रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

March 2016
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

image

 

आवहु सब मिल रोवहु भारत भाई

हा! हा!! भारत दुर्दशा देखि ना जाई।

 

ये पंक्तियां आधुनिक हिंदी के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘भारत दुर्दशा’ की हैं। भारतीय नवजागरण और खासकर हिंदी नवजागरण के अग्रदूत के रूप में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पहली बार अंग्रेजी राज पर कठोर प्रहार किया था। इसके साथ ही, उन्होंने अंग्रेजों के सबसे बड़े सहयोगी सामंतों पर भी चोट की थी। भारतेंदु का समय भारतीय इतिहास में बहुत ही बड़े उथल-पुथल से भरा था। उनके जन्म के ठीक सात साल बाद अंग्रेजी शासन के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा जनविद्रोह हुआ था-1857 का ग़दर। इस ग़दर ने अंग्रेजों को भीतर से हिला दिया था और इसी के बाद अंग्रेज़ शासकों ने कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अख़्तियार की थी, जिसका विघटनकारी प्रभाव आज तक बना हुआ है।

भारतेंदु ने विदेशी शासन के दुष्प्रभावों और गुलामी की पीड़ा को बहुत ही गहराई से महसूस किया था। देश में आम जन की हालत बहुत ही बुरी थी। बार-बार पड़ने वाले अकालों ने किसानों की हालत खराब कर दी थी। वहीं, अंग्रेजों ने ग़दर के बाद बड़े पैमाने पर दमन चक्र चलाया था। यह देश की अस्मिता को कुचलने का प्रयास था। एक तरफ जहां लोगों में पस्तहिम्मती छाई थी, वहीं विद्रोही राजे-रजवाड़ों का दमन करने के बाद अंग्रेजों ने अपने पिट्ठू देशी शासकों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था। उल्लेखनीय है कि सन् 1793 में ही लार्ड कार्नवालिस ने कृषि के क्षेत्र में स्थाई बंदोबस्त यानी परमनानेंट सेटलमेंट की व्यवस्था लागू कर देश में जमींदारों का एक नया वर्ग तैयार किया था, जो अंग्रेजों के साथ मिलकर ग़रीब किसानों को लूटने में लगा हुआ था। ऐसे में, पहली बार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने साहित्य में जन भावनाओं और आकांक्षाओं को स्वर दिया। पहली बार साहित्य में जन का समावेश भारतेंदु ने ही किया। उनके पहले काव्य में रीतिकालीन प्रवृत्तियों का ही बोलबाला था। साहित्य पतनशील सामंती संस्कृति का पोषक बन गया था, पर भारतेंदु ने उसे जनता की ग़रीबी, पराधीनता, विदेशी शासकों के अमानवीय शोषण के चित्रण और उसके विरोध का माध्यम बना दिया। अपने नाटकों, कवित्त, मुकरियों और प्रहसनों के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजी राज पर कटाक्ष और प्रहार किए, जिसके चलते उन्हें अंग्रेजों का कोपभाजन भी बनना पड़ा।

भारतेंदु के समय में हिंदी का वर्तमान स्वरूप विकसित नहीं हो पाया था। राजकाज और संभ्रांत वर्ग की भाषा फारसी थी। वहीं, अंग्रेजी का वर्चस्व भी बढ़ता जा रहा था। साहित्य में ब्रजभाषा का बोलबाला था। फारसी के प्रभाव वाली उर्दू भी चलन में आ गई थी। ऐसे समय में भारतेंदु ने लोकभाषाओं और फारसी से मुक्त उर्दू के आधार पर खड़ी बोली का विकास किया। आज जो हिंदी हम लिखते-बोलते हैं, वह भारतेंदु की ही देन है। यह अलग बात है कि उस समय से अब तक हिंदी का काफी विकास हो चुका है, पर इसकी आधारशिला भारतेंदु ने ही रखी। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक हिंदी का जनक माना जाता है। सिर्फ़ भाषा ही नहीं, साहित्य में उन्होंने नवीन आधुनिक चेतना का समावेश किया और साहित्य को जन से जोड़ा। भारतेंदु की रचनाओं में अंग्रेजी शासन का विरोध, स्वतंत्रता के लिए उद्दाम आकांक्षा और जातीय भावबोध की झलक मिलती है। सामंती जकड़न में फंसे समाज में आधुनिक चेतना के प्रसार के लिए लोगों को संगठित करने का प्रयास करना उस ज़माने में एक नई ही बात थी। उनके साहित्य और नवीन विचारों ने उस समय के तमाम साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को झकझोरा और उनके इर्द-गिर्द राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत लेखकों का एक ऐसा समूह बन गया जिसे भारतेंदु मंडल के नाम से जाना जाता है।

भारतेंदु का जन्म बनारस के एक समृद्ध व्यवसायी परिवार में 9 सितंबर,1850 को हुआ था। उनके पिता गोपीचंद भी ब्रजभाषा में गिरिधर दास नाम से कविता लिखते थे। इस तरह, साहित्यिक संस्कार उन्हें घर में ही मिले। भारतेंदु ने बहुत ही कम उम्र में ही काव्य रचना शुरू कर दी थी और जल्दी ही साहित्यिक समाज में लोकप्रिय हो गए। बहुत ही कम उम्र में उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उच्च शिक्षा के लिए उनका नामांकन बनारस के प्रसिद्ध क्वीन्स कॉलेज में कराया गया, पर परंपरागत शिक्षा पद्धति में उनका मन नहीं लगता था। यद्यपि कॉलेज की शिक्षा उन्होंने पूरी की, पर स्वाध्याय से अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू और अन्य कई भाषाएं सीखी। उन दिनों बनारस में एक बड़े विद्वान और लेखक राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद थे, जिनके संपर्क में वे लगातार रहे, पर भाषा संबधी उनके विचारों से उनके मतभेद भी थे। भारतेंदु एक ऐसी भाषा के पक्षधर थे जो आम जनता से जुड़ी हो और आसानी से उसे समझ में आए। वे लोकभाषाओं के बहुत बड़े समर्थक थे। अपनी अंतर्दृष्टि से उन्होंने समझ लिया था कि लोकभाषाओं के आधार पर ही हिंदी को एक आधुनिक भाषा के रूप में विकसित किया जा सकता है।

पंद्रह वर्ष की उम्र से ही भारतेंदु ने लेखन शुरू कर दिया था। उसी समय उन्होंने जनता की चेतना के विकास में पत्रकारिता के महत्त्व को समझ लिया था। महज अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिका निकाली जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। उनकी प्रतिभा को नज़रअंदाज करना अंग्रेज शासकों के लिए संभव नहीं था। बीस वर्ष की उम्र में वे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए। लेकिन राष्ट्रवादी विचारों के कारण उन्होंने यह पद जल्दी ही छोड़ दिया और साहित्य रचना में लग गए। 1868 में 'कविवचनसुधा' का प्रकाशन करने के बाद 1873 में उन्होंने ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन' का प्रकाशन किया। उस ज़माने में जब स्त्रियों की शिक्षा और उनके उत्थान के प्रति किसी का ध्यान नहीं था, भारतेंदु ने 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए 'बाला बोधिनी' नामक पत्रिका निकाली। साथ ही, उन्होंने कई साहित्यिक संस्थाओं का भी गठन किया। भारतेंदु की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही थी। देश भर के विद्वानों और लेखकों से उनका संपर्क स्थापित हो चुका था। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने 1880 में उन्हें 'भारतेंदु` की उपाधि प्रदान की।

भारतेंदु बहुमुखी प्रतिभासंपन्न लेखक थे। कम समय में इतने विपुल साहित्य की रचना शायद ही किसी दूसरे साहित्यकार ने की होगी। उनकी किताबों की सूची बहुत ही लंबी है। भारतेंदु ने हिंदी में नाट्य लेखन की शुरुआत की जो उनका खास योगदान है। इसके साथ ही, उन्होंने संस्कृत और अंग्रेजी से भी नाटकों का अनुवाद किया। काव्य के क्षेत्र में भी उन्होंने विपुल रचना की। यह अलग बात है कि कविता में उन्होंने खड़ी बोली का प्रयोग नहीं किया। भारतेंदु ने गद्य लेखन भी किया और साथ ही शिक्षा एवं समाज सुधार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। भारतेंदु अंग्रेजों के शोषण तंत्र को भली-भांति समझते थे। अपनी पत्रिका कविवचनसुधा में उन्होंने लिखा था – जब अंग्रेज विलायत से आते हैं प्राय: कैसे दरिद्र होते हैं और जब हिंदुस्तान से अपने विलायत को जाते हैं तब कुबेर बनकर जाते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि रोग और दुष्काल इन दोनों के मुख्य कारण अंग्रेज ही हैं। यही नहीं, 20वीं सदी की शुरुआत में दादाभाई नौरोजी ने धन के अपवहन यानी ड्रेन ऑफ वेल्थ के जिस सिद्धांत को प्रस्तुत किया था, भारतेंदु ने बहुत पहले ही शोषण के इस रूप को समझ लिया था। उन्होंने लिखा था – अंगरेजी राज सुखसाज सजे अति भारी, पर सब धन विदेश चलि जात ये ख्वारी। अंग्रेज भारत का धन अपने यहां लेकर चले जाते हैं और यही देश की जनता की ग़रीबी और कष्टों का मूल कारण है, इस सच्चाई को भारतेंदु ने समझ लिया था। कविवचनसुधा में उन्होंने जनता का आह्वान किया था – भाइयो! अब तो सन्नद्ध हो जाओ और ताल ठोक के इनके सामने खड़े तो हो जाओ देखो भारतवर्ष का धन जिसमें जाने न पावे वह उपाय करो। प्रख्यात आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है, ”भारतेंदु और उनके साथियों की नीति अंग्रेज शासकों की नीति से बिल्कुल उल्टी थी। अंग्रेज हिंदी को दबाते थे, भारतेंदु उसके अधिकारों के लिए लड़े थे। अंग्रेज हिंदुओं और मुसलमानों में फूट डालकर अपना राज कायम करना चाहते थे, भारतेंदु ने इनके एक होने की अपील की थी। अंग्रेज भारत को खेतिहर देश बनाकर उसे लूटना चाहते थे, भारतेंदु ने इस लूट का पर्दाफाश किया था और देश में कौशल और मशीन संबंधी शिक्षा की मांग की थी।” डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि भारतेंदु युग का साहित्य हिंदीभाषी जनता का जातीय साहित्य है, वह हमारे जातीय नवजागरण का साहित्य है। उस दौरान सिर्फ़ भारतेंदु ही नहीं, बल्कि उनसे प्रेरित होकर कई साहित्यकार सामने आए जिनमें बालकृष्ण भट्ट, राधाचरण गोस्वामी, प्रतापनारायण मिश्र और बालमुकुंद गुप्त प्रमुख हैं, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से और पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कर देश में नवीन चेतना जागृत करने की कोशिश की, जिसका मूल स्वर सामंतवाद और उपनिवेशवाद विरोधी था। भारतेंदु मंडल के इन लेखकों ने व्यंग्य को अपना मुख्य माध्यम बनाया और अंग्रेजी शासन के साथ-साथ सामंती कुरीतियों पर भी कड़ा प्रहार किया। भारतेंदु ने स्वयं कई प्रहसन लिखे जिसमें ‘अंधेरनगरी’ बहुत ही लोकप्रिय है। यह आज भी प्रासंगिक है। इसका प्रमाण यह है कि आज भी इस प्रहसन का मंचन होता है। भारतेंदु ने अंग्रेजों की नीति का खुलासा करते हुए लिखा था –

भीतर भीतर सब रस चूसै, बाहर से तन मन धन मूसै।

जाहिर बातन में अति तेज, क्यों सखि साजन? नहिं अंग्रेज।।

ये तो एक उदाहरण है। अंग्रेजों की शिक्षा नीति किस तरह युवाओं को अपनी जड़ों से काटने वाली थी, किस तरह उन्हें परमुखापेक्षी बनाने के साथ बेरोजगारी की ओर धकेलने वाली थी, इस पर भी भारतेंदु ने लिखा है। भारतेंदु लोक साहित्य का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। उन्होंने लिखा था, “भारतवर्ष की उन्नति के जो अनेक उपाय महात्मागण आजकल सोच रहे हैं, उनमें एक और उपाय होने की आवश्यकता है। इस विषय के बड़े-बड़े लेख और काव्य प्रकाश होते हैं, किंतु वे जनसाधारण के दृष्टिगोचर नहीं होते। इसके हेतु मैंने यह सोचा है कि जातीय संगीत की छोटी-छोटी पुस्तकें बनें और वे सारे देश, गांव-गांव में साधारण लोगों में प्रचार की जाएं। मेरी इच्छा है कि मैं ऐसे गीतों का संग्रह करूं और उनको छोटी-छोटी पुस्तकों में मुद्रित करूं।” जाहिर है, भारतेंदु साहित्य को जन से जोड़ना चाहते थे।

भारतेंदु ने साहित्य के प्रकाशन और उसके प्रचार-प्रसार में अपना काफी धन खर्च किया था। उनका एक सपना था देश में हिंदी के एक बड़े विश्वविद्यालय की स्थापना करना। लेकिन धन की कमी के कारण उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उनके जन्म के डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा बीत जाने के बावजूद हिंदीभाषी समाज उनके सपने को पूरा कर पाने में समर्थ नहीं हो सका है।

भारतेंदु के संपूर्ण लेखन का मूल स्वर साम्राज्यवाद-सामंतवाद विरोधी है। जिन सवालों से भारतेंदु दो-चार होते हैं, जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे आज भी बने हुए हैं। भारत की दुर्दशा कम नहीं हुई है, बल्कि बढ़ती ही जा रही है। देश राजनीतिक तौर पर भले ही आजाद है, पर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण के मकड़जाल से मुक्ति नहीं मिली है। किसानों का शोषण अंग्रेजी राज में जितना होता था, उससे कम आजाद भारत में नहीं हो रहा है। सांप्रदायिकता के जिस ख़तरे के प्रति भारतेंदु ने आगाह किया था, वह आज और भी उग्र रूप में सामने है। ऐसे में, भारतेंदु का लेखन आज और भी प्रासंगिक हो गया है।

विपुल मात्रा और अनेक विधाओं में सृजन करने वाले भारतेंदु की मृत्यु महज 35 वर्ष की उम्र में 6 जनवरी 1885 को हो गई। भारतेंदु अपने समय से बहुत ही आगे थे। साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी। उल्लेखनीय है कि जिस वर्ष उनका निधन हुआ, उसी वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, पर उस समय उसका स्वर साम्राज्य समर्थन का था, जबकि भारतेंदु ने बहुत पहले ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी शोषण का हर स्तर पर प्रतिरोध किया था।

उनके निधन पर सही ही कहा गया – प्यारे हरीचंद की कहानी रह जाएगी।

-----------------------------------------------

image

आज के समय में मुख्यधारा की पत्रिकाएं व अखबार कारपोरेट जगत व सम्राज्यवादी ताकतों के प्रभाव में समाहित हो रही है। इस वजह से देश के चौथे स्तंभ के प्रति पाठकों में संशय उत्पन्न होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में लघु पत्रिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैक्नोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे उतने ही बेहतर ढ़ंग से लघुपत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघुपत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को सुरक्षित रखा है। 

लघुपत्रिकाएं पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं। लघु पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, ये पत्रिकाएं मौलिक सृजन का मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो अथवा ग्लोबलाईजेशन का प्रश्न हो हमारी व्यावसायिक पत्रिकाएं सत्ता विमर्श को ही परोसती रही हैं। सत्ता विमर्श व उसके पिछलग्गूपन से इतर लघु पत्रिकाएं अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता, संघर्षशीलता व सकारात्मक सृजनशीलता की पक्षधर हैं। इन बातों के मद्देनज़र इतना स्पष्ट है कि लघु पत्रिकाओं की आवश्यकता हमारे यहां आज भी है, कल भी थी, भविष्य में भी होगी।  

"धरती" पत्रिका एक प्रतिबद्ध एवं स्तरीय लघु पत्रिका है। आज चकाचौंध वाले इस विमर्शवादी युग में जब अन्य पत्रिकाएं व्यवसायिकता और बाज़ार के प्रभाव में आती जा रही हैं ऐसे वक़्त में भी 'धरती' अपनी विशिष्ट पहचान बचाए हुए है। सादगी, सहजता और जनोन्मुखी स्तरीय सामग्री से समाहित यह पत्रिका अलग से ही पहचान में आ जाती है।  सन १९७९ में 'धरती' पत्रिका का पहला अंक विदिशा जैसी छोटी जगह से प्रकशित हुआ था । उसके बाद कई महत्वपूर्ण अंक धरती ने प्रकाशित किये हैं जिनमें सन १९८० में हिंदी ग़ज़ल विशेषांक, १९८१ में समकालीन जन-कविता अंक, १९८२ में आलोचना अंक, १९८३ में त्रिलोचन  अंक, १९८९ में जनकवि 'शील' अंक, २००० में स्मरण अंक, २००२  में समकालीन जन-कविता विशेषांक, २००६ में शलभ श्रीराम सिंह  अंक, २००९ में 'साम्राज्यवादी संस्कृति बनाम जनपदीय संस्कृति' अंक एवं २०११ में 'कश्मीर केन्द्रित' अंक उल्लेखनीय हैं। 

