बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

आत्मानुशासन जरूरी / डॉ. दीपक आचार्य

आत्मानुशासन जरूरी
- डॉ. दीपक आचार्य
 
आत्मा की आवाज और आत्म अनुशासन हर किसी के लिए वह प्राथमिक जरूरत है जिसकी बुनियाद स्वीकार कर ली जाए तो पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक की तमाम समस्याओं, विषमताओं और तनावों से मुक्ति का सुकून पाया जा सकता है।
लेकिन इसके लिए वंशानुगत संस्कारों, मातृभूमि के प्रति समर्पण और औदार्य भावना के साथ जन-मंगल से लेकर विश्व मंगल तक की सभी सेवाओं को निरपेक्ष भाव से आत्मसात करना जरूरी है।
आत्मा हमारे जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु होने तक की एक-एक घटी और पल का हिसाब रखती है। हमारा कोई सा संकल्प, स्वभाव, व्यवहार और कर्म ऎसा नहीं है जो आत्मा नहीं जानती हो। 
जब हम अच्छे, मर्यादित और अनुशासित कर्मों को अपनाते हैं तब आत्मा की आवाज मुखर होती है और कई बार वह हमारे भावी अच्छे-बुरे के बारे में साफ-साफ संकेत भी करती है।
जब हम सारी मर्यादाएं, अनुशासन और सीमाएं छोड़कर अपनी पर उतर आते हैं, बेपटरी हो जाते हैं तब आत्मा की आवाज तो आती है मगर हमारे स्वार्थ, बाहरी चकाचौंध और क्षणिक भोग-विलास के कृत्रिम आनंद के शोर में वह दब जाती है और हमें सुनाई नहीें देती।  फिर हम उन लोगों से घिरे रहते हैं जिनके लिए न आत्मा की आवाज का कोई महत्व है, न इंसानियत का। आस-पास के गंदे, मलीन और अभद्र लोगों के निरन्तर शोर के कारण भी हम आत्मा की आवाज सुन नहीं पाते और इसका खामियाजा अन्ततोगत्वा हमें ही भुगतना पड़ता है।
यह वह स्थिति होती है जब हम न तो आत्मा की आवाज को सुनने के प्रति दिलचस्पी रखते हैं और न ही उसे सुन लेने के बाद भी उसके अनुरूप कर्म को मोड़ते हैं। हम लोग अपने सिवा किसी को मानते ही नहीं, न सिद्धान्तों, मर्यादाओं और आदर्शों को, न अच्छे-बुरे कर्म को।
यह वह अवस्था होती है जिसमें हम ईश्वर को भुला बैठते हैं और अपने आपको संप्रभु मानकर उन्मुक्त, उच्छृंखल और स्वेच्छाचारी गतिविधियों को अपना लेते हैं।  इनमें हर तरह के खोटे कर्म करते हुए भी न हमें आत्महीनता का अनुभव होता है, न किसी प्रकार की लज्जा का। हम हद दर्जे के बेशर्म की तरह अपनी पूरी नंगई और गुण्डई में उतर आते हैं
यह स्थिति हमारे शरीर के लिए तो आनंद का आभास कराने वाली होती है लेकिन आत्मा से हमारा रिश्ता केवल प्राण धारण तक ही रहता है। हमारी आस्था अपने सच्चे-खोटे कामों, स्वार्थ की हरकतों और मर्यादाहीनता की भेंट चढ़ जाती है।
इस मुकाम तक पहुंचते-पहुंचते हम लोग सब तरफ अपने और अपनों को ही देखना चाहते हैं, अपने लिए ही जीने को जीवन का लक्ष्य मान बैठते हैं और जो कुछ करते रहते हैं वह अपने लिए ही।  अपने अलावा और किसी के बारे में सोचने-समझने और करने का भाव हमारे भीतर से पूरी तरह समाप्त हो जाता है।  संसार भर के लिए पैदा होने के बावजूद हम संकीर्णता ओढ़ लेते हैं और यह संकुचित व्यवहार हमारे स्वभाव, जीवन व्यवहार और सभी कर्मों में व्यक्त होता है और दूसरों को भी अनुभवित होता है।
आत्मा से हम इतना अधिक दूर हो जाते हैं कि बार-बार वह हमें अपने भले-बुरे और भावी के बारे में संकेत करती रहती है लेकिन हम अनसुना करते रहते हैं अथवा हम दिन-रात इतने अधिक व्यस्त हो जाते हैं कि एक क्षण के लिए भी आत्मा की आवाज सुनने की फुरसत नहीं होती। यही कारण है कि इस प्रकार के लोगों के लिए कहा जाता है कि  इनकी आत्मा ही मर चुकी है।
