विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

महंगा नहीं है सौदा / यात्रा संस्मरण / गोवर्धन यादव

मंहगा नहीं है सौदा.

 clip_image002[4]

( यात्रा 29 जनवरी से 6 फ़रवरी 2016 )

गोवर्धन यादव

मात्र 7465/- (सात हजार चार सौ पैसठ रुपये) में सात ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करना मंहगा सौदा नहीं है. आई.आर.सी.टी.सी. हालिडे टूर पैकेज के अन्तर्गत चलने वाली “भारत दर्शन” स्पेशल ट्रेन देश के विभिन्न अंचलों से चलाई जा रही है, में यात्रा करना मंहगा नहीं पड़ता. एक निर्धारित स्टेशन से यह यात्रा शुरु होकर उसी स्थान पर आकर ठहर जाती है.

इसकी कुछ खासियत है, जो इसे आरामदायक बनाती है.

(१) इस ट्रेन में वही यात्री सफ़र कर सकते हैं,जिन्होंने अपना रिजर्वेशन बुक करवा लिया है.

(२) सामान्य यात्री इसमें सफ़र नहीं कर सकते.

(३) आपकी अपनी सीट निर्धारित कर दी जाती है,जिसमें आप आराम से सो-बैठ सकते हैं

(४) दर्शनों के लिए जाते समय आपको अपना सामान उठाकर कहीं नहीं ले जाना पड़ता

(५) सुरक्षा गार्डों की नियुक्ति की जाती है,जिससे आपका सामान सुरक्षित रहता है.

(६) दर्शन के लिए जाते समय आपको अपनी कीमती वस्तुएँ जैसे सोने-चांदी के जेवरात, मोबाईल सेट आदि अपने पास रखना होता है.

(७) सुबह के पांच बजते ही आपको अपनी सीट पर गरमा-गरम चाय सर्व की जाती है. सामान्यतः इस समय मिलने वाली चाय उन यात्रियों के लिए होती है, जो सुगर की बिमारी से ग्रसित होते हैं. ठीक पांच-दस मिनट बाद मीठी चाय, और काफ़ी का आनन्द यात्री ले सकता है.

(८) दिन के ग्यारह बजते ही आपको गरम-गरम खाना सर्व किया जाता है. इसी तरह रात के आठ बजते ही आपको खाना खिला दिया जाता है.

(९) प्रत्येक यात्री को एक स्टील के थाली दे दी जाती है, जिसकी समुचित सफ़ाई यात्री को खुद करनी होती है. खाना परोसने के पहले थाली के आकार की प्लास्टिक की पन्नी हर यात्री को दी जाती है. यात्री उसे अपनी थाली में करीने से जमा लेता है. उस पर खाना परोसा जाता है. खाना खाने के बाद पन्नी एक डस्टबीन में डालना होता है. इस प्रक्रिया से पानी की काफ़ी बचत तो होती ही है, साथ ही थाली साफ़-सुथरी बनी रहती है...

(१०) हर कोच में एक बड़ा कन्टेनर रखा होता है,जिसमे कचरा डालना होता है.

(११) अपने निर्धारित स्टेशन के अलावा यह कहीं नहीं रुकती है. अतः यात्रा में उबाऊपन महसूस नहीं होता.

इस नौ दिवसीय यात्रा में शामिल होने के लिए हमने काफ़ी समय पूर्व ही अपना रिजर्वेशन करवा लिया था. छिन्दवाड़ा से रवाना होने वाली ट्रेन “पातालकोट एक्सप्रेस” से हमारा परिवार इटारसी रेल्वे स्टेशन के लिए रवाना हुआ. दिनांक 29 जनवरी को जबलपुर से चलने वाली यह स्पेशल ट्रेन तीन बजे के करीब रवाना होकर इटारसी करीब सात बजे शाम को पहुंचती. इसका दूसरा स्टापेज हबीबगंज( भोपाल) रखा गया था, ताकि शेष यात्री इस पर सवार हो सकें मेरे अपने अनुमान के अनुसार करीब छः सौ यात्री इस ट्रेन में सफ़र कर रहे होते हैं.