'धरती' पत्रिका का हिंदी साहित्य में न केवल विशिष्ट योगदान है बल्कि विद्यार्थियों के  लिए सदैव इसकी शोधपरक आवश्यकता रही है। 

१९७९ में धरती पत्रिका का पहला अंक विदिशा जैसी छोटी जगह से प्रकशित हुआ. यह प्रवेशांक था और इसकी अपनी सीमायें थीं..अंक छोटा था सामग्री सीमित. लेकिन 'नई दुनिया' इंदौर के रविवारीय परिशष्ट में स्वर्गीय सोमदत्त ने इसकी चर्चा की। संपादक की दृष्टि और लगन से यह लग रहा था कि भविष्य में यह पत्रिका अपना मुकाम बना सकेगी। इसके एक वर्ष बाद कवि-गीतकार जगदीश श्रीवास्तव के संयुक्त संपादन में पत्रिका का हिंदी ग़ज़ल अंक प्रकाशित होता है। इस अंक में कुछ अधिक परिपक्वता दृष्टिगत होती है। अधिकांश महत्त्वपूर्ण गज़लकारों की गज़लें इसमें आती हैं और ग़ज़लों के ऊपर कुछ आलेख भी इसमें प्रकाशित होते हैं। हिंदी जगत में इसका स्वागत भी होता है और सराहना भी। कई हिंदी अख़बारों और पत्रिकाओं में इस अंक का जिक्र होता है। इस अंक का लोकार्पण विदिशा के म्युनिसिपल हाल में सुप्रसिद्ध चित्रकार भाऊ समर्थ के हाथों सम्पन्न होता है। इसके बाद 'धरती' का समकालीन कविता अंक नांदेड, महाराष्ट्र से प्रकाशित होता है। इस अंक से 'धरती' एक सुनियोजित व परिपक्व पत्रिका बन कर सामने आती है। इस अंक का देश के सभी भागों में बहुत गर्मजोशी से स्वागत होता है। इस अंक में कई महत्त्वपूर्ण कवियों कि कवितायेँ, अनुवाद और स्तरीय आलेख प्रकाशित होते हैं। हिंदी और मराठी पत्र-पत्रिकाओं में इसकी पर्याप्त चर्चा होती है। धरती पत्रिका का सर्वाधिक चर्चित अंक सन १९८३ में इलाहबाद से प्रकाशित होता है। यह कवि त्रिलोचन के कृतित्व पर केन्द्रित होता है। इस अंक में "स्थापना" के अंकों के बाद त्रिलोचन पर महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत की गई थी। हिंदी जगत की अधिकांश लघुपत्रिकाओं यथा पहल, समवेत, धरातल, कदम से लेकर सारिका, दिनमान और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं  में इस अंक की चर्चा होती है। त्रिलोचन अंक के पश्चात् 'धरती' हिंदी साहित्य की गिनी चुनी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में शामिल हो जाती है। तदुपरांत कानपुर से 'धरती' के तीन सामान्य अंक प्रकाशित होते हैं जिनसे धरती की अपनी पहचान बनी रहती है। 

कानपुर प्रवास के दौरान ही शैलेन्द्र चौहान जन कवि मन्नूलाल शर्मा (त्रिवेदी)  'शील' के घनिष्ठ संपर्क में आते हैं और उनपर धरती का एक अंक निकालने का मन बना लेते हैं। यहां परेशानी यह होती है कि अधिकांश प्रगतिशील-जनवादी धारा के स्थापित रचनाकारों के पास शील जी की रचनाएँ उपलब्ध नहीं होती हैं या उन्होंने पढ़ी नहीं होती हैं। अतः उन पर लिख पाना संभव नहीं हो पाता। दो वर्षों के लगातार प्रयत्नों के बावजूद जब शील जी पर कोई रचनाकार लिखने को तैयार नहीं हुआ तो शैलेन्द्र, धरती में सिर्फ और सिर्फ शील जी की रचनाएँ प्रकाशित करते हैं। उनकी चुनी हुई कवितायेँ, कुछ कहानियां और कुछ लेख। मंतव्य यही कि जिन लोगों ने शील जी को पढ़ा नहीं  कुछ उनकी सहायता ही की जाये। कोटा में भारतेंदु समिति हाल में औपचारिक रूप से इसका लोकार्पण सम्पन्न होता है जिस आयोजन में बावजूद अस्वस्थता के स्वयं शील जी अपने भतीजे के साथ शामिल होते हैं। अंक का लोकार्पण कथाकार हेतु भरद्वाज द्वारा किया जाता है और एक बहुत ही अच्छा पत्र-आलेख सुप्रसिद्ध कवि ऋतुराज प्रस्तुत करते हैं। इस आयोजन में राजस्थान के सभी भागों से कवि-लेखक उपस्थित होते हैं, स्थानीय रचनाकार तो थे ही। इस आयोजन में शिवराम और महेंद्र नेह की भागीदारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है, शैलेन्द्र जी का कहना है कि उनके बिना यह कार्यक्रम संभव नहीं हो सकता था। यह सन १९८९ की बात है। 

इसके उपरांत कोई एक दशक तक धरती का प्रकाशन स्थगित रहता है, शायद व्यक्तिगत-पारिवारिक उत्तरदायित्वों के चलते।   सन २००० में नागपुर से एकाएक स्मरण अंक प्रकाशित होता है जिसमे हिंदी के महत्त्वपूर्ण रचनाकारों-आलोचकों की स्थायी महत्व की रचनाएँ शामिल होती है। शैलेन्द्र जी की यह विशेषता है कि वह अपने कार्यों का बहुत प्रचार और विज्ञापन नहीं करते और चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। इस अंक का जोरदार स्वागत होता है। नागपुर के हिंदी अंग्रेजी सभी अखबारों में इसका जिक्र होता है। तदुपरांत नागपुर से ही धरती का समकालीन जन कविता अंक प्रकाशित होता है। इस अंक में अनेकों समकालीन रचनाकारों की कवितायेँ शामिल होती हैं। उदय प्रकाश की एक कविता धरती से साभार लोकमत समाचार पत्र में प्रकाशित होती है और वह इतनी पसंद की जाती है की उदय प्रकाश को पहल सम्मान मिलने के लिए रास्ता प्रशस्त कर देती है। नागपुर के बाद इंदौर से 'धरती' का शलभ श्रीराम सिंह अंक सन २००६ में प्रकाशित होता है। इस अंक में शलभ जी का वस्तुपरक और सम्यक मूल्यांकन प्रस्तुत किया जाता है, महिमामंडन भर नहीं। शैलेन्द्र की सम्पादकीय दृष्टि और सूझ-बूझ यहाँ भली भांति परिलक्षित होती है। इस अंक पर 'कृत्या' नामक साहित्यिक वेब पत्रिका की टिपण्णी इस प्रकार है -"शलभ" श्री राम सिंह की कविताएँ ठेठ कस्बई अनुराग से प्लावित होने के कारण ऐसी भाषा में संवाद कर पाती हैं जो केवल अपने लोगों की हो सकती है। शलभ की कविता उस आग की तपन लिए है जो सीधे सीने से निकलती है। 'अभी हाल में ही अनियमित कालीन पत्रिका धरती ने शलभ पर एक विशेषांक निकाला। कृत्या उसी में कुछ कविताओं का चयन कर एक प्रमुख लेख देना चाहेगी। इस के लिए हम "धरती" पत्रिका के आभारी हैं।' 'लेखन' पत्रिका इलाहबाद) ने इस अंक पर विस्तार से चर्चा की। अब २००९  में जयपुर से धरती का 'साम्राज्यवादी संस्कृति बनाम जनपदीय संस्कृति' विषय केन्द्रित अंक निकालता है। यह अंक  बेहद सुगठित और स्तरीय सामग्री के साथ आता है। साहित्य और सामाजिक   विज्ञान के गंभीर छात्रों के लिए एक सन्दर्भ ग्रन्थ की भांति उपयोगी है। धरती का पन्द्रहवां अंक २०११ में कश्मीर की आतंरिक स्थिति एवं भारत की उलझन विषय को केन्द्रित कर प्रकाशित हुआ। इसमें कश्मीर की अंदरूनी स्थितियां एक परिचर्चा के माध्यम से प्रस्तुत की गई हैं, जिसमें कश्मीर का दर्द और वहां के हालत बखूबी बयान  किये गए हैं। लोगों की जानकारी के लिए कश्मीर का संक्षिप्त इतिहास भी दिया गया है। सम्पादकीय, वस्तुस्थिति का परिचायक है और हमारी संवेदना को झकझोरता है। अंक में कुछ अन्य सामग्री भी समाहित है। कला का वजूद, मराठी कविताओं का अनुवाद, कवितायें, आलेख एवं पुस्तक समीक्षा भी समाहित है। यह अंक भी धरती की पूर्व प्रकृति की तरह ही यथेष्ट गंभीर, स्तरीय एवं संग्रहणीय है। 

धरती का ताजा अंक भारतीय मीडिया की वास्तविक भूमिका और जनसरोकारों पर केन्द्रित है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण अंक है। इसमें मीडिया विषयक कई सचाई दर्शाने वाले आलेख तो सम्मिलित हैं ही तीन अल​ग-अलग पीढ़ी के कवियों की अच्छी कवितायें भी सम्मिलित हैं। शैलेन्द्र चौहान का सम्पादकीय अत्यंत गंभीर है और समाज, मीडिया, कॉर्पोरेट जगत तथा सत्ता के रिश्तों को बखूबी उजागर करता है वहीँ राजेंद्र यादव के नाम उनका पत्र राजेंद्र जी के वैचारिक खोखलेपन को उद्घाटित करता है। कुल मिला कर यह अंक मीडिया का सच जानने के लिए एक मील का पत्थर है। 

 

मानविकी संकाय,

राष्ट्रिय प्रौद्योगिकी संस्थान,

वारंगल (आ. प्र.)

यह शायद पहला मौका होगा जब पहाड़ी कोरवा आदिवासियों के जीवन में इतनी सारी खुशी उनके हिस्से में आयी है. अब से पहले तक उपेक्षा और तकलीफ के सहारे उनकी जिंदगी बसर हो रही थी. जंगलों पर निर्भर रहने वाले ये पहाड़ी कोरवा की चिंता करती तो हर सरकार दिखती लेकिन कागज पर और यह पहली पहली बार हुआ है जब कागज नहीं, बात नहीं बल्कि सच में उनके हक में कुछ दिखाया है तो राज्य की रमन सरकार ने. राज्य सरकार ने इन आदिवासियों की जिंदगी बदलने के लिए शिक्षा से रोजगार और कोठी में अनाज से लेकर स्वच्छता तक का ध्यान रखा है. अब कोई आदिवासी खुले में शौच के लिए नहीं जाता है और न ही किसी आदिवासी को जंगल में खाने की तलाश करने की जरूरत है. आदिवासी बच्चियों के लिए शिक्षा का रास्ता खुल गया है तो युवा आदिवासियों को रोजगार मिलने लगा है. 

बेहद ही गरीबी में पले बढ़े मंगल सिंह ने कभी सोचा भी नही था कि एक दिन वह खुद की मोटर साइकिल चलायेगा और तीर धनुष की जगह उसके हाथों में मोबाइल रहेगा। घर में कलर टीवी रखेगा और आराम से अपना जीवन बितायेगा। उसे तो लगता था कि बड़े होकर उसे भी हाथों में तीर कमान पकडक़र जंगल में चार,तेंदू तोडऩे, महुआ बीनने जाना पड़ेगा।  जब तक हाथ में कोई नौकरी नही थी,पहाड़ी कोरवा मंगल का दिन जंगलों में घूमते फिरते गुजरता था। लेकिन छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पहाड़ी कोरवाओं सहित राज्य के विशेष पिछड़ी जनजाति पांचवीं और आठवीं पास युवकों को चतुर्थ श्रेणी पद पर शासकीय नौकरी देने की पहल ने  कोरबा जिले के अनेक पहाड़ी कोरवाओं की तस्वीर और तकदीर ही बदल दी। शासकीय सेवा में आने के साथ ही इनके जीवनयापन का तरीका तो बदला ही, जंगलों के आसपास रहने की वजह से अपना पूरा दिन जंगल में ही इधर उधर घूम-फिरकर  बिताने की मानसिकता भी बदल गई। शिक्षा एवं विकास की मुख्यधारा से दूर रहने की सदियों से बनी एक तरह की धारणा इनके दिमाग से दूर होने के साथ-साथ नौकरी ने इन्हें और आगे बढऩे के लिये प्रेरित किया। अब नौकरी मिलने के बाद आठवी पास पहाड़ी कोरवा मंगल सिंह खुद भी इस साल दसवी की परीक्षा दे रहा है और अपने सभी बच्चों को रोजाना स्कूल भेजता है। परिवार को भी खुशहाल रखता है।

कोरबा विकासखंड के वनांचल ग्राम आंछीमार में रहने वाले 15 सदस्यों दो पहाड़ी कोरवा भाईयों ने अपने परिवार के लिए तय किया भले ही कुछ कमरे न बन पाये,लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी शौचालय है। पहाड़ी कोरवा भाईयों ने लगभग 40 हजार रूपये खर्च कर अपने ही घर के पीछे शौचालय का निर्माण कराया। परिवार के सभी सदस्य अब इस शौचालय का उपयोग करते है। गांव में पहाड़ी कोरवा परिवार की इस सोच ने कुछ अन्य लोगों को भी सीख दी है। कुछ परिवार है जो स्वयं के पैसे से अपना घर संवारने के साथ ही शौचालय निर्माण भी करा रहे है। बहोरन सिंह ने बताया कि कुछ समय पष्चात भले ही सरकार की ओर से नि:शुल्क में शौचालय बन जाता,लेकिन हमने इंतजार नही किया। शौचालय के महत्व को जानने के बाद उसे भी आभास हुआ कि सचमुच शौचालय तो हर घर में बहुत जरूरी है। उसने अपने भाई से बात किया और दोनों ने शौचालय निर्माण में आने वाले खर्च को बराबर हिस्से में बांट कर काम शुरू कराया। आज घर परिवार के सभी सदस्य उस शौचालय का उपयोग करते है।

      पहाड़ी कोरवा परिवारों की जिंदगी गुलाबी गुलाबी हो गई है. अन्त्योदय गुलाबी राशन कार्ड ने इनकी जिंदगी के मायने ही बदल दिए हैं. एक समय वह भी था जब हर दिन खानाबदोश की तरह भोजन की तलाश में पहाड़ी कोरवा परिवारों को भटकना पड़ता था। आज वे आराम से अपने घरों में रहते हैं. आज इस गुलाबी राशन कार्ड से सभी पहाड़ी कोरवा परिवारों को एक रूपये की दर से प्रतिमाह 35 किलो चावल मिल जाता है। इससे घर के चूल्हे भी जल जाते हैं और भूखे पेट सोने की नौबत भी नहीं आती। शासन ने इनकी सुध ली। एक स्थान पर ही ठहराव के लिए आशियाना बनाकर दिया। शिक्षा से जोडऩे स्कूल खोले। आंगनबाड़ी खोला गया। अंधेरा दूर करने के लिए जहां तक संभव था सडक़, बिजली पहुंचाई गई और दुर्गम इलाकों में सौर उर्जा के माध्यम से इनके बसाहटों को रोशन किया गया। आर्थिक रूप से कमजोर कोरवाओं को बचत से जोडऩे एवं कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराकर इनके आर्थिक बोझ को कम करने की दिशा में शासन द्वारा सभी कोरवा परिवारों का अन्त्योदय गुलाबी राशन कार्ड बनाया गया है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2012 अन्तर्गत प्रत्येक माह के 7 तारीख को चावल उत्सव के समय 1 रूपये की दर से 35 किलो चावल दिया जाता है। ग्राम छातासरई के पहाड़ी कोरवा पाकाराम ने बताया कि अभी भी अनेक कोरवा हैं जो जंगल जाते हैं। इंदिरा आवास बनाये जाने से अब निश्चित ठिकाना बन गया है, पहले तो बस भटकते रहते थे। उसने बताया कि वे हर माह उचित मूल्य की दुकान में एक रूपए चावल नि:शुल्क दिए जाने वाले अमृत नमक और कम कीमत पर मिलने वाले शक्कर, मिट्टी तेल, चना के पैकेट लेने नीचे आते हैं।

उच्च शिक्षा की राह में अग्रसर हुई पहाड़ी कोरवा छतकुंवर की उड़ान अब चाहे जहां पर थमे। लेकिन उसके इस कदम से कोरवा जनजातियों की उन बालक-बालिकाओं को भी आगे पढ़ाई करने की प्रेरणा मिलेगी जो पांचवीं,आठवीं पढऩे के बाद बीच में ही अपना स्कूल जाना छोड़ देते हंै। लंबे समय तक उच्च शिक्षा से दूर कोरवा समाज की इस बेटी ने 12वीं पास कर कालेज की दहलीज को छुआं है। छात्रा छतकुंवर ऐसे छात्रों के लिये एक मिसाल भी है। इनके पिता बहोरन सिंह ने सिर्फ कक्षा पांचवीं तक ही पढ़ाई किया है। इस गांव से स्कूल की दूरी 6 किलोमीटर और कालेज की दूरी 7 किलोमीटर है। पहाड़ी कोरवा छात्रा कु. छतकुंवर जब हाई स्कूल पहुंची तो मुख्यमंत्री सरस्वती साइकिल योजना के तहत उसे नि:शुल्क साइकिल मिली थी। उस साइकिल से बारहवीं तक की अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रा छतकुंवर अब उसी साइकिल से कालेज भी जाने लगी है। आगे पढऩे और आगे बढऩे की ललक ने छात्रा को जहंा कालेज तक पहुंचाया वहीं सरस्वती साइकिल योजना से स्कूल में मिली नि:शुल्क साइकिल से कालेज का सपना भी पूरा हो रहा है।

यह बदलाव कागज पर नहीं है बल्कि सच का बदलाव है. मंगल हो या छतकुंवर, सबकी जिंदगी बदल रही है क्योंकि सरकार ने इनके प्रति अपनी सोच बदली तो जिंदगी बदल बदल सी गई है. पहाड़ी कोरवा समाज की जिंदगी में बदलाव एक समुदाय की जिंदगी में बदलाव नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में बदलाव की बयार है.