इसी प्रकार हमारे कर्मयोग की तमाम धाराएं भी अपने स्व अनुशासन पर निर्भर हुआ करती है। किसी इंसान को उसके कर्तव्य कर्म, सीमाओं, मर्यादाओं और अनुशासन के बारे में कितना ही अधिक समझाया जाए, वह नहीं समझता।
कुछ तो इतने अधिक दुराग्रही, ढीठ और निरंकुश हो जाते हैं कि कुछ करना नहीं चाहते। इन्हें बिना मेहनत किए सब कुछ चाहिए और वह भी बिना किसी कटौती के। बहुत से हैं जो इस श्रेणी में शुमार हैं और जिनके बारे में हर बार कहा जाता है कि ये लोग सुधरने वाले नहीं। ये लोग धरती पर हमेशा भार बने रहते हैं और पृथ्वी भी इनसे परेशान रहती है।
संसार में बेवक्त पैदा हो गए और केवल क्षणिक सायास-अनायास दैहिक मनोरंजन और व्यभिचार के परिणाम स्वरूप मनुष्य का पिण्ड धारण कर धरा पर आ चुके लोगों की यही खासियत है कि ये लोग कोई काम समय पर नहीं करते। न अपने रोजमर्रा के काम समय पर कर पाते हैं, न ही अपनी ड्यूटी। इनके लिए समय का कोई मूल्य नहीं होता। खुद समय को पहचानते नहीं, दूसरों का समय बिगाड़ने में अहम भूमिका अदा करते हैं।
इन लोगों को कोई भी भरोसे लायक नहीं समझता। हाँ, इतना अवश्य है कि ये अपने स्वार्थ और लाभों के कामों में इतने पक्के होते हैं कि जहां इनका स्वार्थ सध रहा हो वहाँ कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं।
इन्हें अपने निर्धारित कर्तव्य कर्म के अलावा सब कुछ करने में मजा आता है। किसी को लड़ाना-भिड़ाना हो, शिकायत या चुगली करनी हो,  किसी को नीचा दिखाने और गिराने के लिए किसी भी प्रकार का षड़यंत्र करना हो या
और कुछ भी, हमेशा तैयार रहते हैं।
जिन लोगों में अपना खुद का अनुशासन नहीं है, मन में रुचि और लगन नहीं है, वे लोग मरे नहीं सुधरते।  इनकी आत्मा मर चुकी होती है। इस प्रजाति के लोग आजकल सभी स्थानों पर खूब उगने और फबने लगे हैं जिनकी शक्लें और व्यवहार देख कर हर कोई यह कहने को उतावला हो जाता है कि ये लोग किस काम के, अच्छा होता इनकी बजाय कोई दूसरा होता तो कुछ तो करता। 
भारतवर्ष की यह सबसे बड़ी सार्वजनीन समस्या है जिसने देश को पिछड़ेपन से मुक्त कराने के सारे प्रयासों पर पानी फेरने में कोई कमी नहीं रख छोड़ी है। इस श्रेणी के कुछ लोग तो पैसे बनाने और जमा करते रहने में इतने अधिक लिप्त हो गए हैं कि ये किसी विक्षिप्त या भिखारी से कम नहीं लगते। अपने शरीर और अपने लिए भी खर्च करने में इन्हें मौत आ जाती है, दूसरों के लिए कुछ करने की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। हर कोई इनके बारे में बारे में यही कहने को मजबूर है कि इन लोगों के लिए इनका परलोकगमन ही ईलाज है।
जो आत्मा की आवाज और आत्मानुशासन को मानता है उसे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं पड़ती, वह अपने आप सारे कर्म समय पर करता है, अच्छे करता है और लोक मंगल को आकार देता है।
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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya
- डॉ0 दीपक आचार्य
dr.deepakaacharya@gmail.com























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