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कहीं हम ज्यादा सहिष्णु तो नहीं हो रहे हैं / सुशील शर्मा

 

भारत सरकार ने नेट न्यूट्रालिटी पर एक स्वतंत्र फैसला लिया। भारत एक संप्रभुता सम्पन्न देश है तथा ऐसा निर्णय लेना उसका अधिकार है। लेकिन इस निर्णय से फेसबुक को भारी झटका लगा। फेसबुक के एक बोर्ड मेंबर श्री मार्क लॉवेल एंड्रीसन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत के आजाद होने को ही गलत ठहरा दिया। शायद उन्हें उम्मीद रही होगी कि जैसा भारत ब्रिटिश गुलामी के दौरान था, वैसा ही अब भी होगा, एक कमजोर, लिजलिजा। श्री एंड्रीसन सोचते होंगे कि भारत अंग्रेजों का गुलाम रहे या आजाद हो जाए, लेकिन इस देश में उन विदेशियों के हितों के खिलाफ निर्णय लेने की क्षमता नहीं होगी। उनका यह भ्रम भारत के आजाद होने के 69 साल बाद टूटा। आज की सच्चाई यह है कि भारत में मोदी की हुकूमत है। एंड्रीसन इस सरकार के फैसले को पचा नहीं पाए, जो देश के तो हित में है लेकिन एंड्रीसन की कम्पनी के हितों के खिलाफ है चूंकि आज वे भारत का कुछ नहीं बिगाड़ सकते इसलिए विरोध व्यक्त करने के लिए कहा कि यह देश ब्रिटिश शासन के अधीन होता तो अच्छा होता। असहिष्णुता का यह ताजातरीन उदाहरण है।

दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जे.एन.यू भारत का एक आला दर्जे का विश्वविद्यालय है। वहाँ हाल ही में छात्र संघ की ओर से कल्चरल इवनिंग का आयोजन किया गया। यह सांस्कृतिक संध्या एक ऐसे प्रोफेसर की बर्सी के लिए समर्पित हुई जो भारतीय संसद भवन पर हमले का मास्टर माइंड था। जिस पर अदालत में मुकदमा चला। पक्ष विपक्ष की सारी दलीलें सुनी गई। न्यायिक प्रक्रिया विधिवत् पूरी की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने उसे दोषी पाया। उसे फाँसी की सजा सुनाई गई। राष्ट्रपति के द्वारा दया याचिका अस्वीकार किये जाने के बाद अंततः उसे सजा दी गई। जे.एन.यू की कल्चरल इवनिंग ने ऐसे षडयंत्रकारी प्रोफेसर को शहीद करार दिया, उसका सपना पूरा करने की कसम ली, भारत की संप्रभूता को चुनौती देते हुए भारत विरोधी नारे लगाए गए। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए। उस प्रोफेसर का सपना पार्लियामेन्ट को तबाह करना था। जिस सपने को यह छात्र पूरा करना चाहते है। यदि इन छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाएगा तो एक वर्ग फिर कहेगा कि देश में असहिष्णुता है।

पिछले कुछ समय से देश में असहिष्णुता का मुद्दा गर्माया हुआ है। महज संयोग नहीं है कि यह मुद्दा बिहार विधानसभा चुनाव के एनवक्त पर उछाला गया। असहिष्णुता के नाम पर पुरूस्कार लौटाने वाले कुछ वह लोग थे जो मोदी के खिलाफ चुनाव प्रचार करने वाराणसी गए थे। असहनशीलता को मुद्दा बनाकर राजनीति भी गर्माई हुई है। विरोधी दल कांग्रेस की अगुवाई में राष्ट्रपति भवन और राजपथ पर मार्च कर रहे है तो वही दूसरी ओर बॉलीवुड और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय कुछ अलग है।

आज जो लोग मोदी राज में असहिष्णुता की बात कर रहे है वह लोग तब कहाँ गए थे जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को धता बताते हुए सत्ता में बने रहने के लिए देश में इमरजेंसी लगा दी। इमरजेंसी के दौरान संविधान की धारा 21 निलंबित कर दी गई। जिसमें हर नागरिक को जीने का अधिकार मिला है। 25 जून 1975 की रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री ने देश में आपातकाल लगा कर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के संविधान का गला घोट दिया। देश की जनता से उसके मौलिक अधिकार छीन लिए गए। विपक्ष के गाँधीवादी नेता जे.पी को रात्रि 1.30 बजे गिरफ्तार कर लिया गया। 35 हजार से ज्यादा लोगों को मीसा के तहत बंदी बनाया गया। विपक्ष के हर नेता को रातों रात जेल में डाल दिया गया जो लोग आज पुरूस्कार लौटा रहे है वह तब कहाँ गए थे जब देश में इमरजेंसी लगाई गई। इमरजेंसी के वक्त इन्हें देष में असहिष्णुता नजर नहीं आई़?

