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'जो सुख छज्जू के चौबारे, वह न बलख न बुखारे।' : हरिवंशराय बच्चन का यात्रा संस्मरण - पाँच देशों में दो मास एक सप्ताह

भारत सरकार और साम्यवादी देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान- कार्यक्रम के अतर्गत मैंने शिक्षा-मंत्रालय के आदेश पर ३ अप्रैल, १९६७ से ३१ मई, १९६७ तक रूस, मंगोलिया, चेकोस्लोवाकिया तथा पूर्व-जर्मनी की यात्रा की।

चूंकि इसके पूर्व लेबनान की राजधानी बेरूत में तीसरा अफ्रो-एशियायी लेखक सम्मेलन होने को था और मुझे भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व करने के लिए निमंत्रित किया गया था, इसलिए विदेश-मंत्रालय की अनुमति मिलने पर मैं उक्त सम्मेलन में भाग लेने के लिए २५ मार्च को दिल्ली से रवाना हुआ। जो टिकट मुझे मास्को जाने के लिए मिलने को था उससे सीधे मास्को जाने अथवा बेरूत होकर मास्को जाने में किराए में कोई अंतर नहीं पड़ता था।

शिष्टमंडल में प्रमुख थे मुल्कराज आनंद और सज्जाद जहीर। सज्जाद जहीर पहले ही बेरूत पहुँच चुके थे। मुल्करान उसी जहाज में थे जिससे मैं जा रहा था। हम लोग २६ मार्च को तड़के बेरूत पहुंचे, हल्की फुहार पड़ रही थी हवा में दिल्ली से अधिक ठंडक थी घड़ी कोई तीन घटे पीछे करनी पड़ी।

हवाई-अहुाएं के भारवाही मासिक वेतन पाते हैं और उन्हें मुसाफिरों से मजदूरी माँगने का हक नहीं होता कोई खुशी से दे तो सभी जगह ले लेते हैं। कहीं- कहीं के भारवाही प्रत्याशा करते हैं, कहीं के माँग और कहीं के आग्रह भी। बेरूत के अंतिम कोटि के थे। हमें बाहर ले जाने के लिए केवल पाँच पौड मिले थे और वे अमी पौंड की शक्ल में ही थे। देना ही पड़ता तो पौंड को लेबनानी सिक्कों में परिवर्तित कराना पड़ता। मुल्कराज ने स्थिति संभाली। वे अभ्यस्त यात्री हैं लेबनानी भारवाहियों का तेवर उन्हें अप्रत्याशित नहीं लगा। वे उसके लिए तैयार होकर आए थे। उन्होंने अपनी जेब से कुछ लेबनानी सिक्के निकालकर दिए, और हम अपने होटल के लिए रवाना हुए।

दस बजे से सम्मेलन का खुला सत्र आरंभ होने को था। हम लोग जल्दी जल्दी तैयार होकर सभा-भवन में पहुंचे जो निकट के ही एक होटल के बड़े हाल में था। दस-बारह देशों के शिष्ट-मंडल सम्मेलन में भाग लेने के लिए आए थे--- चीन और पाकिस्तान, जिन्होंने पिछले सम्मेलनों में भाग लिया था अनुपस्थित थे कतिपय राजनैतिक कारणों से। संख्या में सबसे बड़ा शिष्ट-मंडल रूसियों का था

वे मास्को से एक पूरा प्लेन चार्टर करा के आए थे। शिष्ट-मंडल के नेताओं को प्रीसीडियन में स्थान दिया गया, जो एक ऊँचे डायस पर था मुझे भी वहीं जगह मिली। उपस्थिति दो-ढाई सौ के करीब होगी हाल छोटा था, इसलिए अतिथियों का प्रवेश नियंत्रित था।

फ्लोर की भाषा अरबी थी, पर भाषणों के अंग्रेजी अथवा फ्रेंच अनुवाद इअर-फोन के द्वारा सुने जा सकते थे। मध्याह्न-पूर्व के सत्र शिष्ट-मंडल के नेताओं के भाषण के लिए थे। ज्दूघाटन, स्वागत भाषण के पश्चात् पहले दिन का प्रमुख भाषण रूसी शिष्ट-मंडल के नेता का था। वे रूसी में बोले और उसका अनुवाद अरबी में किया गया, साथ ही इअर-फोन द्वारा अंग्रेजी और फे' च में सुना गया। उनके भाषण ने जैसे टोन सेट की, दिशा-संकेत दिया और फिर सभी नेता उलट-फेरकर उन्हीं की बातों को दुहराते रहे। दूसरे दिन मैंने अपना लिखित भाषण पढ़ा और किसी अंश में वह भी रूसी भाषण के प्रभाव से मुक्त नहीं था।' मैंने अपना भाषण हिंदी में दिया जिसका अनुवाद मुल्कराज ने अंग्रेजी में किया। लेबनान में तो उसका स्वागत हुआ, पर भारत के अंग्रेजी पत्रों में इसे मेरा हिंदी कठमुल्लापन कहा गया-हिंदी शावनिज्म!

सारे सम्मेलन पर रूसी छाए रहे। कार्यकारिणी और खुले सत्र में भी उनके द्वारा प्रस्तुत समी प्रस्ताव पास हुए। मुल्कराज के सुझाव पर चौथा सम्मेलन नई दिल्ली में करने का प्रस्ताव मैंने पेश किया, जो स्वीकार कर लिया गया। इसके लिए अनुमति मुल्कराज श्रीमती इंदिरा गांधी से लेकर आए थे और संभवत: रूसी शिष्ट-मंडल की पूर्व-सहमति भी उन्होनें प्राप्त कर ली थी। प्राय: सभी प्रस्ताव राजनैतिक स्थितियों-परिस्थितियों-सिद्धांतों से प्रभावित थे। राजनीति से मुक्त शायद दो ही प्रस्ताव थे-एक तो यह कि अफ्रीका-एशिया के विशिष्ट लेखन की एक त्रैमासिक पत्रिका निकाली जाय-'लोटस' नाम की 1 'लोटस' (कमल) नाम किसका सुझाव था, इसका मुझे पता नहीं, पर इस पर भारतीय शिष्ट-मंडल को विशेष संतोष हुआ था। पत्रिका का मुख्यालय काहिरा में होने को था और पहले वह अंग्रेजी और बाद को रूसी, फ्रेंच और अरबी में निकलने को थी; मैंने हिंदी का भी सुझाव दिया था, पता नहीं वह स्वीकार हुआ या नहीं। दूसरा प्रस्ताव था, हर वर्ष अफ्रीका-एशिया के सर्वश्रेष्ठ प्रगतिशील लेखक को 'लोटस' पुरस्कार देने का। पुरस्कार की राशि अच्छी-खासी होने को थी, गो वह निश्चित नहीं की गई थी। कुछ लोगों का ख्याल था कि वह नोबल-पुरस्कार-धनराशि की टक्कर की होगी; और लेखकों में भावी प्राप्त-कर्ताओं के नाम की अनुमान-चर्चा चल पड़ी थी।'

सम्मेलन में कवि-सम्मेलन अथवा मुशायरे का कोई कार्यक्रम नहीं था, पर एक संध्या को येवतेशेंको का काव्य-पाठ हुआ।

दर्शनीय स्थानों में विशिष्ट हमने एक पर्वत की गुफा देखी जिसके अंदर दर्पण-स्वच्छ पानी का एक बड़ा नाला बहता है। हमने उसमें नाव से यात्रा भी की। गुफा को कितना साफ, बिजली की रोशनी से कितना प्रकाशमान, संगीत से गुंजायमान कर रक्खा गया है! दोनों तटों पर तथा गुफा की छत में भी ऊपर से पूनेवाले पानी के साथ आती मिट्टी ने प्राकृतिक वेल-बूटों की क्या अद्‌भुत कारीगरी की है! क्या चित्रकूट की गुप्त गोदावरी को ऐसा ही नहीं बनाया जा सकता?

वहाँ भी गुफा में पानी की धारा बहती है पर वहां कितना अंधकार है, कितनी बदबू, चमगादड़ों का कितना अशोभन, वृणोत्पादक जमघट!

मनोरंजन में हमने लबनानी संगीत-कला-नृत्य का कोई प्रदर्शन नहीं देखा।

कैसीनो, पेरिस की फॉली बरजेर' की सफल नकल भर कहा जा सकता है। एक भाग में बहुत ऊँची बाजी का जुआ भी होता है। सुना, कई लाख वार्षिक आमदनी पर इन्कम-टैक्स देनेवाले ही जुआघर में प्रवेश पाते हैं--एक छोटे-से सुराख से जीतनेवालों की दानवी अट्टहासी मुद्रा और हारनेवालों की नारकीय शोक संतप्त शक्ल देखी जा सकती है और इसके लिए भी बड़ा महँगा टिकट खरीदना पड़ता है।

दोनों तरह के लोगों को सँभालने के लिए डाक्टर और नसों का एक दस्ता वहाँ मौजूद रहता है।

एक दिन हमें सीरिया की राजधानी दमिश्क भी ले जाया गया। वहाँ हम दमिश्क की पार्लियामेन्ट में बैठे और सीरिया के प्रधान मंत्री ने फिलिस्तीनी शरणार्थियों की समस्या पर व्याख्यान दिया। दमिश्क की उमय्या मस्जिद बड़ी विराट और भव्य है। खुदा के बंदों की माँदों को देखने के बाद-माँदों से भी बदतर थीं उनके रहने की जगहें-खुदा के रंगमहल को देखने का मेरा उत्साह जाता रहा। मुल्क जाकर देख आए। चमत्कृत थे!

भारतीय शिष्ट-मंडल के हम कुछ लोग एक दिन लेबनान स्थित भारतीय राजदूतावास गए। मि० खूबचंद हमारे राजदूत हैं वहां उन्‌हेंने बड़े आदर से हमारा स्वागत किया। बातचीत के दौरान उन्होंने इजराइल-अरब राष्ट्र संघर्ष पर भी हमें कुछ मर्म की बातें बताई। अरब राष्ट्र इजराइल से विरोध क्यों मान बैठे हैं? इसलिए कि फिलिस्तीन से निकाले हुए शरणार्थी सब अरब राष्ट्रों में फैल गए हैं और सालहा-साल संख्या में बढ़ रहे हैं, पर अरब राष्ट्र इन्हें हजम नहीं कर पाए। सबसे बड़े दुर्भाग्य की बात है कि अरब राष्ट्रों में एकता नहीं है और न हो सकती है यह इजराइल के हित में है। जार्डन में इतने शरणार्थी आ गए हैं कि जार्डन की मूल आबादी के बराबर हैं और वे सल्तनत के लिए चुनौती बन गए हैं। जार्डन को उन्हें बसाने की इतनी फिक्र नहीं जितनी उन्हें अपने देश से निकालने की। लेबनान में फिलिस्तीनियों के प्रति पूरी हमदर्दी नहीं, यहाँ की ५००7० जनसंख्या ईसाइयों की है जो इस समस्या के प्रति निरपेक्ष हैं। इसी तरह सीरिया, ईराक तथा अन्य अरब-राष्ट्रों में तख्ता पलटने का खेल मौसम बदलने की तरह चला करता है। सब मिलकर इजराइल के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई शायद ही कभी कर सकें। क्रूर सत्य तो यह है कि अरब राष्ट्रों को यत्किंचित निकट लाने का इजराइल-विरोध एक नकारात्मक माध्यम बना हुआ है। फिर इजराइल को अमरीका का समर्थन प्राप्त है--राज्य का भी और अमरीकी यहूदी जनता का भी, जिनकी संख्या और शक्ति बहुत बड़ी है जैसे अरब राष्ट्रों को रूस की सद्‌भावना और सहायता सुलभ है। लेकिन रूसी बाहरी समस्याओं को सुलझाने से अधिक रुचि आंतरिक शासन-पद्धति को बदलने में लेते हैं। बहरहाल, फिलिस्तीन के प्रश्न को लेकर अमरीका और रूस निकट-संघर्ष का खतरा नहीं उठा सकते और बहुत दिनों तक यह समस्या ज्यों की त्यों खड़ी रहेगी। एक आसान-सा हल यह हो सकता था कि अरब राष्ट्र फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों को अपने देश की राष्ट्रीयता देकर हजम कर लें। -वे सब के सब अरब जाति (रेस) के हैं, सब मुसल्मान हैं, सब अरबी भाषी हैं, पर ऐसा सुझाव देने का साहस आज कोई नहीं कर सकता।