रचना और रचनाकार (१५) सुभाष दशोत्तर की कविताओं में मृत्यु-बोध

डा. सुरेन्द्र वर्मा

सुभाष दशोत्तर मध्य-प्रदेश का एक उदीयमान हिंदी कवि था जो एक स्कूटर दुर्घटना में असमय ही मृत्यु का शिकार हो गया. उसके लिए

शाम और रात का प्रश्न / पैदा ही नहीं हुआ

रोज़ सुबह उसे / एक-एक क़तरा /

आल्पिन से / गिराती रहती थी

और वह / दोपह्रर को / मर गया (पैवस्त यातना, पृ.7)

सुभाष ने मानों मौत को अपनी ज़िंदगी में ही देख लिया था. यही कारण है कि उसके एक मात्र संग्रह, पैवस्त यातना (आरक्त प्रकाशन, उज्जैन, 1976), की अधिकांश कविताएं इसी मृत्यु-बोध को सर्वाधिक रेखांकित करती प्रतीत होती हैं. कवि कहता है –

आकाश कब / इद्र धनुष के रंगों को

लील जएगा / हमें इसका भान नहीं होता

क्योंकि मौत का कोई / मनोविज्ञान नहीं होता (पृ.38)

आदमी का क़तरा-क़तरा मरना और फिर मानों मौत का अचानक घटित हो जाना- सुभाष दशोत्तर ने मृत्यु सम्बंधी इन दोनो ही तथ्यों को अलग-अलग पकड़ा था और उसकी ये दोनो ही अनुभूतियां विरोधाभासी होते हुए भी वैध अनुभूतियां थीं जो मृत्यु की द्वैधवृत्ति का सही वर्णन करती हैं.

मृत्यु सम्बंधी चिंतन भारतीय विचारकों का सदैव ही एक प्रिय विषय रहा है तथा मृत्यु-बोध की एक लम्बी परम्परा है. किंतु इस परम्परा के दो पक्षों में स्पष्ट भेद किया जा सकता है. प्राचीन परम्परा स्वयं जीवन को ही मृत्यु का कारण समझती है और मृत्यु से छुटकारा पाने के लिए भाव-चक्र से ही मुक्त होने का प्रयत्न करती है. न जन्म होगा, न मृत्यु का प्रश्न ही उठेगा. यह परम्परा न चाहते हुए भी जीवन और जगत का निषेध करती है और संन्यास के नाम पर अकर्मण्यता को जन्म देती है. किंतु मृत्यु चिंतन की आधुनिक परम्परा जीवन और जगत का निषेध किए बिना ही मृत्यु की विभीषिका को कम करना चाहती है. मृत्यु इस परम्परा में एक प्राकृतिक सम्वृत्ति न होकर मानव निर्मित दशा है जो अनेक रूपों में अभिव्यक्त हुई है. मृत्यु- दुःख और यातना का दूसरा नाम है और जिस हद तक मनुष्य स्वयं मनुष्य के दुःख का कारण होता है, उस हद तक वह मृत्यु का कारण भी होता है. आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि मनुष्य अब स्वयं ही मृत्यु का कारण बन गया है क्योंकि अभाग्यवश –

--- वक्त / उन लोगों के हाथ में

पड़ गया है / जिन्हें

उसकी पहचान नहीं है. (पृ.9)

और यही कारण है कि

...हम / अपने ही जिस्म के बाहर

खून की तरह / फैलते जा रहे हैं (पृ.14)

मनुष्य अपने निजी और व्यक्तिगत दुःख को झेल पाने में स्पष्ट ही मृत्यु का अनुभव नहीं करता, किन्तु जब प्रश्न सामाजिक दुःख के बर्दाश्त का आता है तो मनुष्य दिन में कई बार मरता है. नहीं तो क्या कारण है कि –

घूंट भर पानी मेरे गले में

बर्फ बन गया... (पृ.16)

शोषण और अन्याय का हर उदाहरण और उससे मुक्त न हो पाने की मजबूरी ही मनुष्य की वास्तविक मृत्यु है. शोषण की इस अवस्था में

अलग-अलग बिखरे हुए हम / शायद

सुबह के लिए छटपटा रहे हों

और हम सभी के / झुके हुए कंधों पर

रात पसरी हुई है... (पृ.58)

कंधों पर पसरी हुई इस रात को – मृत्यु की इस व्यापक छाया को – उतार फेंकना कठिन नहीं. ज़रूरत सिर्फ इस बात की है कि हम अलग-अलग बिखरे न रहें. शोषित शक्तियों का इकट्ठा होना ज़रूरी है. अकेले व्यक्ति का शब्द बहुत दूर नहीं ले जा सकता -

मैंने शब्द जला लिया / मगर उससे / रोशनी

उतनी नहीं होती / जितना अंधेरा है

तीलियों की तरह / बहुत जल्दी जलते हुए शब्द

सिरे की तरफ आ जाते हैं / जहां

आंच तीखी हो जाती है / और हम उसे

अपनी पकड़ से / आज़ाद कर देने के लिए

बेबस हो जाते हैं... (56)

शब्दों से आग का एक निरंतर सिलसिला चाहिए. इसीलिए सुभाष को लगता है कि-

एक लम्बी यात्रा की शुरूआत हो गई (है)

जिसका अंत / देह धर्म के साथ नहीं होगा (43)

सुभाष दशोत्तर का कवि मुख्य्तः मृत्यु का गायक है और मृत्यु उसके लिए शोषण और अन्याय से प्रसूत यातनानुभूति है जिसके निराकरण के लिए उसकी

कविता / रेत में छटपटाती हुई

मछली है जो सरोवर की आस्था को

जन्म देना चाहती है...

--------------------------------------------------------------------------------------------------------

(नया-प्रतीक,)

--

 

सरकारी स्कूल हमारे देश के सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद हैं, ये देश के सबसे वंचित व हाशिये पर पंहुचा दिए गये समुदायों की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. देश की शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण और इसे मुनाफा आधारित बना डालने का मंसूबा पाले लोगों के रास्ते में भी सरकारी स्कूल सबसे बड़ी रूकावट हैं. तमाम हमलों और विफल बना दिए जाने की साजिशों के बीच इनका वजूद कायम है और आज भी जो लोग सामान शिक्षा व्यवस्था का सपना पाले हुए हैं उनके लिए यह उम्मीद बनाये रखने का काम कर रहे हैं.

नब्बे के दशक में उदारीकरण आने के बाद से सार्वजनिक सेवाओं पर बहुत ही सुनोयोजित तरीके से हमले हो रहे हैं और उन्हें नाकारा,चुका हुआ व अनुउपयोगी साबित करने हर कोशिश की जा रही है. एक तरह से सार्वजनिक सेवाओं का उपयोग करने वालों को पिछड़ा और सब्सिडी धारी गरीब के तौर पर पेश किया जा रहा है. उच्च मध्यवर्ग और यहाँ तक कि मध्यवर्ग भी अब सार्वजनिक सेवाओं के इस्तेमाल में बेइज्जती सा महसूस करने लगे हैं उनको लगता है इससे उनका क्लास स्टेटस कम हो जाएगा. इसकी वजह से सरकारी सेवाओं पर भरोसा लगातार कम हो रहा है. कायदे से तो इसे लेकर सरकार को चिंतित होना चाहिए था लेकिन सरकारी तंत्र ,राजनेता और नौकरशाही इन सबसे खुश नजर आ रहे हैं, चूंकि निवेश और निजीकरण सरकारों के एजेंडे में सबसे ऊपर आ चुके हैं इसलिए सामाजिक सेवाओं में सरकारी निवेश को सब्सिडी कह कर मुफ्तखोरी के ताने माने जा रहे हैं और इन्हें कम या बंद करने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं दिया जा रहा है.

हमारे सरकारी स्कूलों में भी धीरे- धीरे नेताओं, नौकरशाहों ,बिजनेस और नौकरी पेशा लोगों के बच्चों का जाना लगभग बंद हो चुका है, अब जो लोग महंगी और निजी स्कूलों की सेवाओं को अफोर्ड नहीं कर सकते हैं उनके लिए सस्ते प्राइवेट स्कूल भी उपलब्ध हैं इनमें से कई तो सरकारी स्कूलों के सामने किसी भी तरह से नहीं टिकते हैं, लेकिन फिर भी लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की जगह कमतर लेकिन निजी स्कूलों में भेजना ज्यादा पसंद करते हैं. और तो और अब स्वयं सरकारी स्कूल के अध्यापक भी अपने बच्चों को प्राईवेट स्कूलों में भेजने को तरजीह देने लगे हैं. यह स्थिति हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की त्रासदी ब्यान करती है. आज हमारे स्कूल भी हमारे आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी के नए प्रतीक बन गये हैं. सत्ताधारियों की मदद से शिक्षा को एक व्यवसाय के रूप में पनपने के सबूत भी है. यह बहुत आम जानकारी हो चुकी है कि किस तरह से नेताओं, अफसरों और व्यपारियों की गठजोड़ ने सार्वजनिक शिक्षा को दीमक की तरह धीरे-धीरे को चौपट किया है ताकि यह दम तोड़ दें और उनकी जगह पर प्राइवेट क्षेत्र को मौका मिल सके.

इसलिए जब कुछ अपवाद सामने आते है तो वे राष्ट्रीय खबर बन जाते हैं 2011 में इसी तरह की एक खबर तमिलनाडु से आई थी जहाँ इरोड जिले के कलेक्टर डॉ आर. आनंदकुमार ने जब अपनी छह साल की बेटी को एक सरकारी स्कूल में दर्ज कराया तो यह घटना एक राष्ट्रीय खबर बन गयी, स्कूल स्तर पर भी इसका असर देखने तो मिला था कलेक्टर की बच्ची के सरकारी स्कूल में जाते ही सरकारी अमले ने उस स्कूल की सुध लेनी शुरु कर दी और उसकी दशा पहले से बेहतर हो गयी, जाहिर है अगर यह अपवाद आम बन जाये तो बड़े बदलाव देखने को मिल सकता है. शायद इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सितम्बर 2014 में केंद्र सरकार से कहा था जिस तरह से सरकारी मेडिकल कॉलेज सबसे अच्छे माने जाते हैं उसी तरह से सरकार देशभर में अच्छे स्कूल क्यों नहीं खोलती है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी पिछले साल अगस्त में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए यूपी सरकार से कहा था कि जन-प्रतिनिधियों व सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले हर व्यक्ति के बच्चे का सरकारी स्कूल में पढ़ना अनिवार्य किया जाए और इसकी अवहेलना करने वालों पर कड़ी कार्यवाही हो. इस फैसले का आम जनता द्वारा तो खूब स्वागत किया गया लेकिन संपन्न वर्ग की प्रतिक्रिया थी कि पालकों को यह आजादी होनी चाहिए कि उन्हें अपने बच्चों को कहां पढ़ाना है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश के मंत्री और नौकरशाह इ सपर अमल के लिए तैयार नहीं हुए, पिछले दिनों जो खबरें आई हैं उसके अनुसार यूपी सरकार हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल करने की तैयारी में है।

यह एक ऐसा दौर है जब तमाम ताकतवर और रुतबे वाले लोग ‘सरकारी स्कूलों के निजीकरण’ के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं, इसके लिए खुले तौर लाबिंग की जा रही है, यह लोग सरकारी स्कूलों को ऐसा सफ़ेद हाथी बता रहे हैं जो चुका हुआ भ्रष्ट,निष्क्रिय, और बोझ बन चूका है. सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी नाम की कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नुमा एक सामाजिक संस्था है जिसका मानना है कि सरकारी स्कूल भारत के बच्चों की जरूरतों पर खरे नहीं उतर रहे है इसीलिए यह निजी स्कूलों की वकालत करती है और जनमत बनाने का काम करती है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा “स्कूल चयन अभियान” नाम से एक परियोजना चलायी जा रही है जिसके तहत स्कूलों की जगह छात्रों को फंड देने की वकालत जा रही है जिसे वे “स्कूल वाउचर” का नाम दे रहे हैं, उनका तर्क है कि इस वाउचर के सहारे गरीब और वंचित परिवारों के बच्चे भी अपने चुने हुए स्कूलों में पढ़ सकेंगें, जाहिर सी बात है इससे उनका मतलब निजी स्कूलों से है .सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की एक प्रमुख मांग यह भी है कि आरटीई कानून को लेकर उस गुजरात मॉडल को अपनाया जाए जहाँ निजी स्कूलों की मान्यता के लिए जमीन व अन्य आवश्यक संसाधनों में छूट मिली हुई है और लर्निंग आउटपुट के आधार पर मान्यता का निर्धारण होता है। इस साल फरवरी में निजी स्कूलों के संगठन नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स एलांयस (नीसा) द्वारा इसी मांग को लेकर दिल्ले के जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन भी किया गया है जिसमें प्रधानमंत्री से स्कूलों की मान्यता के मामले में गुजरात मॉडल को देशभर मे लागू करने की मांग की गयी थी. दरअसल यह ढील इसलिए मांगी जा रही है क्योंकि लाखों की संख्या में प्राइवेट स्कूल शिक्षा अधिकार कानून के मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं इसलिए उनपर बंद होने का खतरा मंडरा रहा है. दरअसल हमारी शिक्षा व्यवस्था सफ़ेद नहीं बीमार हाथी की तरह है जिसे गंभीर इलाज की जरूरत है लेकिन समस्या यह है कि हर कोई इसका अपने तरह से इलाज करना चाहता है ,यहाँ सूंड और पूंछ की कहानी सच साबित हो रही है और कुछ लोग इस भ्रम को और बढ़ाकर शिक्षा को अपनी दुकानों में सजाना चाहते हैं.

सरकारी स्कूल अगर बीमार हैं तो इसकी जिम्मेदार कोई और नहीं सरकारें हैं, शिक्षा को स्कूलों के एजेंडे से गायब कर दिया गया है और इसकी जगह पर शौचालय, एमडीएम एवं सतत व व्यापक मूल्यांकन प्रणाली (सीसीई) को प्राथमिकता मिल गयी है, सारा जोर आंकड़े दुरुस्त करने पर है, और स्कूल एक तरह से डाटा कलेक्शन एजेंसी बना दिए गये हैं, कागजी काम बहुत हो गया है और शिक्षकों का काफी समय आँकड़े जुटाने व रजिस्टरों को भरने में ही चला जाता है. हर काम के लिए लक्ष्य और निश्चित समयावधि निर्धारित कर दी गयी है हमारे शिक्षकों का सारा ध्यान इसी लक्ष्य को पूरा करने की जोड़-तोड़ लगा रहता है. हमारे स्कूल ऐसे प्रयोगशाला बना दिए गये हैं जहाँ हर कोई विचारों और नवाचारों को आजमाना चाहता है। देश के लगभग 20 फीसदी स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, समुदाय के लोगों की ज्यादा रुचि स्कूल में होने वाली शिक्षा की जगह वहां हो रहे आर्थिक कामों में अपना हिस्सा मांगने में दिखाई पड़ने लगी है. शिक्षकों के लिए किसी भी तरह के प्रोत्साहन की व्यवस्था नहीं है उलटे सारी नाकामियों का ठीकरा उन्हीं के सर पर थोप दिया जाता है.

