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जग-वासना में नहाया वैलेंटाइन डे / डॉ.गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'


जग-वासना में नहाया  वैलेंटाइन डे
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            14फरवरी  सेंट वेलेंटाइन का अपनी प्रिया के लिए देह त्याग का दिन है,वासना का नहीं। लेकिन जग ने उसे अपनी वासना की लार से नहला डाला है। केवल यूरोप अपनी वासनामयी प्रेम दृष्टि के लिए सबसे ज़्यादा बदनाम है। लेकिन वस्तुतः ऐसा नहीं है। केवल यूरोप   ही नहीं सारी दुनिया  में आज नहीं हजारों सालों से ये वासनान्ध लोग मौजूद रहे हैं,जिनकी लारों से नाना रूपों में जगह-जगह से फूटकर कर्मनाशाएँ बहती रही हैं।  

             अपने सांस्कृतिक राष्ट्र भारत में भी चरित्रवान और अच्छों के साथ-साथ ये कर्मनाशाएँ बहाने वाले बहुत सारे ऐसे वासनांध लोग भी  रहे हैं। साधारण से साधारण और असाधारण से असाधारण हर वर्ग में ये मौजूद रहे हैं। देवलोक का राजा इंद्र है,जिसने  अपनी काम-वासना की तत्काल तृप्ति हेतु छल कर अहल्या से रतिकर्म किया. दूसरी तरफ़ रावण है जो सीता को अपने कब्जे में रखने के बावज़ूद उससे प्रणय निवेदन करता है.आधुनिक परिभाषा में रावण का कृत्य  यौन दुष्कर्म नहीं है ,जबकि इंद्र का कृत्य  यौन दुष्कर्म का जीवंत उदाहरण है.इसे बलात्कार भी कहते हैं.यह बात अलग है कि इसके लिए इंद्र को माइनर और अहल्या को मेजर सजा मिली.रावण सकाम तो है पर वासनांध  नहीं, जबकि इंद्र है.रावण सीता को पाना तो चाहता है पर बलात नहीं जबकि इंद्र अहल्या को बलात हथियाता है.वासना किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बंधती जबकि प्रेम केवल व्यक्ति विशेष से बाँधता है और कुछ-कुछ काम भी.

            काम स्त्री-पुरुष के भीतर है और वासना बाहर.इसीलिए जब काम वासना से जुड़ जाता है तो बाहर आकर अनियंत्रित हो जाता है.इंद्र,पराशर आदि इसी बाहरी दबाव से अनियंत्रित आचरण करते हैं,जबकि रावण नियंत्रण में रहता है.वर्तमान सन्दर्भ में वैयाक्तिक से लेकर सामूहिक यौन दुष्कर्म तक इन्हीं इन्द्रों और पराशरों की वासना के कृत्यों के आधुनिक संस्करण हैं.

          भारतीय जीवन में भक्ति ने इस काम को उदात्त बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है.गायन,वादन और नृत्य भी इसमें अपनी बड़ी भूमिका निभाते हुए मिलते हैं.यही नहीं छहों ललित कलाएँ काम के उदात्तीकरण में सहायक रही हैं.व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो समाज और राष्ट्र के लिए भावात्मक लगाव से भी काम और वासना दोनों संसाधित और रूपांतरित होते रहे हैं.इनसे पीड़ित व्यक्ति भी कला और समाज को समर्पित होकर समाजोपयोगी सिद्ध होते रहे  हैं.काम वस्तुतः बीज रूप होता है.यह सृजन के लिए स्वयं के कायांतरण में भी संकोच नहीं करता.स्वयं को गलाकर पौधे में परिवर्तित होना सर्जनात्मक कायांतरण का ही श्रेष्ठ उदहारण है.अतः काम को कोसने के बजाय उसे संसाधित और संयमित कर जीवन की सर्जनात्मक ऊर्जा से जोड़ें.