लेबनान यात्रा का सबसे सुखद अनुभव था श्री सत्येन्द्र कुमार 'बीना' और भी वीरेन्द्र पाल सिंह से मिलने का। 'बीना' नवयुवक हैं, विवाहित बेरूत में उन्होंने एक हैंडलूम हाउस खोल रक्खा है जहाँ वे भारत से हथकरघे-बने वस्त्र और कला-कारीगरी के नमूने मँगाकर बेचते है। काम तो वे दूकानदारी का करते हैं, पर तबीयत उन्हें मिली है शायरों की। मेरी कविता के बडे प्रेमी हैं। वीरेन्द्र पाल सिंह, अविवाहित, भारतीय राजदूतावास में कमर्शल सेक्रेटरी हैं, और उन्हें भी मेरी कविता से बड़ा प्रेम है। जब उन्हें मेरे बेरूत में होने का पता लगा तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे पता लगाते-लगाते मेरे होटल आए, मुझे अपने घर लिवा ले गए, खाना खिलाया, तस्वीरें खीचीं मुझसे कविताएं सुनीं, उन्हें टेप की।

उनके साथ मैं बहुत जल्दी पुल-मिल गया। चलते समय 'बीना' जी ने १०० डालर का एक नोट मेरी जेब में डाल दिया-लेबनानी डालर का, जो भारत के दो-ढाई रुपये के बराबर होता है। बोले, मुझे मालूम है भारत सरकार कितनी कम विदेशी मुद्रा बाहर ले जाने देती है और आदमी को बाहर सौ तरह की जरूरतें पड़ती हैं। आप यथावश्यकता खर्च करें और जो बचे जाते समय मुझे वापस कर दें, और की जरूरत हो तो निःसंकोच माँग ले 1 उन्होंने इतनी आत्मीयता के साथ आग्रह किया कि मुझसे इन्कार करते न बना। बाद को मैंने महसूस किया कि अच्छा ही किया वे डालर ले लिए।

लेबनान पहले फ्रांसीसियों के अधिकार में था और फ्रांसीसी होटलवालों से लेबनानियों ने मुसाफिरों को दुहने की कला खूब सीखी है। यों तो हम लेखक- सम्मेलन के मेहमान थे, पर फोन, जूता-पालिश, कपड़ा की प्रेस कराई-खुलाई, कभी-कभार किसी मेहमान के लिए चाय आदि का अतिरिक्त खर्च करीब ५० डालर होटलवालों ने लगा दिया जिसे देने को सम्मेलन बाध्य न था और मांगने में हमें संकोच होता था ऊपर से होटल के बेयरों को 'टिप' भो देनी थी। 'बीना' के डालर बहुत काम आए। बीना और वीरेन्द्र का आग्रह था कि यात्रा से लौटूंगा तो मैं बेरूत ही होते, लौटते समय क्यों न दो-तीन दिन उनके पास रूकूं, उनका अतिथि बनकर। मुझे प्रसन्नता है कि लौटते समय मैं उनकी इच्छा पूरी कर सका, और उनके स्नेह-सत्संग का मैंने भी बड़ा आनंद उठाया।

यों तो मास्को में मेरा कार्यक्रम दो अप्रैल से आरंभ होने को था, पर बेरूत से मास्को जानेवाले जहाज में तीन से पहले जगह न मिल सकी। इस परिवर्तन की सूचना मास्को को दे दी गई थी। मैं तीन अप्रैल की संध्या को मास्को पहुँचा। जहाज उतरने के कुछ देर पहले मास्को में बरफ पड़ चुकी थी और जहाज की खिड़की से बाहर पड़ी बरफ का दृश्य दिखाई देता था। सहसा ध्यान आया दिल्ली में त्दू शुरू हो गई होगी।

हवाई अड्डे पर सोवियत राइटर्स यूनियन की ओर से मादाम मरियम ने मेरा स्वागत किया। पूरा नाम उनका मरियम सलगानिक है, कई बार भारत आ- जा चुकी हैं, हिंदी बहुत अच्छी और शुद्ध बोलती हैं, किसी हिंदी लेखक ने, शायद 'दिनकर' ने उन्हें 'मीरा' नाम दे रक्खा है और इसे उन्होंने बड़ी खुशी से स्वीकार कर लिया है 1 मेरा-उनका पूर्व परिचय भी था। औपचारिक सद्‌भावना प्रकाशन के बाद उन्होंने मेरा परिचय मादाम इरीना ने कराया--भरे शरीर की सुंदर नवयुवती--दुबली-पतली स्त्रियाँ-लड़कियाँ रूस में अपवाद ही होती हैं जैसे स्वयं मरियम। वे मेरी दुभाषिया थीं और मेरी रूस-यात्रा के दौरान बराबर मेरे साथ रहने को थीं। वे हिंदी-उड़े के अतिरिक्त अंग्रेजी भी समझती और बोल सकती थी। उनके बैग में हर समय दो पाकेट-कोष पडे रहते थे-रूसी-अंग्रेजी और रूसी- हिंदी के, जिन्हें वे जब-तब निकालकर देख लिया करती थीं। शायद ही कोई ऐसा अवसर आया जब उन्हें मेरी बात समझने या अपनी बात मुझे समझाने में दिक्कत

पेश हुई। बने हुए कार्यक्रम को पूरा कराने के लिए सब तरह का प्रबंध करने में वे दक्ष थीं और मेरी सुविधा और आवश्यकता का हर समय ध्यान रखती थी।

मुझे पीकिंग होटल में ठहराया गया। सुना कि चीन की सरकार ने चीनी ढंग से सजा कर इसे मास्को वालों को भेंट किया था। सबसे नीचे तल्ले पर खाने के लिए बने दो बड़े हालो' को छोड्‌कर चीनी साज-सज्जा मुझे कहीं न दिखी। दस- बारह तल्लों का होटल था जिसमें आधुनिक रहन-सहन की सभी सुविधाएँ प्राप्त थीं। मेरी दुभाषिया लगभग दस बजे होटल में आ जाती थी और फिर दिन भर के कार्य- क्रम में मेरे साथ रहती थी। मेरे लिए एक बड़ी कार का भी प्रबंध कर दिया गया था जो नगर में कहीं भी आने-जाने के लिए मुझे हर समय सुलभ थी 1 रूस में एक बड़ी अजीब प्रथा देखी-- और बाद को तो सभी साम्यवादी देशों में देखी --अतिथि को प्रतिदिन के हिसाब से सारे प्रवास के लिए निश्चित धनराशि दे दी जाती है। उसे अपने ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर का बिल खुद उसी राशि से चुकाना पड़ता है। राशि इतनी होती है कि खाने का बिल अदा करने के बाद भी ऊपर के खर्च के लिए कुछ बच रहता है। मैं तो शाकाहारी था और शराब-सिगरेट भी नहीं पीता था। प्रतिदिन के लिए नियत राशि के आधे से ही मेरा काम चल जाता था। वापस आते समय बचाए रूबलों से मैंने कई रूसी सोवेनीर' (स्मारक-उपहार) खरीदे।

सको-एशियायी लेखक सम्मेलन में रूसी लेखकों का जो प्रतिनिधि-मंडल गया था वह भी उसी जहाज से मास्को लौटा जिससे मैं आया। सम्मेलन में भाग लेनेवाले कई पूर्वी देशों के लेखक भी मास्को आए, जैसे जापान, वियतनाम आदि के। तीन- चार दिन तक मेरा कार्यक्रम प्राय: उन्हीं लेखकों के साथ बंधा था। पहली प्रमुख सभा इस ध्येय से की गई कि मास्को के लेखकों को उपयुक्त सम्मेलन की उपलब्धियों से अवगत कराया जाए। दूसरी बड़ी सभा में जनता भी बुलाई गई और उसमें अन्य कवियों के साथ मैंने भी अपनी कविता का पाठ किया। उसका रूसी अनुवाद मादाम इरीना ने पढ़कर सुनाया 1 मेरी चुनी हुई कविताओं का एक सकलन लिरिका' नाम से रूसी भाषा में अनूदित और प्रकाशित हो चुका है। संपादन मादाम रीमा बरान्नि- कोवा ने किया है। उनके पति प्योत्र बरान्निकोव कुछ समय पूर्व भारत स्थित रूसी राजदूतावास में सांस्कृतिक-कार्य अधिकारी थे। पति-पत्नी दोनों हिंदी का अच्छा ज्ञान रखते थे और बड़े सहज ढंग से बोलते थे। तभी मैं उनके संपर्क में आया था और रीमा मेरी कविताओं की प्रेमी हो गई थी। मैंने 'एकांत संगीत' की अग्नि-पथ, अग्नि पथ, अग्नि पथ! ' कविता सुनाई। श्रोताओं की प्रतिक्रिया से मैं अनुमान कर सकता था कि अनुवाद अच्छा था और कविता उन्हें पसंद आई थी।

इन कार्यक्रमों के अतिरिक्त हमें कभी दिन के और कभी रात के कई भोज दिए गार। रूसी भोज कई घंटे तक चलते हैं और बीच-बीच में मेजबानों और मेहमानों की तरफ से भाषण होते है और विशिष्ट लोगों के जामे-सेहत पीने के प्रस्ताव किए जाते हैं। रूसी अपनी मेहमान-नवाजी में अपने यहाँ की खास शराब 'वोदका' पीने की प्रार्थना करते हैं, मनुहार करते हैं, आग्रह करते है और खुद नशे में आ जाएँ तो जबर्दस्ती भी करते हैं! इन भोजों में मेरी तो बड़ी मुसीबत होती थी। रूसी यह समझ ही नहीं सकते थे कि मैं शराब न छूने के लिए प्रतिज्ञा-बद्ध हूँ। और एकाध जगह बिना 'वोदका' के गिलास को होंठों से खुलाए में अपने प्राण न छुड़ा सका।

मैंने इसे आपद्धर्म कह कर अपना प्रबोध कर लिया। एक काकटेल पार्टी भारतीय राजदूतावास में दी गई। राजदूतावास की इमारत पुरानी है, ऐतिहासिक है, कुछ नए हिस्से भी उसमें जोड़े गए हैं। पुराने हिस्से में हमें एक 'बालकनी' दिखाई गई जहाँ से, कहते हैं, नेपोलियन ने मास्को को जलते हुए देखा था। जब उसने मास्को पर आक्रमण किया था तब, इसके पूर्व कि उसकी सेनाएँ नगर में घुसें, मास्को निवासियों ने स्वयं नगर खाली करके उसमें आग लगा दी थी! राजदूतावास से चलते समय फिर मुझे एक विचित्र बात मालूम हुई। एक अधिकारी ने मुझे कुछ मेरे काम की जगहों के फोन नं, दिए, बताया, मास्को में फोन तो असंख्य हैं पर .डायरेक्टरी' नहीं छपती, अपने काम-बात के जरूरी नंबरों का पता आप मुख्यालय से लगा सकते हैं। इसके तो बड़े गहरे मतलब हुए। अपने देश में तो आप रिसीवर उठाइए और प्रधान मंत्री के यहाँ फोन कर दीजिए। रूस में यह अकल्पनीय। प्रजातंत्र और साम्य- बाद का अंतर! - खैर।

