वन-डे लव कहें या लव-डे / डॉ. दीपक आाचार्य

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वन-डे लव कहें

या लव-डे

- डॉ. दीपक आाचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

साल में सिर्फ एक बार आता है आज का यह दिन, जिसे पाश्चात्यों और उनका अंधानुकरण करने वाले देशी पिछलग्गुओं की भाषा में वेलेन्टाईन-डे कहा जाता है।

सारे के सारे लोग आज के दिन जोश में होश खोने का जतन करते हैं और एक-दूसरे का परम प्रेमी होने का सार्वजनीन उद्घोष भी करते हैं और उसके लायक सारे व्यवहार भी।

वेलेन्टाईन के नाम से जिस भावना के साथ यह प्रेम पर्व आरंभ किया गया था वह अब केवल प्रेमी-प्रेमिका के संबंधों तक सिमट कर रह गया है, बाकी सारे संबंधों से प्रेमपूर्ण व्यवहार हम लोग भुलाते जा रहे हैं।

प्रेम की सार्वजनीन और वैश्विक अभिव्यक्ति का यह पर्व अब केवल स्त्री-पुरुष के प्रगाढ़ संबंधों के दिग्दर्शन का दिवस होकर रह गया है जहाँ हम एक-दूसरे के प्रति इतना अधिक सब कुछ समर्पण का भाव जताते हैं कि हमारा अवतरण केवल उन्हीं के लिए हुआ है, उन्हीं के लिए जीना और मरना है और उन्हीं पर मरते हुए जिन्दगी को गुजारना है जिन्हें हम अपना मान चुके हैं। अब मैं और तुम के सिवा और कोई नहीं वाली परंपरा बनती जा रही है।

प्रेम का करुणामूलक भाव सभी प्राणियों के प्रति दिखना और अनुभव होना चाहिए। हमारे घर-परिवार, कुटुम्ब और आस-पास सर्वत्र हमारी निरपेक्ष प्रेम दृष्टि हो तथा सामने वाले सभी लोगों को हमारे हृदय के भीतर हमेशा उमड़ते रहने वाले प्रेम-ज्वार की अनुभूति होनी चाहिए।

पर ऎसा कहाँ हो पा रहा है? हम लोग प्रेेम के नाम पर एकाध से लेकर चंद जिस्मों में सिमट गए हैं, और कई मामलों में तो हमने ईश्वर से भी अधिक मान लिया है उन संबंधों को।  हमारा सार्वजनीन और वैश्विक प्रेम-प्रवाह बाधित हो गया है।

हमारे प्रेम में भेदमूलक दृष्टि और पक्षपात के भावों का इस तरह घालमेल हो गया है कि कहीं से नहीं लगता कि ये प्रेम है। बल्कि अब तो लगता है कि जो लोग इस तरह का प्रेम करते हैं वे प्रेम को व्यापार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं जहाँ एक-दूसरे को भरमाकर उसकी देहयष्टि, सौंदर्य और सम्पत्ति पर निगाहें रखकर कोई न कोई लोभ-लालच या वासना पाले हुए हैं।

जब तक इनकी प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक प्रेम के नाम पर हम दुनिया के सारे आडम्बरों, स्वाँग और कुटिलताओं को मनमोही अंदाज में अपनाते और प्रदर्शित करते रहते हैं और जब अपेक्षित प्राप्त हो जाए, तब फिर वही पुराने स्वभाव में आ जाते हैं। 

प्रेम की हम अपने-अपने स्वार्थ, अवसर, लाभों और सुविधाओं को देखकर परिभाषाएं गढ़ते हैं और सामने वालों को लुभावनी बातों से भ्रमित करते हुए अपने आपको प्रतिष्ठित करने और हमेशा बनाए रखने की हरचन्द कोशिश करते रहते हैं, या कि अपने मुद्दे में सावधान रहते हुए एक के बाद एक नया बिम्ब तलाशने लग जाते हैं।

वेलेन्टाईन के नाम पर प्रेम का दरिया बहा देने वाले लोग जरा अपनी जिन्दगी और अपने आस-पास वालों की प्रेमधाराओं और पुराने स्नेहीजनों को याद करें, कितनों से हमारा सम्पर्क बना रहता है, कितने हमसे दूर चले गए और कितने ऎसे हैं जो हमारे पास आना ही नहीं चाहते।

कितनों का लगता है कि हमारा प्रेम झूठ और पाखण्ड का पुलिन्दा है जहाँ फँसना, नुकसान पाना और आत्महीनता का शिकार होना ही लिखा है। कुछ वक्त बाद लगता है कि जैसे हम अपने आपको आदरपूर्वक लुटा ही चुके हैं। और इसके बाद पछताने के सिवाय हमारे पास कुछ नहीं बचता। क्योंकि हम अपनी ही मूर्खता या गलतियों से फँसते हैं इसलिए प्रायश्चित भी ढंग से नहीं कर पाते।