         फ्रायड का यही काम अपने उदात्त रूप में माँ-बाप के प्रति समर्पित होकर संतान को श्रेष्ठ बना देता है.लेकिन ऐसा कम ही होता है .यह प्रायः प्रेयसी या पत्नी में विशुद्ध काम और संतान में कामना के रूप में स्थानांतरित हो जाता है.बचपन की माँ ,वह  माँ है जो कभी हुआ करती थी ,पर अब नहीं है.अब उसके स्थान पर प्रेयसी या  बीबी आ गई है.इससे एक बात और स्पष्ट होती है कि वयस्क होते-होते सोच केवल प्रेयसी या बीबी  केन्द्रित हो सकती  है.अपनी सोच को किसी पर भी केंद्रित रखा जाए  पर परिधि में पूरा परिवार रखें तो प्रेम का उदात्त रूप बचा रह सकता  है ।

         कल 14 फरवरी है। वैलेंटाइन को याद करते हुए नाना जोड़े बाइक रास करते हुए मिलेंगे। किसे की स्कूटी तो किसी की बाइक और कारें सड़क के किनारे प्रेम में डूबी हुई खड़ी ,पड़ी या झूमती हुई मिलेंगी। प्रेम को नए रूप में परिभाषित करने को आतुर नई पीढ़ी नई-नई परिभाषाएँ गढ़ रही है। लेकिन उसकी मर्यादाएँ नहीं निर्धारित कर पा रही है। जब हर एक कार्य  की मर्यादा होती है तो प्रेम की भी होनी ही चाहिए। जल जबतक मर्यादा में रहता है जीवन देता है। लेकिन मर्यादा से बाहर आते ही बाढ़ का रूप लेकर नाश कारण  बनता है।प्रेमी जोड़ों को भी इस बात के प्रति सजग रहना चाहिए कि कहीं उनका  अपना   प्रेम भी कहीं प्रलय का कारण तो नहीं बनने वाला है।

       संतानों के प्रेम के प्रति माँ-बाप के भी कुछ दायित्व होते हैं। प्रेम करने के कारण उन्हें विधर्मी,अधर्मी या अपराधी नहीं मानना चाहिए। प्रेम प्राकृतिक है। बस इतना ध्यान रखना चाहिए कि वे कहीं भटक तो नहीं रहे हैं। अपने जीवन के अहम फैसले को बचकाने ढंग से तो नहीं ले रहे हैं।प्रेम के इस  गंभीर विषय को  माता-पिता और संतान किसी को भी हलके  में नहीं लेना चाहिए।प्रेम जीवन को सारस बनाता है।  लेकिन सुखाता भी यही है। करने  वाले को बदले में यदि प्रेम नहीं मिलता तो उसकी उर्वर उर भूमि  भी मरुभूमि बन जाती है। इसलिए आवश्यक है कि प्रेम की मृग मरीचिका में भटके बेटे-बेटी को प्यासे न मारें। उन्हें शीतल स्पर्श देकर नए जीवन के लिए प्रेरित करें। उनके मरुदयान को वाटिका बनाने में माँ-बाप को सार्थक भूमिका निभाने की ज़रूरत है।कम से उन्हें तो यह सत्य तो स्वीकारना ही चाहिए कि केवल उनके बच्चे ही नहीं बल्कि  उनके खुद के समेत यह समूचा जग ही प्रेम- वासना में नहाया है। 

-डॉ.गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष(हिंदी पीठ),
एशियाई भाषा ,संस्कृति और दर्शन विभाग ,
क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय ,
क्वांग्चौ ,
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कटुः सत्य और सही मार्गदर्शन .सादर आभार..

"जग वासना में नहाया वैलेंटाइन डे" नामक डाक्टर गंगा प्रसाद शर्मा "गुणशेखर" जी का लेख कई बार पढ़ा...कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा ..वे कहना क्या चाहते है..कि
वैलेंटाइन प्रथा गलत है ..और समाज में गलत सन्देश जाता है..
मैं व्यक्तिगत तौर पर "गुणशेखर" साहब की राय से इत्तेफाक नहीं रखता

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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