तीन-चार दिन के सम्मिलित कार्यक्रम के बाद मेरा स्वतंत्र कार्यक्रम बनाया गया। लेनिन की समाधि का दर्शन सबसे पहले याद आता है। क्रेमलिन की दीवार के बाहर रेड स्क्वायर में लेनिन की समाधि है-इमारतलाल संगमरमरी पत्थरों की बनी-सादी, सुदृढ, गंभीर-लेनिन के व्यक्तित्व के अनुरूप। किसी भी दिन जाइए दर्शनार्थियों के लंबे-लबे 'क्यू' आपको मौन प्रतीक्षा में खड़े मिलेंगे। लोग एक दरवाजे से जाते हैं और बिना रुके लेनिन के शव को देखते हुए दूसरे दरवाजे से बाहर निकल आते हैं-किसी तरह की फूल-माला भीतर ले जाने अथवा बोलने की आज्ञा नहीं है। लेनिन का शव एक शीशे के ताबूत में रक्खा है उनके चेहरे पर तेज रोशनी पड़ती है, चेहरा प्राय: श्वेत दिखाई पड़ता है। चारों कोनों पर, जैसे बाहरी दरवाजों पर, नीली वर्दी में बुत-से खड़े बंदूकधारी फौजियों का पहरा रहता है। स्टेलिन के मरने के बाद उनका भी शव लेनिन के बराल में रख दिया गया था, पर खु श्चोव ने उसे हटवा दिया। मैं चूंकि विशिष्ट अतिथि था-राज्य सभा का सदस्य भी—इसलिए मुझे 'क्यू' में नहीं खड़ा होना पड़ा। समाधि के वातावरण का कुछ ऐसा प्रभाव मुझ-पर पड़ा कि बाहर निकलकर मैं बहुत गंभीर हो गया और बड़ी देर तक मेरे मुँह से कोई शब्द नहीं निकला!

रेड स्क्वायर में ही एक सिरे पर ईवान दि टेरिबिल का बनवाया हुआ सेंट अए बेसिल का चार सौ बरस पुराना गिरजा है जो अपने गुम्बदों के रंग, आकार, प्रकार नंद तरतीब के कारण संसार में अद्वितीय है। कहते हैं कि इसको बारमा नाम के इंजीनियर ने बनाया था। ईवान इसे देखकर इतना प्रसन्न हुआ कि उसने बारमा की आँखें निकलवा लीं, जिससे कि वह कहीं और ऐसा गिरजा न बना सके!

: बारमा को इसकी आशंका पहले से हो गई थी। उसने मेहराब के बीच-बीच में ऐसे झरोखे बना दिए थे जिन्हें दूर से देखने से लगता है कि बारमा की आँखें ही जैसे अनेक हो इन नेत्राकार मेहराबों और पुतली-रूप झरोखों से घूर रही हैं!

कई दिन मैंने यूनिवर्सिटी, आर्ट गैलेरियां, पुस्तकालय-प्रसिद्ध लेखकों के भवन- जैसे तोल्सतोय, गोर्की, मायकोव्सकी, चेखोव आदि के देखने में लगाए। लेखकों के भवनों में जाने के पहले जूतों के ऊपर बड़े-बड़े कैनवस नम्दे के जूते पहनने पड़ते हैं जिससे एक तो जूतों की रगड़ से फर्श न खराब हों हजारों लोग प्रतिदिन दर्शनार्थी के रूप में आते हैं दूसरे जूतों की खटर-पटर से शोर न हो। तोल्सतोय में अपने लेखन को निखारने के प्रति कितनी लगन थी, कितना धैर्य उनमें था, कितना श्रम उन्होंने किया! वार ऐड पीस' ऐसे भीमकाय ग्रंथ को सात-आठ बार उन्होंने अपने हाथों से लिखा! प्रतिभावानों के कैसे विचित्र-विचित्र गुगल भी होते हैं। लार्ड तोल्सतोय को जूते बनाने का शौक था और वे फुरसत के समय जूते बनाया करते थे जूते बनाने का उनका सारा सामान ज्यों का त्यों रक्खा है। क्रांति के बाद लेनिन ने गोर्की को रहने के लिए जो घर दिया वह किसी सामंत का था! सोने के कमरे का प्रांगार देखकर उन्होंने कहा, इसमें तो किसी बैले डांसर को सोना चाहिए। बिस्तर के आगे दीवार में आदमकद शीशा लगा था, पहली रात तो गोर्की को नींद ही न आई। दूसरी रात को उन्होंने शीशे की ओर अपना सिरहाना करा लिया। हर जगह गाइड हैं जो लेखकों के भवनों, रहन-सहन, कार्य-प्रणाली आदि के बारे में मनोरंजक बातें बताते हैं।

एक संध्या को मास्को की स्टेट यूनिवर्सिटी में मेरा काव्य-पाठ हुआ। मास्को की यूनिवर्सिटी मकानियत और विद्यार्थी-अध्यापक संख्या में इतनी बड़ी है कि अगर हमारे देश की दस-बारह सर्वश्रेष्ठ यूनिवर्सिटियाँ मिल जाएँ तो भी उसकी बराबरी शायद ही कर सकें! सभा में भारतीय विद्यार्थियों के अतिरिक्त बहुत-से रूसी भाई भी आए। एक और संध्या को लुमुम्बा फ्रेंडशिप युनिवर्सिटी में मेरा व्याख्यान और काव्य-पाठ हुआ। यहाँ डेढ़-दो सौ भारतीय विद्यार्थी विभिन्न विषयों में शिक्षा पा रहे हैं। एक दिन रूस के वयोवृद्ध लेखक और कवि ईलिया एड्‌रेनबुर्ग से मेरी भेंट का प्रबंध किया गया। साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला में भी उनकी गहरी रुचि है। उनके ड्राइंग रूम में मैंने एक-दो चित्र जैमिनी राय के देखे। एड्‌रेनबुर्ग का कहना था कि जैमिनी राय की कला पर फेंच प्रभाव है। मैंने उनसे लगभग एक घटे आधुनिक साहित्य और काव्य के विषय में बातचीत की। अपने साहित्य संबंधी विचारों में वे बहुत-से रूसी लेखकों से अलग और स्वतंत्र लगे-निर्भीक भी। इन दिनों उनके दिमाग में साहित्य-कला के अंतरराष्ट्रीय मापदंड की बात जोरों से घूम रही है। सोवियत राइटर्स यूनियन में एक संख्या को केवल मेरा काव्य-पाठ कराया गया एहरेनबुर्ग ने सभापति का आसन ग्रहण किया कई हिंदी जाननेवाले रूसी मित्रों ने मेरी कविता का भाव रूसी में बताया। एक रूसी भाई ने लिखकर भेजा--मेरी हिंदी कविता, जिसकी वे केवल ध्वनि मात्र सुनते हैं, रूसी अनुवाद से अधिक प्रभावकारी लगती है। एहरेनबुर्ग ने पढ़कर उसका मतलब मुझे समझाया और कहा, यह आपके लिए बहुत बड़ा सर्टिफिकेट है। उसी रात को मुझे एक भोज दिया गया जिसमें ए_हरेन- बुर्ग, भारत के राजदूत और कई प्रसिद्ध रूसी लेखक सम्मिलित हुए_।

प्राय: प्रत्येक रात्रि को किसी न किसी प्रकार के मनोरंजन का प्रबंध रहता था,

थियेटर, बैले, ओपेरा, सिनेमा और कुछ न सही तो पपेट शो (कठपुतली का खेल ) या सरकस। सरकस के लिए मास्को में स्थायी भवनें हैं जैसे सिनेमा के लिए। बोलशाई थियेटर का .स्वान लेक बैले' भूलने की चीज नहीं। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उसपर कविता लिखी जा सकती हैं-मेने एक लिखी भी है-स्वान- लेक बैले की प्रमुख बैलेरीना के प्रति-'हंस-मानस की नर्तकी' शीर्षक से। प्रस्तुत कर दूं?

शब्द-बद्ध तुमको करने का

मैं दुःसाहस नहीं करूँगा।

तुमने अपने अंगों से जो गीत लिखा है

विगलित लयमय, नीरव स्वरमरा, सरस रगमय, छद-गंधमय

उसके आगे मेरे शब्दों का संयोजन-

अर्थ-समर्थ बहुत होकर भी-मेरी क्षमता की सीमा में-

एक नई कविता-सा केवल जान पड़ेगा-

लयविहीन, रसरिक्त, निचोड़ा, सूखा, भोडा।

ओ माखन-सी मानस-हंसिनि, गीत तुम्हारा

जब मैं फिर सुनना चाहूँगा

अपने चिर-परिचित शब्दों से नहीं सहारा मैं माँगूंगा।

कान मूंद लूंगा, मुख अपना बंद करूंगा

पलकों में पर लगा, समय-आकाश पार कर

क्षीर-सरोवर तीर तुम्हारे उतर पड्ंगूा

तुम्हें निहारूँगा नयनों से

जल मुक्ताहल तरल झडूंगा!

दर्शक बैले समाप्त होने पर हाल छोड्‌कर घर जाने की जल्दी में नहीं रहते। वे तालियाँ बजाते हैं और नर्तकियाँ बारम्बार-बारम्बार परदे से बाहर अकर दर्शकों का अभिनंदन स्वीकार करती है, और जोर से तालियाँ बजती हैं, लोग ब्रावो' ब्रावो'

खूब किया-चिल्लाते हैं और यह कम आठ-दस मिनट तक चलता है!

मुझे दस दिन मास्को में रखने के बाद रूस के अन्य नगरों की यात्रा कराने का भीकार्यक्रम बनाया गया। १४ की रात को टेर न से मैं लेनिनग्राद के लिए रवाना हुआ-इस गाड़ी को 'रेड ऐरो' कहते हैं। स्टेशन पर मुझे लेने के लिए वरान्निकोव दंपति मौजूद थे, शायद राइटर्स यूनियन की ओर से मेरे लेनिनग्राद पहुँचने की सूचना उन्हें दे दी गई थी 1 दोनों आजकल लेनिनग्राद की विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में अध्यापन का कार्य करते हैं। इरीना मेरे साथ आई ही थी। हमें 'होटेल एस्टो रिया' में ठहराया गया। कहते हैं हिटलर ने लेनिनग्राद पर कब्जा करने के बाद इसी होटल में भोज देने का स्वप्न देखा था योजना तक बना डाली थी निमंत्रण- पत्र भी छपा लिए ग्ए थे, पर उसने अपना भाग्य समझने में कितना धोखा खाया था।