दिनांक 30 जनवरी 2016 को यह ट्रेन उज्जैन में रुकती है. यात्री उज्जैन में महाकालेश्वर के दर्शन पाकर कृतार्थ हो उठता है. इनके दर्शन के पश्चात स्पेशल बस ओमकारेश्वर के लिए रवाना होती है, जहाँ यात्री ओमकारेश्वर और ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करता है. ( 31 जनवरी) यहाँ से लौटकर ट्रेन का रात का सफ़र शुरु होता है. पूरी रात चलने के पश्चात यह ट्रेन द्वारिका में आकर ठहर जाती है.( 1 फ़रवरी 2016) द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण के दर्शनों के पश्चात नागेश्वर ज्योतिलिंग के दिव्य दर्शन यात्री करता है. इस यात्रा के पश्चात पूरी रात यात्रा का क्रम जारी रहता है. (02-02-2016) गुजरात में अवस्थित सोमनाथ ज्योतिलिंग दर्शनों के बाद यात्री भेट-द्वारिका के लिए स्टीमर पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्णजी के दिव्य दर्शन कर अपने को बड़भागी मानता है. (03-02-2016) को पूरी रात यात्रा करने के पश्चात ट्रेन नासिक जा पहुँचती है, जहाँ त्र्यम्बेकेश्वर ज्योतिर्लिग के दर्शन होते हैं. सारी रात चलती हुए ट्रेन (04-02-2016) अब पुणे जा पहुँचती है. यहाँ से यात्री को करीब एक सौ पचास किलोमीटर दूर स्थित भीमाशंकर ज्योतिलिंग के लिए बस द्वारा यात्रा करनी होती है. इसके बाद ट्रेन औरंगाबाद के लिए रवाना होती है. पूरी रात यात्रा करने के बाद यात्री को औरंगाबाद ( 05-02-2016) में अवस्थित घृष्णेश्वर ज्योतिलिंग के दर्शन प्राप्त होते हैं. यह यात्रा का समापन बिंदु है. इसके बाद आपकी यह स्पेशल ट्रेन जबलपुर के लिए लौट पड़ती है. भोपाल से यात्रा करने वाले, तथा छिन्दवाड़ा की ओर रवाना होने वाले यात्रियों को इटारसी उतरना होता है. शेष यात्री जबलपुर के लिए रवाना हो जाते हैं.

काफ़ी कम खर्च में, नौ दिनों की यात्रा के दौरान सात ज्योतिर्लिंगों के दिव्य दर्शनों से लौटकर यात्री अपने आपको धन्य मानता है. आइये, अब हम उन सात ज्योतिर्लिगों के बारें में संक्षेप्त में जानकारियाँ लेते चलें.

यों तो शिवलिंग असंख्य हैं. फ़िर भी इनमे 12 ज्योतिर्लिंग सर्व- प्रधान हैं. शिव पुराण के अनुसार ये निम्नलिखित हैं इन बारह ज्योतिर्लिगों में से हमने केवल सात ज्योतिर्लिंगों के दर्शन लाभ उठाये.

सौराष्ट्रे सोमनाथंश्च श्री शैले मल्लिकार्जुन *उज्जयिन्यां महाकालं ओमकारं अमलेश्वरम केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम *वाराणस्याश्च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे वैजनाथ चिताभूमौ नागेशं दारुकावने * सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशश्च शिवालये द्वादशे तानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत *सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति

१. श्री महाकालेश्वर clip_image003[4]

महाकालेश्वर’:- यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर मे स्थित है. उज्जयिनी का एक नाम अवन्तिकापुरी भी है. यह स्थान सप्तपुरियों में से एक है. महाभारत व शिवपुराण में इसकी महिमा गाई गई है. महाकालेश्वर का प्रसिद्ध मन्दिर क्षिप्रा नदी के तट पर अवस्थित है. बारह वर्ष मे एक बार यहां कुम्भ का मेला भी भरता है आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेस्श्वरम मृत्युलोके महाकालं लिंगत्रयं नमोस्तुते

स्वर्गलोक में तारकलिंग,हाटकेश्वर और पृथ्वीलोक में महाकालेश्वर स्थित हैं.

