मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

इन्कलाब कोई होने को है : चंद्रलेखा

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​​

समीक्षक :एम.एम.चन्द्रा

चंद्रलेखा का प्रथम काव्य संग्रह “सन्नाटा बुनता है कौन” स्त्री विमर्श के उन पहलुओं को उजागर करता है जो आधुनिक चकाचौंध में धुन्दला गये हैं. आधी आबादी ने मानव विकास की मंजिलों में अनेकों  कठिनाइयों का सामना करते हुए बहुत सी महिलाओं ने ऊँचाईयों को छुआ जरुर है लेकिन आधी आबादी की कुछ समस्याएँ आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं . आज आधुनिक महिलाएं अध्यापक, पुलिस, जज, लेखक आदि बन रहीं हैं. लेकिन वे किसी भी ऊँचे स्थान पर पहुँच जाये या कोई भी सम्मान प्राप्त कर ले  लेकिन ये सब आधी आबादी का अंतिम सच नहीं है. लेखिका ने उन्ही छुपी हुई सच्चाई , बेबसी ,लाचारी, व्याकुलता, निराशा और  छटपटाहट को पाठक के सामने लाने का साहस किया है. जो किसी एक स्त्री का दर्द नहीं, आधी आबादी का भी सच है-

कब तक चलना है ?

कहाँ तक चलना है ?

कब ख़तम होगी मेरी तलाश ?

परिवार संस्था के बारे में विभिन्न लोगों के भिन्न विचार हैं. कोई उसे प्रगतिशील कहता है तो कोई परम्परावादी.  ऐसा माना जाता कि महिला को आगे बढ़ने के लिए परिवार संस्था मुख्य भूमिका निभाती है लेकिन लेखिका का मानना है कि सामन्ती मूल्य कदम क़दम पर उसके रस्ते की बेड़ियाँ  बनते हैं. सामन्ती मूल्यों से आधी आबादी  अभी भी मुक्त नहीं है . क्योंकि-

घर आंगन में ही दफन है

आधी दुनिया का व्यापार ..

क्योंकि-

एक्विरियम को ही अपना

वे सागर समझती हैं

क्योंकि-

चुप चाप और

बिस्तर पर बिछ जाती है

पहचान मेरी

क्योंकि –

लोहे की सलाखों में

मिलती है रौशनी उतनी ही

लेना चाहते हम जितनी ही

अलग अलग खांचे सबके

और अलग अलग आकार

क्योंकि -

इन्सान से पशु बनते, देर नहीं लगती

औरत का मूरत ही बने रहना

अच्छा है ,बहुत अच्छा है

क्योंकि

लगा दाव द्रुपदसुता को फिर भी धर्म राज कहलाये

बने रहे पुरुषोतम तुम

और सिया ने कष्ट उठायें

लेखिका ने सिर्फ अपनी कविताओं में स्त्री पक्ष के दर्द, घुटन एवं ऊब को ही नहीं दिखाया बल्कि जीवन के उस पहलू को भी दिखाया है जो मनुष्य को हर पल जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है. वह दूसरा पक्ष है उजाले का क्योंकि हर रात के बाद दिन आता है –

इतना भी उदास न हो मेरे दिल

रात कितनी ही काली और गहरी ही सही

प्राची में स्वर्ण किरण का आना

ऐ दोस्त

अभी बाकी है , अभी बाकी है ...

लेखिका की कविताएँ एक नई दुनिया को पाने का सपना बुनती है लेकिन वह सपना अपने लिए नहीं बल्कि उन लोगों के लिए भी है जिनके सामने घनघोर अँधेरा है. जब कविता व्यक्ति से आगे बढ़ जाती है और उसका दायरा व्यापक बन जाता है तो समझो कविता अपने आप में सार्थक सिद्ध होती है-

है उड़ता आज अकेला तो क्या?

पंछी उड़ते पीछे जो तेरे

उनको राह दिखाता जा ...

अपना उन्हें बनाता जा ....

पंख फैला तू उड़ता जा , बस उड़ता जा....

चंद्रलेखा की कविताओं में जो संघर्ष जुझारूपन, आकांक्षा दिखाई देती है. वह सिर्फ आधी आबादी को ही प्रेरित नहीं करती बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज को ऊर्जा प्रदान करती है. यही कारण है कि उनकी कवितायें एक पाठक के दिल में अपनी जगह बनाती है. एक तरफ उन्होंने मानव समाज की दशा का चित्रण, सहज सरल शब्दों में किया है, वहीं दूसरी तरफ समाज को दिशा देने का काम बखूबी किया है-

फूट पड़ने को है

सोने चांदी के महल

अब ढहने को हैं

इन्कलाब कोई होने को है

सन्नाटा बुनता है कौन : चंद्रलेखा | प्रकाशक : हिन्द युग्म | कीमत :140

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