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मालिक मेहरबान तो मातहत पहलवान - डॉ. दीपक आचार्य

युग तेजी से बदलता जा रहा है। उसी के अनुरूप बदलती जा रही हैं कई परंपराएं। बनती जा रही हैं नई-नई परिभाषाएं। सर्वाधिक मजेदार रूपान्तरण  हो रहा है लोक कहावतों और मुहावरों का। यों तो ये कहावत-मुहावरें हर युग का अपना सत्य होती हैं लेकिन इनमें भी कुछ मामलों में देखा जाए तो परिवर्तित मुहावरे और कहावतें ज्यादा सटीक बैठती हैं।

बहुत सारे लोग आज अपने आपको हीन, असमर्थ और नाकारा समझ बैठे हैं। खुद पर न इनका भरोसा  रहा है, न इन पर औरों का।  अपने आपको आत्महीन, निष्ठुर और निकम्मे मान बैठे लोगों की जिन्दगी दूसरों के भरोसे चल रही है और इस मामले में अपना देश दुनिया में अलग दिखता है जहाँ आदमी अपनी प्रतिभा या हुनर से खुद को इंसान नहीं मानता बल्कि मदारियों के डेरों में बंधे रहने वाले भालुओं, कुत्तों और दूसरे जानवरों की तरह पराश्रित रहता है या इनके दम पर बंदरिया उछलकूद करता रहता है।

वह जो कुछ करता है, दूसरों के दम पर। खुद अपने आप में बेदम है लेकिन जब कोई इन्हें अपना अनुचर या अंधभक्त मान लेता है अथवा ये किसी को अपना आका मान लिया करते हैं, उसके बाद इनमें जाने कहाँ से दम-खम आ जाता है।

यही स्थिति उन मरियलों, निकम्मों और नाकाबिलों की है जो किसी न किसी की छाया पा जाते हैं फिर छायादार गुदगुदी घास पर उछल कूद करते हुए खुद को शावकों या शेर से कम नहीं समझते। जिस पेड़ की छांव में ये उछलकूद करते हैं, धींगामस्ती करते रहते हैं, किसी को कुछ कह देते हैं, किसी को क्या कह डालते हैं, छांव के सान्निध्य और अंधेरे का फायदा उठाकर क्या कुछ नहीं कर गुजरते, किसी से छिपा हुआ नहीं।

कई बार पेड़ बेचारा ही बना रहता है, उसे नहीं मालूम होता था कि उसकी जड़ों की मखमली छाती पर बैठे उसके अपने मातहत क्या गुल खिला रहे हैं, कितनी जड़ें खोद रहे हैं, क्या अन्याय-अत्याचार ढा रहे हैं। और बहुधा पेड़ को इनकी हर हरकत की खबर होती है मगर वह भी क्या करे, उसका भी अपना लम्बा-चौड़ा तना है, गहरे तक धंसी हुई जड़ें हैं।

फिर किसे अच्छा नहीं लगता वह सब कुछ, जिससे देह भी तृप्त होता है, दिमाग भी बाग-बाग होता रहता है और दिल के तो कहने ही क्या।  मुफत में कोई सुकून मिलता रहे तो कौन होगा जो इस पर पहरे बिठाने की सोच भी सके।

फिर आजकल ऎसे विश्वस्त लोग कहां मिलते हैं जो स्वामीभक्ति और वफादारी में किसी से कम नहीं हांंे। इस वफादारी का प्रतिफल पाना सभी का हक है, और स्वामीभक्ति में रमे हुए लोगों को पुरस्कार देते हुए प्रोत्साहित करते रहना ही उदारता का पहला अध्याय है।

आजकल सभी जगह यही सब हो रहा है। या तो ‘‘ उष्ट्राणां विवाहे .....’ वाली बात सिद्ध हो रही है अथवा एक-दूसरे के लिए जीने की बातें साकार हो रही हैं। सब एक दूसरे की प्रशंसा और प्रशस्ति गान करते हुए भरमाते हुए आगे बढ़ना और प्रतिष्ठित होना चाहते हैं।