इन तमाम समस्याओं से जूझते हुए भी हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था अपने आप को बनाये और बचाए हुए है और दौड़ नहीं तो कम से कम चल रही है, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार देश भर में करीब दो लाख सरकारी स्कूल हैं जहाँ 13.8 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं जबकि प्राइवेट स्कूलों में करीब 9.2 करोड़ छात्र पढ़ते हैं, यानी अभी भी सरकारी स्कूल ही है जो तमाम कमजोरियों के बावजूद हमारी शिक्षा व्यवस्था को अपने कंधे पर उठाये हुए हैं और आज भी सबसे ज्यादा बच्चे अपनी शिक्षा के लिए इन्हीं पर निर्भर हैं जिनमें ज्यादातर गरीब और हाशिये पर पहुंचा दिए गये समुदायों से हैं, इसलिए जरूरी है कि इन्हें मजबूत बनाया जाए लेकिन यह काम सभी की सहभागिता और सहयोग के बिना नहीं हो सकता है, इस दिशा में राज्य , समाज शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन समिति आदि को मिलकर अपना योगदान देना होगा। कोठारी कमीशन द्वारा साठ के दशक में ही समान शिक्षा प्रणाली की वकालत की गयी थी . मजबूत सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था हमें उस सपने के और करीब ला सकती है.

प्रसिद्ध संवृतशास्त्री, एडमंड हुस्सर्ल, की यह मान्यता है कि हमारी चेतना अनिवार्यतः विषयोन्मुख होती है. लेकिन जिनकी ओर वह अभिप्रेरित है, वे वस्तुएं ज़रूरी नहीं देश-काल में स्थित वस्तुएं ही हों. सच तो यह है कि ये वस्तुएं हमारी चेतना का विषय हो भी नहीं सकतीं. इनका स्वभाव चेतना के ठीक विपरीत है. हम उन्हें चेतना का विषय केवल इसलिए मानते हैं कि हम अपनी इंद्रियानुभव वाली पूर्वमान्यता से स्वतंत्र नहीं हो पाते. इस पूर्वमान्यता के अनुसार जो भी है वह देश-काल में स्थित है और हमारे इंद्रियानुभव द्वारा हमें प्राप्त है. यदि हम अपनी इस पूर्वमान्यता से स्वतंत्र होकर वस्तुओं को देखें तो पाएंगे कि वस्तुएं नहीं बल्कि वस्तुओं का सारतत्व, उनका अपना आंतरिक स्वभाव, उनकी वह विशेषता जो उन्हें वैसा बनाती है कि जैसी वे हैं - चेतना का विषय होता है. इनका स्वभाव चेतना के स्वभाव से –आत्मा से- अलग नहीं है. हमारी चेतना इन्हीं सार-तत्वों का –संवृतियों का- घर है. शायद इसीलिए हाइडागर ने एक बार कहा था, ‘स्रोत ही गंतव्य’ है.

अमृता भारती भी ठीक संवृतशास्त्रियों की तरह ही मनुष्य को, समाज और दुनिया को और सम्बंधों को, वहीं देखना चाहती हैं जहां उन्हें होना चाहिए. वे अपनी काव्य- रचनाओं में ‘परभाव के अंधेरों से अलग’ वस्तुओं की उनकी मूल या मौलिक प्रकृति के अंतरगत, उनकी अपनी ही रोशनी में देखना जानती हैं,-अपने पूरे वैशिष्ट के साथ.

अमृता जी की दृष्टि अंदर की तरफ है. अतः जब वे स्वयं अपने को –मैं- को देखती हैं तो भी वे उसे अपनी मूल या मौलिक प्रकृति के अंदर ही देखती हैं. वे वाह्य जगत को बहुत कम देख पाती हैं. या तो उसे वे तब देखती हैं जब वह उनके अंदर के निहितार्थ को पहचानने में उनकी सहायता करता है अथवा उनके ‘मैं’ को प्रतिभाषित करता है.

बेशक वाह्य जगत उनके लिए अनजाना नहीं है और न ही उसके प्रति संवेदनशीलता का उनमें अभाव है. वस्तुतः उनकी मुख्य अभिरुचि उस प्रयोजन को पकड़ पाने में है जिसकी ओर सारा जगत, जिसमें वे स्वयं भी सम्मिलित हैं, अग्रसर है/होना चाहिए. यह प्रयोजन क्या है, उसका निश्चित स्वरूप क्या है- यह तो वे नहीं जानतीं, लेकिन वे इतना ज़रूर महसूस करती हैं कि उनके अंदर ही वह उपस्थित है. अपने आंतरिक जगत में उसकी विद्यमत्ता के कारण वह निश्चित ही आत्मिक है और इसी लिए उनके समस्त काव्य का अभिमुखीकरण अध्यात्म की ओर है. यही ‘वह’ है जिसकी तलाश उन्हें अभीष्ट है. ‘तुम’ में भी वे इसी को देखना चाहिती हैं. आत्मा का सम्प्रत्यय उनके काव्य में मम और ममेतर के अद्वैत में इतना उदार हो गया है कि उसमें अन्य या other को स्थान ही नहीं है. कोई पराया नहीं है. सभी अपने हैं. अपने ही आत्म विस्तार में समाहित हैं. मुझमें, तुममे, हममें

सूत-दर-सूत खिसकती हुई / चलती रहती है

विकास की यह यात्रा / बहुत देर तक

(या, अ‍त तक)...पर उद्देश्य,

वह तो कभी परिभाषित नहीं होता यात्रा के दौरान

या पूर्ण परिभाष्य नहीं होता

सिर्फ एक दिशा बोध देता है / चलते हुए

और हम अनयत्र नहीं हो पाते.!

(सन्नाटे से दूर तक. पृ.21, इस आलेख में सभी उद्धरण इसी पुस्तक से लिए गए हैं, अतः केवल पृ. संख्या का ही उल्लेख किया गया है)

पर भाव के अंधेरों से अलग अमृताभारती अपनी कविताओं में स्व की तलाश प्रायः दो विरोधी पदार्थों को आमने-सामने रखकर करती हैं जिनमें एक वह प्रयोजन होता है जिसकी उपलब्धि अभीष्ट है और दूसरा वह अवरोध है जो लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा बनता है. पर-भाव और स्व-भाव भी ऐसे ही दो विरोधी सम्प्रत्यय हैं. स्व-भाव की तलाश में पर-भाव बाधक है- शरीर मृत्यु से बंधा है, मन अज्ञान से और प्राण दुःख से बंधा है. (पृ.87) इसी प्रकार अन्य विरोधी द्वंद्व भी हैं,- प्रकाश-अंधकार, श्वेत-श्याम, अंदर-बाहर, दिगम्बरता-वस्त्रता, अनन्यता-अन्यता, शाश्वत-क्षणिक, आदि. ऐसा ही एक द्वंद्व/द्वैत भूत-भविष्य भी है.

विगत को बेशक पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता. लेकिन मनुष्य का यह विगत, यह भूत, उसके आत्म विकास/विस्तार में कितना बाधक हो सकता है, इसका अंदाज़ मुश्किल है. हम अपने अतीत को कितना ही भुलाने की कोशिश क्यों न करें –मुर्दा ज़मींदोज़ ही क्यों न कर दें- वह उखड़ आता है या प्रायः उखाड़ दिया जाता है. हम जानते हैं कि मुर्दा अब उग नहीं सकता, लेकिन लोग अपने कटाक्षों से –अपनी लहलहाती हंसी से, उसे हवा और पानी देते रहते हैं. –

वे मुर्दा उखाड़ लाए थे / और कफन हटाकर

बात कर रहे थे / उसकी गुलाबी नसों की

मुर्दा अब उग नहीं सकता था

पर वे उसे दे रहे थे हवा और पानी...

अपनी लहलहाती हंसी- (पृ. 55)

अमृता भारती के लिए विगत को बार-बार स्मरण करना ‘धरती में समा जाने की शर्म’ तो है ही किंतु ‘मिट्टी के साथ एक हो जाने की गरिमा भी’ इसमें निहित है. भूत को इस प्रकार हम सृजन के परिप्रेक्ष्य में स्वीकार कर सकें तो भूत और भविष्य का विरोधी स्वर स्वतः समाप्त हो जाता है. यही है ‘विरुद्धों का सामंजस्य.

अमृता भारती द्वैतों के इस समन्वय की आकांक्षी हैं. द्वैत के दो विरोधी क्षण अपने तीसरे क्षण में सामंजस्य स्थापित कर एक नया सृजन करते हैं. अमृता जी बार-बार इस तीसरे क्षण की हमें याद दिलाती हैं –कभी यह तीसरा क्षण तीसरा-समय हो जाता है तो कभी तीसरा-घर. कभी वे तीसरे-आदमी में इसकी पहचान करती हैं. एक औरत है जो सिर्फ शरीर है (भले ही उसमें गर्भाशय भी क्यों न हो), एक औरत है जो सिर्फ मन है, हृदय है - लेकिन दोनों ही ये औरतें वास्तविक सृजन नहीं कर पातीं. इसके लिए उन्हें एक तीसरे (आध्यात्मिक / सृजनशील‌) क्षण की ज़रूरत होती है. एक तीसरे आदमी की औरत होने की ज़रूरत है. अपनी कविता, ‘एक असंदर्भ’, में अमृता भारती तीसरे आदमी के मिस उस द्वंव्दात्मक प्रक्रिया की ही बात करती हैं जो दैहिक-आध्यात्मिक क्षणों में सम्पन्न होती है.

तीसरा घर, कविता भी इसी द्वंद्वात्मक-प्रक्रिया से गुज़र कर अपना अभीष्ट प्राप्त करती है. पहला वह घर है जहां पूरी तरह परतंत्रता है, जहां व्यक्ति अपनी सहज इच्छाएं तक व्यक्त नहीं कर पाता. यहां ऊंची दीवाल है- कहीं कोई ऐसा आला भी नहीं कि एक फूल भी रख सकें. दूसरे घर में इच्छाओं को बस व्यक्त कर सकने का अवकाश भर है, इससे अधिक और कुछ नहीं. लेकिन तीसरा-घर वह पूर्ण स्वतंत्रता का क्षण है जहां दीवारें हैं न द्वार. सब जगह, अंदर और बाहर, स्वायत्तता है –यह मेरा तीसरा घर है!(पृ. 96)

तीसरा समय, कविता भी (पृ.53) इसी प्रकार तीन ऐसे क्षणों की बात करती है जिसमें पहले दो विरोधी क्षण तीसरे क्षण में एक रचनात्मक अवकाश ग्रहण करते हैं. एक समय है जो व्यक्ति को बांधता है उसकी आयु से –उम्र जो परछाईं की तरह बढ रही है मृत्यु की ओर. समय का दूसरा क्षण व्यक्तिनिष्ठ न होकर सर्वकालिक और वस्तुनिष्ठ है जो मुझे लांघ जाता है. लेकिन तीसरा समय –वह मेरा होगा. न अंदर न बाहर, न व्यक्तिनिष्ठ न वस्तुनिष्ठ. वह आत्मिक समय सृजन का क्षण होगा जिसे मैं

अपना संदर्भ दूंगी / अपना वास्तविक अर्थ

अपने सपने से जुड़ा हुआ...

अपने अंदर / चाहे जब गतिमय कर दूंगी

वह मेरा अपना शिशु होगा

मेरा अपना सृजन

(पृ. 53-54)

अमृता भारती के आत्म-विस्तार की यह यात्रा बहुस्तरीय यात्रा है जिसमें जहां एक ओर हीगल की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया अपना रूप ग्रहण करती है वहीं अरविंद का विकास क्रम भी कि जिसमें प्रतिविकास की भी अपनी भूमिका है, अरविंद के दर्शन में विकास ध्रुव दिशा से ऊर्ध्व की ओर केवल इसलिए सम्भव हो पाता है क्योंकि नीचे के धरातल को ऊपर से प्रकाश की किरण मिलती है जो उसे ऊर्ध्वगामी विकास के लिए एक नई परिवर्तित ज़मीन पर उठने के लिए प्रेरित करती है.-

मैं सोच रही थी / वह नित्योदित नवीनता

एक क्षण के लिए मिला वह अनुभव

मुक्ति या आत्म-साक्षात्कार का

क्या एक कौंध ही नहीं थी

नई और परिवर्तित ज़मीन पर उतरने के लिए मिली

रोशनी की एक दरार (पृ.17-18)

अमृता भारती मूलतः एक कवियित्री हैं- अर्थात, एक कवि भी और एक स्त्री भी. ये दोनों ही स्थितियां सृजनकामी स्थितियां हैं और ऐसे में वे उस अवकाश की दरकार करती हैं जो पूर्णतः स्वायत्त हो –सभी बंधनों से मुक्त, आत्म-निर्धारित हो. यही कारण है कि उनकी रचनाओं में उनकी अपनी की एक स्वायत्त दुनिया है. इसमें प्रवेश करने के बाद यह अहसास होता है कि तमाम परतंत्रताओं के बीच भी मनुष्य अपनी स्वाधीनता बनाए रख सकता है. मनुष्य निःसंदेह अपने इतिहास और अपने घर (पढें, अपनी काया और कामनाओं) से बंधा है. लेकिन यदि वह चाहे तो इन बंधनों से पलायन किए बिना इन बाधाओं को पार कर सकता है. वह एक ऐसी दुनिया में पदार्पण कर सकता है जहां सृजन के लिए पूर्ण अवकाश हो. अमृता भारती अपनी कलात्मक सृजनशीलता और आध्यात्मिकता में अंतर नहीं करतीं. बल्कि कहना चाहिए, अपनी आध्यात्मिक स्वतंत्रता को कलात्मक सृजनशीलता प्रदान करती हैं. इस सृजनशीलता में जो भी बाधक तत्व हैं उन्हें वे अपनी रचनात्मकता में ढालकर, पिरोकर सृजन का हिस्सा बना देती हैं. यही कारण है कि उनकी अनेक कविताओं में हमें एक अयथार्थवादी तेवर देखने को मिलता है. यह तेवर उनकी कविताओं में एक अनोखा और बेतुका सा स्वप्न-संसार आविष्कृत कर देता है. फिर भी यह एक सर्जनात्मक भाव-बोध को जन्म दिए बिना नहीं रहता. समय का अगला चरण, शीर्षक कविता में अनेक सांस्कृतिक प्रतीकों से बुना हुआ एक मिथक है जिसमें बियावान है, भटके हुए पथ का खोयापन है, दैत्य का घर है, विस्मरण का कोहरा है, समय का भूत है और विशाल शव-वस्त्र है –

मुझे मिला था / बियावन / पेड़ों का अंधा सिलसिला

एक दूसरे पर लदा हुआ / पथ का खोखलापन

और एक बड़े कोटर की तरह / लटका यह घोंसला

जो पक्षी का नहीं / परी कथा के दैत्य का सा

घर लगता है... (पृ.47)

ऐसी अतियथार्थवादी कल्पनाओं में कुछभी तार्किक, देश-काल बद्ध या सामान्य नहीं रहता-

सरसों के खेत में भाग रहा वह पहाड़

पहले ऊंट / फिर सियार

फिर एक थोथा विचार-मात्र रह गया (पृ. 30)

आखिर क्या है यह थोथा विचार ! यही न कि झूठ कितना ही पहाड़ सा, दैत्य सा क्यों न लगे, वह झूठ ही है. यदि हम झूठ को बाधाओं के रूप में देखना छोड़ दें और इस प्रकार अज्ञान से मुक्ति पा लें तो बेशक हमारी ज्ञान की तलवार उन सबको जो आवश्यक नहीं है और जो मेरा नहीं है, काटती चली जाएगी. निर्मल वर्मा का कहना बिल्कुल सही लगता है कि आध्यात्मिक-सर्रियलिज़्म (!) जैसी यदि कोई चीज़ है तो ये दो शब्द अमृता भारती के काव्य-संसार को सर्वाधिक सशक्त रूप से अभिव्यक्त करते हैं. इन कविताओं में जहां एक ओर ऐंद्रिक मांसलता है, वहीं दूसरी ओर अस्तित्वगत विकलता का भी अद्भुत मिश्रण मिलता है.

अमृता जी का अध्यात्म कोई कूटस्थ दर्शन नहीं है. यदि हम कैलाश वाजपेयी का मुहावरा इस्तेमाल करें तो कहा जा सकता है कि वह तत्वाश्रयी-मनोविज्ञान अधिक है. यह सारी मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों को अतीत के अंधकार (अचेतन) से निकाल कर उन्हें उद्घाटित करने का एक उपक्रम है. अपने एकांत में, अपने घर के किसी कोने में ये त्रासद मानसिक ग्रंथियां पवित्रीकरण की प्रक्रिया से गुज़र कर धीरे-धीरे खुलने लगती हैं –

घर के एक कोने में....(जब)

मैं गठरियां खोलने बैठ जाती / बीता हुआ कल

एक गांठ की तरह लग जाता था

और कपासियां / खुलने नहीं देती थीं

अंधेरे का यह ढेर / पर यातना की यह शलाक

पीनते हुए / कातते हुए / मैंने देखा था

गुजल्क शिराएं तंतु की तरह फैलती चली गईं थीं

और हर मैला कण छिटक कर अलग हो गया था

गली खुल रही थी...