सन् 1984 के सिख दंगे में कई सारे सिख भाईयों के घरों, दुकानों, ट्रकों और लकड़ी की टालों को आग के हवाले कर दिया गया। दंगों में कई सिख परिवार के लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी। आज जो लोग सरकारी अवार्ड लौटा रहे है उन्हें 1984 के दंगों के समय देश में असहनशीलता नजर नहीं आई। 

जब जम्मू कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को मारकर उन्हीं के घर से उन्हें बेघर कर दिया गया  उनकी सम्पत्ति छीन ली गई उनके परिवारों पर जुल्म किये गए जिस वजह से आज भी उनकी जिंदगी पटरी पर नहीं लौट पाई है। वह आज भी सरनार्थी केम्पों में रहने को मजबूर है। कश्मीरी पंडितों ने अपने ऊपर हुए इतने जुल्मों के बावजूद भी कभी देश छोड़ने की बात नहीं की। आमिर खान और उनकी पत्नि पर ऐसे कौनसे जुल्म हुए की वह देश छोड़ने की बात करते है। हिंदू धर्म पर टीका टिप्पणी के बाद भी फिल्म पीके ने करोड़ों रुपये कमाए। फिल्म पीके ने करोड़ों इसलिए बनाए की यह देश असहनशील है?

जिन्होंने अवार्ड लौटाए है उन्हें देष को बताना चाहिए -

1.   जब देश में इमरजेंसी लगाई गई क्या तब असहिष्णुता नहीं थी?

2.   1984 के सिक्ख दंगों के समय क्या तब असहिष्णुता नहीं थी?

3.   जब जम्मू कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को मारकर उन्हीं के घर से उन्हें बेदखल कर दिया गया और वह आज भी शरणार्थी कैम्पों में रहने को मजबूर है क्या तब असहिष्णुता नहीं थी?

4.   जब देश का बटवारा हुआ क्या तब असहिष्णुता नहीं थी?

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प्रशंशनीय लेख।।।

बिल्कुल सही है जब देश नयी गति पर है तो हमे कई शक्ति रोकने का प्रयास कर रही है आज उन्हे लग रहा है कि देश को राजा नही सच्चा सेवक मिल गया

विचारशील प्रस्तुति

जब आमिर देस में असहिष्णुता की बात करता है तो वह देश द्रोही हो जाता है.. अब एंडरसन देश की स्वतंत्रता पर चोट करता है तो वे सब बड़बोले चुपचाप टकोरते हैं... जहाँ उम्मीद हो उसकी वहाँ नहीं मिलता...सहिष्णुता कहाँ होना चाहिए और कहाँ असहिष्णुता होनी चाहिए वह इन बड़बोलों को तो पता ही नहीं है.जे एन यू के छात्रों पर मुकदमें की बात तो बाद में किंतु आरोप - प्रत्यारोप लगाते हुए राजनीतिक लाभ लेने वाली सरकार पहले वीडियों में दिख रहे छात्रों को हिरासत में लेकर बंद क्यो नहीं करती ??? ताकि सबूतों को छेड़ - बदल कर अन्यों पर आरोप किए जा सकें??? जो देशद्रोहियों को छोड़ रहा है उसे आप क्या कहोगे??? आप मोदी का बखान करते रहें. देश जल रहा है जलते रहेगा यदि सरकार ने कुछ ठोस कदम न उठाए तो... हिंदू कट्टरवाद को खुले आम प्रोत्साहन हो रहा है... अच्छा है यह सब संविधान संशोधन के बाद होता कब से कम कानूनन तो वे सही करार दिए जाते..देश आज भी सर्व प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य है.

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