पहले मुझे १९१७ की क्रांति और पिछले महायुद्ध से संबद्ध स्थान-स्मारक दिखाए गए। मैंने 'अरोरा' नामक जहाज देखा जिससे क्रांति का पहला गोला दागा गया था। मुझे बताया गया कि जिस आदमी ने पहला गोला दागा था वह अभी मौजूद है और अक्तूबर में जब क्रांति की स्वर्ण-जयती मनाई जायगी तब उसे विशेष रूप से सम्मानित किया जायगा। स्मालनी' वह इमारत है जिसमें क्रांति की सफलता के पश्चात् लेनिन रहते और काम करते थे। इस बड़ी इमारत में उन्होंने केवल दो कमरे अपने और अपनी पत्नी के लिए रब। थे। एक कमरे को पर्दे से दो भागों में विभाजित कर छोटा-सा सोने का कमरा बनाया गया था-बिस्तर इतने कम चौड़े थे जितने अपने यहाँ के रेलवे के बर्थ। आधे में उनका दफ्तर था। दूसरे कमरे में वे लोगों से मिलते थे। उसी कमरे में अब लेनिन के व्याख्यानों के रेकार्ड दर्शकों को सुनाए जाते हैं। रूसी तो मैं न समझा, पर उनकी आवाज में गंभीरता, संतुलन, निश्चितता, ठोसपन सहज का जा सकता था। ये विशेषताएँ गांधी जी की आवाज में भी थीं। एक जगह एक रेल का डिब्बा देखने की याद है जिसमें चढ़- कर लेनिन क्रांति पूर्व लेनिनग्राद (पहले पीट्रोग्राद आए थे, एक टैंक देखने की भी, जिस पर खडे होकर क्रांति के पश्चात् लेनिन ने जनता को सम्बोधित किया था। पिछले महायुद्ध की गति-प्रगति प्रदर्शित करने के लिए तो ग्‌क स्थायी प्रदर्शनी लगाई गई है। युद्ध में काम आए सैनिकों, शहीदों, नागरिकों के स्मारक पर रात- दिन अविरत आग की लपटें उठाने का प्रबंध है-गैस-प्रवाह के द्वारा। आप दिन में किसी वक्त जाएँ आपको एक भीड़ मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति देने वाले अपने संबंधियों की याद में खड़ी दिखाई देगी।

हरमिताज' पुराने जारों का राजमहल था; अब वह रूस का सबसे बड़ा संग्रहालय है, चित्रों, मूर्तियों और नानाविध कलाकृतियों का। उसके सारे कक्षों में से होकर निकल जाने के लिए ही सारा दिन चाहिए। हम दो दिन हरमिताज' देखने गए और नहीं कह सकते कि हमने वहाँ की सारी चीजें देख लीं, गो कला- कृतियों के देखने भर का कोई अर्थ नहीं होता। एक-एक कृति के पीछे कलाकारों के जीवन-भर का परिश्रम है, वह साधिकार माँग करती है कि उसके सामने रुको, उसके सौंदर्य को समझो, उसके सर्जक के प्रति आदर से झुको। हर संग्रहालय से मैं यह भावना लेकर लौटता हूँ कि मैं उसके प्रति न्याय नहीं कर सका। यह सोचकर उदास भी हो जाता हूँ कि इन कलाकारों ने अपनी कल्पना, प्रतिभा, श्रम, लगन से दुनिया के एक कोने को सुन्दर बना दिया है क्या मैं भी कभी ऐसा कुछ कर सकं__गा इस जन्म में तो नहीं। एक दिन रीमा बरान्निकोवा मुझे अपने स्कुत्न लिवा ले गई। वहाँ हिन्दी एक विषय के रूप में शुरू से पढ़ाई जाती है। मुझे बताया गया कि ऐसे बहुत-से स्कूल है जहाँ विश्व की कोई न कोई भाषा शुरू से आखिर तक शिक्षा क्रम में रहती है-एक तरह से रूस में भी 'थ्री लैंग्वेज फारमूला' माना जाता है। जिनकी भाषा रूसी है उन्हें एक योरोपीय भाषा और एक एशियायी भाषा सीखनी होती है। रूस के तीस से ' अधिक रिपब्लिका की अलग-अलग भाषाएं हैं। रूसी के अतिरिक्त उन्हें अपनी भाषा भी सीखनी होती है और एशिया अथवा योरोप की एक और भाषा। रूसी के सर्व-स्वीकृत होने का एक बड़ा कारण है कि अन्य रूसी भाषाओं की तुलना में वह सर्वाधिक विकसित है। हिन्दी के भारत भर में स्वीकृत न होने की वजह यही है कि वह भारत की अन्य दर्जन भर प्रमुख भाषाओं के समान ही विकसित या अविकसित है 1

-मैंने स्कूल के बच्चों को कुछ कविताएँ सुनाई, उन्हें गाने की लय सिखाई। उन्होंने भी मेरी कुछ कविताएं मुझे सुनाई। एक शाम को प्योत्र और रीमा बरान्निकोवा ने मुझे अपने घर बुलाया, हिंदुस्तानी खाना बनाकर खिलाया, रीमा अपने भारत-प्रवास में हिंदुस्तानी खाना बनाना सीख गई थी, पर सामान आदि उसने कहाँ से जुटाया, राम ही जानें!

लेनिनग्राद से मैं हवाई जहाज से किएव गया। किएव किसी समय रूस का सबसे महत्वपूर्ण नगर था। ईसा की दसवीं शताब्दी में जब प्रथम रूसी राजवश की नींव डाली गई तो किएव को ही राजधानी बनाया गया था। किएव के धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्मिक विकास में उसकी यूनान से निकटता का बड़ा हाथ है।

किएव के ही राजा व्लादिमीर प्रथम ने सन् ९८९ में सर्वप्रथम ईसाई धर्म स्वीकार किया-यूनानी कट्टरपंथी चर्च का ईसाई धर्म, जिसे ईस्टर्न चर्च भी कहा जाता है वेस्टर्न चर्च रोम केन्द्रित था। मुझे याद है कि पहले दिन जब मैं अपने होटल से निकल नगर देखने चला था तो सबसे पहले मुझे व्लादिमीर प्रथम की मूर्ति के सामने ले जाया गया था जो एक ऊँचाई पर खड़ी की गई है।

ईसाई धर्म को शासकीय स्वीकृति तो दसवीं शताब्दी में मिली, पर उसके बहुत पूर्व ईसाई साधक किएव में साधना करने को आ गए थे। संभवत: खुले में साधना का विरोध देखकर उन्होंने जमीन के अंदर-अंदर गुफाएँ खोदकर, रास्ते बनाकर अपनी साधना जारी रक्खी थी। मुझे ये गुफाएँ दिखाई गई, गुफाओं के पतले रास्तों की लम्बाई ही सब मिलाकर एक मील से कम न होगी। बीच-बीच में अच्छे बड़े कमरों की चौड़ाई की गुफाएं हैं जिनमें सामूहिक प्रार्थना होती होगी।

अब तो इनमें बिजली का प्रकाश है, ताजी हवा भी पहुंचाई जाती है, पर सदियों पूर्व इनके भीतर जीवन की कठिनाई का अनुमान सहज ही किया जा सकता है।

संतों के मरने पर उनकी लाशें दीवारों में जगह खोदकर रख दी जाती थीं--बहुत-सी लाशें हजार बरस से अधिक पुरानी हैं और सड़ी नहीं! किएव में बड़े सुन्दर और भव्य गिरजे हैं जिनमें बाइजैनरिराम शैली की चित्रकारी की गई है। यह दीवारो पर रग-बिरंगे पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़ों को जमाकर की जाती है। साम्यवादी व्यवस्था में चर्चों में तो प्रार्थना नहीं होती पर उनकी सफाई, मरम्मत और उनके जीर्णोद्धार का पूरा प्रयत्न किया जाता है। पिछले युद्ध में कई गिरजे बममारी से ध्वस्त हो गए थे उनका उसी तरह पुननिर्माण करने की योजना बनी है। रूसी ' अपने अतीत के इतिहास से जुड़े रहने की महत्ता को खूब समझते हैं फिर ट्ररिज्म '' की दृष्टि से भी इनका महत्व है। मनुष्य में न जाने क्या है कि चीजें जितनी पुरानी हो वह उतनी ही रुचि-कौतूहल से उन्हें देखता है।

किएव में मुझे एक प्लेनिटोरियम भी दिखाया गया। यहाँ एक विशेष प्रकार के डिमोन्सट्रेशन से जमीन के चलने का सबूत दिया जाता है। बड़ी ऊँची छत से एक भारी तरह टँगा हुआ है। उसके एक सिरे से दूसरे सिरे तक चलने का अनुपात किसी वैज्ञानिक विधि से धरती की चाल से रक्खा गया है लट्‌टू इतना भारी है कि वह अपनी चाल की सीधी रेखा नहीं बदल सकता, पर पृथ्वी के चलने से वह थोड़ा बदलता है। इसका पता यों लगता है कि लट्टू आते-जाते अपनी नोक से दोनों ओर रक्खी लकड़ी की छोटी-छोटी गोटों को टक्कर से गिरा देता है जबकि पहली झूल में वह साफ उनके बगल से निकल गया था।

किएव ऊँचाई और ढलानों पर जैसा बसा है उससे मुझे वह शिमले की याद दिलाता था, आबोहवा भी उन दिनों वहां कुछ शिमले जैसी थी।

किएव की भी राइटर्स यूनियन में मुझे निमंत्रित किया गया और वहाँ बहुत- से लेखकों और कवियों से मेरा परिचय कराया गया। कुछ ने अपनी कविताएं' भी सुनाई, मैंने भी सुनाई, उनके अनुवाद भी एक दूसरे के लिए किए गए पर ऐसे अनुवादों से कविता का कोई तत्व हाथ नहीं लगता।

किएव के मूल निवासी कोसक्स या कज्जाक है। कज्जाक शब्द के संदर्भ हमारी भाषा में बहुत प्रिय नहीं है--'कज्जाक अजल का लूटे है दिन-रात बजाकर नक्खारा।' कज्जाक भाबुक लोग हैं, मिलते-विदा होते मर्द भी मर्द का चुम्बन लेते हैं, रंगों से बड़ा शीत है। वैसे तो साधारणतया अब सब योरोपीय पोशाक पहनते हैं, खासकर बाहर; पर घरों में उन्हें अपनी पुरानी पोशाकें पसंद हैं जिन पर रंगीन तागों से बड़ी सुन्दर कढ़ाई की जाती है। किएव के आसपास के पहाड़ी स्थानों में बड़े सुन्दर चिकने पत्थर पाए जाते हैं। वहाँ इन पत्थरों को कलापूर्ण शक्लों में काटने की कारीगरी विकसित की गई है। ऐसे पत्थरों की एक दूकान पर गया तो समझ में नहीं आता था कि किसे खरीदूं? किसको छोड़ूं?। विचित्र पत्थरों को इकट्ठा करने का शौक मुझे भी है, बहुत-से लोगों को होता है। मैंने जाकिर हुसेन साहब के पास पत्थरों का बहुत अच्छा संग्रह देखा था। कहीं पढ़ा था जर्मन कवि गेटे को भी पत्थरों के प्रति बड़ा आकर्षण था। किएव के पत्थर एक तो भारी, दूसरे भारी कीमतों के, फिर मुझे हवाई जहाज से यात्रा करनी और रूबल अपने पास इने-गिने। केवल नमूने के तौर पर एक खरीदा बाक़ियों को अपनी स्मृति में सँजो लाया। अब भी कभी-कभी विचित्र शक्ल-रंग के पत्थरों की वह दूकान मेरी आंखों के आगे नाच जाती है।

तीन दिन किएव में रहकर मैं हवाई जहाज से बाकू गया। मुझे किसी ने बताया कि बाक्रू' का पुराना नाम ग्बादेखूबा' था जो दो शब्दों से बना था 'बाद:' और खूना' .बाद:' का अर्थ है 'हवा' मौर खूबा' का अर्थ है अधिक-यानी वह स्थान जहाँ हवा खूब चलती है। दोनों शब्द फारसी के हैं। बादेखूबा' ही बिगड़कर बाक्रू' हुआ। बाबू में हवा अब भी खूब चलती है। ठंडक भी वहाँ मुझे और जगहों से अधिक लगी। अपने यहाँ कहावत प्रसिद्ध है-'माघे जाइ न पूसे जाड् जबै बयार तबै जाड्' और बयार बाबू में हर समय चलती थी। अब तो बाकू की प्रसिद्धि उसकी तेल उगलने वाली जमीन के कारण है। नगर के बाहर चप्पे-चप्पे पर तेल खींचने की मशीनें लगी है। जिन दिनों मैं वहाँ था समुद्र के अंदर से तेल निकालने का कोई बड़ा अभियान चल रहा था।