कथा- रत्नमाला पर्वत पर एक भयंकर दानव रहता था,जिसका नाम दूषण था. वह वेदों और ब्राह्मणॊं का घोर विरोधी था और उन्हें आए दिन परेशान करता रहता था.

उज्जैन में एक विद्वान ब्राह्मण के चार पुत्र थे,जो शिव के प्रबल उपासक थे. एक दिन दूषण ने उज्जैन नगरी पर अपनी विशाल सेना के साथ आक्रमण कर दिया. चारों भाईयों ने शिव कि आराधना की. शिव ने प्रकट होकर दर्शन दिए. इन्होंने दूषण को सेना सहित मार गिराने के लिए शिव से प्रार्थणा की. शिव ने तत्काल ही दूषण को सेना सहित मार डाला. चारो भाईयों ने शिव को ज्योतिर्लिंग रुप में वहां अवस्थित रहने की प्रार्थणा की.

(बस द्वारा)

(२) -श्री ओंकारेश्वर एवं अम्लेश्वर clip_image005[4]

यह ज्योतिर्लिंग भी मध्यप्रदेश में पवित्र नदी नर्मदा के पावन तट पर स्थित है. ओंकारेश्वर लिंग मनुष्य निर्मित नहीं है. स्वयं प्रकृति ने इसका निर्माण किया है. इसके चारों ओर हमेशा पानी भरा रहता है. इस स्थान पर नर्मदा के दो भागों में विभक्त हो जाने से बीच में एक टापू सा बन गया है. इस टापू को मान्धाता या शिवपुरी भी कहते हैं. नदी की एक धारा इस पर्वत के उत्तर की ओर और दूसरी दक्षिण की ओर बहती है. दक्षिणवाली धारा मुख्य धारा मानी जाती है. इसी मान्धाता पर्वत पर श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मन्दिर स्थित है. पूर्व काल में महाराज मान्धाता ने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया था.

कथा-एक बार नारद मुनि विंध्याचंल पर्वत पर शिव को प्रसन्न करने के लिए तप कर रहे थे. उसी सम्य विंध्य मनुष्य रुप में उनके समक्ष प्रकट हुआ और कहने लगा कि उसके जैसा पर्वत और कहीं नहीं है. नारदजी ने तत्काल उसका प्रत्युत्तर देते हुए कहा कि तुमसे बडा तो मेरु पर्वत है. इस बात से दुखी होकर उसने नर्मदा के तट पर शिव की कडी तपस्या की. शिव ने प्रसन्न होकर उसे अपने दर्शन देते हुए वर मांगने को कहा. पर्वत ने शिव से कहा कि वे ज्योतिलिंग के रुप में वहां विराजमान हो जाएं. ओंकारेश्वर मन्दिर नर्मदाजी के पावन तट पर,जो मध्यप्रदेश का मालवा क्षेत्र कहलाता है,पर अवस्थित है. यदभीष्टं फ़लं तश्च प्राप्नुयान्नत्र संशयः एतत्ते सर्वमाख्यातमोंकार प्रभवे फ़लम !!

ओंकारेश्वर का नाम सुन लेने मात्र से सारे इच्छित फ़लों की प्राप्ति होती है.

