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मातृभाषा में है संस्कृति की आत्मा का संगीत / डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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हमारी नई शिक्षा नीति पर विगत कुछ महीनों से चर्चा का जो सिलसिला चल पड़ा उसमें भाषाओं के विकास तथा राष्ट्रीय एकीकरण में भाषाओं की भूमिका पर भी विमर्श किया गया है। मैंने नई शिक्षा नीति की छत्तीसगढ़ राज्य स्तरीय कार्यशाला में न सिर्फ सहभागिता का सुअवसर पाया, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजधानी में उसके सूत्र संयोजन की जिम्मेवारी भी निभाई। नीति का ऐलान अभी बाक़ी है लेकिन इस में दो मत की कोई संभावना नहीं क़ि मातृ भाषा का महत्व सर्वोपरि है। मातृ भाषा आदमी के संस्कारों की आधारशिला है।

मातृभाषा के बिना, किसी भी देश की संस्कृति की कल्पना बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम की भावना उत्प्रेरित करती है। मातृ भाषा आत्मा की आवाज़ है। मां के आंचल में पल्लिवत हुई भाषा बालक के मानसिक विकास को शब्द व पहला सम्प्रेषण देती है। मातृ भाषा ही सबसे पहले इंसान को सोचने-समझने और व्यवहार की शिक्षा और समझ देती है। यही कारण है कि बालक की प्राथमिक शिक्षा मातृ भाषा में ही करानी चाहिए। 

यहाँ हाल के एक शोध के निष्कर्ष की थोड़ी जानकारी साझा करना चाहता हूँ - 

अंग्रेजी माध्यम की किताबें स्व-अध्ययन में बाधा उत्पन्न करती हैं।

हिन्दी माध्यम में शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाना जरूरी है।

प्राथमिक स्तर पर अपनी मातृ भाषा में पढ़ने से बच्चे बहुत जल्दी सीखते हैं।

इसमें उनकी भाषा के शब्द सहायक होते हैं।

अंग्रेजी का प्रभाव कुछ ऐसा है कि हमारे ज्यादातर बच्चे ट्रांसलेशन पद्धति में पढ़ रहे हैं।

यह हमारी अनूदित तीसरी-चौथी पीढ़ी तैयार हो रही है।

आज पब्लिक स्कूलों में हिन्दी-अंग्रेजी खिचड़ी ज्ञान परोसा जा रहा है।

आज हजारों बच्चे न तो ठीक तरह से अंग्रेजी जानते हैं, न ही हिन्दी पर उनका सही अधिकार है। बच्चा संशय में है। दबाव में आकर अंग्रेजी कोर्स रटने के कारण उनकी मौलिकता और रचनात्मकता घुटने टेकने पर मज़बूर हो जाती है। 6 से 14 वर्ष तक का बच्चा अपनी भाषा से दूर रहकर समर्थ अभिव्यक्ति नहीं कर पाता है। लेकिन मातृ भाषा में शिक्षा के साथ बच्चों को अंग्रेजी की जानकारी भी हो। अगर मातृ भाषा की उपेक्षा होती रही तो हम केवल भाषा नहीं अपनी अहचान और संस्कृति भी खो देंगे। इससे हमारी राष्ट्रीय एकता को भी झटका लगेगा। स्मरण रहे जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया कि नई शिक्षा नीति के 33 बिन्दुओं में भाषाओं के विकास और भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय एकीकरण पर जोर दिया गया है। 

यह संयोग मात्र नहीं है कि हर वर्ष 21 फरवरी को मातृ भाषा दिवस मनाया जाता है। परन्तु इसके प्रति गंभीरता का अभाव बड़ी खटकने वाली बात है। मातृभाषा दिवस मातृभाषा दिवस को मनाने का उद्देश्य है भाषाओं और भाषाई विविधता को बढ़ावा देना, लेकिन याद रखना होगा कि आज हम भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए उतने सजग नहीं हैं जितनी समय की मांग की पूर्ती के लिए आवश्यक है। 

यहां समझना होगा कि सिर्फ मातृ शब्द की वजह से मातृभाषा का सही अर्थ और भाव समझने में हमेशा से दिक्कत हुई है। मातृभाषा बहुत पुराना शब्द नहीं है, मगर इसकी व्याख्या करते हुए लोग अक्सर इसे बहुत प्राचीन मान लेते हैं। हिन्दी का मातृभाषा शब्द दरअसल अंग्रेजी के मदरटंग का शाब्दिक अनुवाद है। इसका व्यापक अर्थ समझना होगा। बच्चे का शैशव जहां व्यतीत है, जिस परिवेश में वह गढ़ा जा रहा है, जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, जहां विकसित-पल्लवित हो रहा है, वही महत्वपूर्ण है। 

दरअसल शिक्षा का अधिकार का प्रश्न मातृभाषा से अलग नहीं हो सकता, वह शिक्षा के साथ भी अभिन्न रूप से जुड़ा है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना बच्चे का अधिकार है, उस पर दूसरी भाषा को जबरन थोप देना उसके स्वाभाविक विकास को रोकना और उसके अधिकाओं का भी हनन है। 

मातृभाषा में शिक्षा का महत्व में लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक और प्रख्यात चिंतक श्री जगमोहन सिंह राजपूत बड़े काम का प्रसंग सुनाते हैं। उनके अनुसार एक प्रबंधन संस्थान में एक युवा प्रशिक्षणार्थी आत्महत्या कर लेता है। वह इसका कारण लिख कर छोड़ जाता है कि कमजोर अंग्रेजी के कारण उसे हास्यास्पद स्थितियों से गुजरना पड़ रहा था, जो असहनीय हो गया था। ऐसी ही एक अन्य घटना में विद्यार्थी इसी कारण से तीन महीने तक विद्यालय नहीं जाता है। घर पर सब अनभिज्ञ हैं और जानकारी तब होती है जब वह गायब हो जाता है। ऐसी खबरें अगले दिन सामान्यत: भुला दी जाती हैं। इस प्रकार का चिंतन-विश्लेषण कहीं पर भी सुनाई नहीं पड़ता है कि आज भी अंग्रेजी भाषा का दबाव किस कदर भारत की नई पीढ़ी को प्रताडि़त कर रहा है। सच तो यह है कि आजादी के बाद मातृभाषा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान का जो सपना देखा गया था अब वह सपना दस्तावेजों, कार्यक्रमों तथा संस्थाओं में दबकर रह गया है। कुछ दु:खांत घटनाएं संचार माध्यमों में जगह पा जाती हैं। समस्या का स्वरूप अनेक प्रकार से चिंताग्रस्त करने वाला है। 

तभी तो भारतेंदु जी ने बहुत पहले आगाह कर दिया था - 

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।


अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।

पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

हमें समझना होगा कि -


साँसों की है साज यह आँखों की है लाज

तन मन से वंदन करें निज भाषा का आज।

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राजनांदगांव

मो.9301054300

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