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बेणेश्वर मेले से शुरू होती हैं फागुनी बयारें / डॉ. दीपक आचार्य

संदर्भ ः होलिकोत्सव की शुरुआत

(माघ पूर्णिमा-22 फरवरी 2016)

बेणेश्वर मेले से शुरू होती हैं फागुनी बयारें

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

वागड़ अंचल में माघ पूर्णिमा का महत्त्व सिर्फ बेणेश्वर महामेले तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह दिन राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश की लोक संस्कृतियों के बेणेश्वर बने हुए वनवासी अंचल बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों में फागुनोत्सव की शुरूआत का आधार पर्व है।

राजस्थान के ध्रुव दक्षिणांचल में अवस्थित वाग्वर अंचल की सदियों पुरानी परम्परा के अनुसार माघ पूनम के दिन होली चौक में सेमल के पेड़ का तना लगाया जाता है और उस पर रंगीन ध्वज चढ़ाया जाता है। इस फागुनी ध्वजारोहण के साथ ही क्षेत्र भर में होलिकोत्सव की रंग-बिरंगी शुरूआत हो जाती है जो फाल्गुन पूर्णिमा को होली तथा उसके बाद करीब पूरे पखवाड़े तक चलती है।

बेणेश्वर मेला करता है होली का आगाज

इन्हीं में एक अनूठी परम्परा है होलिकोत्सव शुभारंभ की। वागड़ अंचल भर में माघ पूर्णिमा का दिन बेणेश्वर मेले के नाम समर्पित होता है। इसके साथ ही यह दिन आगाज करता है फागुनोत्सव का। इस दिन इस समूचे आदिवासी  क्षेत्र में उन सभी स्थानों पर सेमल का डण्डा व रंग-बिरंगा फागुनी ध्वज लगाया जाता रहा है जहां होली के दिन परम्परा से होलिका दहन होता है।

होलिकोत्सव की नींव रखती है डाण्डा रोपणी पूनम

पहले यह परम्परा हर होली चौक पर थी लेकिन वनों के ह्रास और पर्यावरण रक्षा का माहौल बनने के बाद अब यह परम्परा काफी कम हो चली है और कहीं-कहीं ही देखी जाती है। सेमल के डण्डे व फागुनी झण्डे को लगाने की ही परम्परा की वजह से माघ पूर्णिमा को वागड़ अंचल में ‘‘डाण्डा रोपणी पूनम’’ कहा जाता है। जिस डण्डे को लगाया जाता है उसे स्थानीय भाषा में ‘होरी नो डाण्डो’ भी कहा जाता है। सेमल उपलब्ध न होने पर अन्य डण्डा भी रोपा जाता है।

रंगीन ध्वज करते हैं फागुन का शंखनाद

माघ पूर्णिमा को शुभ मुहूर्त में इस डण्डे की स्थापना की जाती है। डण्डे की विधि-विधान के साथ पूजा होती है तथा इसके ऊपर रंगीन ध्वज लगाया जाता है। डण्डे की स्थापना उसी प्रकार की है जिस तरह किसी बड़े यज्ञ-यागादि और महानुष्ठान के लिए ध्वज स्थापित किया जाता है। पहले जमाने में गांव के लम्बरदार, मुखिया, ठाकुर या प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हाथों डाण्डा स्थापित कराने की परम्परा थी पर अब क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्ति या वरिष्ठ श्रेष्ठीजन इस काम को करते हैं।

यह डाण्डा क्षेत्र में होलिकोत्सव के आगाज़ का प्रतीक होता है जहां होली के दिन होलिका दहन की विधि पूरी होने तक फागुनी परम्पराओं का निर्वाह किया जाता है।

शिक्षा, जागरुकता और पर्यावरण चेतना विस्तार के चलते अब आदिवासी क्षेत्र के लोगों की मानसिकता बदलने लगी है। क्षेत्र के लोग मानते हैं कि वनों की रक्षा और पर्यावरण की खातिर अब इन पुरानी रूढ़ियों को बदलना जरूरी हो चला है। अंधी परम्पराओं को छोड़ा नहीं गया तो सेमल और अन्य वृक्षों की लकड़ियां होली के नाम पर स्वाहा होती चली जाएंगी। अब होली को प्रतीकात्मक रूप में कुछ लकड़ियां जलाकर या सामूहिक होली दहन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत को समझा जाने लगा है।

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