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‘गोदान’ और ‘रंटिटंङष़ी’ (दो सेर धान) एक अध्ययन / लंबोधरन पिल्लै. बी

‘गोदान’ और ‘रंटिटंङष़ी’ (दो सेर धान)
एक अध्ययन





लंबोधरन पिल्लै. बी
कोयमबत्तूर कर्पगम विश्वविद्यालय में
डॉ.के.पी.पद्मावती अम्मा के मार्गदर्शन में
पी.एच.डी केलिए शोधरत


‘गोदान’ प्रेमचन्द से हमें प्राप्त उच्च कोटि का महाकाव्यात्मक उपन्यास है । ‘रंटिटंङष़ी’ मलयालम उपन्यासकार तकष़ी शिवशंकर पिल्लै से उपलब्ध अमर- अनुपम उपन्यास है । दोनों निश्चय ही कालजयी कृतियाँ है । युगांतरकारी श्रेष्ठ रचनाएँ युग से संबंधित नये - नये प्रश्नों को जगाती है । उसका समाधान ढूँढना सामाजिक जीव मनुष्य का बाध्य बन जाता है । कहा जाता है कि समाज की गतिशीलता विचार - पुनर्विचार पर निर्भर है।

‘गोदान’ पढ़ना वास्तव में भारत का इतिहास पढ़ना ही है । इस अमर रचना के बारे में डॉ. ज्ञानचन्द्र गुप्त का उल्लेख है :- “ गोदान’ आधुनिकता - बोध का प्रस्थान - बिन्दु है । नये विचार, नयी संवेदना और संरचना की नयी अन्विति है । कृषक जीवन के समस्त संबंध - असहायता, शोषण, संघर्ष, हर्ष - विषाद, आशा -आकांक्षा, संस्कार, मर्यादा, आस्था - अनास्था और जीवन मूल्य एक दूसरे से जुड़कर सामाजिक यथार्थ की बदलती तस्वीर पेश करते है ।”(गोदान विमर्श,पृ 9)

‘गोदान’ के पूर्व के उपन्यासों में प्रेमचन्द एक ही प्रकार का आदर्शवाद अपनाकर चले । लेकिन न सुधारवादी दृष्टि है न प्रचारवादी दृष्टि । ‘गोदान’ में न किसी आश्रम की स्थापना हुई है, न ही किसी गाँधीवादी नेता की अवधारणा । यहाँ प्रेमचन्द की दृष्टि यथार्थवादी सत्य से ओतप्रोत है ।

‘गोदान’ एक शुद्ध यथार्थवादी रचना है । प्रेमचन्द ने इसके सामाजिक रूप को युग - युग के मानवीय सत्य का रूप दिया है । समाज की समस्याओं का जितना गहन और व्यापक रूप ‘गोदान’ में प्राप्त है उतना पहले की किसी भी रचना में नहीं मिलता । साहित्य में पहली बार एक दीन - हीन निम्न वर्ग के किसान को नायक बनाकर उसके जीवन की मार्मिक परिस्थितियों का चित्रण हुआ है तो निश्चय ही वह ‘गोदान’ में ही है ।

तकष़ी ने भी अपनी लंबी जीवन यात्रा के बीच दो दर्जन से अधिक छोटे - बड़े उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, यात्रा विवरण आदि लिखे है । प्रेमचन्द ने भी साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों से अपना नाम जोड़ा है । किंतु दोनों प्राय: उपन्यासकार के रूप में ही जाने जाते हैं । ‘गोदान’ की तरह, तकष़ी ने भी ‘रंटिटंङष़ि’ (दो सेर धान) में पतनोन्मुख सामंतवाद और तत्स्थान पर उदित पूंजीवाद दिखाने का सफल प्रयास किया है । इसलिए दोनों उपन्यास भूतकाल के ही नहीं, वर्तमान और भविष्यत् काल के भी दस्तावेज है । ‘गोदान’ प्रेमचन्द युग और प्रेमचन्दोत्तर युग के बीच की कड़ी है । तकष़ी की कृतियाँ को भी मलयालम गद्य काल के पुराने - आधुनिक युग के बीच की ‘कड़ी’ कह सकते हैं ।