पुराना बाकू निश्चय ही रूमानी नगर था- हुस्नो-इश्ख का, शेरों-शायरी का, कला-कारीगरी का सुन्दर इमारतों का। पुराने महल-मीनारों से प्रेमी-प्रेमिकाओं की अजीबोरारीब कहानियाँ जुड़ी हें, जो अब भी दुहराई जाती हैं---फलाँ महल में फलाँ सुन्दरी क्रैद थी फलां मीनार से फलों आशिक कूद पड़ा था। पुराने साहित्य और कला को संरक्षित रखने के बहुत अच्छे संग्रहालय हैं। आबादी में बहुतायत मुसल्मानों की है। मुझे बताया गया, किसी को अपना धर्म छोड़ने को बाध्य नहीं किया जाता, पर नास्तिक भौतिकवाद की शिक्षा स्कूल के पाठ्‌य-क्रम का एक अंग है। एक मस्जिद को देखने की याद है-निहायत साफ, सुथरी, सुन्दर। भीतर नमाज केवल बूढ़े लोग पढ़ रहे थे औरतों के नमाज पढ़ने की जगह पीछे थी, परदे से अलग की हुई।

पुराने बाजार, जिनमें पुरानी कला-कारीगरी की चीजें बिकती हैं, दिल्ली या लखनऊ के बाजार की याद दिलाते हैं। सामान बेचना और शायद खरीदना भी एक कला है। योरोप में तो चीजें रखी है, उनपर दाम लिखा है, आप को चीज पसंद हो तो इशारा कीजिए, चीज पैककर आपको दे दी जाएगी, आप काउंटर पर जाइए, दाम चुकाइए, अपनी राह लीजिए। पूर्व का विक्रेता दूकान में आपका स्वागत करता है, आपकी पसंद भाँपता है, आपकी जेब आंकता है, कौन-सी चीज आपको पसंद है, कौन नहीं किस पर, कहां तक आप खर्च कर सकते हैं। कोई चीज आपको कम पसंद है, उसे पूरी पसंद करा देने में बिक्री की कला है कोई चीज आपको पसंद नहीं है उसे आपको खरीदवा देना बिक्री-कला की बहुत बड़ी सफलता है। एक बाजार में चाँदी के बारीक काम के गहने बिक रहे थे। इरीना की नजर एक झुमके पर पड़ी और दूकानदार ने बातों की वह झड़ी लगाई, झुमका निकालकर इरीना के कानों में ऐसे पहना दिया कि उसे लेना ही पड़ा। उस झुमके के बारे में मुझे एक मनोरंजक बात याद आ गई। बाजार से गुजरते हुए इरीना के एक कान का झुमका कहीं गिर गया बहुत ढूंढा गया, नहीं मिला। इरीना बड़ी दुखी हुई, मैंने उसका मन बहलाने को 'बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे' गीत थोड़ा बदलकर सिखाया,

बाकू के बाजार में झुमका गिरा रे!

सास मोरी पूछे, ननद मोरी पूछे,

कहाँ गिरा रे?

बाकू के बाजार में झुमका गिरा रे।

सइयाँ ने देखा, कान मेरा छूंछा

कहाँ गिरा झुमका, सवाल नहीं पूछा

चुपके से ला के नया दिया रे!

वाकू के बाजार में झुमका गिरा रे!

इरीना अंत में फिर गहनों की दूकान पर गई, इस आशा में कि शायद उसी तरह का दूसरा मिल जाए। दूकानदार ने यह कहकर कि सिर्फ इस झुमके के तीन पीस बने थे बिल्कुल उसी तरह का एक झुमका लाकर दे दिया! फिर बेचने की कला का नमूना। बाद को मैं सोचने लगा कि झुमका दूकान में ही तो नहीं गिर गया था कि दूकानदार ने वही फिर पेश कर दिया पर इरीना इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुई कि रूस का दूकानदार ऐसी बेईमानी करेगा।

बालू से मैं २२ अप्रैल को मास्को वापस आया। वह दिन मैंने खरीदारी करने में बिताया। मेरी लिरिका' की रायल्टी मुझे दे दी गई जो कई सौ रूबल थी इरीना के हिसाब से भारतीय सिक्कों में लगभग तीन हजार रुपयों के बराबर कुछ रूबल दैनिक भत्ते के मेरे पास बचे थे। ये सब रूस के अंदर ही खर्च करने थे। कुछ समय मैंने किताबों की दूकानों पर बिताया। रूस में सारा प्रकाशन राज्य की ओर से होता है। रूस ने अपने को वर्ल्ड कापीराइट कन्वेन्शन से मुक्त कर लिया है। वे दुनिया की किसी भी पुस्तक का अनुवाद बिना लेखक की अनुमति के और बिना कुछ रायल्टी दिए कर सकते हैं-करते भी हैं कोई लेखक रूस पहुँच जाए तो रूबलों में वे उसकी रायल्टी अदा कर देते हैं, पर रूबलों को रूस में ही खर्चना होता है। रूस की आंतरिक भाषाओं में भी परस्पर अनुवाद खूब होते हैं। पुस्तकें सुंदर होने के साथ सस्ती भी होती हैं और रूसी जनता में पुस्तक प्रेम बहुत है। जहाँ भी मैं पुस्तकों की दूकान पर गया मैंने खरीदनेवालों की भीड़ देखी। मुझे बताया गया कि भारतीय साहित्य की ही लगभग सौ किताबें रूसी में अनुदित हो चुकी हैं और कई किताबें रूसी अनुवाद में जितनी बिकी हैं उतनी मूल भारतीय भाषा में नहीं! रूस ऐसे बड़े देश के विषय में, जो देश नहीं दुनिया है, केवल तीन सप्ताह रहकर, और उसके सिर्फ चार नगरों को देखकर, और उन नगरों में भी वही देख- कर जो आपको दिखाया गया है, कोई सही राय बनाना असंभव है। कुल मिलाकर मुझपर यह असर पड़ा कि रूस ऐसे बिविधतापूर्ण देश को सुगठित, सुअनुशासित करने और उसके निवासियों को समृद्धि नहीं तो खुशहाली देने और भविष्य के लिए उन्हें आशावान और कर्मशील बनाने में जो सफलता प्राप्त की गई है वह किसी भी शासन प्रणाली के लिए बड़ी भारी उपलब्धि है। शासन की जकड़बंदी बड़ी चौकस है पर उसके बदले में जनता को कुछ मिला है जिसके कारण वह उस जकड़बंदी को स्वेच्छया स्वीकार किए हुए है।

रूस के बाद मुझे मंगोलिया जाना था। मैं २२ अप्रैल की शाम को मास्को से हवाई जहाज से रवाना हुआ। ओमस्क रुकते जब हमारा जहाज इरकुटस्क पहुँचा तो घड़ी में मास्को समय से चार घटे का अंतर आ चुका था। इरकुटस्क में हमें बताया गया, रात के दो बजे हैं, गो सूरज निकल रहा था, गर्मियों में वहाँ सूरज ऐसे ही वक्त निकल आता है। वहाँ से मंगोलिया जाने वाला जहाज आठ बजे चलने को था। हम लोग पास के होटेल में जाकर सो गए। काले परदों को खिड़कियों पर खींचना पड़ा तब रात होने का आभास हुआ। इरकुटस्क से आठ बजे चलकर हमारा जहाज क़रीब ग्यारह बजे मंगोलिया की राजधानी उलानबतोर पहुँचा। मुझे नेहरू परिवार में किसी ने बताया था उलानबतोर' के अर्थ हैं लाल बहादुर'-'उत्वान' का अर्थ है लाल, 'बतोर' वही शब्द है जो बहादुर। मुझे पता नही कि नगर का यह नाम पुराना है या लाल क्रांति के बाद यह नाम दिया गया 1 वहाँ मुझे पूछने की याद नहीं रही। अपने देश में दक्षिण में कोयमबतोर' नगर प्रसिद्ध है। क्या संबंध होगा कोयमबतोर' और उलानबतोर' के बनोर में? प्रसंगवश बता दूं कि मंगोलिया में कांति के जनक थे मूकेबतोर, जो वही है जो सुख बहादुर। सूकेबतोर लेनिन से मिले थे और मंगोलिया में उनका वही स्थान है जो रूस में लेनिन का। उलानबतोर के रेड स्क्वायर में मूकेबतोर कीं स्मारक उसी तरह बना है जिस तरह मास्को में लेनिन का। क्रांति के पूर्व मंगोलिया में लामा-धर्म सामंती शासन था, जैसे तिब्रत में तिब्बत से उसका निश्चित रूप से धार्मिक-सांस्कृतिक सबंध और आदान-प्रदान था और इस प्रकार सदियों से भारतीय वौद्ध संस्कृति का निर्यात मंगोलिया को हो रहा था। मध्ययुगीन लामा-धर्म-संस्कृति से अपने को बिल्कुल काट कर नवयुग में पदार्पण करने के क्रांति के प्रयत्नों के बाजूवद मंगोलिया के जन जीवन में पुरा संस्रुारों के सूक्ष्म चिह्न आज भी देखे जा सकते हैं उदाहरणार्थ लड़कों के संजय, धनंजय नाम, लड़कियों के सूकिया (सुखिया) सुंदरिया। प्रणाम करने .में हाथों को जोड़ने की रीति। यह प्रथा तो कोरिया-जापान तक चली गई है। खैर।

उलानबतोर के हवाई अड्डे पर मंगोलिया सरकार की मिनिस्ट्री आफ कल्चर की ओर से मिस्टर थरवा और मिस्टर तावा ने मेरा स्वागत किया। मि० तावा मेरे दुभाषिया थे, वे अंग्रेजी बोल और समझ सकते थे। हिंदी जाननेवाला दुभाषिया उपलब्ध न था संस्कृत जाननेवाला दुभाषिया मिल सकता था, लेकिन लज्जा और दुर्भाग्य की बात कि भारत का सांस्कृतिक प्रतिनिधि मैं संस्कृत नहीं बोल सकता था! संस्कृत न जानने की लज्जा इससे अधिक शायद ही कहीं मैंने अनुभव की।

मैं उलानबतोर होटल में ठहराया गया। होटल समस्त आधुनिक सुविधाओं से संपन्न योरोपीय होटलों के समान था। अधिक लोग उस होटल में नहीं ठहरे थे।

उत्पानबतोर में मेरा कार्यक्रम छह दिनों का था। संग्रहालय और पुस्तकालय दे: अतिरिक्त वहाँ मुझे कोयले की खान, चमडे की एक फैक्टरी और ऊन की बुनाई का एक कारखाना दिखाया गया। पुस्तकालय में तिब्बती भाषा में लिखी पांडलिपियों का बहुत बड़ा संग्रह है। मंत्रों और धार्मिक पुस्तकों को स्वर्णाक्षरों न। में लिखने की कला मंगोलिया के लामाओं ने विकसित की थी। बहुत-सी पांडुलिपियां सचित्र हैं। संग्रहालय में दीवारों से टाँगने के लिए कपड़े पर बने चित्रों का बहुत बड़ा संग्रह है। पत्थर, काठ,, धातु की कला-कारीगरी की, पूजा के उपयोग में आनेवाली अथवा जन-जीवन के दैनिक व्यवहार की जितनी भी चीजें है सब पर तिब्बती कला की छाप है। कला के संबंध में तिब्बत की एक अपनी दृष्टि है। मुझे ँ पता नही कला विशेषज्ञों ने कला में किसी विशिष्ट तिब्बती स्कूल की स्थापना की है या नहीं। यह लिखावट में, चित्रकारी में, धातु की वस्तुओं की ढलाई में पत्थरों