वेलेन्टाईन डे के नाम पर धींगामस्ती का अब केवल एक ही मार्ग रह गया है और वह है प्रेमी-प्रेमिका के संबंधों का सार्वजनिक प्रकटीकरण और उपहारों का आदान-प्रदान। हम हमारे माता-पिता, भाई-बहनों, गुरुजनों, पड़ोसियों, संबंधियों और अपने इलाके के लोगों को हीन या बिना लाभ के मानते हुए उनकी उपेक्षा करते रहते हैं, उनके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना हमने भुला दिया है, उनसे बातचीत करने में हमें शर्म या हीनता का अनुभव होता है।

दूसरी तरफ हम उन लोगों के साथ बाग-बगीचों, रेस्तराँ, होटलों और पर्यटन स्थलों पर गुलछर्रे उड़ाते हुए वेलेन्टाईन - डे की धींगामस्ती में रमे हुए जिन्दगी भर एक-दूसरे के बने रहने के लिए कसमों और वादों के गलियारों में भटकते जा रहे हैं जिनसे हमारा न खून का रिश्ता होता है न दूसरा कुछ पुराना परिचय।

इसका यह अर्थ भी नहीं है कि अनजान लोगों से बन जाने वाले अनायास-सायास रिश्तों में प्रेम या विश्वास नहीं होता। कई बार ये संबंध अपने आत्मीयों से भी अधिक गहरे और जिन्दगी भर अपने बने रहते हैं लेकिन अधिकांश मामलों में ऎसा नहीं होता।

यथार्थ में देखा जाए तो वेलेन्टाईन डे का संदेश केवल स्त्री और पुरुष के बीच रिश्तों का पर्याय और पूरक नहीं है बल्कि प्राणी मात्र के प्रति प्रेम व्यवहार का दर्शन है। यह प्रेम आत्मा के संबंधों का द्योतक है, रूप-यौवन और सुन्दर-सुपुष्ट देहयष् िट के सुनहरे बिम्बों का नहीं।

हम किसी एक स्त्री या पुरुष से गहरे संबंध रख लें और घर-परिवार के या दूसरे लोगों के साथ हमारा व्यवहार रुखा और क्रूर हो, यह प्रेम नहीं किसी अघोषित बिजनैस डील का संकेत है जो किसी मोड़ पर आकर निस्सन्देह दर्द का अहसास कराएगा ही।

अब तो मन-मस्तिष्क की कोमल परतों पर शातिर लोग ऎसे गुलशन दिखाने लगे हैं जहाँ भविष्य के तमाम ख्वाबों को  दर्शाने वाले  इन्द्रधनुष ग़ज़ब का कमाल ढा रहे हैं।

प्रेम का संबंध हृदय से है लेकिन अब हम दिमाग का इस्तेमाल करने लगे हैं इसलिए प्रेम अब आत्मीय संबंधों, माधुर्य और सार्वजनीन करुणामूलक नहीं रहा बल्कि कारोबारी रास्तों को पकड़ चुका है।

फिर वो प्रेम काहे का प्रेम, जो केवल एक दिन सिमट कर रह जाए, साल भर फिर वही हाल। प्रेम का शाश्वत स्वरूप वही है जो हर क्षण बना रहे, उसे अपने इजहार के लिए किसी एक दिन का इन्तजार नहीं करना पड़। फिर जिस व्यवहार की सार्वजनीन या पारस्परिक अभिव्यक्ति करनी पड़े, कसमें खानी पड़े, वादे करने पड़ें, वह प्रेम नहीं कारोबारी अनुबंध है।

सच्चा प्रेम अपने मन-कर्म और वचन से झरता है उसे शब्दों, चेहरे के हाव-भावों और उपहारों से कोई सरोकार नहीं, न ही शरीर को आकर्षक अंदाज में मटकाने की जरूरत पड़ती है, और न ही डेटिंग या लोंग ड्राइविंग की। प्रेम इनमें से किसी का मोहताज नहीं होता, प्रेम दिल की ही भाषा को सुनने का आदी होता है और उसी को मानता है। 

जो लोग वेलेन्टाईन -डे मनाने को ही जीवन में प्रेम का पर्याय मानते रहे हैं जरा उनके जीवन और इतिहास को भी देख लें । हम साल भर सभी के प्रति संवेदनशीलता, प्रेम, माधुर्य और निष्कपट व्यवहार का परिचय देते हैं तभी हमारा प्रेम सच्चा है। हमारा जीवन-व्यवहार यदि ऎसा नहीं है तब हमें वेलेन्टाईन-डे मनाने का कोई हक नहीं है। 

यह बात उन लोगों को भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए जो वेलेन्टाईन-डे के नाम पर भावनाओं में बह जाते हैं, बहक जाते हैं और उन लोगों को अपना मानने लगते हैं जो प्रेम के नाम पर भ्रमित करने और बहलाने-फुसलाने के सारे तिलस्मों में माहिर हैं। प्रेम एकान्तिक हो तब भी सार्वजनीन प्रभाव दर्शाता है और सार्वजनीन तो तब भी हर इकाई के प्रति प्रेम प्रकट करता है।

वेलेन्टाईन-डे पर प्रेम का पैगाम देने वाले सभी जिन्दादिलों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। आशा की जानी चाहिए कि यह प्रेम साल भर निरन्तर प्रवाहित होता रहे।

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