द्वारकाधीश मंदिर-भेंट द्वारिका की यात्रा

clip_image007[4]

OVERNIGHT JOURNEY

 clip_image009[4]

गुजरात का द्वारका शहर वह स्थान है जहाँ 5000 वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण ने मथुरा छोड़ने के बाद द्वारका नगरी बसाई थी। जिस स्थान पर उनका निजी महल 'हरि गृह' था वहाँ आज प्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर है। इसलिए कृष्ण भक्तों की दृष्टि में यह एक महान तीर्थ है। वैसे भी द्वारका नगरी आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित देश के चार धामों में से एक है। यही नहीं द्वारका नगरी पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। मान्यता है कि इस स्थान पर मूल मंदिर का निर्माण भगवान कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने करवाया था। कालांतर में मंदिर का विस्तार एवं जीर्णोद्धार होता रहा। मंदिर को वर्तमान स्वरूप 16वीं शताब्दी में प्राप्त हुआ था।

यह मंदिर एक परकोटे से घिरा है जिसमें चारों ओर एक द्वार है। इनमें उत्तर में स्थित मोक्ष द्वार तथा दक्षिण में स्थित स्वर्ग द्वार प्रमुख हैं। सात मंज़िले मंदिर का शिखर 235 मीटर ऊँचा है। इसकी निर्माण शैली बड़ी आकर्षक है। शिखर पर क़रीब 84 फुट लम्बी बहुरंगी धर्मध्वजा फहराती रहती है।

द्वारकाधीश मंदिर के गर्भगृह में चाँदी के सिंहासन पर भगवान कृष्ण की श्यामवर्णी चतुर्भुजी प्रतिमा विराजमान है। यहाँ इन्हें 'रणछोड़ जी' भी कहा जाता है। भगवान ने हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल धारणकिए हैं। बहुमूल्य अलंकरणों तथा सुंदर वेशभूषा से सजी प्रतिमा हर किसी का मन मोह लेती है। द्वारकाधीश मंदिर के दक्षिण में गोमती धारा पर चक्रतीर्थ घाट है। उससे कुछ ही दूरी पर अरब सागर है जहाँ समुद्रनारायण मंदिर स्थित है। इसके समीप ही पंचतीर्थ है। वहाँ पाँच कुओं के जल से स्नान करने की परम्परा है। बहुत से भक्त गोमती में स्नान करके मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं। यहाँ से 56 सीढ़ियाँ चढ़ कर स्वर्ग द्वार से मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं। मंदिर के पूर्व दिशा में शंकराचार्य द्वार स्थापित शारदा पीठ स्थित है।

बेट द्वारका

द्वारका से ३५ किमी दूर है ओखा क्षेत्र, जो समुद्रतटीय क्षेत्र का अंतिम छोर है और यहां समुद्र के भीतर टापू पर बसी है "भेंट द्वारका"। द्वारका से भेंट द्वारका जाने वाला मार्ग आलौकिक जान पड़ता है। मार्ग में सबसे पहला पड़ाव आता है रुक्मणिजी का मंदिर। कहते हैं रुक्मणिजी को प्यास लगने पर यहां श्रीकृष्ण ने गंगाजी का आह्वान किया था और वे यहां प्रकट हुई थीं। तभी से यहां आने वाले श्रद्धलुओं के लिए यहां जल सेवा जारी है। इसके बाद आता है ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव और फिर पड़ता है गोपी तालाब। तमाम मंदिरों में प्रयुक्त होने वाला गोपीचंदन यहीं से आता है।

भेंट द्वारका को "मूल द्वारका" भी कहा जाता है। यहां बोट की सहायता से पहुंचा जाता है। समुद्र में भेंट द्वारका हर एक को आश्चर्यचकित कर देती है। कहते हैं कि श्रीकृष्ण के शरीर त्याग करते ही द्वारका समुद्र में विलीन हो गई थी और स्मृति रूप में जो स्थान अब है, वह भेंट द्वारका कहलाता है।

३ - श्री नागेश्वर clip_image011[4]

यह ज्योतिर्लिंग गुजरात प्रान्त में द्वारिकापुरी से लगभग 17 मील की दूरी पर स्थित है. .

