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छत्तीसगढ़ के प्रयाग में राजिम कुंभ का वैभव / अनामिका

छत्तीसगढ़ के अनेक स्थल अनादिकाल से धर्म, अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का केन्द्र रहा है। अध्यात्म और दर्शन का वैभव चमत्कारिक रहा है लेकिन सुनियोजित पहल के अभाव में छत्तीसगढ़ के केन्द्र नेपथ्य में रहे हैं। बीते सालों में सुनियोजित पहल ने छत्तीसगढ़ की पावन भूमि को धर्म एवं अध्यात्म की दुनिया में विशिष्ट स्थान दिया है। इन्हीं में एक है राजिम का कुंभ। दस वर्ष पहले प्रयाग के रूप में पहचाने जाने वाले राजिम को देश के संतों ने कुंभ का दर्जा दिया। साल-दर-साल राजिम कुंभ वैभव का प्रकाश धर्मालुओं को आलौकित करता आ रहा है। धर्म, अध्यात्म और विज्ञान के इस सालाना अनुष्ठान का उपक्रम शुरू हो चुका है। एक ऐसा अनुष्ठान जिसमें छत्तीसगढ़ का हर नागरिक कवि लक्ष्मण मस्तूरिया के गीत दोहराता है... कहां जाहूं बड़ दूर हे गंगा... यहीं तीरथ नहाबो रे... मोर संग चलौ रे... मोर संग चलौ...गा...

राजिम कुंभ महानदी, सोंढूर और पैरी नदियों के साझा तट की रेत के विशाल पाट में नए आस्वाद की संगत में आने, रहने और बसने का निमंत्रण देता है। एक बार फिर छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर अविरल बहने वाली 'महानदी' आने वाले मेहमानों का स्वागत करने के लिए आतुर है. यह वह नदी है जिसके तट पर बसी है, 'राजिम नगरी'. इलाहबाद की तरह ही यहां संगम है. 'सोंढूर', 'पैरी' और 'महानदी' के त्रिवेणी संगम-तट पर बसे छत्तीसगढ़ की इस नगरी को श्रृद्धालु 'श्राद्ध', 'तर्पण', 'पर्व स्नान' और 'दान' आदि धार्मिक कार्यों के लिए उतना ही पवित्र मानते हैं, जितना कि अयोध्या और बनारस को। मंदिरों की महानगरी राजिम की मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक यात्री राजिम की यात्रा नहीं कर लेता। तीनों नदियों के संगम पर हर वर्ष न जाने कब से आस-पास के लोग 'राजिम कुंभ' मनाते आ रहे हैं। राजिम कुंभ के त्रिवेणी संगम पर इतिहास की चेतना से परे के ये अनुभव जीवित होते हैं। हमारा भारतीय मन इस त्रिवेणी पर अपने भीतर पवित्रता का वह स्पर्श पाता है, जो जीवन की सार्थकता को रेखांकित करता है। अनादि काल से चली आ रहीं परम्पराएँ और आस्था के इस पर्व को 'राजिम कुंभ' कहा जाता है.

कुंभ माघी पुन्नी मेला के रूप में 'राजिम कुंभ' मनाया जाता रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य बना तो कुछ वर्षों बाद 'राजिम मेले में कुंभ' आयोजनों को नया आयाम मिला। यह एक दृष्टि से बड़ा काम भी है। देश के दूसरे प्रांतों में कुंभ स्नान के लिए लोग जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी कुंभ के लिए पवित्र नगरी राजिम को धीरे-धीरे चिह्नित किया गया। वर्तमान समय में राजिम कुंभ देश भर में विख्यात हो गया है।  राजिम कुंभ साधु-संतों के पहुँचने व प्रवचन के कारण धीरे-धीरे विस्तार लेता गया और यह अब प्राचीन काल के चार कुंभ हरिद्वार, नासिक, इलाहाबाद व उज्जैन के बाद पाँचवाँ कुंभ बन गया है। राजिम का यह कुंभ हर वर्ष माघ पूर्णिमा से प्रारंभ होता है और महाशिवरात्रि तक पूरे एक पखवाड़े तक लगातार चलता रहता है।

ऐसा विश्वास किया जाता है कि यहाँ स्नान करने मात्र से मनुष्य के समस्त कष्ट नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के उपरांत वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है। यह भी माना जाता है कि भगवान शिव और विष्णु यहाँ साक्षात रूप में विराजमान हैं, जिन्हें 'राजीवलोचन' और 'कुलेश्वर महादेव' के रूप में जाना जाता है। यह भी उल्लेखनीय है कि वैष्णव सम्प्रदाय की शुरुआत करने वाले महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली 'चम्पारण्य' भी यहीं है। वल्लाभाचार्य ने तीन बार पूरे देश का भ्रमण किया। वे 'अष्टछाप' के महाकवियों के गुरु थे। सूरदासजैसे महाकवि को उन्होंने ही दिशा देकर कृष्ण की भक्ति काव्य का सिरमौर बनने हेतु प्रेरित किया।

महानदी के तट पर विशाल पंडालों में सारे संत और ज्ञानी उपस्थित होते हैं, जो जीवन के अर्थ अलग तरह से तलाशने में लीन रहते हैं। निराकार से एकाकार होने के अद्भुत अनुभवों के बीच यज्ञ की धूम्र शिखाओं मे सामान्य-जन एक नई ऊर्जा पाते हैं। श्रद्धा के अनुष्ठानों का पवित्र जगत जीवित हो उठता है, आस्था और समर्पण की उन स्वर लहरियों में जहाँ अपने आराध्य को याद करने में सब कुछ भुला दिया जाता है। त्रिवेणी होने के कारण राजिम हमेशा से अवस्थित एक तीर्थ रहा है। शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, अखाड़ा प्रमुख तथा संतों की अमृत वाणी को लोगों ने जब ग्रहण किया, तो दुनिया के नये अर्थ सामने आए। उनका यहाँ एकत्र होना बताता है कि राजिम में त्रिवेणी पर कुंभ है और राजिम कुंभ के पावन पर्व की अनुभुति को गहराई प्रदान करते हैं।

'राजिम कुंभ' सदा से ही भारतीय मानस के गहरे अर्थों को रेखांकित करता रहा है। वह भारतीय जीवन के उल्लास पक्ष को भी दिखाता रहा है। राजिम कुंभ लोगों के मन की सहज श्रद्धा, उनके जीवन की सहज आस्था, सामान्य उल्लास लगने वाले जीवन को अद्भुत उल्लास और पूर्णता से भर देता है। एक ओर जहाँ श्रद्धा के भाव से भरे होते हैं तो दूसरी तरफ़ मेले के उल्लास के चटख रंग भी यहाँ मौजूद हैं। राजिम कुंभ अपने होने में भारतीय मानस और भारतीय जीवन के रंग-बिरंगे मेले के रूप में मन मस्तिष्क पर छा जाता है। (लेखिका भोपाल में युवा पत्रकार हैं) 

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