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भारत की अध्यात्म परम्परा और वर्तमान दशा / प्रोफेसर महावीर सरन जैन

तत्त्व को अलग-अलग दृष्टियो से देखने के कारण तथा भाषिक अभिव्यक्ति के कारण पंथ भेद हो जाते हैं। इस विश्व में सभी पदार्थों की सत्ता है। सत्ता अणु में भी है और महत् में भी है। 'सत्ता´ एक भी है और अनेक भी है। ´सत्ता' सत् भी है और असत् भी है। ´सत्ता' चेतन भी है और अचेतन भी है। ´सत्ता' नित्य भी है और अनित्य भी है। विज्ञान का विषय अचेतन सत्ता का अध्ययन है। विज्ञान अचेतन पदार्थ का विश्लेषण एवं विवेचन करता है। अध्यात्म का पथिक साधक चेतन सत्ता का साक्षात्कार करता है। विश्व में मृण्मय से लेकर चिन्मय तक की सत्ता है। विज्ञान एवं अध्यात्म के विवेच्य पृथक हैं। अध्यात्म परमार्थ ज्ञान है, आत्मा-परमात्मा सम्बन्धित ज्ञान है, इल्मे इलाही है, चिन्मय सत्ता का ज्ञान है। विज्ञान लौकिक जगत का ज्ञान है, भौतिक सत्ता का ज्ञान है; पदार्थ, वस्तु, रसायन, प्रकृति का विश्लेषणात्मक-विवेचनात्मक ज्ञान है। सामान्य धारणा है कि दोनों विपरीतार्थक हैं। चिन्तक एवं मनीषी विद्वानों को भविष्य के लिए यह सोचना है कि दोनों की मूलभूत अवधारणाओं में किस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है ? आज का युवा धर्म-दर्शन को भी विज्ञान की तार्किक कसौटी पर कसना चाहता है। क्या विज्ञान एवं अध्यात्म की मूलभूत अवधारणाओं में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में मेरी धारणा है कि यदि दोनो अपने-अपने आग्रह छोड़ दें तो दोनों के बीच सामरस्य के सूत्र खोजे जा सकते हैं। दोनों सत्ता को अविनाशी मानते हैं। विज्ञान मानता है कि मैटर (Matter) नष्ट नहीं हो सकता उसका रूपान्तरण सम्भव है। अध्यात्म स्वीकारता है कि आत्मा नष्ट नहीं हो सकती; वह अनादि-निधन है। भविष्य के विज्ञान को अपनी भौतिकवादी सीमाओं का अतिक्रमण करना होगा। विज्ञान विशुद्ध रूप से भौतिकवादी रहा है। विज्ञान विश्व के मूल में पदार्थ एवं ऊर्जा को ही अधिष्ठित देखता है। विज्ञान को अपार्थिव चिन्मय सत्ता का भी संस्पर्श करना होगा। भविष्य के विज्ञान को अपना यह आग्रह छोड़ना होगा कि जड़ पदार्थ से चेतना का आविर्भाव होता है। डार्विन के विकासवाद के इस सिद्धान्त को तो स्वीकार करना सम्भव है कि अवनत कोटि के जीव से उन्नत कोटि के जीव का विकास होता है किन्तु उनका यह सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं है कि अजीव से जीव का विकास होता है। मेरी इस धारणा अथवा मान्यता का तार्किक कारण है। जिस वस्तु का जैसा उपादान कारण होता है, वह उसी रूप में परिणत होता है। चेतन के उपादान अचेतन में नहीं बदल सकते। अचेतन के उपादान चेतन में नहीं बदल सकते। न कभी ऐसा हुआ है, न हो रहा है और न होगा कि जीव अजीव बन जाए तथा अजीव जीव बन जाए। पदार्थ के रूपांतरण से स्मृति एवं बुद्धि के गुणों को उत्पन्न किया जा सकता है मगर चेतना उत्पन्न नहीं की जा सकती। चेतना का अध्ययन अध्यात्म का विषय है। ‘जानना’ चेतना का व्यवच्देदक गुण है। जीव चेतन है। अजीव अचेतन है। जीव का स्वभाव चैतन्य है। अजीव का स्वभाव जड़त्व अथवा अचैतन्य है। जो जानता है, वह जीवात्मा है। जो नहीं जानता, वह अनात्मा है। जीव आत्मा सहित है। अजीव में आत्मा नहीं है। जीव सुख दुख की अनुभूति करता है। अजीव को सुख दुख की अनुभूति नहीं होती। जो जानता है, वह चेतना है; जो नहीं जानता, वह अचेतना है। स्मृति एवं बुद्धि तथा मस्तिष्क के समस्त व्यापार ‘चेतना’ नहीं हैं। पदार्थ के रूपांतर से स्मृति एवं बुद्धि के गुणों को उत्पन्न किया जा सकता है मगर चेतना उत्पन्न नहीं की जा सकती।