कथा:- किसी समय सुप्रिय नामक वैश्य था, जो बडा धर्मात्मा,सदाचारी और शिवजी का भक्त था. एक बार नौका पर सवार होकर वह कहीं जा रहा था. अकस्मात दारुक नामक राक्षस ने उसकी नौका पर आक्रमण कर दिया. उसने सुप्रिय सहित सभी यात्रियों को अपने जेलखाने में डाल दिया. चुंकि वह शिवभक्त था, सो जेल में भी शिवाराधना करता रहा.

जब इस बात की खबर दारुक को लगी तो उसने अपने सैनिकों को उसका वध कर देने की आज्ञा दी. शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने अपना पाशुपतास्त्र सुप्रिय को देकर अंतर्ध्यान हो गए. उसने उसे दिव्यास्त्र से सभी का वध कर अपने सहयात्रियों को उस कारागार से मुक्त करवाया. भगवान शिव के आदेशानुसार ही इस लिंग का नाम नागेश पडा.

एतद्धश्श्रृणुयान्नित्यं नागेशोद्भवमादरात....सर्वान्कामानियाध्दीमा महापातकनाशनान

अर्थात- जो भी मनुष्य इस कथा का श्रवण करेगा उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे.

४ - श्री सोमनाथ clip_image013[4]

यह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ नामक विश्व प्रसिद्ध मन्दिर में स्थापित हैं. यह मन्दिर गुजरात प्रान्त के काठियावाड क्षेत्र में समुद्र के किनारे स्थित है. चन्द्रमा ने भगवान शिव को अपना स्वामी मानकर यहाँ तपस्या की थी..यह क्षेत्र प्रभास क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है. यह वह क्षेत्र भी है जहाँ श्रीकृष्णजी ने जरा नामक व्याध के बाण को निमित्त बनाकर अपनी लीला का संवरण किया था.

कथा…………….

-चन्द्रमा ने दक्षप्रजापति की 27 पुत्रियों के साथ अपना विवाह रचाया था लेकिन वे केवल रोहिणी से अत्यधिक प्रेम करते थे. शेष 26 पत्नियों ने अपने व्यथा-कथा अपने पिता से कही. उन्होंने चन्द्रमा को क्षय रोग से ग्रसित होने का शाप दे दिया .शाप से शापित चन्द्रमा ने शिव को प्रसन्न करने के लिए कडा तप किया. शिव ने प्रसन्न होकर चन्द्रमा को पन्द्रह दिनों तक घटते रहने और शेष दिन बढते रहने का वरदान दिया. शिव के इस स्थान पर प्रकट होने एवं सोम अर्थात चन्द्रमा द्वारा पूजित होने के कारन इस स्थान का नाम सोमनाथ पडा. सोमलिंगं नरो दृष्ट्वा सर्वपापात प्रमुच्यते ! लब्द्ध्वा फ़लंमनो॓Sभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहिते!!

सोमनाथ महादेव के दर्शनों से प्राणि सभी पापों से तर जाता है,ऐसी मान्यता है.

५- -श्री त्र्यम्बेकश्वर- clip_image014[4]

यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक जनपद में अवस्थित है.जो माहात्म्य उत्तर भारत में पापविमोचिनी गंगा का है,वैसा दक्षिण में गोदावरी का है. जैसे इस धरती पर गंगावतरण का श्रेय तपस्वी भगीरथ को है वैसे ही गोदावरी का प्रवाह ऋषिश्रेष्ठ गौतम की घोर तपस्या का फ़ल है .इसी पुण्यतमा गोदावरी के उद्गम स्थल के समीप अवस्थित त्र्यम्बकेश्वर भगवान की भी बडी महिमा है .गौतम ऋषि तथा गोदावरी के प्रार्थनानुसार भोलेनाथ शिव इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यम्बकेश्वर के नाम से विख्यात हुए.