‘गोदान’ में भारतीय जन जीवन के अनेक मुख उजागर होते हैं । इसमें डूबने वाले सामंतवाद और उगने वाले पूंजीवाद का चित्रण मुख्य है । ‘गोदान’ को शोषण के विरुद्ध का ‘धर्म युद्ध’ कहना उचित है । ‘रंटिटंङष़ी’ में तकष़ी भी पतनोन्मुख जमींदारी- सामंतवाद एवं तत् स्थान पर उदित पूंजीवाद दिखाते हैं । ‘गोदान’ के समान तकष़ी का ‘रंटिटंङष़ी’ भी हमें हर वातावरण में पुनर्विचार करने को उत्तेजित करता है ।

‘रंटिटंङष़ी’ तकष़ी शिवशंकर पिल्लै का प्रसिद्ध उपन्यास है, जिसका प्रकाशन 1948 में हुआ था । मलयालम प्रकाशन से दस वर्ष बाद, 1958 में भारती विद्यार्थी ने ‘दो सेर धान’ नाम से इसका हिन्दी अनुवाद कर केंद्र साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित किया । ‘गोदान’ की तरह ‘रंटिटंङष़ी’ शोषित किसान - मज़दूरों के जीवन की लड़ाई का दर्पण है । केरल के किसानों- मज़दूरों के भौतिक एवं नैतिक जीवन का अद्भुत वर्णन इसमें मिलता है । ‘आलप्पुष़ा’ (स्थान विशेष) का ‘कुट्टनाडु’ (स्थान विशेष) ‘धान की खान’ के नाम से विख्यात है । यहाँ ‘पुलया’ और ‘परया’ (अनुसूचित) जाति के लोग मृत्यु पर्यंत धान उपजने का पेशा करते हैं । लेकिन मनुष्य होकर भी उसका जीवन मनुष्य समान नहीं है । उन मज़दूरों के मर्मस्पर्शी जीवन से ‘रंटिटंङष़ी’ उपन्यास संपुष्ट है ।

‘गोदान’ बड़ी गहराई से एक युग का प्रतिनिधित्व करने वाला उपन्यास है । यह भारतीय किसान की समर - गाथा है । ‘गोदान’ में प्रेमचन्द ने अपनी परवर्ती रचनाओं से अलग होकर यथार्थवाद को अपनाया है । घटना और अनुभूति, आदर्श और यथार्थ का सम्मेलन ‘गोदान’ की गरिमा को बढ़ाते है । इसमें उपन्यासकार ने सामाजिक यथार्थ के धरातल पर खड़े होकर किसान - इतिहास को भली - भाँति रेखांकित किया है । प्रेमचन्द के उस विशिष्ट सक्षमता को आलोचकों ने ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ नाम से पुकारा है । ‘दो से धान’ के आरंभ से अवसान तक की घटनाओं में यथार्थ की चमक मिलती है । अथवा इसे निःसंकोच आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रचना कह सकते है ।

‘गोदान’ के हीरो (Hero) होरी और ‘रंटिटंङष़ी’ का कोरन दोनों ग्रामीण कृषक - मज़दूर संस्कार - सभ्यता के प्रतीक हैं । ‘गोदान’ का होरी और ‘रटिटंङष़ी’ का कोरन आर्थिक स्थिति में ऋणी है । लेकिन दोनों के दृष्टिकोण में कुछ अंतर भी है । होरी में आदर्शवाद और यथार्थवाद है तो कोरन में आदर्श और यथार्थ के साथ विप्लव ज्वाला भी है।

‘गोदान’ में प्रेमचन्द ने जमींदारी - किसान संबंध को विविध आयाम से देखकर उसकी सद् एवं दुष्परिणाम यथा तथा खींचा है । ‘रंटिटंङष़ी’ में तकष़ी ने एक पग आगे बढ़कर दोनों वर्गों के संघर्ष का चित्रण भी देते हैं । होरी जमींदार अमरपाल सिंह के अन्यायों को चुपचाप सहन कर आगे जाते है । उसमें अनीति के बदले प्रतिकार भावना जागरित नहीं होती । किंतु ‘रंटिटंङष़ी’ का नायक कोरन अनीति नहीं सहता है । नीति के लिए विप्लव का विचार उसकी नस - नस में व्याप्त है । वह ‘पुन्नप्र’ - ‘वयलार’ (स्थान विशेष) के कम्युनिस्ट योद्धाओं के समान शस्त्र लेकर लड़ता है ।