की गढाई में, लकड़ी पर की गई नक्काशी में, भवनों की बनावट में, उनपर किए गए रंगों की सजावट-मिलावट में, सब जगह अपनी विशिष्टता लिए हुए है। इसका ध्येय वास्तविकता से दूर ले जाना है और कल्पना को एक अर्थ-गर्भित वक्रता देना है अर्थ जो गुह्य तंत्रों या मंत्रों में छिपा है। साधारण दृष्टि से देखने पर भी उनका वैचित्रय अर्थ की जिज्ञासा तो जगाता ही है।-संग्रहालय में लोहे की एक इतनी मोटी जंजीर रक्खी है कि कल्पना नहीं की जाती कि किन दानवों को उनसे बाँधा जाता होगा। चंगेज खां का झंडा आज भी दिल में दहशत पैदा करता है। यह असंख्य बालों का बना है, कहते हैं जब चंगेज खान किसी का सिर काटता था तो उसके सिर या दाढ़ी का एक बाल इस झंडे में जोड़ देता था। एशिया और योरोप को रौंद डालने वाला चंगेज खान बौद्ध था और मंगोलियायी उसे अपना राष्ट्र वीर मानते हैं

मुझे ग्राम की एक सहकारी संस्था भी दिखाई गई जिसे मंगोल भाषा में नगदल' कहते हैं। नगदल' में ग्राम जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करनेवाले, विभिन्न परिवारों को एक साथ रक्खा जाता है। खेती करनेवाले, कपड़ा बनानेवाले, जानवरों की देख-रेख करनेवाले, डेरी का काम करनेवाले, शिक्षक, डाक्टर और मेकैनिक-मशीन की सँभाल-मरम्मत करनेवाले-सब मिलकर एक इकाई बनाते हैं जो आत्म पर्याप्त होती है। मंगोलिया में जहाँ जन-संख्या बहुत कम है मशीनों के अधिकाधिक उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है। जहाँ मशीनें कभी देखी ही नहीं गई थीं वहाँ जनता बडे विनोदपूर्ण कौतूहल से मशीनों को देखती, चलाती और उनकी उपयोगिता सीखती है तोड़ती भी है, और नंगदल में मेकैनिक का बड़ा महत्व है 1 शुरू-शुरू में विकसित साम्यवादी देशों से मेकैनिक लाकर रक्खे गए थे। अब मंगोलियायी उनकी जगह लेते जा रहे हैं।

मगोलिया में मीलों लंबे-चौड़े-चौरस मैदान हैं जिनमें खेती नहीं हो सकती, केवल जंगली घास उगती है। वहाँ केवल भेड़ें और घोड़े पाले जा सकते हैं घोड़ी वहाँ की गाय है, थोड़ा बैल। घोड़ी के टूध से क्यूमिस' बनाया जाता है जो गड़रियों का प्रिय पेय है मादक और शक्तिवर्धक भी होता है। गड़रियों के परिवार नमदे के तंबू लिए चारागाहों में एक जगह से दूसरी जगह घूमा करते हैं। भेड़-थोड़े जब एक जगह की घास चर लेते हैं तो दूसरी जगह जाना जरूरी हो जाता है। उनके गोल तंबू घिर' कहलाते हैं। डा० रघुबीर ने मुझसे बताया था कि 'घिर' 'शिविर' का बिगड़ा रूप है। ये 'घिर' आधे घटे में उखाड़े या लगाए जा सकते हैं। मुझे बताया गया कि जाड़ों में भी, जब बरफ पड़ रही हो, 'घिर' पक्के मकानों से अधिक गर्म रहते हैं। एक घिर में आठ-दस आदमियों का परिवार बड़े मजे से रह सकता है। मुझे मोटर से ले जाकर एक चरागाह में 'घिर' दिखाया गया। बैट्री से चलनेवाले रेडियो सेट घिरो' में रक्खे गए है, जिनसे गड़रियों को खबरें दी जाती हैं, मौसम का हाल बताया जाता है, गीत-वार्ताएं सुनाई जाती हैं और शिक्षित भी किया जाता है। एक घिर में गड़रियों ने मुझे रवाना खिलाया। भेड़ का मांस वे इस प्रकार पका-सुखाकर रखते हैं कि बहुत दिनों तक खराब न हो। शकरपारे भी वे बना-

कर रखते हैं पर वे इतने सख्त थे कि उन्हें काटने में दाँतों को पूरी ताकत लगानी पड़ती थी। मांस तो मैंने न खाया दूध, घी, शक्कर में पका चावल भी था, वही मैंने लिया; एकाध शक्करपारे खाए) क्यूमिस की चरबी तेज थी, स्वादिष्ट नहीं लगी। मैंने मंगोली घोड़े की सवारी की और याद आया कि संभव है इसी घोड़े के लक्कड़दादे के लक्कडदादे की पीठ पर सवारी गाँठ कर चंगेज खाँ या उनका कोई जाँबाज सरदार लुट-मार के किसी साहसी-क्रूर अभियान पर गया हो!

मुझे मंगोलिया में बचा एकमात्र लामाओं का मठ दिखाया गया, जहाँ करीब सौ लामा अब सरकारी वेतन में रहकर पुरानी पांडुलिपियों को व्यवस्थित, संरक्षित अथवा उनपर शोध का काम करते हैं। मुख्य हाल में भगवान बुद्ध की मंगोली मुद्रा में चमकती धातु-मूर्ति थी और उसके अगल-बगल बहुत-सी मूर्तियाँ और पूजा का सामान था जो खुली आलमारियों में सजा था। घी के बड़े-बडे दीपक जल रहे थे, अगरबत्तियां जल रही थी और उनके गंध और धुंए' से हाल भरा था। बीच में आमने-सामने दो पंक्तियों में पालथी मारे बैठे वृद्ध, मुंडित शीश, -ललाम, पीत- लबादा धारी एक दर्जन लामा अपने आगे पोथियां खोले पढ़ रहे थे और से-रो-गे'- शब्द हाल भर में गूँज रहा था। बीच-बीच में छत से लटकती एक खँझड़ीनुमा डफली को एक लामा नीचे से घुमाकर डिमिक-डिमिक' बजा देता और दूसरा लामा एक बड़े झाँझ को झड़म-झड़म,' और फिर वे बिना रुके, बिना हिले-डुले, बिना किसी की ओर देखे से-रो-रो'-करने लग जाते। हाल की दीवारों से लगी आलमारियों में बस्तों में बँधी सैकड़ों पोथियाँ रक्खी थी किसी लामा ने उनकी ओर संकेत करके कहा, गंजोरतंजोर'। इसके आगे मैं कुछ न समझा। मठ के बाहर 'प्रेयर ह्वील' या प्रार्थना चक्र लगे हैं, जिनपर 'ऊँ नमो मणि पद्मे हुँ' लिखा है। कुछ लोग अब भी आते हैं,इन प्रार्थना चक्रों को घुमाते हैं और मुख्य द्वार पर साष्टांग प्रणाम करते है।

प्रमुख लामा से भी मुझे मिलाया गया पाठकारी लामाओं का प्रतिरूप, रक्तवर्ण, गंभीर। मठ से लगा उनका निजी कक्ष था। मैंने झुककर प्रणाम किया तो उन्होंने मुझ से कुछ कहा। दुभाषिया ने बताया, आपको आशीर्वाद देते हैं। वहाँ मंगोलिया के कई कवि और लेखक भी एकत्र हुए मेरा कविता-पाठ हुआ मैंने ही अपनी कविता का भावार्थ अंग्रेजी में बताया, तावा ने उसको मंगोल में समझाया। वहीं मुझे दिन का भोज दिया गया। प्रमुख लामा ने साथ खाना नहीं खाया वे उपस्थित भर रहे। मंगोलिया में वह मेरा अंतिम दिन था। चलते समय मंगोलियायी चित्रों का एक भारी एलबम मुझे भेंट किया गया।

मंगोलिया जो आधी सदी पूर्व केवल गड़रियों और लामाओं और उनके संरक्षक तानाशाही सामंतों का देश था अब साम्यवादी जनसत्तात्मक लोकतंत्र है हर दिशा मैं विज्ञान के सहारे औद्योगिक उन्नति हो रही है नए नगर खड़े हो रहे हैं और उसे आधुनिक बनाने की योजनाएँ कार्यरूप में परिणत की जा रही हैं। रूस और चीन दोनों ही मंगोलिया को अपने प्रभाव में रखना चाहते थे, पर सफल रूस ही रहा है। मंगोलिया में चीन के प्रति इस बात पर आक्रोश है कि उसने आउटर- मंगोलिया को अपने कव्जे में कर रक्खा है। मंगोलिया की उन्नति-प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि पूर्वी समुद्र तट पर उसे कोई द्वार मिले जिससे निकलकर वह बाहरी दुनिया से स्वतत्र संबंध बना सके। रेड स्क्वायर में घोड़े पर सवार सूकेबतोर की मूर्ति अपना बायाँ हाथ पूर्व दिशा की ओर बढाए हुए है। क्या मंगोलिया- वासियों के लिए यह कोई संकेत है?

मंगोलिया से लौटकर मैं मास्को आया और मैंने पहली मई का परेड देखा जिसके लिए मुझे पहले से निमंत्रण मिला था। भूलने की चीज नहीं वह। रूसी फौज और उसके हथियारों का विश्व-आतंककारी प्रदर्शन! रूसियों को अडिग आश्वासन कि कोई शक्ति तुम्हारे देश का बाल बाँका नहीं कर सकती। लेनिन की समाधि की छत पर खड़े होकर रूस के राष्ट्रपति और मंत्रिमंडल के सदस्य सलामी लेते हैं। जिसके पाँवों में सात-आठ घंटे खडे रहने की ताकत न हो वह रेड स्क्वायर में परेड देखने न जाए। वहाँ किसी को बैठने की जगह नहीं दी जाती। जब फौजी मार्च करते हुए जा रहे हैं तब किसी को आराम से बैठकर उन्हें देखने का अधिकार नहीं है। अपने देश का रिपब्लिक डे भी याद आया! फौजियों के परेड के बाद किसान, मजदूर, नागरिक हाथों में कुल की डालियाँ लेकर निकलते हैं गाते-नाचते-हजारों, हजारों, हजारों-जैसे घोषित करते हों कि यह सारी युद्ध की तैयारी इसलिए है कि देश में शांति के सुमन खिलते-महकते रहें।

अगला पखवाड़ा चेकोस्लोवाकिया की यात्रा के लिए था। वास्तव में चेकोस्लोवाकिया दो देशों का सम्मिलित नाम है। किन राजनीतिक कारणों से चेक और स्लोवाक दो विभिन्न भाषा-भाषी देशों को एक कर दिया गया है, मुझे नहीं मालूम।

मैं तो उसे एक ही देश समझता था। वहाँ जाने पर पता चला कि दोनों देशों की अलग-अलग राजधानियों भी हैं चेक की प्राग, जिसको वहाँ वाले प्राहा कहते हैं, और स्लोवाक की वाटिसलावा। मैं २ मई को मास्को से हवाई जहाज से चलकर प्राग पहुँचा। प्राग में राइटर्स यूनियन की ओर से मदाम यूनोवा ने मेरा स्वागत किया।

वे स्वयं लेखिका हैं और अंग्रेजी अच्छी तरह बोल और समझ सकती हैं। उनके पति किसी समय मंत्रिमंडल में थे अब उनकी मृत्यु हो चुकी है और युनोवा अपने दो बेटों के साथ रहती हैं जिनमें से एक की शादी हो गई है दूसरा कालेज में पड़ता है। भारतीय राजदूतावास के सांस्कृतिक संपर्क अधिकारी भी हवाई अड्‌डे पर मुझसे मिलने आए थे। मुझे एम्बेसेडर होटल में ठहराया गया।

तीस अप्रैल को उलानबतोर में, १ मई को मास्को में, २ मई को प्राहा में था। माना कि यात्रा हवाई जहाज से की गई थी पर बदन थककर चूर था। मैंने यूनोवा से कहा, आज कोई प्रोग्राम नहीं वह चली गई। पर शाम को कमरे में लेटे-लेटे घुटन महसूस हुई और मैंने अकेले ही बाहर निकलने का निश्चय किया। फुटपाथ पर काफी चहल-पहल थी और में अपनी अजनबी की-सी नजर आदमियों, मकानों, दुकानों पर डालता आगे बढ़ रहा था कि मुझे एक आदमी निर्मल वर्मा-सा दिखा, और मैंने आवाज लगा ही दी। वर्मा ही थे।

'अरे आप! यहां कैसे ' खूब पहचाना!