कथा;-सह्याद्री जनपद में एक दयालु साधु गौतम अपनी पत्नि अहल्या के साथ रहते थे. वहां निवास कर रहे अन्य लोग इनसे ईर्षाभाव रखते थे और उस स्थान से निकाल देना चाहते थे. एक दिन सभी ने एक युक्ति निकाली और इन पर आरोप जड़ दिया कि इनके द्वारा किसी गाय का वध किया गया है .इस पापाचार के लिए वे वहां से निष्कासित कर दिए गए. दुखी गौतम ने कठिन तपकर शिव को प्रसन्न किया. जब शिव ने वरदान मांगने को कहा तो गौतम ने सभी को माफ़ करने एवं पास ही एक नदी के प्रकट होने की बात शिव से की. शिव ने गोदावरी को वहां प्रकट होने को कहा तो उसने शिव से विनती की कि आपको भी मेरे तट पर स्वयं विराजित होना होगा. गोदावरी की प्रार्थना सुनकर शिवजी वहां ज्योतिर्लिंग के रुप मे विराजमान हो गए.

अतः परं प्रवद्यामि माहात्म्यं त्र्यम्बकस्य च....यच्छुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवःक्षणात अर्थात-त्र्यम्बकेश्वर महादेव के नाम स्मरण करने,उनकी लीलाएं सुनने से सारे पाप धुल जाते हैं.

६- श्री भीमाशंकर: clip_image015[4] clip_image017[4]

-यह ज्योतिर्लिंग पूना से 150 मील की दूरी पर भीमा नदी के पावन ताट पर अवस्थित है. यहां “डाकिनी”ग्राम का पता नहीं लगता. शंकरजी यहां पर सह्याद्रि पर्वत पर अवस्थित हैं. भगवान शिव ने यहां पर त्रिपुरासुर का वध करके विश्राम किया था. उस समय यहां अवध का भीमक नामक एक सूर्यवंशी राजा तपस्या करता था. शंकरजी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया. उसके बाद से इस ज्योतिर्लिंग का नाम “श्री भीमशंकर” पडा.

कथा:- रावण के भाई कुम्भकरण के पुत्र भीमासुर ने भगवान विष्णु और अन्य देवताओं से इस बदला लेने की ठानी कि उन्होने उसके परिवार और प्रियजनों की हत्या का वध किया था. प्रतिशोध की आग में जलते भीमासुर ने ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया. ब्रह्मा ने प्रकट होकर उसे अतुलित बलशाली होने का वरदान दे दिया. अब उसने वरदान पाकर देवलोक से देवताऒं को स्वर्ग छोड देने पर मजबूर कर दिया. अपनी विशाल सेना लेकर वह एक दिन कामरु प्रदेश के राजा पर आक्रमण कर दिया जो संयोग से शिवभक्त था. उसने राजा से शिवलिंग को उखाड फ़ेंकने को कहा. जब राजा ने इनकार कर दिया तो उसने अपनी तलवार निकालकर शिवलिंग पर वार किया. जैसे ही उसकी तलवर शिवलिंग से टकराई, शिव स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने उसे मार डाला. दानव भीमासुर का वध करने के कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमाशंकर के नाम से जगप्रसिद्ध हुआ. अतः परं प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं भैमशंकरम::यस्य श्रवणमात्रेण सर्वाभीष्टं लभेन्नरः

अर्थ;-इस चमत्कारी शिवलिंग की कथा सुनने मात्र से प्राणियों की हर मनोकामामनाएं पूरी होती है

७ श्री घुश्मेश्वर अथवा घृष्णेश्वर clip_image018[4]

यह बारहवां ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर के नाम से जाना जाता है. यह ज्योतिर्लिंग मराठवाडा के औरंगाबाद से करीब 12 मील दूर बेरुस गांव के पास यह अवस्थित है.