बर्फीली ऊंचाइयों पर / धूप की तरह ऊपर जाता समय

पवित्रीकरण की प्रक्रिया को जानता था (प. ५०-५२)

अमृता भारती के काव्य में हमें जहां उनकी मौलिक प्रतिभा की झलक मिलती है, वहीं उनकी अध्ययनशीलता का आभास भी होता है. कहीं संवृतशास्त्र का स्पर्श तो कहीं हीगल का सोच, कहीं अद्वैत का ज्ञान-योग तो कहीं अरविंद का विकास सिद्धांत, कहीं सुर्रियलिज़्म का अटपटापन तो कहीं फ्रायड की अचेतन की धारणा आदि, सभी महत्व- पूर्ण विचार उनके काव्य में अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं. शायद यही कारण है कि उनकी कविताएं सामान्य पाठक की समझ से कभी-कभी दूर हो जाती हैं. किंतु इससे उनका काव्यात्मक गुण बेशक प्रभावित नहीं होता.

-------------------------------------------------------------------------------------------------------

surendraverma389@gmail.com

किसी जमाने में लोग कम हुआ करते थे और दानी-मानी लोगों की संख्या भी कोई कम नहीं थी। वे लोग गांवों-शहरों और कस्बों में धर्मशालाएं बनवाते थे जो आम लोगों के लिए काम आती थी।

यह काम सेवा-परोपकार को साकार करने के साथ ही पीढ़ियों तक पुण्य भी देता था। निष्काम सेवा भावना से किया गया यह परोपकार इतना कालजयी होता था कि दशकों से लेकर सदियों तक ये धर्मशालाएं उनके संस्थापकों व निर्माणकर्ताओं के नाम से मशहूर रहती थीं और इनके प्रति आम लोगों में भी अच्छा भाव हुआ करता था।

कम से कम खर्च में ठहरने और कहीं-कहीं खाने-पीने की सुविधाओं की उपलब्धता से जनजीवन को कई मायनों में राहत और बहुविध सुकून का अहसास होता था। वास्तव में यही धर्म का वह साकार स्वरूप है जो कि अक्षयकीर्ति और श्रेय दिलाता है वहीं पीढ़ियों तक याद रखा जाता है।

आज भी कई जगह दानी-मानियों के नाम से बड़ी-बड़ी धर्मशालाओं का संचालन हो रहा है जिनसे आमजन को सुकून मिल रहा है। जनसंख्या विस्फोट और प्रवृत्तियों के व्यापक विस्तार के आधुनिक दौर में आम इंसान के लिए धर्मशालाओं की संख्या में बढ़ोतरी समय की आवश्यकता थी लेकिन हमारी स्वार्थी और संकीर्ण मनोवृृत्ति ने सेवा-परोपकार और आतिथ्य सत्कार को धत्ता दिखाकर धंधेबाजी मानसिकता को अंगीकार कर लिया।

इसका परिणाम यह हुआ कि धर्मशालाओं का रूपान्तरण होटलों में होता चला गया, पुरानी धर्मशालाओं का अस्तित्व समाप्त हो गया और जो बची-खुची धर्मशालाएं थीं वे जीर्ण-शीर्ण होकर वजूद खो बैठी।

आज सम्पन्न लोगों के लिए सभी जगह आलीशान होटलें, सर्किट हाउस, रेस्ट-गेस्ट हाउस और दूसरे बहुत सारे स्थान उपलब्ध हैं। लेकिन  गरीब आदमी के लिए गांवों-कस्बों-शहरों से लेकर महानगरों तक में ऎसा कोई स्थान नहीं है जहां वह  रात भर रुक कर विश्राम पा सके, नहाने-धोने, पीने के पानी और कम दरों पर भोजन तथा रात गुजारने के लिए बिस्तर की सुविधा उपलब्ध हो।

लोक जीवन में परंपरा में इन धर्मशालाओं ने आम आदमी को ठहरने का सुकून दिया है लेकिन हाल के वर्षों में सदियों पुरानी यह परंपरा खत्म सी हो चली है। होना यह चाहिए था कि गरीब और आम इंसान की  इस जरूरत को ध्यान में रखकर सभी स्थानों पर आवश्यकता के अनुसार धर्मशालाएं होती जहां एक सामान्य इंसान को ठहरने से लेकर रात गुजारने तक की जरूरी सुविधाएं सुलभ होती जिससे कि वह अपनी जिन्दगी के कामों के और अधिक सहूलियतों से पूरा कर सके। पर ऎसा हो नहीं पाया।

हम लोग दुकानदारी और व्यावसायिक मानसिकता में इस कदर उलझते चले गए कि हमने धर्मशालाओं के महत्व को भुला दिया अथवा उनकी जगह होटलें बना डाली या धर्मशालाओं का नामोंनिशान मिटा डाला।

सम्पन्न और अभिजात्य कहे जाने वाले, प्रजा के पैसों पर मौज उड़ाने वाले तरह-तरह के लोगों को यह बात कभी समझ में नहीं अ सकती कि आम इंसान के लिए धर्मशालाओं का महत्व कितना अधिक है।

इसे वह आम इंसान अच्छी तरह समझ और अनुभव कर सकता है जो सामान्य परिवार से संबंधित है अथवा मध्यमवर्गीय परिवार का बाशिन्दा है। आज लोग धर्मस्थलों और भगवान के नाम पर अनाप-शनाप पैसा बहा रहे हैं और धर्म के नाम पर सभी स्थानों पर इतना अधिक कर रहे हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

पर गरीबों, सामान्य वर्ग के लोगों और जरूरतमन्दों के लिए धर्मशालाओं के निर्माण की दिशा में कुछ नहीं हो पा रहा। कलियुग का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि जब वास्तविक धर्म ही संकट में हो वहाँ धर्मशालाओं की बात बेमानी ही है।

आज हम चाहे कितना कुछ कर लें, मानवीय संसाधनों की सेवा और परोपकार, आतिथ्य भाव आदि की दिशा में कुछ न कर पाएं तो इस धर्म का कोई मूल्य नहीं है।

हम नर सेवा नारायण सेवा के केवल नारे ही लगाते रहते हैं, असल में हमने इंसान में भगवान को देखना बंद कर दिया है। या यों कहें कि हमारी आँखों के आगे स्वार्थ का इतना अधिक मोटा काला परदा छा गया है कि हमें अब इंसान की बजाय अपने  स्वार्थ ही दिखने लगे हैं और इसी वजह से हम न इंसान के प्रति सहिष्णु रहे हैं, न धर्म के मूल मर्म को ही समझ पाए हैं।

हम सभी को सोचना होगा कि वास्तव में हम यदि जनसेवा का भाव रखकर मानवता का उत्थान चाहते हैं, आम मानव को सुकून देना चाहते हैं तो हमें अन मानवों के लिए जगह-जगह धर्मशालाओं की स्थापना करनी होगी, इन धर्मशालाओं में बहुत ही कम दरों पर लोक को स्थान देना होेगा ताकि लोक अपने सामान्य जीवन व्यवहार और यात्राओं के अभीष्ट को प्राप्त कर सके।

---000---

  संपर्क:

9413306077

www.drdeepakacharya.com

image

(१)

सूख कर कांटा हो गई नदी,

पता नहीं, किस दुख की मारी है बेचारी ?

न कुछ कहती है,

न कुछ बताती है.

एक वाचाल नदी का -

इस तरह मौन हो जाने का -

भला, क्या अर्थ हो सकता है?

 

(२)

नदी क्या सूखी

सूख गए झरने

सूखने लगे झाड़-झंखाड़

उजाड़ हो गए पहाड़

बेमौत मरने लगे जलचर

पंछियों ने छॊड़ दिए बसेरे

क्या कोई इस तरह

अपनों को छॊड़ जाता है?.

 

(३)

उदास नदी

उदासी भरे गीत गाती है

अब कोई नहीं होता संगतकार उसके साथ

घरघूले बनाते बच्चे भी

नहीं आते अब उसके पास

चिलचिलाती धूप में जलती रेत

उसकी उदासी और बढ़ा देती है

 

(४)

सिर धुनती है नदी अपना

क्यों छॊड़ आयी बाबुल का घर

न आयी होती तो अच्छा था

व्यर्थ ही न बहाना पड़ता उसे

शहरों की तमाम गन्दगी

जली-अधजली लाशें

मरे हुए ढोर-डंगर

 

(५)

नदी-

उस दिन

और उदास हो गई थी

जिस दिन

एक स्त्री

अपने बच्चों सहित

कूद पड़ी थी उसमें

और चाहकर भी वह उन्हें

बचा नहीं पायी थी.

 

(६)

नदी-

इस बात को लेकर भी

बहुत उदास थी कि

उसके भीतर रहने वाली मछली

उसका पानी नहीं पीती

कितनी अजीब बात है

क्या यह अच्छी बात है?

 

(७)

घर छॊड़कर

फ़िर कभी न लौटने की टीस

कितनी भयानक होती है

कितनी पीड़ा पहुंचाती है

इस पीड़ा को

नदी के अलावा

कौन भला जान पाता है ?

--

--  गोवर्धन यादव

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की रचना धर्मिता

नई कविता के समर्थ कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जो एक ओर अपनी निजी कोमल भावनाओं को अपनी कविताओं में अभिव्यंजित करते हैं वहीं दूसरी और आम जन की पीड़ा, आर्थिक विषमता से छटपटाते उनके दु:ख दर्द और अपने समय के यथार्थ को भी अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं. वस्तुत: वे एक ऐसे युग-चेता कवि के रूप में उभरे हैं जिनका भारत की स्वतंत्रता के उपरांत अन्य बुद्धिजीवियों की तरह भारत की सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था के प्रति पूरी तरह मोह भंग हो गया था. वे व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते थे और इसके लिए वे अपने काव्य में जनता का आह्वाहन करते रहे.

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म १५ सितम्बर १९२७ को बस्ती (उ.प्र.) में हुआ था. उनकी आरंभिक शिक्षा बस्ती में ही हुई, किन्तु उन्हें उच्च शिक्षा वाराणसी और इलाहाबाद में मिली. उन्होंने अपनी आजीविका के लिए कई धंधे अपनाए. अध्यापिकी भी की और क्लर्की भी. आकाशवाणी में वे सहायक प्रोड्यूसर रहे. “दिनमान” के उपसंपादक रहे तो “पराग” के सम्पादक भी बने. “दिनमान” के स्तम्भ ”चरचे और चरखे” में उन्होंने मार्मिक लेखन किया. “पराग” में बालोपयोगी साहित्य परोसा. सर्वेश्वर दयाल, अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरे “सप्तक” के कवि हैं. “प्रतीक” में भी वे लिखते रहे. कविता के अतिरिक्त कहानी, नाटक और बाल साहित्य में उनका महत्वपूर्ण योगदान है. सन १९७३ में वे सोवियत संघ के निमंत्रण पर पुश्किन समारोह में सम्मिलित हुए. २४ जनवरी १८८३ को उनका केवल छप्पन वर्ष की अवस्था में आकस्मिक निधन हो गया.

सर्वेश्वर दयाल सदैव एक परिवर्तन-कामी कवि रहे हैं. इसके लिए, ज़ाहिर है, वे आत्मविश्वास को आवश्यक गुण मानते हैं. लीक पर चलना उन्हें पसंद नहीं है. वे कहते हैं –

 

लीक पर वे चलें जिनके / चरण दुर्बल और हारे हों

हमें तो हमारी यात्रा से बने / ऐसे अनिर्मित पथ प्यारे हैं.

वे कभी हार मानने वाले नहीं रहे. पराजय उन्हें कभी पस्त नहीं कर सकी. वे दोबारा शक्ति अर्जित करने के लिए कटिबद्ध रहे. “प्रार्थना” में कहते हैं –

नहीं, नहीं प्रभु तुमसे / शक्ति नहीं मांगूंगा / अर्जित करना है इसे

मारकर बिखरकर / आज नहीं ,कल सही / लौटूंगा उभरकर.

वे यह भी प्रार्थना करते हैं कि –

अपनी दुर्बलताओं का मुझे अभिमान रहे /

अपनी सीमाओं का / नित मुझे ध्यान रहे,

परन्तु

चरणों पर गिरने से मिलता है / जो सुख वह नहीं चाहिए

कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना अपने समय की बदहाली के लिऐ पूंजीपतियों और सरकारी कर्मचारियों के अतिरिक्त मूलत: राजनेताओं को दोषी मानते है. उनकी कविताओं में वे “भेड़िए” की तरह डरावने और खूंखार हैं तथा “गौबरैला” की तरह गलीज़ हैं. लेकिन इनसे खौफ खाने की ज़रूरत नहीं है. बेशक, “भेड़िए की आँखें सुर्ख हैं”, लेकिन वे कहते हैं

 

उसे तबतक घूरो / जबतक तुम्हारी आँखें / सुर्ख न हो जाएं.

ज़रुरत इस बात की नहीं है कि हम भेड़ियों से भयभीत हो जाएं बल्कि आवश्यकता यह है कि हम भी अपने क्रोध और गुस्से को वाणी दें. –

 

भेड़िया गुर्राता है /तुम मशाल जलाओ / उसमें और तुममे

यही बुनियादी फर्क है / /भेड़िया मशाल नहीं जला सकता

करोड़ों हाथों में मशाल लेकर / एक झाड़ी की ओर बढ़ो

सब भेड़िए भागेंगे.

ज्ञान और एकता की जो रोशनी है वही अंतत: हमें शोषण से बचा सकती है. हमें इस मशाल को बराबर जलाए रखना है क्योंकि—

 

भेड़िए फिर आएँगे / फिर इतिहास के जंगल में / हर बार

भेड़िया माद से निकाला जाएगा/ आदमी साहस से एक होकर

मशाल लिए खडा होगा.

कितनी ही विषम परिस्थिति क्यों न हो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कभी उम्मीद नहीं छोड़ते. बस हमें “अभी और यही” कुछ न कुछ कर गुज़रना है.

 

इंतज़ार शत्रु है / उसपर यकीन मत करो / उससे बचो

जो पाना फ़ौरन पा लो / जो करना है फ़ौरन करो.

अन्यथा ये गलीज़ “गुबरैले” हमें चैन से जीने नहीं देंगे

 

वे आश्चर्य करते हैं—

यह क्या हुआ / देखते देखते / चारों तरफ गुबरैले छा गए

गौबरैले – काली चमकदार पीठ लिए / गंदगी से अपनी दुनिया रचाते

धकेलते आगे बढ़ रहे हैं / कितने आत्मविश्वास के साथ ...

देखने, सुनने समझने के लिए / अब यहाँ कुछ नहीं रहा

सत्ताधारी, बुद्धिजीवी / जननायक, कलाकार सभी की

एक जैसी पीठ / काली चमकदार / सभी की एक जैसी रचना

एक जैसा संसार...

गुबरैले बढ़ रहे हैं / गौबरैले चढ़ रहे है / और हम सब /

गंभीर इश्तहारों से लदी दीवार की तरह निर्लज्ज खड़े हैं.

हालात नाकाबिले बर्दाश्त हैं. इन्हें बदलना होगा. कुछ न कुछ उपाय करना ही होगा. लड़ो, शोषण के विरुद्ध, अत्याचार के विरुद्ध, भूख के विरुद्ध – लड़ो. प्रयत्न करना, संघर्ष करना ही एकमात्र रास्ता है. चुप रहना, यथास्थिति को स्वीकार कर लेना, कभी मूल्यवान नहीं हो सकता. विषम परिस्थितियों में डटकर खडा रहना और उनका सामना करना ही श्रेयस्कर है. खूबसूरती इसी में है. सर्वेश्वर दयाल कहते हैं -

 

जब भी भूख से लड़ने / कोई खडा हो जाता है / सुन्दर दीखने लगता है

झपटता बाज़ / फेन उठाए सांप / दो पैरों पर ख़डी

काँटों से नन्हीं पत्तियां खाती बकरी / दबे पाँव

झाड़ियों में चलता चीता / डाल पर उलटा लटक

फल कुतरता तोता / या, उसकी जगह / आदमी होता.

 

सर्वेश्वर की कविताओं की एक विशेष पहचान उनमें कभी व्यक्त, कभी निहित व्यंग्य का स्वर है. किसी भी कीमत पर अत्याचार और शोषण करने वालों को वे भेड़िया और गुबरैला तो कहते ही हैं, पर अपनी एक कविता “व्यंग्य मत बोलो” में यथा स्थितिवादियों पर भी जम कर कटाक्ष करते हैं. –

व्यंग्य मत बोलो .

काटता है जूता तो क्या हुआ / पैर में न सही

सर पर रख डोलो / व्यंग्य मत बोलो

अंधों का साथ हो जाए तो / खुद भी आँखें बंद कर लो

जैसे सब टटोलते हैं / राह तुम भी टटोलो

व्यंग्य मत बोलो .