'योरोपियनों की भीड़ में हिन्दुस्तानी कहीं छिपता है '

फिर हम दोनों साथ हो गए और दो-तीन घंटे उन्होंने मुझे पैदल और ट्राम से प्राग की खास-खास सड़कें, इमारतें, बाजार, रेस्टराँ दिखाए चेकोस्लोवाकिया के सिक्के समझाए नगर-नागरिकों की विशेषताएँ बताई, फिर किसी क्लब या पब में ले गए। सवाल है, पीनेवालों की संगत का मजा वह ज्यादा उठाता है जो खुद पीता है या जो नहीं पीता! मैं अपना निर्णय न पीनेवालों के पक्ष में देना चाहूँगा। क्लब में निर्मल ने एक नवयुवक चेक कवि से मेरा परिचय कराया नाम था तोपिका-सुन्दर, छरहरा, निर्मल की ही तरह नाटा, किसी कदर नाटी' भी यानी नटखट वह निर्मल से बीच-बीच में चेक में कुछ कहकर हँसता रहा। निर्मल ने मुझे बताया था और मुझे खुद भी यह भाँपने में देर न लगी कि चेकोस्लोवाकिया में साम्यवाद है पर साम्यवाद का आतंक या दबदबा नहीं है। रूस और मंगोलिया की यात्रा के बाद चेकोस्लोवाकिया का यह खुला-खुलापन मुझे प्रियकर लगा। मुझे यह भी लगा कि चेकोस्लोवाकिया का नागरिक उतना राजनीति-प्रेरित नहीं, जितना कला अथवा सौन्दर्य प्रेरित। सामाजिक बंधनों को स्वीकार करते हुए वह कहीं अपनी स्वतंत्रता के प्रति भी सचेत है।

बाद को मादाम पूनोवा के संरक्षण में कई बार राइटर्स यूनियन में चेक लेखकों और कवियों से मेरी भेंट कराई गई और भारतीय साहित्य और भाषा के विषय में मैंने उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। ऐतिहासिक महत्व के स्थानों और भवनों को देखने के अतिरिक्त मैंने चार्ल्स यूनिवर्सिटी में हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों के बीच व्याख्यान दिया और कविता-पाठ किया। वहाँ डॉ० स्मेकल हिन्दी के अध्यापक हैं। वे एक से अधिक बार भारत आ चुके हैं। उनका-मेरा परिचय दिल्ली में हुआ था। जब वे पहली बार भारत आए थे तब भी इतनी शुद्ध, और सही उच्चारण से हिन्दी बोलते थे कि आश्चर्य होता था। मैं उनके घर भी गया, उनकी पत्नी से मिला। उनके घर के भीतर की साज-सज्जा किसी सुसंस्कृत भारतीय के घर से अधिक भारतीय लगी। उन्होंने अपने टेप रेकार्डर पर मेरी कई कविताएँ रेकार्ड कीं। मेरी 'मधुशाला' के कई पदों का अनुवाद उन्होंने चेक भाषा में किया था जो किसी चेक पत्रिका में छपा भी था और भी कुछ कविताओं का। प्राग में सभी क्लब-पब पीने-पिलाने, नाचने, ब्रिज-रमी खेलने के लिए नहीं हैं। कुछ क्लबों का ऊँचा सांस्कृतिक स्तर है, जहाँ बुद्धिजीवी, कवि कलाकार चित्रकार एकत्र होते है। ऐसे ही एक ' वियोला क्लब' में मेरा कविता-पाठ कराया गया डॉ० स्मेकल ने मुझपर और मेरी कविता पर एक परिचयात्मक व्याख्यान दिया और मेरी पठित कविताओं का अनुवाद चेक में सुनाया। वास्तव में मैंने वही कविताएँ सुनाई जिनका अनुवाद डॉ० स्मेकल पहले ही चेक में कर चुके थे कविता कोई साधारण भाषण नहीं कि उसका अनुवाद तुरत-फुरत दूसरी भाषा में प्रस्तुत कर दिया जाए।

तीन दिन के लिए मुझे प्राग से ग्राटिसलावा भेजा गया। वहां भी मैंने ऐति हासिक स्थानों को देखा और राइटर्स यूनियन में व्याख्यान दिया और कविता-पाठ किया। डेन्यूब के तट पर बसा ब्राटिसलावा बड़ा रमणीक नगर है। नगर के कतिपय भागों में किसी प्रकार की सवारी गाडियां ले जाना मना है। वहाँ बड़ी शांति रहती है बूढ़े लोग निर्भय घूमने आते हैं, नगर की दौड़-इप-तेजी-शोर-शराबा जैसे यहाँ आकर शांत हो गया है। दाटिसलावा में सिरेमिक्स' का काम बहुत अच्छा होता है-मिट्टी के बर्तनों, खिलौनों, कलाकृतियों को रंगकर पकाने का काम।

।मरेमिक्स' का काम सिखाने के कालेज भी हैं- एक कालेज में एक भारतीय विद्यार्थी भी प्रशिक्षण ले रहा था। डेन्यूब पर मैंने मोटर लांच से यात्रा की थोड़ी दूर पर उस पार हंगरी की सीमाएँ शुरू होती हैं तटों पर बड़ी चौकसी रक्खी जाती है।

चेकोस्लोवाकिया में मैंने कई ओपेरा, वैसे, नाटक भी देखे। नाट्‌य कला को वहाँ विशेष रूप से विकसित किया गया है-विशेषकर रंगमंच की तकनीक को।

सिनेमा और रंगमंच को मिलाने के भी प्रयोग हुए हैं। सिनेमा कई जगह बीच के बड़े पर्दे के अतिरिक्त पखवाड्‌यों पर भी दिखाया जाता है -तीन दृश्यों पर ध्यान रखने से दिमाग और आंख दोनों पर जोर पड़ता है-शायद अभ्यास से देखना सहज और आनंददायक भी हो जाता हो। प्राग में एक रात को मैंने रूमियो ऐन्ड जूलियट' का चेक रूप देखा। रंगमंच की तकनीक नाटक पर हावी हो गई थी। मैं शेक्सपियर के नाटकों को सादे से सादे रंगमंच पर देखना चाहता हूँ तभी भाषा के सौंदर्य और पात्रों के अभिनय-कला की पूरी परख होती है। शेक्सपियर के नाटक इन्हीं दो लक्ष्यों को सामने रखकर लिखे गए थे। शेक्सपीरियन नाटकों  के मंचन में आधुनिकीकरण की एक सीमा माननी होगी उसका उल्लंघन कर जाने से शेक्सपियर शेक्सपियर नहीं रह जाएगा।

कुल मिलाकर मुझको चेकोस्लोवाकिया बड़ा कल्पना-प्रवण और प्रयोग-प्रिय देश लगा।

१४ मई को मैं प्राग से ईस्ट बर्लिन पहुंचा। हवाई अड्‌डे पर मिनिस्ट्री आफ कल्चर की ओर से मेरा स्वागत किया गया और मिस कोपेल्के मुझे दुभाषिया के रूप में दी गई। ईस्ट बर्लिन में मुझे उन्टर डिन लिन्डेन होटल में ठहराया गया। यह होटल हिन्डेनबर्ग गेट से दूर नही हैं जो वेस्ट-ईस्ट बर्लिन के बीच खिंची दीवार की सीध में है। वेस्ट बर्लिन से शायद ही कभी किसी ने ईस्ट बर्लिन आने की कोशिश की हो, पर ईस्ट बर्लिन से वेस्ट बर्लिन जाने पर सख्त प्रतिबंध है और दीवार फाँद-कर उस पार जाने के प्रयत्न में वहुत-से लोग पहरेदारों की गोलियों के शिकार हुए. हैं। इस पर टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं। हिन्डेनबर्ग गेट से दीवार की सीध में चलकर कुछ दूर पर वह स्थान है जहाँ हिटलर की चांसरी थी। उसे बिल्कुल नेस्तनाबूद कर दिया गया था उसपर अब जंगली घास उगती है केवल का बंकर, जैसे किसी जानवर की माँद के रूप में, छोड़ दिया गया हैं वहाँ किसी को जाने की आज्ञा नहीं है। चांसरी की सारी भूमि ईस्ट बर्लिन की ओर पड़ती है।

सबसे पहले मुझे वह स्माकर दिखाया गया जो उन लोगों की यादगार में बनाया गया है जो हिटलरी फासिज्म के शिकार हुए थे। एक बड़ा-सा हाल है जिसमें मानो फासिज्म के प्रतीक के रूप में एक भारी कुरूप काला पत्थर रक्खा है। मुझे बताया गया कि गैस-प्रवाह से यहाँ दिन-रात अग्नि-ज्वाल उठती रहने का प्रबंध किया जा रहा है। इमारत के आगे फौजी पहरा रहता है और सप्ताह में एक दिन फौज की एक टुकड़ी बैड-बिगुल-झंडे के साथ आकर शहीदों को सलाम पेश करती है। युद्ध के समय बर्लिन पर जबरदस्त बममारी हुई थी। मलबे साफ की गई जमीन पर नया बर्लिन उठ चुका है, उठ रहा है, पर नगर के बीच मैं कई अंशत: ध्वस्त इमारतें अब भी खड़ी हैं। शायद उन्हें न गिराया गया है, न उनकी मरम्मत कराई गई है, इस ध्येय से कि आनेवाली पीढ़ियाँ देख सकें कि युद्ध कितनी भीपण चीज होती है! और वह सभ्यता-संस्कृति की बहुमूल्य उपलब्धियों को किस निर्ममता से विनष्ट करती है।

ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा के अतिरिक्त मैंने राज्य-पुस्तकालय, संग्रहालय और यूनिवर्सिटी देखी। कुछ स्कूल भी मुझे दिखाए गए। एक स्कूल के विद्यार्थियों को मैंने अपनी कविताएँ सुनाईं। बर्लिन नगर छोटी-छोटी झीलों से घिरा है इनको नहरों द्वारा मिलाकर बड़ा मनोरम जलमार्ग बनाया गया है। मोटर लांच द्वारा इस जलमार्ग से यात्रा करने की याद बहुत दिनों तक बनी रहेगी। इस जलमार्ग के दोनों तटों पर छोटे-छोटे काटेज बने हैं जहाँ नगर के धूल-धुएँ-शोर के दमघोंटू वातावरण से ऊबकर ताजगी पाने के लिए लोग छुट्टियों में आ जाते हैं। बर्लिन जैसे व्यस्तता- विक्षिप्त नगर के लिए ऐसे स्थल कितने बड़े वरदान हैं!