कोई किसी के कंधे पर चढ़कर अपने कद को ऊँचा करने में भिड़ा हुआ है, कोई टांग खींच कर आगे आने के फेर में है, बहुत सारे हैं जिन्हें तलाश है उन मजबूत कंधों की जिन पर उनकी पालकियां स्थापित होकर विश्वविजय का सपना पूरा कर सकें।

बहुत से लोग हैंं जो यही कर रहे हैं।  कुछ लोग दिन में साथ रहते हैं वे भी अपनी चला रहे हैं, सूरज को दीपक दिखा रहे हैं। दूसरे हैं जो दिन-रात साथ रहते आये हैं, ये नहीं चाहते कि वे जिनके साथ हैं उन्हें बाहर की हवा लगे, आवाज सुनाई दे अथवा कोई अनचाहा शोरगुल देख लें।

इसलिए अर्दली, चम्पीबाज, छड़ीदार और चँवर हिलाने वाले चंद लोग ही हैं जो बार-बार इन्हें दिखते हैं, इन्हें महान और अन्यतम बताते हैं और इन्हीं की जय-जयकार करते हुए यह प्रयास करते हैं कि बाहर का कुछ भी भीतर न आने पाए, जो कुछ सुनाई दे, दिखाई दे और अनुभव हो, वह सब कुछ अन्दर ही अन्दर का। ताकि उनके भ्रम बने रहें और साथ वालों का डेरा लम्बे समय तक कायम रहे। और जिन्दगी भर नहीं तो कम से कम तब तक तो रहे ही जब तक कि इन साण्डों में कुछ दे पाने का माद्दा बना रहे, पॉवर का इस्तेमाल हो सके। कम से कम तभी तक का साथ बना रहे जब तक कि इन जर्सी गायों में दूध देने का समय बना रहे। बाद में जो होगा, देखा जाएगा।

वैसे भी बिना पॉवर के आजकल कौन किसके साथ रहता है, लोग या तो चुप बैठ जाते हैं, पाला बदल लिया करते हैं अथवा अन्दरखाने कोई गुप्त समझौता ही कर डालते हैं।

आजकल तमाम बाड़ों और गलियारों में उन्हीं उस्तादों और पहलवानों की चर्चा है।  उस्ताद भी कम नहीं है और पहलवान तो उनसे आगे रहेंगे ही, आखिर कितने सारे उस्तादों के साथ काम कर चुके हैं, अपनी उस्तादी दिखा चुके हैं, तभी अब बाड़े और गलियारे अखाड़ों से कम नहीं दिखते।

सारे के सारे अखाड़ची हो गए हैं, बेचारे कुछ बचे होंगे जिनकी विवशता है कि दर्शकों की तरह दूर रहकर तालियां बजाते रहकर हौसला अफजाई करते रहें अथवा मौन समर्थन देते रहेंं। 

कई बार तो  लगता है कि जैसे मालिक और मातहतों में कोई फरक ही नहीं रहा, दोनों एक जैसी हरकतों पर आमादा हो जाते हैं। मालिक भुल जाते हैं अपनी प्रभुता और उतर आते हैं नीचता पर। उधर मातहतों को इतना सर चढ़ाये रखते हैं कि ये मालिक को दरकिनार कर खुद को मालिक समझते रहते हैं और जहाँ मौका मिलता है अपनी चाल चल लिया करते हैं।

दोष किसी एक का नहीं माना जा सकता।  जहाँ साहबों का वरदहस्त होगा वहाँ मातहतों की पहलवानी का चमत्कार दिखेगा ही दिखेगा। दुर्भाग्य से हम लोग आजकल कई सारे बाड़ों और गलियारों में यही खेल देख देख कर अपना मनोरंजन करने लगे हैं।

इस मनोरंजन का ही परिणाम है कि हम अपने कामों को भूलते जा रहे हैं, कत्र्तव्यों को हाशिये पर बिठा दिया है और खुद उन्मुक्त, स्वच्छन्द और स्वेच्छाचारी होकर पूरे आसमान को नाप लेने के लिए मुक्त हैं। मालिक भी हमारी तरह हो गए हैं और हम भी मालिक की तरह। हम सबने अपने-अपने बाड़ों को अखाड़ों में तब्दील कर लिया है। कौन किससे कहे, और क्यों कहे, जब कहीं कुछ अन्तर रहा ही नहीं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

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