क्या रखा है कुरेदने में / हर एक का चक्रव्यूह भेदने में /

सत्य के लिए / निरस्त्र टूटा पहिया ले

लड़ने से बेहतर है /जैसी है दुनिया / उसके साथ हो लो

व्यंग्य मत बोलो /

कुछ तो सीखो गिरिगिट से / जैसी शाख वैसा रंग

जीने का यही है सही ढंग / अपना रंग दूसरों से

अलग पड़ता है तो / उसे रगड़ धो लो/ व्यंग्य मत बोलो

बाहर रहो चिकने / यह मत भूलो / यह बाज़ार है

सभी आए हैं बिकने / राम राम कहो और

माखन मिश्री घोलो / व्यंग्य मत बोलो

व्यंग्य और कटाक्ष के बावजूद सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक अत्यंत मार्मिक और संवेदनाओं से परिपूरित कवि हैं. उनकी कविताओं में हमें प्यार और प्रकृति के घुले-मिले चित्र मिलते हैं. “रात की वर्षा” ,”जाड़े की धूप” “चंचल बयार” “हवा बसंत की” ये सभी उनकी कोमल भावनाओं को स्पंदित करने वाली कवितायेँ हैं. वे अपनी कविता समर्पण में “घास की एक पत्ती के सम्मुख” झुक जाते हैं

 

और मैंने पाया कि / मैं आकाश छू रहा हूँ.

बच्चों के प्रति उनकी सुकुमारता और क्रीडाभाव देखते ही बनाता है. इब्न-बतूता इसका एक अनूठा उदाहरण है! –

 

इब्नबतूता पहन के जूता /निकल पड़े तूफ़ान में

थोड़ी हवा नाक में घुस गयी / थोड़ी घुस गई कान में

कभी नाक को कभी कान को / मलते इब्नबतूता

बीच में से निकल पडा / उनके पैरों का जूता

उड़ते उड़ते जूता उनका / जा पहुंचा जापान में

इब्नबतूता खड़े रह गए / मोची की दूकान में

 

और अंत में हमें उनकी कविताओं में मौन,या कहें वाणी से परे एक आध्यात्मिक स्वर भी देखने को मिलता है – “सब कुछ कह लेने के बाद / कुछ ऐसा है जो रह जाता है” वह पीड़ा है... सच्चाई है ....

वह यति है- हर गति को नया जन्म दे अंतराल है वह – नया सूर्य उगा देती है

 

वह मेरी कृति है

पर मैं उसकी अनुकृति हूँ

तुम उसको वाणी मत देना

 

surendraverma389@gmail.com

image


लोफिर आ गए सूरज के जलने और धरती के तपने के दिन। यानी गरमी की हुई दस्तक। फिर उठने लगे पानी के सवाल। यह एक तरह की नियति सी बन गई है कि हम पानी पर रोना तो जानते हैं पर पानी का होना हमें गवारा नहीं है !....खैर, दिन-प्रतिदिन विकट होते जा रहे जल संकट से परित्राण की पुकार सब तरफ सुनी जा सकती है। पानी पर बात करने तो सभी तैयार हैं, किन्तु पानी बचानेऔर उसका सही प्रबंधन करने के प्रश्न पर सीधी भागीदारी की बात जब आती है तब लोग किनारा कर जाते हैं। सब जानते हैं कि जल जीवन का पर्याय है, पर उसी जल के जीवन के लिए सार्थक हस्तक्षेप से जी चुराने की आदत से बाज़ नहीं आते हैं। हम मानते हैं जरूर कि जल के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है,  हम जानते हैं कि जल हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल करते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि बेतरतीब इस्तेमाल का बेइन्तिहां हक़ हमें किसी ने नहीं दिया है। हम जल का दोहन करना तो जानते  है, किन्तु उसके संरक्षण में हमारी रूचि जवाब देने लगती है। हम यह भी जानते हैं कि कुछ घंटे या कुछ दिनों तक भूखे तो रहा जा सकता सकता है, पर पानी पिए बगैर कुछ दिनों के बाद जीना भी मुमकिन नहीं है। फिर भी, आश्चर्य है कि हम जल से जग के नाते की उपेक्षा करने के आदी हो गए हैं।

अब समय की मांग है कि जल संसाधनों के प्रबंधन को हमें निजी जीवन ही नहीं, सामाजिक सरोकार से जोड़कर आगे कदम बढ़ाना चाहिए तथा इसके लिए स्थायी तरीके खोजना चाहिए । वहीं एक स्थायी जल प्रबंधन की रणनीति तैयार करनी होगी, जिसमें भारत की युवा शक्ति का समुचित निवेश करना होगा। इधर यह खबर भी हौसला बढ़ने वाली है कि जल प्रबंधन पर शोध के लिए होनहार युवक पीयूष रंजन का चयन टेनसिस टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय कुकवैली अमेरिका में किया गया है। जहां पर दो वर्ष तक पीयूष द्वारा शोध कार्य किया जाएगा। शोध कार्य हेतु विश्वविद्यालय द्वारा प्रतिमाह 12 सौ डॉलर दिया जाएगा। विदित हो कि पटना जिले के मरांची गांव निवासी पीयूष रंजन राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित है। यहां इस उपलब्धि के उल्लेख का तात्पर्य यह है कि हमारे युवाओं में योग्यता, लगन, जूनून, जज़्बा सब कुछ है, जिनका इस्तेमाल पानी के सवालों के हल में सही ढंग से सही समय पर किया जाये तो बात बन जाये। 

कौन नहीं जनता कि पानी प्रकृति की सबसे अनमोल धरोहर है। वह विश्व सृजन और उसके संचालन का आधार है। मानव संस्कृति का उद्गाता है।  मानव सभ्यता का निर्माता है। पानी जीवन के लिए अनिवार्य है। पानी के बिना जीव जगत के अस्तित्व और साँसों के सफर की कल्पना बेकार है। फिर भी सभी लोगों को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिल पाता है। खेती किसानी की आशाएं पानी के आभाव में धूमिल हो जाती हैं। नदियों को कलकल निनाद कब अवसाद में बदल जाएगा कोई नहीं जनता। जलाशयों को जीवन कब ठहर जाएगा, कह पाना मुश्किल है। पानी न मिलेगा तो परिंदों की उड़ान पर भी सवालिया निशान लग जायेगा। वैसे भी,उड़ान के लिए पानी रखने की जरूरत को हम भुला बैठे हैं। कहा गया है न कि -

नए कमरों में अब चीज़ें पुरानी कौन रखता है

परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है।

हमीं गिरती हुई दीवार को थामे रहे वरना

सलीके से बुज़ुर्गों की निशानी कौन रखता है।

इसलिए ,अब युवा शक्ति की लोकतान्त्रिक पहचान पानी से जुड़ी हमारी आन-बान -शान के आसपास ही मिल सकती है। जल प्रबंधन और जल संरक्षण के प्रश्न पर युवा पीढ़ी को संजीदा होना पडेगा। उन्हें खुद जागकर लोगों को जगाने का बीड़ा उठाना होगा। जल संकट की भयावहता और जल की महत्ता को लेकर लोगों को जगाने की जिम्मेदारी कोई एक दिन, सप्ताह या माह भर मनाने वाले उत्सव की तरह नहीं बल्कि, हर दिन, पर पल जीकर दिखाने वाली चेतना का ही दूसरा नाम है। 

युवा शक्ति को स्वयंसेवी उद्यम के साथ-साथ रोजगारमूलक अभियानों में नियोजित किया जाना चाहिए ताकि वह जल चेतना के दूत बनकर व्यावहारिक स्तर पर श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें। युवा शहरों और गाँवों  में पहुंचकर अच्छी आदतों से पानी की बचत का सार तत्व लोगों तक पहुंचाएं। बताएं कि पानी पर हमारी निर्भरता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और पानी के स्रोत दिनों-दिन घटते जा रहे हैं। हमें पेयजल, दैनिक दिनचर्या, कृषि कार्यों और उद्योग धंधों में पानी की आवश्यकता होती है जिनकी पूर्ति के लिए हम उपलब्ध जल संसाधनों के साथ-साथ भूजल का भी जमकर दोहन कर रहे हैं। लगातार हो रहे दोहन से भूजल का स्तर प्रतिवर्ष नीचे जा रहा है। परिणामस्वरूप जल स्रोत सूखने लगे हैं। जलसंकट गहराने लगा है। वर्षा भूजल स्रोत बढ़ाने का कार्य करती है। भारत में औसतन ग्यारह सौ से बारह सौ मिलीमीटर के आसपास बारिश होती है। अगर हम वर्षा जल का उचित प्रबंधन करें तो यह हमारी आवश्यकताओं के हिसाब से पर्याप्त है बस जरूरत है वर्षा के जल को सहेजने की। वैसे भी पानी कोई समस्या नहीं है बल्कि पानी का भंडारण और पानी को प्रदूषित होने से बचाना एक चुनौती है। 

हमरी युवा पीढ़ी समझे और लोगों को समझाए कि जल पर्यावरण का अभिन्न अंग है। मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। मानव स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ जल का होना नितांत आवश्यक है। जल की अनुपस्थित में मानव कुछ दिन ही जिन्दा रह पाता है क्योंकि मानव शरीर का एक बड़ा हिस्सा जल होता है। अत: स्वच्छ जल के अभाव में किसी प्राणी के जीवन की क्या, किसी सभ्यता की कल्पना, नहीं की जा सकती है। यह सब आज मानव को मालूम होते हुए भी जल को बिना सोचे-विचारे हमारे जल-स्रोतों में ऐसे पदार्थ मिला रहा है जिसके मिलने से जल प्रदूषित हो रहा है। जल हमें नदी, तालाब, कुएँ, झील आदि से प्राप्त हो रहा है। जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण आदि ने हमारे जल स्रोतों को प्रदूषित किया है जिसका ज्वलंत प्रमाण है कि हमारी पवित्र पावन गंगा नदी जिसका जल कई वर्षों तक रखने पर भी स्वच्छ व निर्मल रहता था लेकिन आज यही पावन नदी गंगा क्या कई नदियाँ व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। यदि हमें मानव सभ्यता को जल प्रदूषण के खतरों से बचाना है तो इस प्राकृतिक संसाधन को प्रदूषित होने से रोकना नितांत आवश्यक है वर्ना जल प्रदूषण से होने वाले खतरे मानव सभ्यता के लिए खतरा बन जायेंगे।

हम देश के प्रत्येक गांव में छोटे-छोटे तालाब बनाकर वर्षा जल को संग्रहित कर सकते हैं जिससे हमें खेतों में सिंचाई के लिए पानी मिलेगा और भूजल स्तर भी सुधरेगा। शहरों में भी प्रत्येक इमारतों की छतों से वर्षा जल संग्रहण के लिए रेन वॉटर-रूफ वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना चाहिए। इस सिस्टम में वर्षा का जल छतों से पाइप लाइन के द्वारा सीधे जमीन के भीतर चला जाता है। इस विधि से भूजल स्तर में सुधार होता है। अगर हमें भविष्य में होने वाले जल संकट को रोकना है तो इसके लिए प्रत्येक स्तर पर जल संग्रहण करना होगा। जल संरक्षण के अभियान में समाज के प्रत्येक वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति को ख़ास तौर पर युवा वर्ग को शामिल होना होगा। युवा लोगों को बताएं कि पानी से जुडू ये दस समस्याएं आज मानवता के समक्ष विशेष रूप से मुंह बाए खडी हैं -

1- प्रति व्यक्ति उपलब्धता की कमी

2- विशेष कामों के लिए खराब गुणवत्ता

3- फ्लोराइड प्रदूषण

4- विभिन्न प्रकार के स्थानीय प्रदूषण

5- जैविक प्रदूषण

6- खारापन

7- मौसमी जल संचय क्षमता

8- भौगोलिक स्थिति के कारण बर्बादी

9- तटीय इलाकों में नुकसान

10- सिलिका और सल्फर से प्रदूषण

यहां जल संरक्षण के मद्देनज़र कुछ सुझाव साझा करना चाहता हूँ -

1.सबको जागरूक नागरिक की तरह `जल संरक्षण´ का अभियान चलाते हुए बच्चों और महिलाओं में जागृति लानी होगी। स्नान करते समय `बाल्टी´ में जल लेकर `शावर´ या `टब´ में स्नान की तुलना में बहुत जल बचाया जा सकता है। पुरूष वर्ग ढाढ़ी बनाते समय यदि टोंटी बन्द रखे तो बहुत जल बच सकता है। रसोई में जल की बाल्टी या टब में अगर बर्तन साफ करें, तो जल की बहुत बड़ी हानि रोकी जा सकती है।

2. टॉयलेट में लगी फ्लश की टंकी में प्लास्टिक की बोतल में रेत भरकर रख देने से हर बार `एक लीटर जल´ बचाने का कारगर उपाय उत्तराखण्ड जल संस्थान ने बताया है। इस विधि का तेजी से प्रचार-प्रसार करके पूरे देश में लागू करके जल बचाया जा सकता है। 

3. पहले गाँवों, कस्बों और नगरों की सीमा पर या कहीं नीची सतह पर तालाब अवश्य होते थे, जिनमें स्वाभाविक रूप में मानसून की वर्षा का जल एकत्रित हो जाता था। साथ ही, अनुपयोगी जल भी तालाब में जाता था, जिसे मछलियाँ और मेंढक आदि साफ करते रहते थे और तालाबों का जल पूरे गाँव के पीने, नहाने और पशुओं आदि के काम में आता था। दुर्भाग्य यह कि स्वार्थी मनुष्य ने तालाबों को पाट कर घर बना लिए और जल की आपूर्ति खुद ही बन्द कर बैठा है। जरूरी है कि गाँवों, कस्बों और नगरों में छोटे-बड़े तालाब बनाकर वर्षा जल का संरक्षण किया जाए।

4. नगरों और महानगरों में घरों की नालियों के पानी को गढ्ढे बना कर एकत्र किया जाए और पेड़-पौधों की सिंचाई के काम में लिया जाए, तो साफ पेयजल की बचत अवश्य की जा सकती है।

5. अगर प्रत्येक घर की छत पर ` वर्षा जल´ का भंडार करने के लिए एक या दो टंकी बनाई जाएँ और इन्हें मजबूत जाली या फिल्टर कपड़े से ढ़क दिया जाए तो हर नगर में `जल संरक्षण´ किया जा सकेगा।

6. घरों, मुहल्लों और सार्वजनिक पार्कों, स्कूलों अस्पतालों, दुकानों, मन्दिरों आदि में लगी नल की टोंटियाँ खुली या टूटी रहती हैं, तो अनजाने ही प्रतिदिन हजारों लीटर जल बेकार हो जाता है। इस बरबादी को रोकने के लिए नगर पालिका एक्ट में टोंटियों की चोरी को दण्डात्मक अपराध बनाकर, जागरूकता भी बढ़ानी होगी। 

7. विज्ञान की मदद से आज समुद्र के खारे जल को पीने योग्य बनाया जा रहा है, गुजरात के द्वारिका आदि नगरों में प्रत्येक घर में `पेयजल´ के साथ-साथ घरेलू कार्यों के लिए `खारेजल´ का प्रयोग करके शुद्ध जल का संरक्षण किया जा रहा है, इसे बढ़ाया जाए। 

8. गंगा और यमुना जैसी सदानीरा बड़ी नदियों की नियमित सफाई बेहद जरूरी है। नगरों और महानगरों का गन्दा पानी ऐसी नदियों में जाकर प्रदूषण बढ़ाता है, जिससे मछलियाँ आदि मर जाती हैं और यह प्रदूषण लगातार बढ़ता ही चला जाता है। बड़ी नदियों के जल का शोधन करके पेयजल के रूप में प्रयोग किया जा सके, इसके लिए शासन-प्रशासन को लगातार सक्रिय रहना होगा। 

9. जंगलों का कटान होने से दोहरा नुकसान हो रहा है। पहला यह कि वाष्पीकरण न होने से वर्षा नहीं हो पाती और दूसरे भूमिगत जल सूखता जाता हैं। बढ़ती जनसंख्या और औद्योगीकरण के कारण जंगल और वृक्षों के अंधाधुंध कटान से भूमि की नमी लगातार कम होती जा रही है, इसलिए वृक्षारोपण लगातार किया जाना जरूरी है। 

10. पानी का `दुरूपयोग´ हर स्तर पर कानून के द्वारा, प्रचार माध्यमों से कारगर प्रचार करके और विद्यालयों में `पर्यावरण´ की ही तरह `जल संरक्षण´ विषय को अनिवार्य रूप से पढ़ा कर रोका जाना बेहद जरूरी है। अब समय आ गया है कि केन्द्रीय और राज्यों की सरकारें `जल संरक्षण´ को अनिवार्य विषय बना कर प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक नई पीढ़ी को पढ़वाने का कानून बनाएँ। 

लोगों में ऎसी समस्याओं की समझ और उन्हें दूर करने के लिए सरोकार पैदा करना बड़ी चुनौती भी है। फिर भी स्मरणीय है कि जल और स्वच्छता पर निवेश  हमेशा और हर तरह से फायदे का सौदा होगा। हमारा मत है कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना में अपशिष्ट जल के प्रशोधन की अहमियत और एकीकृत जल और अपशिष्ट जल योजना बनाने पर जोर दिए जाना प्रशंसनीय है, लेकिन उसे ज़मीनी तौर पर अमल में लाना उतना ही जरूरी है। राष्ट्रीय विकास में जल की महत्ता को देखते हुए अब हमें `जल संरक्षण´ को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखकर पूरे देश में कारगर जन-जागरण अभियान चलाने की आवश्यकता है।