चार-पाँच दिन बर्लिन में रखने के बाद मुझे कार से डेरसडेन, लाइपजिग और वाइमार की यात्रा पर भेज दिया गया। डेरसडेन पर पिछले युद्ध के समय सबसे बर्बर और भीषण बमबारी हुई थी और बताते हैं कि लगभग अस्सी प्रतिशत इमारतें धराशायी हो गई थीं। नया डेरसडेन फिर से खड़ा हो गया है। कुछ पुराने ध्वंसाव- शेष ज्यों के त्यों पड़े हैं, शायद जैसे बर्लिन में, युद्ध की भीषणता का बोध कराने के लिए। डेरसडेन में मैं वहाँ के कवि जिमरिन और उपन्यासकार विली माइनस से मिला 1 माइनस भारत आ चुके है, भारत पर कोई पुस्तक भी लिख रहे हैं।

लाइपजिग व्यावसायिक नगर है, वहीं पर मैंने जर्मन भाषा का सबसे बड़ा पुस्तकालय देखा। संसार में जहाँ कही भी जर्मन में कुछ लिखा जाता है लाइपजिग के पुस्तकालय में उसे संगृहीत करने का प्रयत्न किया जाता है। ग्राफिक आर्ट स्कूल भी वहाँ बहुत बड़ा है, जहाँ छपाई की कला का विकास किया जाता है। मुझे यहाँ के छपे कई सचित्र जर्मन क्लासिक्स दिखाए गए। महाकवि कालिदास के 'ऋतुसंहार' के जर्मन अनुवाद का सचित्र भव्य संस्करण मुझे भेंट किया गया, जो कभी यहीं छपा था। कालिदास की किसी कृति का मूल संस्करण भी इतने भव्य रूप में भारत में प्रस्तुत नहीं किया गया। यहाँ तो संस्कृत के उत्कृष्ट से उत्कृष्ट ग्रंथों के लिए काशी की 'चौखंबा सिरीज है जिसे सस्ती बनाने के प्रयत्न में सुरुचि का अच्छी तरह बलिदान कर दिया गया है। उसका विक्रेता सरे ब्राह्मण इतने से ही संतुष्ट हो जाता है कि मूलपाठ तो  से उपलब्ध करा दिया गया-उसके निकट पूर्वजों को तो हाथ से प्रतिलिपियाँ बनानी पड़ती थीं। स्वतंत्र भारत का ध्यान अपनी साहित्यिक निधि का सम्मान करने की ओर कब जाएगा? सुना है, भारत सरकार ने अच्छी छपाई को प्रोत्साहन देने के लिए पुरस्कारों की एक योजना बनाई है, पर उसका लाभ प्राय: कैलेन्डरों-पोस्टरों को छपवाने वाले उठाते हैं क्यों न आग्रह समय-सिद्ध ग्रंथों के उत्कृष्ट प्रस्तुतीकरण पर हो! --कार्ल मार्क्स यूनिवर्सिटी में मुझे जर्मन भाषा पड़ाने की वैज्ञानिक विधि समझाई गई। कई भारतीय विद्यार्थी वहाँ हैं जिन्होंने एक वर्ष में इतनी जर्मन सीख ली है कि वे उसी माध्यम से उच्च कोटि का वैज्ञानिक शोध संबंधी कार्य कर सकते हैं। वैज्ञानिक विधियां किसी भाषा पर लागू हो सकती हैं। भारत सरकार, यदि वह हिंदी के व्यापक प्रचार के प्रति गंभीर है तो, इस वैज्ञानिक विधि को क्यों न अपनाए? शुरू-शुरू में यह कुछ महंगी पड़ सकती है, पर इससे समय की जो बचत होगी, अन्ततोगत्वा वह इसको सस्ता भी सिद्ध करेगी।

मेरी लाइपजिग यात्रा एक और कारण विशेष से महत्त्वपूर्ण रही। जिन दिनों मै लाइपजिग में था उन्हीं दिनों गेटे के संपूर्ण 'फाउस्ट' का मंचीकरग नगर की सबसे बड़ी नाट्‌यशाला में हो रहा था। मुझे बताया गया ऐसा अवसर दस- बारह बरस के अंतराल पर आता है। पूर्ण 'फाउस्ट' के अभिनय में लगभग बारह घंटे लगते हैं 1 शाम से खेल शुरू होता है और सारी रात चलता है तीन-तीन घंटे वाद आधे-आधे घंटे के इन्टरवल होते हैं। इसे मैं अपना परम सौभाग्य समझता हूँ कि मैं पूर्ण 'फाउस्ट' का मंचीकरण देख सका! मैं 'फाउस्ट' के अनुवाद को अंग्रेजी में  कई वार पढ़ चुका था, इस कारण नाटक को समझने में मुझे कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई। क्या अभिनय, क्या साज-सज्जा, क्या दृश्य-परिवर्तन, वया भव्य प्रदर्शन, क्या प्रकाश-व्यवस्था- सब कुछ अद्‌भुत था। जनता का तीन-तीन घंटे तक समाधि लगाकर बैठना, न हिलना-डुलना, न चूँ करना (किसी की छींक-खांस भी मैंने नहीं सुनी) कम अदभुत नहीं था। एक-एक सीट भरी थी। योरोप का यूनान-युग से लेकर मध्ययुग तक का सारा इतिहास ही रंगमच पर होकर गुजर गया।

कल्पना करना कठिन है कि कितने सौ अभिनेताओं ने इस विराट प्रदर्शन में भाग लिया होगा। और हर इन्टरवल पर और नाटक की समाप्ति पर जनता ने अभिनेताओं के अभिनंदन में जो तालियाँ बजाई, जो हर्ष-ध्वनि की, हेल-हेल' जो उत्साह दिखाया वह मेरे अनुभव में न पहले आया था, न बाद को कभी आया।

ऐसी जनता के बीच होना उल्लास के समुद्र में स्नान करने जैसा था। धन्य है वे लोग जो अपने कलाकारों का सम्मान करते हैं, उनके प्रति कृतज्ञ होते हैं। उनके बीच उच्चकोटि के कलाकार न जन्म लेंगे तो कहाँ लेंगे।

लाइपजिग से कार से हम लोग वाइमार आए। मैं वाइमार में विशेष प्रभावित हुआ गेटे और शिलर के सग्रहालय और स्मारक देखकर। गेटे अभिजात वर्ग के थे राज्य-सम्मानित भव्य भवन में रहनेवाले, भव्य जीवन बिताने वाले। वे जिस घर में रहते थे--महल ही है उसी में अब उनका संग्रहालय है। उनके जीवन-सृजन से संबद्ध छोटी से बड़ी चीजें तक संकलित सुसज्जितस सुव्यवस्थित। गेटे और शिलर में घनिष्ठ मित्रता थी और वसीयत के अनुसार दोनों के शव लोहे के मुहरबंद ताबूतों में एक चबूतरे पर अगल-बगल रक्खे हैं।

वाइमार से कुछ ही दूर पर हिटलर ने बुखेनवाल्ड कन्सन्टेरशन कैम्प बनाया था। प्राकृतिक दृश्य यहाँ का बड़ा ही मनोरम है, धीरे-धीरे उठती जमीन आगे चलकर चौरस हो गई है, कुछ दूर पर वनाली आरंभ होती है, लंबे, शायद देवदार के, वृक्ष हरी प्राचीर-सी उठाए हुए हैं। प्रकृति और संस्कृति की इस रंगस्थली को हिटलर ने क्यों अमानुषी अत्याचार ढाने के लिए चुना था! बताते हैं, यहाँ दो लाख यहूदी बंदी थे जिनमें से साठ हजार को जान से मार दिया गया था। फाटक पर जर्मन में एक मोटो था जिसका अर्थ अंग्रेजी में होता है—to everyman his due - हर व्यक्ति को उसका प्राप्तव्य-और यहाँ के हर व्यक्ति का प्राप्तव्य था, कठिन श्रम, भूख, प्यास, गाली, मार, मृत्यु। बंदियों को भारी पत्थरों से लदी गाड़ियां खींचनी पड़ती थीं, जिनको singing cart कहा जाता था। बंदी खींचते-खींचते गिरते, कोई खाते, दम तोड़ देते थे। सामूहिक मृत्यु के गैस चेम्बर थे, सामूहिक फाँसी के हाल थे जिनमें बंदियों को अपने हाथों से गले में फंदा डाल झूल जाना पड़ता था, जो झूलने पर भी न मरते थे उन्हें मुँगरियों से पीटा जाता था, फिर मरों-अधमरों को उतार कर बिजली की भट्ठियों में झोंक दिया जाता था, ये भट्ठियाँ आज भी मौजूद हैं और इनके निकट जाने पर जलते मनुष्य मांस की काल्पनिक चिरायेंध से भी उबकाई आने लगती है। जिस दिन बुखेनवाल्ड कैम्प देखने गया था उस दिन मुझसे खाना नहीं खाया गया। गैस पी, गोली खा अथवा फाँसी लगा मर जाना तो निश्चय ही कैम्प का सुखद अनुभव रहा होगा। मनुष्य को दमित, पीड़ित, पराजित अपमानित करने के जिन क्रूर से क्रूर, पाशविक से पाशविक कृत्यों की कल्पना की जा सके, वे सब वहाँ किए गए थे, कुछ कल्पनातीत भी। उनकी बात सुनकर आदमी हहर उठता है। अगर सभ्यता और संस्कृति में कुछ भी नैतिक बल बाकी हो तो उसे देखना चाहिए कि संसार का कोई देश अब कभी फासिस्टी शिकंजे में न आने पाए।

वाइमारसे लौटकर मैं फिर ईस्ट बर्लिन आया। वहाँ मिनिस्ट्री आफ कल्चर की ओर से मुझे बिदा भोज दिया गया, कुछ साहित्य भी भेंट किया गया उसमें १९२४ में जर्मन में लिखी गांधी जी पर डॉ० जाकिर हुसेन की पुस्तक की फोटो प्रतिलिपि भी थी। उस समय वे डाक्टरेट लेने के लिए बर्लिन में शोध कार्य कर रहे थे। जर्मन में गांधी जी पर लिखी वह प्रथम पुस्तक थी।

लौटते समय एक समस्या खड़ी हो गई। मेरा टिकट फ्रैंकफर्ट होकर था और वहाँ के लिए मुझे वेस्ट बर्लिन से जहाज पकड़ना था. मुझे ईस्ट बर्लिन से वेस्ट बर्लिन भेजने को कोई तैयार न था, मेरा टिकट बदलवा कर वे मुझे मास्को से भेज सकते थे। एक भारतीय मित्र ने वेस्ट बर्लिन से एक टैक्सी मँगवाई और उसमें बैठकर मैंने हिन्डेनबर्ग गेट पर ईस्ट-वेस्ट बर्लिन के बीच विमाजन रेखा पार की। एक-एक चीज की तलाशी दोनों ओर हुई, पर मेरे पास कुछ आपत्तिजनक न था, सिवा एक दूरबीन के, जो ईस्ट जर्मनी में मुझे भेंट स्वरूप मिली थी। उसे रास्ते में न निकालने की शर्त पर मैं वेस्ट बर्लिन हवाई अड्डे पर भेज दिया गया। २७ मई को वेस्ट बर्लिन से फ्रैंकफर्ट और फैंकफर्ट से जहाज बदल मैं बेरूत आया और वहां 3 दिन वीरेन्द्र पाल सिंह और सत्येन्द्र कुमार 'बीना ' का मेहमान रहकर ३१ मई को दिल्ली पहुँचा।

दिल्ली में आग बरस रही थी। पर अपना धर अपना ही घर था। तेजी सकुशल थीं, अकेली छोड्‌कर गया था, पर ये बहादुर हैं। बच्चे दोनों कलकत्ते में थे, पहले ही दिन उनसे ट्रंक पर बात बार ली। जी खुश हो गया। 'जो सुख छज्जू के चौबारे, वह न बलख न बुखारे।' यह कहावत जब बनी होगी तब बलख या बुखारा का वैसा ही आकर्षण होगा जैसे आज लंदन या पेरिस का।

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