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समय से संवाद- सुशील कुमार शैली

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समीक्षक:एम.एम.चन्द्रा

‘समय से संवाद’ सुशील कुमार शैली का प्रथम काव्य संग्रह है. उन्होंने अपनी बातचीत में इस बात की आशंका जाहिर की है कि व्यवस्था विरोध में जब भी साहित्य खड़ा होता है तो उसे कुलीन वर्ग नकार सकता है.वैसे भी व्यवस्था के विरोध में खड़ा होना और डंके की चौट पर अपनी बात रखना बहुत कम लेखकों में देखा जाता है. यह साहस लेखक ने कर दिखाया है. लेखक को पूर्ण विश्वास है कि यह संग्रह हाशिये पर रहकर भी संवाद करता रहेगा और संग्रह की पहली ही कविता न्याय व्यवस्था को कटघरे में ला खड़ा करती है-

आज आदमखोर के लिए आदमियत के नारे

आदमियत को पिंजरे में डालकर

दो टुकड़े फेंक दिए जाते हैं, इस तन्त्र में

पूर्णतः स्वतंत्र

गुरु शिष्य परम्परा पर जहाँ दुनिया नाज करती है वहीं एकलव्य का अंगूठा मांग कर द्रोणाचार्य ने गुरु की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह भी लगाया. आधुनिक युग में भी द्रोणाचार्य से बढ़कर है जिसकी चर्चा कवि इस प्रकार करता है-

गुरुदेव फिर ऐसा किया हुआ?

जब मैंने अपने अस्तित्व की खोज में निकला

आपने मुझसे अंगूठा नहीं माँगा

बल्कि हाथ की काट दिए

कविता अँधेरे समय में जवान होती है . विद्रोह के समय परवान चढ़ती है और युद्ध के समय अपना पक्ष चुनती हुई तलवार बनती है. कविता सवाल करना ही नहीं जवाब देना भी जानती है कवि को जब अपने सवालों का जवाब नहीं मिलता तो शब्दों के तेवर तीखे स्पष्ट और विद्रोही हो जाते हैं.-

बता नहीं सकता कितना दुखी हूँ मैं

भूखा देखकर तुम्हें

मन आता है

आग लगा दूँ दुनिया को ....

मैं तो कहता हूँ-औ मजदूर

भूख और पेट की आग को

हाथ में लाओ

क्योंकि सुना है, नाखून काटकर

दांतों को छंटवाकर, गाँधी बन गया

और लोकतंत्र उसके जबड़ों के बीच का अन्तराल

शहर के रस्मों रिवाज के नये चलन को कवि अपने नजरिये से देखता है. आदमी न जाने कितनी बार उजड़ता है लेकिन फिर सफर में निकल पड़ता है-

मौत की परछाई में जीना

सीख लेते हैं लोग...

न मातम, न कोई अफसोस

पराधीनता में स्वाधीनता का अहसास

यूँ लोकतंत्र में लोग मुर्दा हुए जाते हैं

लेखक कोई नई दुनिया का प्राणी नहीं है. वह भी शहर की आपाधापी में खुद को मशीन से कम नहीं समझता. जैसे चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘मोर्डन टाइम्स’ में व्यक्ति व्यवस्था का एक पुर्जा बन जाता है जिसे टाइम समय के अनुसार चलना होता है. उसी प्रकार लेखक ने भी अपने मशीनी मनुष्य की व्यथा अपनी कविता दिनचर्या में लिखता है. देश में भूख, गरीबी अपनी चरम अवस्था पर पहुँच गयी है लेकिन देश के रहनुमाओं को तंगहाली, गरीबी व भूख नहीं दिखती, अंधराष्ट्रभक्तों को राष्ट्रप्रेम सिर्फ क्रिकेट या साम्प्रदायिक रंग में ही नजर आता है. चूँकि लेखक की कविताएँ शब्दों में विद्रोह है तो वे सबको चुनौती देते हैं-

मुझ में राष्ट्र प्रेम

कूट-कूट कर भरा है

इसीलिए मैंने

पेट के रिक्त स्थान में

लोकतंत्र लिखा है

लेखक ने कविताओं में जिन बिम्बों, प्रतीकों का प्रयोग किया है वह आसानी से पाठक को समझ में आ जाते हैं. इसीलिए ‘हाशिये में कविता’ तमाम सुविधा भोगी रचनाकारों को एकदम नंगा कर देता है.

तो सुविधा जनित पिछला मार्ग

या तो संडास में खुलता है

या रसोई में पतीली के बगल में खुलता है

आज लेखक की करनी और कथनी में फर्क देखने को मिलता है वीर रस की कविता लिखते है. लेकिन उनकी आस्था समय के अनुसार बदल जाती है. एक तरफ लेखक अपनी कविताओं में अन्य कवियों को ललकारता है देखों देश गर्त में जा रहा है.कोई तो देश के बारे में सोचो ....और जब देश समाज के लिए करनेकी बरी आती है तो सब अपनी-अपनी मजबूरी भी दिखा देते हैं-

न तो घर की चौघट लांघ कर

तुम कभी बाहर आओगे

न ही ... मैं बाहर आऊंगा

तुम भी घुटन भरे माहौल में

दम तोड़ दोगे, मैं भी

हमारे देश में भूख, गरीबी,बेरोजगारी जैसी समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है.लाखो लोग आत्महत्या करने पर मजबूर है.आदमी को इतना निचे गरिय जा रहा है की वह मनुष्य के रूप जी भी न सके. जो जी रहे है वो विकृत मानसिकता के साथ अलगाव का शिकार हो रहे है. तमाम वादों के साथ हर बार नई सरकार गरीबों के लिए, भूखों के लिए नए सपने और नई सौगात लाती है इस बार तो अछे दिन जरूर आ जायेंगे. लेकिन भूख और गरीबी दोनों अपनी जगह निरुत्तर बनी हुई है लेखक भूख और गरीबी के परिणामों को इस प्रकार लिखता है –

आदमी की आदिम प्रवृत्ति भूख

या तो उसे पालतू बना देती है

या दीवार

या फिर हाथ में हथियार थमा देती है

एक कवि के लिए सबसे कठिन समय, समय को बेबसी से गुजरता हुआ देखना होता है. लेखक भी बेबस और हताश है जबकि वह अच्छी तरह जानता है कि मेरे सामने होने वाली घटना सही नहीं है फिर भी वह चुपचाप देखता है न देख पाने का ढोंग करता है–

कितना भयावह है

सबकुछ ज्ञात होते हुए भी

अज्ञात होने का अभिनय करना

लेखक विद्रोह का प्रतिनिधित्व करता है. अपने समय से संवाद करता हुआ भूख के गलियारों में सफ़र करते हुए अशुद्ध संस्कारों के विरुद्ध कविता का आवाहन करता है.

समय से संवाद : सुशील कुमार शैली | प्रकाशक : अयन प्रकाशन | कीमत :250

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