अंत  में बस यही कि अब

धरती पर मनमानी की कहानी नहीं,

जल प्रबंधन का महाकाव्य लिखा जाना चाहिए।

और इसके लिए हमारे युवाओं को आगे आना चाहिए।

--------------------------------------------------------------------

लेखक राष्ट्रपति पदक और छत्तीसगढ़ राज्य शासन के

शिखर सम्मान से विभूषित हैं।

सम्प्रति - प्राध्यापक

हिन्दी विभाग,शासकीय दिग्विजय स्वशासी

स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव।

मो.09301054300

image

पागलों के बारे में कहा जाता है कि हर युग के अनुरूप पागलों का जन्म होता रहता है जो अपनी युगानुकूल अजीबोगरीब हरकतों के कारण उस युग में चर्चित रहते हैं। 

पागलों की कुछ किस्में ऎसी होती हैं जो कि हर क्षेत्र में समान रूप से पायी जाती हैं और इस किस्म के पागलों की संख्या दूसरे सारे पागलों से अधिक हुआ करती है।

वर्तमान युग में पागलों की एक उम्दा किस्म है जिसे हम लोग रोजाना देखते और भुगतते हैं। खासकर हर शहर में इन पागलों की आजकल भरमार है। और बड़ी बात यह कि ये सारे पागल अमीरों और अभिजात्यों की औलादें हैं। 

शहरों में लोग अब चोर-उचक्कों, घोषित पागलों और मच्छरों से उतने परेशान नहीं हैं जितने इन पागलों से। दिन हो या रात, इन पागलों को लगता है जैसे कोई काम ही नहीं है। 

बहुधा ये पागल समूहों में ही रहते हैं और सरे राह धींगामस्ती मचाते रहते हैं। पिछले कुछ समय से शहरों में बाइकर्स की जबर्दस्त धमाल मच रही है। कोई सा रास्ता हो बाइकर्स तेज रफ्तार में सरपट भागते रहते हैं जैसे कि कोई विश्वस्तर की बाईकर्स दौड़ हो रही हो और ये लाडसाहब बहुत बड़ा पुरस्कार जीतने ही जा रहे हों।

इस तरह बाइक भगाते हुए जाते हैं जैसे यह संदेश दे रहे हों कि कोई रोके नहीं, वरना दुनिया के महान खिताबों से वे चूक ही जाएंगे। हमें यह  देखना हो कि अपने इलाके में कौन-कौन लोग हैं जो उन्मुक्त मनोरंजन और बिना मुहूर्त की उपज हैं, वर्णसंकर दोष वाले हैं या किसी न किसी रूप में पागलपन के शिकार हैं, तो इन बाइकर्स को देख लीजियें, अपने आप पता चल जाएगा कि ये बिगडैल औलादें कैसी हैं।

इनके माँ-बाप और घरवाले भी इनके पागलपन से परेशान हैं लेकिन अपनी औलाद या घर वालों को कौन खराब कहे। यह संस्कारहीनता मुखर होकर इनके पारिवारिक संस्कारों, कुटुम्ब की मर्यादाओं और परंपराओं का मखौल उड़ाती रहती है।

जोरों से बाईक भगाते हुए समूहों में बेतरतीब चिल्लाते हुए शोर मचाना, जोरों से हॉर्न बजाते हुए शांति भंग करना और आवारा पशुओं के झुण्ड की तरह तेज रफ्तार भाग-दौड़ करते इन पागलों ने तकरीबन तमाम शहरों में लोगों का जीन हराम कर दिया है।

फिर बहुत से ऎसे हैं जो अपने बाप की हराम की कमाई से दारू पीकर वाहन चलाते हैं। कई स्थानों पर तो यह मनचलों की बारात से कम नहीं होते।  सड़कों पर चलने वाले राहगीरों तक में इस बात की आशंका बनी रहती है कि पता नहीं कब कोई ठोंक जाए और गई कई महीनों तक खटिया में पड़े रहने की, फ्रेक्चर या मौत हो जाए वो अलग।

अब इन पागलों की इस नई बाइकर्स कल्चर ने जन्म ले लिया है जिसका क्या हश्र होगा भगवान जाने। अपने आस-पास भी  ऎसे तेज रफ्तार और चिल्लपों मचाते हुए गुजरने वाले बाइकर्स की धींगामस्ती और आतंक आसानी से दिख जाता है।

यह सब देख कर लगता है जैसे हम संस्कारहीनता के उस भयानक दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ आदमी को देखकर कहीं से नहीं लगता कि आदमी है। कभी वह शैतान की तरह चिल्लाता रहता है, कभी बाइकर्स के रूप में हायतौबा मचाने लगता है, कभी तेज रफ्तार का आनंद लेता हुआ अपने आपको किसी नरपिशाच से कम नहीं समझता।

और अब तो  नए जमाने की लड़कियां भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। पता नहीं यह संस्कारहीनता हमें कहां ले जाएगी। इन बाइकर्स के माता-पिता और घर वालों की भी जिम्मेदारी है कि इन उन्मादियों को किसी मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाएं, समय पर ईलाज करवाएं अन्यथा कहीं ऎसा न हो जाए कि यह मर्ज बढ़ता ही चला जाए और बाद में पछताना पड़े।

इन पागलों पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो देश के लिए बहुत बड़ा खतरा बनकर सामने आ सकते हैं। समय आ गया है कि हम जागरुक रहें और अपनी इस मेधावी पीढ़ी को समझाएं, संस्कारवान बनाएं और इनकी प्रतिभाओं का उपयोग समाज तथा देश के लिए करने में ठोस प्रयास करें।  इनके माँ-बाप के भरोसे न रहें क्योंकि या तो वे भी ऎसे ही होंगे अथवा ये बच्चे उनके नियंत्रण से बाहर होंगे।

---000---

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1950 में बी.ए.(प्रथम-वर्ष) में दाख़िला लिया था. 1949 में धर्मवीर भारती का उपन्यास “गुनाहों का देवता” प्रकाशित हो चुका था और उसकी गूंज इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उन दिनों स्पष्ट सुनी जा सकती थी. मेरा विषय हिंदी नहीं था. लेकिन “गुनाहों का देवता” की चर्चा ने मुझे इस उपन्यास को पढ़ने के लिए मानों बाध्य ही कर दिया था. ज़ाहिर है मैं उन दिनों किशोर वय की आख़िरी सीढियां पार कर रहा था. ऐसे में यह उपन्यास मेरे मन को छू गया. उसकी रूमानी भावुकता मेरे दिलो-दिमाग़ पर छा गई. धर्मवीर भारती से इस उपन्यास के ज़रिए मेरा प्रथम परिचय हुआ. इस उपन्यास ने भारती को एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था. लेकिन आज जब धर्मवीर भारती का ज़िक्र होता है तो उनकी छबि साप्ताहिक पत्रिका, “धर्मयुग” के सम्पादक के रूप में मानो उनके हर क़दम को पीछे ढकेलती हुई सी सामने आती है. एक समय ऐसा भी आया था जब धर्मवीर भारती और “धर्मयुग” एक दूसरे से इतने जुड़े हुए थे कि धर्मयुग धर्मवीर भारती हो गया था और स्वयं धर्मवीर भारती साक्षात धर्मयुग बन गए थे. मज़े की बात तो यह है कि धर्मवीर भारती “धर्मयुग” में इस शर्त पर आए थे कि धर्मयुग में रहते हुए उन्हें अपनी साहित्यिक रचना-धर्मिता छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा. वस्तुतः “टाइम्स आफ इंडिया” समूह ने नियमों के विपरीत धर्मवीर भारती की ज़िद पर उन पर धर्मयुग में काम करने के दौरान उनके अपने रचनात्मक लेखन पर बंदिश लगाने की शर्त उठा ली थी.

धर्मवीर भारती (25 दिसम्बर 1926 – 4 सितम्बर 1997) आधुनिक हिंदी-साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार, सामाजिक विचारक और अपने समय की प्रख्यात पत्रिका “धर्मयुग” के संपादक थे. उनका जन्म प्रयाग में हुआ था और उन्होंने शिक्षा भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी. प्रथम श्रेणी में एम. ए. करने के बाद डॉ. धीरेंद्र वर्मा के निर्देशन में उन्होंने पीएच.डी प्राप्त की. लेकिन अध्यापन छोड़ कर उन्होंने पत्रकारिता को ज़्यादह तरजीह दी. धर्मयुग में पत्रकारिता के लिए धर्मवीर भारती का आना अप्रत्याशित नहीं था. इससे पहले वे पद्मकांत मालवीय के साथ “अभ्युदय” में काम कर चुके थे और इलाचंद जोशी के साथ “संगम” से भी जुड़े रहे थे. “संगम” के दिनों में मुझे याद है कि मैं एक छोटे से कस्बे, मैनपुरी, में हाई स्कूल का विद्यार्थी था. जहाँ पर “संगम” पत्रिका के नए अंक की हम बेसब्री से प्रतीक्षा किया करते थे. दो वर्ष यहां काम करने के बाद भारतीजी हिदुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद, में अध्यक्ष नियुक्त हुए. सन् 1960 तक यहां कार्य किया “धर्मयुग” में जाने से पूर्व धर्मवीर भारती साहित्यिक रूप से प्रतिष्ठित हो चुके थे और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक अध्यापक की तरह उनकी नियुक्ति भी हो चुकी थी. यहां अध्यापन के दौरान “हिंदी साहित्य कोष” के संपादन में सहयोग दिया. “निकर्ष” पत्रिका निकाली तथा ‘आलोचना’ का संपादन किया. लेकिन साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहुँच बना लेने के बाद भी पत्रकारिता के लिए उन्होंने मुम्बई जाना अधिक श्रेयस्कर समझा. उनके शुभेच्छुकों को यह अच्छा नहीं लगा. पर भारती जी धर्मयुग में प्रधान संपादक के पद पर 1987 तक रहे. उनके धर्मयुग में आने से हिंदी साहित्य और पत्रकारिता का परिदृश्य ही बदल गया. “इलस्ट्रेटेड वीकली” की तर्ज़ पर निकाले गए “धर्मयुग” ने पूरे भारत में अपनी एक अलग पहचान बना ली. धर्मवीर भारती ने इसे नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं.

धर्मवीर भारती विविध विधाओं के एक सधे हुए साहित्यकार हैं. उनके व्यक्तित्व में कवि, उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार –सभी “रोल्ड इंटू वन” हैं. उन्होंने दो उपन्यास लिखे, एक तो “गुनहों का देवता’ जो प्रकाशित होते ही अपनी रूमानियत से तत्काल लोकप्रिय हो गया. इस उपन्यास में आदर्शात्मक और वासनात्मक प्रेम के बीच संतुलन की तलाश दिखाई देती है. उनका दूसरा उपन्यास “सूरज का सातवां घोड़ा” शैली और शिल्प की दृष्टि से एक अनूठी रचना है. डॉ. धर्मवीर भारती के चार कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुए. मुरदों का गांव, स्वर्ग और पृथ्वी, चांद और टूटे हुए लोग, तथा बंद गली का आख़िरी मकान. इनमें संकलित सभी कहानियों में सामाजिक विसंगतियाँ सहज ही उभरती हैं. इनमें आज के व्यक्ति का अकेलापन, आत्मनिर्वासन, ऊब, कुंठा, संत्रास और टूटन है. भारती ने वैचारिक और समीक्षात्मक लेखन भी ख़ूब किया है. रंगमंचीय रोचक एकांकी भी लिखे. रिपोर्ताज़, इंटरव्यू, डायरी के पन्ने तथा ठेले पर हिमालय जैसे यात्रा संस्मरण भी उनके खाते में इंदराज हैं.

धर्मवीर भारती की “कनुप्रिया” और “अंधायुग”, दो ऐसी रचनाएँ हैं जो गीत-नाट्य विधा में लिखी गई हैं और जो पौराणिक संदर्भों में नई संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती हैं. इन दोनों रचनाओं से भारती का क़द्दावर काव्य-व्यक्तित्व पता चलता है. “अंधायुग” में यह स्पष्ट किया गया है कि आज भी वही अंधी संस्कृति विराजमान है जो द्वापर में महाभारत के समय थी. नीति-अनीति, विवेक, मर्यादा आज भी वहीं की वहीं अपने खोखले और दिखावटी रूप में मौजूद हैं. आज भी मनुष्य बर्बर पशुमात्र है. विश्वत्थामा के समान वह विवेक-बुद्धिहीन व कुंठा से ग्रस्त है. “अंधायुग” की तरह “कनुप्रिया” में भी पौराणिक संदर्भ में नई संवेदना को अभिव्यक्ति मिली है. इसमें राधाकृष्ण के प्रणय प्रसंग के सहारे आधुनिक मनुष्य की युद्धोत्तर विवश स्थिति को कुरेद-कुरेद कर सामने रखा गया है. इस प्रकार राधा-कृष्ण कथा के राग-संबंधों को एक वैचारिक पृष्ठ-भूमि प्रदान की गई है.

अंधायुग और कनुप्रिया तो धर्मवीर भारती के काव्य शिखर पर स्थित रचनाएँ हैं किंतु उन्होंने जो स्फुट कविताएँ लिखी है उन्हें भी हम नज़र-अंदाज़ नहीं कर सकते. ठंडा लोहा, सात गीत वर्ष, सपना अभी भी, आद्यांत आदि, कविता संग्रहों में उनके अभिनव काव्य प्रयोग बिखरे पड़े हैं. कविता और उपन्यास दोनों में ही धर्मवीर भारती एक सार्थक प्रयोगकर्ता के रूप में दिखाई देते हैं. शिल्प की दृष्टि से इतने सफल प्रयोग तत्कालीन किसी भी कवि में नहीं दिखाई देते. सामान्यजन के भय को समाप्त करके, उसकी अस्मिता को प्रतिष्ठित करने वाली भारती की कविता “मुनादी” उत्पीड़न से मुक्ति, वास्तविक स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव याद की जाएगी.

डॉ. धर्मवीर भारती को 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. उनका उपन्यास “गुनाहों का देवता” सदाबहार रचना मानी जाती है. “अंधायुग” को लेकर इब्राहीम अल्का जी, राम गोपाल बज़ाज, अर्विंद गौड़, रतन थियम, एम के रैना, मोहन महर्षि और कई अन्य भारतीय रंगमंच निर्देशकों ने इसका मंचन किया है. 1999 में युवा कहानीकार उदय प्रकाश के निर्देशन में साहित्य अकादमी, दिल्ली, के लिए डॉ. भारती पर एक वृत्त-चित्र का निर्माण भी हुआ. धर्मवीर भारती को अपने जीवनकाल में अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए. इनमें भारतभारती पुरस्कार, १९९०, भी सम्मिलित है जो उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा उन्हें प्रदान किया गया था. भारती जी को पद्मश्री से अलंकृत किया गया. वे व्यास सम्मान व केके बिडला फाउन्डेशन पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए.