एक दृष्टि ने माना कि परम चैतन्य से ही जड़ जगत की सृष्टि होती है। दूसरी दृष्टि मानती है कि भौतिक द्रव्य की ही सत्ता है। भौतिक पदार्थ के अतिरिक्त अन्य किसी की सत्ता नहीं है। बुद्धि एवं मन की भाँति चेतना भी ‘स्नायुजाल की बद्धता’ अथवा ‘विभिन्न तंत्रिकाओं का तंत्र’ है जो अन्ततः अणुओं एवं आणविक क्रियाशीलता का परिणाम है। भविष्योन्मुखी दृष्टि से विचार करने पर यह स्वीकार करना होगा कि दोनों की अपनी अपनी भिन्न सत्ताएँ हैं।

अजीव अथवा जड़ पदार्थ का रूपान्तरण ऊर्जा (प्राण), स्मृति, कृत्रिम प्रज्ञा एवं बुद्धि में सम्भव है किन्तु इनमें चैतन्य नहीं होता। कम्प्यूटर चेतनायुक्त नहीं है। कम्प्यूटर को यह चेतना नहीं होती कि वह है, वह कार्य कर रहा है। कम्प्यूटर मनुष्य की चेतना से प्रेरित होकर कार्य करता है। उसे सुख दुख की अनुभूति नहीं होती। उसे स्व-संवेदन नहीं होता। ‘मैं हूँ,’ ‘मैं सुखी हूँ’, ‘मैं दुखी हूँ’ - शरीर को इस प्रकार के अनुभवों की प्रतीति नहीं होती। इस प्रकार के अनुभवों की जिसे प्रतीति होती है, वह शरीर से भिन्न है। जिसे प्रतीति होती है उसे भारतीय दर्शन ‘आत्मा’ शब्द से अभिहित करते हैं। आत्मा में चैतन्य नामक विशेष गुण है। आत्मा में जानने की शक्ति है। आत्मा के द्वारा जीव को अपने अस्तित्व का बोध होता है। ज्ञान का मूल स्रोत आत्मा ही है। आत्मा अमूर्त तत्व है। इन्द्रियों का वह विषय नहीं है। इन्द्रियाँ उसे जान नहीं पातीं। इससे इन्द्रियों की सीमा सिद्ध होती है। इससे आत्मा का अस्तित्व नहीं है - यह सिद्ध नहीं होता।

हमारे मनीषियों ने अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोषों की विवेचना की है। सम्प्रति इसकी विवेचना का अवकाश नहीं है। हम मनीषियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहते हैं कि विज्ञान एवं अध्यात्म के बीच सामरस्य का मार्ग स्थापित करने में ‘मनोविज्ञान’ का अध्ययन सहायक हो सकता है । मनोविज्ञान में ‘संज्ञानात्मक मनोविज्ञान’ पर कार्य हो रहा है। पहले मनोविज्ञान उत्तेजन-प्रतिक्रिया व्यवहार के आधार पर ही मानवीय व्यवहार का अध्ययन करता था। आज का मनोविज्ञान उद्दीपनों और प्रतिक्रियाओं के आधार पर मानवीय व्यवहार का अध्ययन करने तक सीमित नहीं है। अब मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार को समझने के लिए प्रत्यक्षण, स्मृति, कल्पना, तर्क, निर्णय, अनुभव बोध आदि का भी उपयोग कर रहा है। संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के अध्ययन का आधार संज्ञान है। संवेदन एवं संज्ञान में अन्तर है। संवेदन के द्वारा प्राणी को उत्तेजना का आभास होता है। संज्ञान शक्ति के द्वारा मनुष्य संवेदनों को नाम, रूप, गुण आदि भेदों से संगठित कर, ज्ञान प्राप्त करता है। योग साधना में ध्यान, धारणा तथा समाधि का विशद् वर्णन एवं विवेचन सुलभ है। मनोविज्ञान को गहन समाधि एवं स्वभावोन्मुख गहन ध्यान में लीन साधक की शान्त, निर्विकल्प, विचार शून्य एवं क्रियाहीन स्थिति के अन्तर्निरीक्षण की विधि एवं पद्धति का संधान करना चाहिए।इस प्रकार का गहन अध्ययन अध्यात्म एवं विज्ञान के मध्य सेतु का काम कर सकता है। पहले भौतिक-विज्ञानी मानते थे कि भौतिकी व्याख्या में तरंग एवं सूक्ष्म अंश परस्पर विपरीत छोर हैं। परमाणु के आविष्कार के बाद भौतिक-विज्ञान का उक्त सिद्धान्त अमान्य हो गया है। अब सर्वमान्य है कि परमाणु क्रिया की व्याख्या के लिए दोनों की साथ-साथ व्याख्या करना आवश्यक है। परमाणु के सम्बन्ध में यह भी ध्यान देने योग्य है कि परमाणु के अंशों को गणित की दृष्टि से तो विश्लेषित किया जा सकता है, किन्तु परमाणु के अंशों की किसी भी विधि से झलक पाना सम्भव नहीं है। ऊर्जाणु का सूक्ष्म-अंश युगपत एकाधिक स्थानों पर हो सकता है अथवा एकाधिक मार्गों पर गमन कर सकता है। जब भौतिक जगत के ऊर्जाणु के स्वरूप की आधारभूत यथार्थता का प्रत्यक्षण इतना दुष्कर एवं जटिल है तब समस्त आभासों का अतिक्रमण करने वाले आत्म तत्व का किसी यंत्र से प्रत्यक्षण किस प्रकार सम्भव है। जिससे सबको जाना जाता है उसको बाह्य-विधि से कैसे जाना सकता है। विज्ञान में ऊर्जाणु भौतिकी के क्षेत्र में नए अनुसंधान कार्य हो रहे हैं। इनसे भविष्य में आत्मा अथवा चेतना के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रमाण सिद्ध होना सम्भव है। विज्ञान में ऊर्जा भौतिकी आदि क्षेत्रों में जो नव्यतम अनुसंधान हुए हैं, उनके आलोक में विज्ञान इस सिद्धान्त की पुष्टि की ओर कदम बढ़ा रहा है कि प्रत्येक प्राणी की चेतना को प्रकट करने के लिए जैविक चेतना संहिति तो केवल भौतिक ढाँचा जुटाता है।