कथा:- सुधर्मा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नि सुदेहा के साथ देवगिरि पर्वत पर निवास करता था. सुदेहा इस बात को लेकर दुखी रहती थी कि उसके कोई संतान नहीं थी. संतान प्राप्ति के लिए उसने अपने पति से अपनी छोटी बहन घुषमा से विवाह करने को कहा. घुष्मा चुंकि शिवभक्त थी. उसने कुछ ही दिनों बाद एक पुत्र को जन्म दिया. बालक बडा हुआ. उसका विवाह बडी धूमधाम से हुआ. यह सब देखकर सुदेहा ने ईष्यावश उस का वध कर दिया. इस समय उसकी माता घुष्मा पार्थिव शिवलिंग बना कर पूजा कर रही थी. पूजा समाप्ति के बाद पार्थिव शिव लिंग को विसर्जित करने के लिए जब वह एक झील के पास पहुंची और उसने उसने जैसे ही शिवलिंग का विसर्जन किया, उसका पुत्र जीवित अवस्था में झील में से प्रकट हो गया .पुत्र के साथ स्वयं शिवजी भी थे. शिवजी ने सुदेहा के बारे में सब बतलाते हुए उसे सजा देने की बात की तो दयालु घुष्मा ने अपनी बहन के कुकर्मों को माफ़ कर देने को कहा.

घुश्मेशाख्य्ममिदं लिंगमित्थं जातं मुनीश्वराः ””तत्दृष्टवा पूजयित्वा हे सुखं संवर्द्धते सदा

अर्थ;- घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा करने से सुखॊं की प्राप्ति होती है.

( घृष्णेश्वर मन्दिर के कुछ फ़र्लांग की दूरी पर अवस्थित है जग-प्रसिद्ध एलोरा शिव मन्दिर)

एलोरा शिव मंदिर

औरंगाबाद शहर से 28 किमी.की दूर तथा घउष्णेश्वर मंदिर से लगभग एक किमी. की दूरी पर एलोरा का विश्व विख्यात शिव मंदिर है. भारतीय शिल्प कला के बेजोड़ नमुने के रूप में एलोरा प्रथम स्थान रखता है. एलोर शब्द का निर्माण एलापुरा या इलापुरा इस नाम से हुआ.

एलोरा में पहाड़ियों की वादी में ये अद्भुत आकृतियां चट्टानों में खुदी हुई हैं. दशावतार और घूमर की छत, कैलाश मन्दिर की छत, तीन मंजिला गुफ़ाओं और इंद्र सभा के मन्दिर में देखने को मिलती हैं.अजंता की गुफ़ाओं की तरह ही इनका निर्माण किया गया था. दर्शक यह देखकर आश्चर्य में डूब जाता है कि इन गुफ़ा मन्दिरों की खुदाई ऊपर से होती हुई नीचे आती है. विश्व का यह अनोखा आश्चर्य केवल अजंता और एलोरा में ही देखा जा सकता है. clip_image020[4]- -clip_image022[4]

मित्रों,

निश्चित ही इस यात्रा से उन तमाम यात्रियों को अपूर्व सुख की प्राप्ति हुई होगी, जो पहली बार इस यात्रा पर रवाना हुए थे.( इनमें से अनेक ऎसे यात्री भी थे जिन्होंने उपरोक्त ज्योतिर्लिंगों में से किन्ही एक - दो अथवा तीन ज्योतिर्लिंग के दर्शन पूर्व में कर चुके रहे होंगे). यह यात्रा अत्यधिक रोमांचक इसलिए भी कही जा सकती है कि यात्री, एक साथ, सात-सात ज्योतिर्लिंग के दर्शन एक निश्चित समय के अन्तराल में कर रहे थे.

रेल मैनेजमेन्ट ने तो सारी सुख-सुविधाएँ देने की भरपूर कोशिश की, जिसकी अपेक्षाएँ यात्रियों को रही होंगी. लेकिन यात्री इस दिशा में प्रशासन को कितना सहयोग दे पाया, इस पर जरुर ध्यान देने की जरुरत है ?

(१)हम में से कई यात्री ऎसे भी थी जो अपशिष्ट पदार्थों को खिड़की से बाहर फ़ेंकते नजर आए, जबकि डस्टबीन की व्यवस्था की गई थी. रोकटोक का उन पर कोई असर पड़ रहा हो, ऎसा भी देखने में नहीं आया.