धनिया (गोदान) और चिरुता (रंटिटंङष़ी) में भी कई समानताएँ है । होरी की मृत्यु के अवसर पर धनिया धैर्य नहीं छोड़ती, परिस्थिति का सामना करती है । चिरुता में प्रतिक्षण जमींदार की क्रूरता की प्रतिकार ज्वाला धधकती है । धनिया एक कर्तव्य निष्ठ आदर्श पत्नी के स्तर तक सीमित रहती है और सारी मुसीबतें दुर्भाग्य समझकर सहती है तो ‘रंटिटंङष़ी’ की ‘चिरुता’ इससे एक कदम आगे बढ़कर एक विप्लवकारी ओजस्वी नारी रत्न के पद को अलंकृत करती है । चिरुता कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्या बन कर जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार होती है । तकष़ी की चिरुता शस्त्र लेना पाप नहीं समझती । कोरन के जेल जाते समय चिरुता उस विडंबना पूर्ण वातावरण का धैर्य पूर्वक सामना करती है ।

प्रेमचन्द और तकष़ी साम्यवाद से अतृप्त न थे । ‘गोदान’ और ‘रंटिटंङष़ी’ में दोनों का साम्यवादी दृष्टिकोण दो रूपों में प्रकट होते है । तकष़ी कोरन के हाथ में शस्त्र देकर संघर्ष भूमि की ओर भेजते है तो प्रेमचन्द का होरी और गोबर साम्यवाद को ‘सहन समर’ के रूप में स्वीकारते हैं । प्रेमचन्द और तकष़ी का रचना काल भिन्न है । ‘गोदान’ के रचना काल में उत्तर भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का स्थान दुर्बल था । यह एक आदर्श के रूप से बढ़कर एक विप्लव संघ का रूप - भाव न ही पा चुका था । लेकिन ‘रंटिटंङष़ी’ के रचना काल में केरल में ‘कम्युनिस्ट पार्टी’ ‘विप्लव पार्टी’ के रूप में संघर्ष में सक्रिय थी ।

‘गोदान’ में मुख्य (ग्रामीण) कथा और गौण (शहरी) कथा है । दोनों कथा ताल - मेल खाकर एक साथ चलती है । इसलिए इसमें कथापात्रों का बाहुल्य है । परंतु ‘रंटिटंङष़ी’ में केवल मुख्य कथा (ग्रामीण) ही है । इसलिए ‘गोदान’ की तुलना में ‘रंटिटंङष़ी’ में पात्रों की संख्या कम है ।

प्रेमचन्द के समान तकष़ी भी ग्रामीण है, फिर भी प्रेमचन्द ने नगर की कथा को नहीं छोड़ा है । ‘गोदान’ के अमरपाल सिंह, प्रो. मेहता या मिस मालती के जैसे शहरी कहने योग्य कोई पात्र ‘रंटिटंङष़ी’ में नहीं है । तकष़ी पेशे में वकील है, प्रेमचन्द वकील नहीं, अध्यापक वृत्ति करते थे । फिर भी दोनों ने समाज रूपी अदालत में दरिद्रों - पद दलितों की वकालत ली । ‘गोदान’ में प्रेमचन्द प्रोफसर, व्यापारी, मज़दूर, मालिक, डाक्टर, पुरोहित जैसे समाज में विभिन्न पद भार करने वालों को एक पंक्ति में लाये हैं । ‘रंटिटंङष़ी’ में मज़दूर- मालिक को छोड़कर उच्च शिक्षित और पद भार संभालने वाला कोई पात्र नहीं है । यह तो पहले ही स्पष्ट किया गया है कि तुलनात्मक अध्ययन या अनुसंधान में शत प्रतिशत साम्य नहीं दिखायी पड़ता । वैषम्य भी तुलनात्मक अध्ययन (अनुसंधान) का एक भाग है ।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि ‘गोदान’ और ‘रंटिटंङष़ी’, दोनों उपन्यास अनेक समानताओं और कुछ असमानताओं के साथ, समानांतर चलने वाली, भारत की दिशा सूचक कृतियाँ है । दोनों हमारी महान कालजयी उपलब्धियाँ भी है ।

Written By : LEMBODHARAN PILLAI. B, Research scholar, Under the guidance of Dr.K.P Padmavathi Amma, Karpagam University, Coimbatore.
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