंने आयातित स्वरूप में ओढ़ रखी है।

अपनी तारीफ सुनकर मन प्रसन्न हो उठता है और यही प्रसन्नता कुछ क्षण के लिए उनके चेहरे पर लावण्य के भाव ला सकती है लेकिन इसका ज्यादा समय तक असर नहीं रहता। देखने वाले लोगों में भी अधिकांश हमारी कृत्रिमता को जानते-पहचानते और समझते हैं लेकिन हमें खुश करने के लिए वे झूठी तारीफ भी कर दिया करते हैं।

झूठी तारीफ करके सामने वालों को खुश करने की कला आजकल अभिजात्यों, बुद्धिजीवियों या चतुर लोगों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि सामान्य से सामान्य आदमी भी इस बात को अच्छी तरह समझता है कि आजकल लोग सच को पसन्द नहीं करते, सिर्फ और सिर्फ तारीफ ही चाहते हैं इसलिए आजकल झूठी तारीफ करना इंसान का सर्वोपरि स्वभाव हो गया है।

इस तिलस्म के सहारे बहुत सारे लोग बड़ो-बड़ों को उल्लू बनाकर अपने काम निकाल और निकलवा रहे हैं। पिछले कुछ समय से तारीफ दर तारीफ करने वालों की बेतहाशा बढ़ती जा रही भारी भीड़ में ऎसे लोग भी हैं जो नकारात्मकताओं के सारे अवगुणों को आदर, सम्मान एवं श्रद्धा के साथ स्वीकार कर चुके हैं।

इन लोगाें द्वारा की जाने वाली तारीफ से सामने वाला कोई भी इंसान खुश हो न हो, उसे इनकी बुरी नज़र जरूर लग जाती है जिसकी वजह से अच्छे-भले संस्कारित और मनःसौन्दर्य वाले लोग भी मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान हो जाते हैं, चेहरे की तेजस्विता पर ग्रहण लगने लगता है।

जो लोग काले मन के हैं वे निश्चित तौर पर काली निगाह, काली जुबान और काले कर्म वाले होते ही हैं। ऎसे लोग यदि तारीफ भी करें तो नुकसान सामने वाले का होता है। और इस किस्म के लोग हमारे आस-पास ही रहने वाले हों तब तो हमारा भगवान ही मालिक है। ये झूठी तारीफ करने वाले लोग किसी के नहीं होते। न ये किसी के काम आने वाले होते हैं।

इन लोगों के जीवन का सबसे बड़ा ध्येय यही रहता है कि औरों को खुश करने के सारे जतन करते हुए अपने काम निकलवाते रहो, मुफत में सब कुछ करवा लो। सामने वाला जिसमें राजी हो, उसी विधा को अपना लो और खुश कर दो। हमें अपने कामों और स्वार्थ पूरे होने से मतलब है फिर किसी की झूठी तारीफ से खुश किया जा सके तो इससे सस्ता उपाय और कोई है ही नहीं।

जब से लोग यह जान गए हैं कि झूठी तारीफ करने और इसे बार-बार दोहराने मात्र से किसी को भी खुश किया जा सकता है तभी से तारीफों का दौर परवान पर है। हर तरफ झूठ के साथ तारीफों का चलन आज की पहली प्राथमिकता हो गई है। और लोग भी अपनी तारीफ सुनने-सुनाने के इतने अधिक भूखे-प्यासे हैं कि लगता है कि उनकी कई पीढ़ियों की किसी ने प्रशंसा नहीं की होगी।

जो लोग दूसरों की झूठी तारीफ करते हैं उनके मन-मस्तिष्क मैले होते हैं, इनकी निगाह, वाणी और संकल्प दूषित होते हैं। भले ही ये लोग अपने आपको बहुत बड़े साधक, आध्यात्मिक और धार्मिक, महान व्यक्तित्व, सिद्ध और चमत्कारिक गुरुओं के चेले-चेलियों के रूप में प्रचारित करें और यह जताएं कि उनके मुकाबले पाक-साफ और कोई नहीं हो सकता। लेकिन हकीकत यही है कि ये लोग मन, दिमाग, निगाहों और कर्मों के काले होते हैं और इनके द्वारा जब भी किसी की तारीफ की जाती है, इसका नुकसान सामने वाले को होता है।

इसलिए जहाँ तक हो सके, इन लोगों से बच के रहें क्योंकि इनके दर्शन, किसी भी तरह का व्यवहार, इनके साथ रहन-सहन और खान-पान तथा इनका सामीप्य तक भी बुरा होता है।

इस किस्म के लोग सभी जगह हैं जो दिखने में बड़े ही शालीन, धीर-गंभीर, वफादार, सुन्दर और मोहक होते हैं लेकिन इनकी वजह से दूसरों को बड़े-बड़े नुकसान उठाने पड़ते हैं जिसे आंका नहीं जा सकता।

इन अभिशप्त लोगों से सायास दूरी ही इनसे बचाव का मार्ग है।  अपने जीवन, कर्मक्षेत्र और व्यवहार रखने वाले लोगों को जानें और इनसे समुचित दूरी बनाए रखें

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