(२) यात्रा के दौरान दो बार ऎसा भी समय आया, जब रेल लगातार लम्बी दूरी तय कर रही थी, बेसब्र लोगो ने लेवोट्री में अथवा दरवाजे के पास खड़े होकर बड़ी बेशर्मी से स्नान किया. कुछ महिलाएं तो चलती ट्रेन में अपने कपड़े-लत्ती धोकर खिड़कियों में सुखाने के लिए लटकाती नजर आयीं. फ़लस्वरूप पानी की टंकी खाली हो गई और अनेक यात्रियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा

.(३) कुछ यात्री इस तरह के भी थे, जो ब्रश करते समय तथा दाढ़ी बनाते समय पानी को अकारण बहाते नजर आए. कुछ यात्री तो ऎसे भी देखे गए जो पेपर-सोप का इस्तेमाल करने के बाद बची सामग्री को वाश-बेसिन में ही फ़ेंकते नजर आए.

(४) ज्योतिर्लिंग.के दर्शनों के लिए बस की उत्तम व्यवस्था मैनेजमेन्ट ने कर रखी थी. बसें रेल्वे स्टेशन के परिसर के बाहर खड़ी मिलती थी. जो यात्री हृष्ट-पुष्ट है, जवान है, अथवा तन्दुरुस्त है, वह दौड़कर आगे की सीटॊं पर कब्जा जमा लेता और अन्त तक वहीं जमा रहता था. जो यात्री वृद्ध है, कुछ घुटनों की दर्द की वजह से जल्दी नहीं चल पाते थे, उन्हें मजबूरी में पीछे की सीटॊं पर बैठना पड़ता था. जबकि होना तो यह चाहिए था कि वे अपनी ओर से उन असमर्थ लोगों की मदद करनी चाहिए थी.

(५) महिलाओं और पुरूषॊ के नहाने की अलग-अलग जगहों की व्यवस्था प्रशासन ने बना रखी थी, जिसका समुचित उपयोग यात्रियों ने नहीं किया. कुछ तो अपने कपड़ॆ धोने में लग गए, जिससे पानी का अपव्यय हुआ. कई यात्री तो बिना नहाये ही दर्शनों को निकलना पड़ा.

प्रशासन की कुछ बड़ी विफ़लताएँ रही है, जिस पर उसे ध्यान दिलाए जाने की आवश्यकता है.

(१) खाना उत्तम कोटि का नहीं रहा. मैनेजर से शिकायत करने के बाद आशिंक सुधार आया. रेल मैनेजमैन्ट को चाहिए कि वह मैनेजर को इस दिशा में आवश्यक निर्देश दे. हो सके तो रेल्वे के किसी अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए, कि वह इस पर बराबर नजर बनाए रखे

(२) इतनी लम्बी यात्रा के दौरान किसी कुशल डाक्टर की व्यवस्था जरुर करनी चाहिए थी, क्योंकि सफ़र में अनेक आयु वर्ग के लोग सफ़र कर रहे होते हैं.

(३) बसों की व्यवस्था उत्तम कही जा सकती है, लेकिन इसमें यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि विकलांग-वृद्धों के आगे बैठने की जगह आराम से मिल सके. इस समस्या को निपटाने के लिए यह किया जा सकता है कि आयु वर्ग के हिसाब से उन्हें पहले से ही सीट आवंटित करा दी जाए.

(४) हर कोच में मोबाईल चार्ज करने के उपकरण तो लगे हुए होते हैं, ( दोनो गेट के पास) लेकिन काम नही कर रहे होते हैं. अतः प्रशासन को चाहिए कि वह प्रत्येक कूपे में इसकी व्यवस्था कर दे, ताकि यात्री को उठकर अन्यत्र जाने की जरुरत न पड़े और चलती ट्रेन में झकोरा खाकर गिरने से अपने को बचा सके.

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget