मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

आनंद-मंगल चाहें तो उत्सवों को देखें-दिखाएँ - डॉ. दीपक आचार्य

 

अपने आस-पास और दुनिया में होते रहने वाले उत्सवों, मेर्लों-पर्वों और तमाम परंपरागत आयोजनों का अपना कोई न कोई विशेष महत्व होता ही है।

साल भर में कई प्रकार के आयोजन होते हैं जिनमें धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, परिवेशीय और अन्य कई तरह के आयोजनों से आम इंसान का प्रगाढ़ रिश्ता रहा है। हर आयोजन कोई न कोई संदेश देता है, किसी न किसी वैज्ञानिक और भौगोलिक अथवा मनोवैज्ञानिक रहस्य से जुड़ा हुआ होता है। तभी तो इनका वजूद सदियों से निरन्तर बना हुआ आज भी जनमानस और धरा पर अपनी गहरी जड़ें जमाया हुआ है।

हो सकता है कि युग परिवर्तन के साथ इनमें कई मामलों में बदलाव आ गया है और बाकी यों ही विद्यमान हैं जिन्हें बहुत सारे लोग सही मानते हैं, बुद्धिजीवियों की जमात और इससे भी आगे अति बुद्धि के अजीर्ण के शिकार,  आधुनिक चकाचौंध और अपने आस-पास ही भौतिक भोग-विलासिता उपलब्ध हो जाने के कारण संकीर्ण हो चुके लोग इन मेलों-पर्वों की उत्सवी परंपरा को ठीक नहीं मानते हों।

सच यही है कि भारतीय परंपरा में सामाजिक समरसता, एकता और अखण्डता मूलभूत तत्व हैं और इनकी पुष्टि इन सामुदायिक और सार्वजनिक मेलों-उत्सवों और पर्वों के माध्यम से होती है। देश का कोई सा क्षेत्र ऎसा नहीं देखने को मिलेगा जहां मेले-पर्व और उत्सव की परंपरा न हो।

साल भर में अक्सर आते रहने वाले ये आयोजन ऋतु परिवर्तन, मौसम में बदलाव, आन्तरिक शुद्धि, मनोरंजन आदि के माध्यम से प्रकृति और परिवेश की धाराओं के साथ शरीर और मन-मस्तिष्क के समीकरण बिठाने और समयानुकूल करने के लिए वैज्ञानिक रहस्यों भरे मनोवैज्ञानिक उपाय हैं जिनमें न पैसा लगता है न टका, और आनंद पूरा का पूरा।

बावजूद इसके बहुत सारे लोग हैं जो इन आयोजनों को न तो देखने जाते हैं, न इनका आनंद पाने को उत्सुक रहते हैं। निःशक्तों और बीमारों को छोड़ दिया जाए तो सभी लोगों को अपने क्षेत्रों में और यथा सामथ्र्य देश के अन्य क्षेत्रों में जाकर वहां के मेलों-पर्वों और उत्सवों को देखना, जानना और समझना चाहिए।

इससे ज्ञानार्जन के साथ ही जीवन और जगत की कई समस्याओं और जिज्ञासाओं का शमन होता है और इसी अनुपात में हमारा दिल और दिमाग जिज्ञासामुक्त होकर बिन्दास होने लगता है। दूसरा फायदा यह होता है कि मेल-मिलाप की संस्कृति से नए-नए संबंध बनते हैं, हमारे काम आसान होने लगते हैं और हम किसी एक कक्ष, मोहल्ले, एसी चैम्बर या गलियों के न होकर वैश्विक माहौल का आनंद पाने वाले हो जाते हैं जहां जो जितना अधिक देखता है, भ्रमण करता है उतना अधिक उसके व्यक्तित्व का सर्वांग विकास होता है।

खुद भी आनंद लें, अपने घर वालों को भी भागीदार बनाएं, अपने बच्चों को भी कम से कम अपने क्षेत्र की भौगोलिक, प्राकृतिक और परिवशीय रचनाओं, तरह-तरह के आयोजनों और उत्सवों, मेलों-पर्वों आदि में ले जाएं ताकि मनुष्य की समुदाय और प्रकृति के सामीप्य की धाराओं को बल प्राप्त हो सके।

यह संबल हर इंसान की जिंदगी को सँवारने में अहम् भूमिका निभाता है। इन उत्सवी आयोजनों की परंपरा की बहुआयामी उपादेयता के बावजूद बहुत सारे लोग इन आयोजनों की सार्वजनिक छुट्टियों का आनंद पाने में पूरी बेशर्मी दिखाएंगे, घर के कोने में किसी शोकाकुल वैधव्य या विधुरत्व प्राप्त जीव की तरह दुबके रहेंगे, अशक्त और गंभीर रोगियों की तरह खटिया तोड़ते रहेंगे या फिर अपनी ही तरह के बातुनियों की महफिल में चंद फीट के घेरों में  दुनिया भर का बकवास करते रहेंगे लेकिन अपने घर के आस-पास या अपने इलाकों में होने वाले उत्सवों, मेलों और पर्वों में शिरकत करने या इनमें किसी भी प्रकार से अपनी भूमिका सुनिश्चित करने में इन्हें मौत आती है।

इस वजह से इनकी संतति भी इनकी ही तरह द्वीप जैसा जीवन निर्वाह करने की आदी हो जाती है। इन किस्मों के लोगों की जिन्दगी में असफलता ही रहती है और इसके लिए ये ही जिम्मेदार हुआ करते हैं।

कई सारे लोगों को मरते दम तक यह पता तक नहीं रहता कि उनके  आस-पास कौन से पर्यटन, धार्मिक, सामाजिक और सामुदायिक स्थल  हैं और इनका क्या महत्व है। ऎसे लोग संसार से कोरे ही कोरे ऊपर चले जाते हैं और भगवान से उलाहना सुनते हैं। ईश्वर भी वहाँ इन आलसी, प्रमादी और खुदगर्ज लोगों को खूब खरी-खोटी सुनाता है।

मनुष्य का जीवन संसार को जानने, संसार की सेवा करने और संसार के लिए जीने के उद्देश्य से ही हुआ है, चंद फीट के बंद कमरों, एयरकण्डीशण्ड परिसरों व वाहनों, प्रतिष्ठानों और अपनी ही किस्म के चंद धंधेबाजों या जीवन से निराश हो चुके फालतू लोगों के बकवासों और अनर्गल अलाप-प्रलापों में रमने अथवा सुन्दरियों के मोहपाश में फंसकर एक जगह बंधे रहने या कि जायज-नाजायज तरीकों से अर्जित धन-सम्पदा की रखवाली करने के लिए नहीं हुआ है। 

हम जिस क्षेत्र में रहते हैं वहां होने वाले विभिन्न उत्सवों, पर्वों और मेलों को अपनी आँखों से देखें, अपने परिजनों को दिखाएं और इन आयोजनों का भरपूर लाभ लें। जो ऎसा करता है वही सम्राट के रूप में रहता है और जीवन का सम्पूर्ण आनंद पाता है, बाकी सारे तो जरखरीद गुलामों या नज़रबंद कैदियों की तरह किसी न किसी मजरे में शोक मग्न पड़े रहने की जिन्दगी जीते हैं।

और तो और इन उत्सवों के नाम पर घोषित अवकाशों का उपभोग करने वाले लोग भी बेशर्मों की तरह उत्सवों से दूर रहने के आदी हो जाते हैं।

हर आयोजन में भागीदार बनें, स्रष्टा न बन सकें तो कम से कम द्रष्टा तो जरूर बनें और वह भी न बन सकें तो अपने घर-परिवार वालों और परिचितों को लेकर बैठे न रहें, उन्हें इनका आनंद पाने दें।

ये उत्सव ही हैं जो जीवन में शोक, उदासी, खिन्नता, निराशा-हताशा आदि से मुक्ति दिलाकर आनंद-मंगल और उत्साह देते हैं। वे लोग सौभाग्यशाली हैं जो इनका भरपूर आनंद लेते हैं।

 

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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