अध्यात्म के विभिन्न दर्शनों एवं धर्मों के भेद का मूल कारण पंथ भेद है। धर्म जब पंथ हो जाता है तो विभिन्न पंथों के अपने शास्त्र, अपने प्रतीक, अपने चिन्ह, अपने झण्डे, अपने पारिभाषिक शब्द हो जाते है। साधना के सोपानों तक भेद रहते हैं। भाषिक धरातल पर भेद रहते हैं। सिद्धि के धरातल पर भेद नहीं होता। वहाँ आत्म साक्षात्कार होता है जिसे भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। मुझे कबीर की पंक्ति याद आ रही है। ´तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखन की देखी'। उस धरातल पर यह अनुभूत होता है कि एक महाशक्ति (परम चेतना) अथवा अनन्तानन्त महाशक्तियाँ (आत्म चेतनाएँ) आचार-भेद से भिन्न-भिन्न स्वरूपों में दृश्यमान हैं।

´एको देवः सर्वभूतेषु गूढ़ः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा'। अनन्तानन्त महाशक्तियों की दृष्टि से व्यक्त करना चाहें तो अहं भी ब्रहास्मि ही है। सच्चिदानन्द परब्रह्म सर्वविधि परिपूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण को निकालने पर जो शेष रहता है वह पूर्ण ही रहता है।´पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते'।

मैंने बहुत से तथाकथित साधकों को निकट से देखा, जाना, पहचाना है। वे केवल कहते हैं किन्तु उनका आचरण कपट भरा होता है। उनकी करनी-कथनी का द्वैत इतना अधिक होता है कि उनका जीवन अपवित्र, विकारी एवं विकृत कोटि का बन जाता है। वे अध्यात्म, दर्शन, धर्म, योग, साधना जैसे पवित्र, पावन एवं विशुद्ध चेतना के पर्यायों को अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कलंकित करते हैं। उनके पास वाक् चातुर्य का भंडार होता है जिसके बल पर वे अपने अंध-भक्तों को प्रभावान्वित करते रहते हैं।

भारत में चिंतन के धरातल पर जितनी विश्वजनीनता रही है, उदारता रही है, विशालता रही है, अभेदता रही है, भेदभावविहीनता रही है, समतावादिता एवं समदर्शिता रही है सामाजिक धरातल पर उतनी ही संकीर्णता, असमानता, भेदभावपूर्णता रही है। दर्शन के धरातल पर हमारे मनीषियों ने उद्धोष किया – ´तच्चैकं सर्वभूतेषु' (वह एक ही सब प्राणियों में वर्तमान है) मगर समाज के धरातल पर वर्णों एवं जातियों को उनके कर्म के आधार पर नहीं अपितु जन्मना आधार पर ऊँची-नीची, छोटी-बड़ी कोटियों में बाँट दिया गया और तथाकथित निम्न कोटि की जाति में जन्म लेनेवालों को मानवीय गरिमा एवं अधिकारों से वंचित कर दिया गया।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

भारत सरकार

123, हरि एन्कलेव, चाँदपुर रोड

बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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