सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

परमहंस की सीख / कहानी / राम नरेश ‘उज्‍ज्‍वल‘

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स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस आश्रम में बैठे थे। एक शिष्‍य ने जिज्ञासावश पूछा- ”गुरुदेव, ईश्वर का वास कहाँ-कहाँ हैं ?”

परमहंस ने बताया -”हर जगह ईश्वर का वास है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं, जहाँ ईश्वर का वास न हो।”

क्या जीव-जन्‍तुओं में भी भगवान हैं ?” शिष्‍य ने पूछा।

हाँ।’’ सभी जीव-जन्‍तुओं में भगवान हैं, कोई ऐसा जीव नहीं, जिसमें परमात्‍मा का वास न हो।” परमहंस ने बताया।

अच्‍छा।” शिष्‍य उठ कर पानी लेने चला गया। रास्‍ते में उसे हाथी मिला। उस पर महावत बैठा था। वह चिल्‍ला रहा था-”हटो, हटो, अलग हटो। हाथी पागल है। अरे पास मत आओ।”

शिष्‍य ने सोचा-‘हाथी में भी भगवान का वास है और भगवान किसी का बुरा नहीं करता । फिर हाथी मेरा बुरा क्‍यों करेगा ? यह तो साक्षात परमात्‍मा का स्‍वरूप है।‘ वह परमात्‍मा के पैर छूने के लिए आगे बढ़ा। किन्‍तु हाथी ने उसे उठा कर फेंक दिया। वह दूर जाकर गिरा। चोट लग गई। वह क्रोधित हो उठा।

परमहंस के पास आकर बोला-”गुरुदेव, आपने ने मुझसे झूठ क्‍यों बोला ? आपने कहा था, कि हर जीव-जन्‍तु में भगवान होता है, किन्‍तु मैंने स्‍वयं अनुभव किया है, कि यह सरासर झूठ है। सबमें भगवान नहीं होता हैं।”

परमहंस ने पूछा-”क्‍यों, क्‍या हुआ ? ये कहाँ से धूल-धूसरित हो आए ?”

कहाँ से क्‍या ? हाथी ने पटक दिया। आप कहते हैं, हर जीव में भगवान है। मैं हाथी रूपी भगवान के पैर छूने गया, किन्‍तु उसने मुझे सूँड़ में लपेट कर पटक दिया। हर जीव में ईश्‍वर नहीं होता है।” शिष्‍य ने गुस्‍से में कहा।

परमहंस ये घटना सुनकर पहले हँसे, फिर पूछा-”क्‍या हाथी अकेला था ?”

हँसिए मत।” शिष्‍य ने खीझते हुए कहा-”उस हाथी पर महावत भी बैठा था?।”

‘‘क्‍या उसने कुछ नहीं कहा ?’’ परमहंस ने पूछा।

‘‘वह क्‍या कहेगा ? बस फालतू में पागलों की तरह चिल्‍ला रहा था, कि हाथी पागल है, पागल है, अलग हटो।’’

‘‘तो तुम हटे क्‍यों नहीं ?’’ परमहंस ने पूछा।

‘‘मैं क्‍यों हटता ? आपने ही तो कहा था कि पशु-पक्षियों में भी भगवान होते हैं।’’ शिष्‍य ने बताया।

परमहंस बोले-‘‘हाथी में भगवान थे तो हाथी पर बैठे महावत में क्‍या कोई और थे ? उसमें भी तो भगवान ही थे। जब परमेश्‍वर ने खुद महावत के रूप में आकर तुम्‍हें हटने को कहा तो तुम क्‍यों नहीं हटे ? यदि महावत रूपी परमेश्‍वर की बात मान लेते तो तुम्‍हें चोट क्‍यों लगती ? ज्ञान को समझने के लिए विवेक का इस्‍तेमाल आवश्‍यक है।’’

शिष्‍य परमहंस की बात सुनकर मौन हो गया। वह सोचने लगा-‘‘यानी ज्ञान ग्रहण करने के साथ अपने विवेक का भी प्रयोग करना चाहिए।’’

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जीवन-वृत्‍त

नाम ः राम नरेश ‘उज्‍ज्‍वल‘

पिता का नाम ः श्री राम नरायन

विधा ः कहानी, कविता, व्‍यंग्‍य, लेख, समीक्षा आदि

अनुभव ः विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग पाँच सौ

रचनाओं का प्रकाशन

प्रकाशित पुस्‍तके ः 1-‘चोट्‌टा‘(राज्‍य संसाधन केन्‍द्र,0प्र0

द्वारा पुरस्‍कृत)

2-‘अपाहिज़‘(भारत सरकार द्वारा राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से पुरस्‍कृत)

3-‘घुँघरू बोला‘(राज्‍य संसाधन केन्‍द्र,0प्र0 द्वारा पुरस्‍कृत)

4-‘लम्‍बरदार‘

5-‘ठिगनू की मूँछ‘

6- ‘बिरजू की मुस्‍कान‘

7-‘बिश्‍वास के बंधन‘

8- ‘जनसंख्‍या एवं पर्यावरण‘

सम्‍प्रति ः ‘पैदावार‘ मासिक में उप सम्‍पादक के पद पर कार्यरत

सम्‍पर्क ः उज्‍ज्‍वल सदन, मुंशी खेड़ा, पो0- अमौसी हवाई अड्‌डा, लखनऊ-226009

मोबाइल 09616586495

ई-मेल % ujjwal226009@gmail.com 

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