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद (उ.प्र.) -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

image

सब लोग सुख चाहते हैं, दुःखी रहना कोई नहीं चाहता। लेकिन जो पूर्वजन्मार्जित पाप-पुण्य हैं वे दुःख और सुख के रूप में आते-जाते रहते हैं। नियति के इस चक्र से कोई नहीं बच सकता।  असल में न कोई सुख है, न कोई दुःख। यह मन की अवस्थाएं हैं जो किसी के लिए अनुकूल हुआ करती हैं और किसी के लिए प्रतिकूल। 

मनुष्य इन्हें अनुभव करने की शैली में बदलाव ले आए तो उसे सुख में भी समत्व भाव के साथ आनंद का अहसास होगा और दुःख में भी कष्ट न होगा। अपने मन की दशा को आत्म नियंत्रित किया जाकर दुःखों के अस्तित्व के बावजूद इनका आनंद पाया जा सकता है।

यह कला जो सीख जाता है वह सुख और दुःख से ऊपर उठकर आनंद भाव को प्राप्त कर लेता है। वस्तुतः भगवान की पूजा-उपासना और साधना, प्रार्थना आदि सब कुछ किसी सुख या दुःख को न्यूनाधिक नहीं करते, वे अपने परिमाण में उपस्थित रहते हैं लेकिन इनका अनुभव सभी लोग अलग-अलग प्रकार से करते हैं। कोई दुःखों को गहन और व्यापकता देता हुआ दुखी होता है, कोई इसे हल्के में लेता है। इसी प्रकार सुख की स्थिति है। अधिकांश लोग सुख की अवस्था में बौरा जाते हैं, जोश में होश खो बैठते हैं और इसे ही जीवन का सत्य मान कर चलने लगते हैं, इन लोगों के लिए छोटा सा दुःख भी पहाड़ जैसा अनुभव होने लगता है। जबकि जो लोग सुख में भी समत्व और धीर-गांभीर्य के साथ रहते हैं, बौराते नहीं, घमण्ड नहीं करते, उनके लिए कोई सा दुःख आ जाए, कोई अधिक विचलित नहीं कर सकता।

बहुधा हम सभी लोग यही सोचते हैं कि हमारे जीवन में सुख ही सुख बने रहें, दुःख आए ही नहीं। मगर ऎसा संभव नहीं है। प्रारब्ध को भोगे बिना कुछ भी नहीं हो सकता। हर कर्म का अपना फल निर्मित होता है जो देर सबेर हमें ही भुगतना पड़ता है, इससे बचने का कोई विकल्प नहीं है। जीवन प्रवाह में पाप-पुण्य के फल के अनुरूप दुःख-सुख का क्रम निरन्तर यों ही चलता रहता है। 

इन सभी के बावजूद हममें से अधिकांश लोग अच्छे कामों की सोचते हैं,  शुरूआत भी करते हैं मगर कुछ समय बाद उनका संकल्प खण्डित हो जाता है। उनके सामने समस्या यह आ जाती है कि जैसे ही वह अच्छा काम शुरू करते हैं, सेवा-परोपकार या साधना की शुरूआत करते हैं, आरंभिक दौर में ही कोई न कोई समस्या या अड़चन आ धमकती है।

इससे इनका आत्मविश्वास बिखरने लगता है और यह सोच बन जाती है कि जब भी कोई अच्छा काम या साधना शुरू होती है, कुछ दिन में ही विघ्न आ धमकते हैं। इस अवस्था में कई लोग भगवान, अपनी साधना, साधन और इससे जुड़ें कर्मों में अविश्वास करने लग जाते हैं और महसूस करने लगते हैं कि दुष्ट, पापी, बेईमान और व्यभिचारी लोग फल-फूल रहे हैं, उनका डंका बज रहा है और मालामाल हो रहे हैं। और एक हम हैं कि अच्छे कर्म, सेवा, साधना आदि ईमानदारी से करते हैं तो समस्या सामने आ जाती है। हमसे तो वे खराब लोग अच्छे हैं जो लाभ में ही रहते हैं।

इस गणित को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। हम पूजा-पाठ, जप-तप और साधना करें या जरूरतमन्दों की सेवा और परोपकार, यह सब भगवान को प्रिय है। भगवान यह चाहता है कि उसके भक्त का कल्याण करता हुआ मोक्ष प्रदान करे। उस पर कृपा बनाए रखते हुए आत्म आनंद में नहलाता रहे। उसके हृदय में प्रतिष्ठित होकर सदैव साथ रहे। मगर इसके लिए जरूरी है कि भक्त के पुराने पापों का क्षय हो, पवित्र हो ताकि भगवान के लायक शुचितापूर्ण शरीर, मन और मस्तिष्क बन सके।

इसके लिए भगवान भक्त के सारे जन्मों के पाप कर्मों का हिसाब लगाकर एक साथ क्रम में आगे लगाकर एक के बाद एक को अपनी साक्षी में न्यून से न्यून घनत्व वाला दर्शा कर भुगतवाता है।  निश्चय ही पाप के कारण दुःख आएगा, भोग लेने के बाद नष्ट हो जाएगा और हिसाब चुकता हो जाएगा। इस अवस्था में भगवान भक्त को सहनशीलता देता है ताकि जीवन पापों का फल समाप्त हो सके। इस दुःख समाप्ति का क्रम शुरू होने पर कच्चा भक्त घबराने लगता है लेकिन पक्के भक्त ईश्वरीय विधान मानकर एक के बाद एक दुःख को झेलते हुए आनंद के साथ भोग लेते हैं।

सारे पापों के भुक्तमान होने के बाद सुखों का नम्बर आता है जिसे भगवान अधिकाधिक आनंद के साथ भुगतवाता है और आयु पूरी होने तक साक्षात्कार भी कराता है, और अंत में मोक्ष कर देता है।  जबकि पापियों के साथ उल्टा होता है। भ्रष्ट, बेईमान, चोर-उचक्कों, पाखण्डियों, धूर्तों और दुष्टों को भगवान पहले सारे सुखों का नम्बर लेकर उन्हें  भोग करा देता है और इसके बाद इन दुष्टों के भाग्य में दुःखों का क्रम शुरू हो जाता है। जिसे वे बड़ी पीड़ा के साथ भोगने को विवश होते हैं।

इसलिए यह तय मान कर चलें कि जीवन में सज्जनों और साधकों को आरंभिक अवस्था में आने वाले दुःख ईश्वरीय कृपा के कारण से प्रारब्ध को क्षय करने आते हैं।  अच्छे काम करते हुए दुःखों की स्थिति सामने आए तब समझ लेना चाहिए कि भगवान हम पर खुश है। यह दुःख किसी भी रूप में हो सकता है।

---000---

 

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

image

चैत्र नवरात्रि पर विशेष

हिंदी मास चैत सुदी एकम हिंदू धर्मावलंबियों को अनेक पर्वों से जोड़ देती है। इस तिथि से हिंदी नव संवत्सर का प्रारंभ होता है। आदिशक्ति मां अंबे के नवरात्रों का भी यह प्रथम दिवस होता है। एक ओर जहां हम धर्म कर्म से जुड़ते है, वहीं दूसरी ओर नया वर्ष हमें नई ऊर्जा और संचार प्रदान करने वाला होता है। देवी मंदिरों से लेकर घरों तक में ज्योत जवारों की स्थापना जीवन में नये प्रकाश का संचरण कर जाते है। मां के उपासकों द्वारा 9 दिन की कठिन साधना वाला यह पर्व लोकगीतों और गीतकारों के लिए नई रचना के रूप में साहित्य के विकास को भी पर लगाने वाला होता है। देवी जस गीतों को झूम कर गाने की विधा उन लोगों के लिए नई प्रेरणा लेकर आता है, जो इस गीत से अछूते हुए है। यदि धार्मिक भावनाओं को देखना और समझना हो तो नवरात्र पर्व से बढक़र कोई दूसरा पर्व नहीं। मां पर अपार श्रद्धा रखने वाले भक्तों की अलग-अलग तरह की भक्ति अन्य लोगों को भाव विभोर कर जाती है। वर्ष में दो बार क्वांर एवं चैत्र माह में आने वाले नवरात्रों में जसगीतों के माध्यम से देवी आराधना विशेष गायन शैली एवं वाद्य कला का बेजोड़ नमुना मानी जा सकती है।

क्या है लोकगीतों की परंपरा

लोकगीत अथवा लोक गाताथों का विशेष महत्व नवरात्रि पर्व के दौरान या फिर दीपावली पर्व के दौरान स्पष्ट रूप से हमारे समक्ष आता है। आज कल के भोंडे गीतों के प्रदर्शन ने लोक गाथाओं और लोकगीतों पर खासा नकारात्मक प्रभाव डाला है। हमारी वर्तमान पीढ़ी लोक गाथाओं और लोकगीतों से पूर्ण रूप से विमुख है। लोकगाथाओं की शुरूआत कहां से और कैसे हुई, इसे प्रमाणिकता के साथ कह पाना असंभव है। इसके प्रमाणिक खोज का इतिहास अब तक अप्राप्त है। लोकगाथाओं की लिखित हस्तलिपि का भी सर्वथा अभाव ही है। यह माना जा सकता है कि मौखिक परंपरा द्वारा ही लोकगाथाओं ने लोकमत की अभिव्यंजना की होगी। यही कारण है कि यह अब तक रहस्य बना हुआ है। एक बात स्पष्ट है कि लोकगाथाओं की रचना सामूहिक रूप से किसी प्रदेश के लोग मिलकर ही करते है। यह कभी समाप्त न होने वाली परंपरा है, इसके प्रचार प्रसार पर आधुनिकता का प्रभाव पड़ सकता है। लोकगाथाओं के लिए जरूरी है कि वह किसी लोककथा से प्रत्यक्ष संबंध रखती हो। हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश की आंचलिक संस्कृति का दर्शन करना हो हो प्रचलित लोकगाथाओं से परचित होना जरूरी होगा। इन लोकगाथाओं में लोक विश्वास, लोक धर्म, आचार-संस्कार आदि के दर्शन सहज रूप से हो जाते है। बिलासपुर जिले में प्रचलित ‘लक्ष्मणजती’ (राजा बिसरा), महाकाव्य तथा ढोला मारू की गाथा, देवरों में प्रचलित ‘सीता राम नाईक की गाथा’, पनिकाओं में लोकप्रिय ‘बकावली’ लोकगीत तथा दुर्ग जिले में प्रचलित ‘लोरीकचंदा’ ऐसे महाकाव्य है, जिनके छत्तीसगढ़ के गौरवशाली अतीत का प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है।

पूजी जाती है मां शीतला

हिंदू धर्म में अनेक गणों की पूजा का प्रावधान लगभग हर माह हम सबके सामने आता रहा है। इन सारे देवी-देवताओं में मां शीतला ही देवी का एक ऐसा स्वरूप है, जिसे ग्रामीण ग्राम्य देवी के रूप में पूजते आ रहे है, तो बड़े शहरों के लोग उन्हें नगर देवी के नाम में अपनी श्रद्धा का केंद्र बनाए हुए है। सामान्यत: निस्तारी कामों के लिए बनाए गए तालाब और सरोवरों के किनारे मां शीतला का मंदिर आवश्यक रूप से स्थापित देखा जा सकता है। मां की सवारी सिंह मंदिर के द्वार पर इस बात की जानकारी देता प्रतीत होता है कि मां शीतला अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने यहां विराजी है। हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश में देवी भक्ति की महिमा का गान करने वाले लोक गीतकारों की कमी नहीं है। क्वांर और चैत नवरात्रि प्रारंभ होते ही मंदिरों सहित घरों एवं मां दुर्गा के पूजा पंडालों में जस गीतों की सुमधुर तान सभी को अपनी ओर आकर्षित करने लगती है। जस गीतों में पिरोई गई मां की शक्ति का वर्णन एकाएक असुरों के साथ मां जगदंबे की वीरता की कहानी लोगों के कानों में रस घोल जाती है। असुर वध का गीत रूप में ढोल मंजीरों की धुन में वर्णन भक्तों के रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। किस प्रकार मां अपने भक्तों के रक्षा के लिए असुरों का संहार कर सौम्य जीवन प्रदान किया गया, इसे भी पूरा मानवीय समाज आसानी से समझ सकता है।

चेचक रोग को दूर करती है मां शीतला

भारतीय धर्म शास्त्रों में स्कंद पुराण के अनुसार मां शीतला चेचक रोग के रोगी को ठीक करने तपते शरीर को आनंद प्रदान करता है। शास्त्र के अनुसार मां का वाहन गर्दभ अथवा गदहा है। मां शीतला अपने एक हाथ में कलश दूसरे में सुपा, दूसरे में झाड़ू तथा चौथे में नीम के पत्ते धारण किए होती है। चेचक रोग में मां के द्वारा धारण किए गए कलश सुप, झाडु तथा नीम पत्तों का विशेष महत्व है। चेचक रोग से पीडि़त युवक-युवती रोग से तपते हुए अपने वस्त्रों को फेंक देते है, सुप से रोगी को हवा की जाती है, झाडु़ से रोगी के घाव फुट जाते है, नीम के पत्ते घावों को सड़ऩे और पकने नहीं देते। इसी तरह रोगी को ठंडा जलप्रिय होता है। अत: कलश का महत्व सबसे ज्यादा है। आयुर्वेद में यह भी माना जाता है कि गर्दभ अथवा गदहे की लीद लेपन से चेचक के दाग मिट जाते है। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता के संग ‘ज्वरा सुर’ अर्थात ज्वर का दैत्य, ‘ओलैचंडी बीबी’ अर्थात हैजे की देवी, ‘घेटुकर्ण’ अर्थात त्वचा रोग के देवता एवं ‘रक्तवती’ अर्थात रक्त संक्रमण की देवी भी विराजमान होती है। मां शीतला के हाथों में धारित कलश में दाल के दाने के रूप में शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है। स्कंद पुराण में मां की आराधना हेतु शीतलाष्टक स्त्रोत दिया गया है, जिसके करने से मां शीघ्र प्रसन्न होती है। हमारे शास्त्रों में ऐसे भी उल्लेख मिलते है कि शीतलाष्ट स्त्रोत की रचना स्वयं भगवान शिव द्वारा की गई थी। मां शीतला को प्रसन्न करने शास्त्रों में निम्न मंत्र का उल्लेख किया गया है-

वन्देअहंम शीतलादेवीं रासभस्थांदिगम्बरां।

मार्जनी कलशोयेतां सूर्पालंकृतमस्तकामं।।

 

बस्तर में प्रसिद्ध है चैत्र फेस्टिवल डांस

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरा में बस्तर का अपना अलग स्थान रहा है। बैगा भील एवं गोंड़ जातियों की परंपरा पूर्ण रूप से धर्म पर टिकी दिखाई पड़ती है। दशहरा पर्व भी बस्तर में अपने अलग रंग में रंगा होता है। इसी तरह बस्तर जिले की गोंड़ जाति द्वारा चैत्र के माह में किया जाने वाला नृत्य ‘चैत्र फेस्टिवल डांस’ के रूप में प्रसिद्धि पा चुका है। वरिष्ठजनों की माने तो चैत्र नृत्य प्राय: फसल कटने के बाद मां अन्नपूर्णा की आराधना करते हुए धन्यवाद स्वरूप किया जाता है। इस नृत्य के आयोजन के लिए गोंड़ जाति के लोग एक स्थान पर एकत्रित होकर अगली फसल के लिए झुमते और झिरकते हुए मां अन्नपूर्णा से प्रार्थना करने की मुद्रा में दिखाई पड़ते है। बड़े ही शालीन विचारों और साफ चरित्र वाले गोंड़ जाति के स्त्री-पुरूष साथ मिलकर वृत्ताकार, अर्धवृत्ताकार या फिर सीधी लाईन में खड़ी होकर नृत्य की भाव भंगिमा तैयार करते है। सभी नृत्य करने वाले स्त्री-पुरूष एक दूसरे के हाथ की कलाई पकडक़र न टूटने वाली कड़ी तैयार करते है। मोर पंखों को अपने सिरों पर सजाए अलग अलग वेशभूषा में गले में मोतियों की माला पहने नर्तक एक ही अलग ही दृश्य का आभास कराते है। संगीत की धुन में थिरकने वाले सभी नर्तक अपने पैरों को इस प्रकार जमीन पर थापा के रूप में पटकते है कि वह संगीन के साथ संगत कर सके। उक्त अवसर पर प्राय: शहनाई, टिमकी, टपरी, ढोलक आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग संगीत की धुन के लिए किया जाता है।

 

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

फॉसिल

अविनाश ब्यौहार


बालाई आमदनी
से उन्होंने
सब कुछ
कर लिया
हासिल...!
आगामी समय
में हमें
देखने को
मिलेंगे ईमान
के फॉसिल....!
सम्पर्कः 86, रायल स्टेट कॉलोनी,
माढ़ोताल, कटंगी रोड, जबलपुर-482002
मोः 9826795372

00000000000000

 

धर्मेन्द्र गुप्त ‘साहिल’ की गजलें


1
तेरा अहसास पत्थर हो गया है.
सुना है तू भी हिटलर हो गया है.

लिखा हर ईंट पर है नाम जिसका,
वो कैसे घर से बेघर हो गया है.

कहीं तो आग पानी हो गयी है,
कहीं तो फूल पत्थर हो गया है.

भटकता था जो आवारा-सा कल तक,
समय का वो सिकन्दर हो गया है.

दिये हैं आज को दुख-दर्द तो क्या,
हमारा कल तो बेहतर हो गया है.


2
क्या मिलें इस शहर में किसी से.
कोई मिलता नहीं सादगी से.

इस सदी ने दिये जख्म इतने,
बदगुमां हूं मैं अगली सदी से.

सीख पाये कहां कुछ अभी तक,
पेड़-बादल-हवा-चांदनी से.

घर दिवाली में मेरा जला यूं,
डर-सा लगने लगा रोशनी से.

कितने जीवन सुलगने लगे हैं,
जिन्दगी जब मिली जिन्दगी से.

हम बयां कर न पायेंगे उसको,
जो मिला है हमें शायरी से.


सम्पर्कः के, 3/10ए, मां शीतला भवन, गायघाट, वाराणसी-221001
मोः  8935065229

00000000000

 

000000000

डॉ. अशोक गुलशन की काव्य रचनाएं

होली पर एक गीत


        

जबसे दूर हुए तुम मुझसे
सभी पड़ोसी करें ठिठोली.
मत पूछो तुम हाल हमारा,
कैसे कटी हमारी होली.
    इधर तुम्हारा पत्र न आया,
    अपने सब बीमार हो गए.
    खाली हाथ रह गया मौसम,
    व्यर्थ सभी त्योहार हो गए.
    देख रहा है घर में फागुन,
    बुझी-बुझी लग रही रंगोली.
कुछ तो तुम अन्याय कर रहे,
कुछ रूठा भगवान हमारा.
उजड़ रहा है मन-उपवन का,
हरा-भरा उद्यान हमारा.
मिलने कभी नहीं आते हैं,
अब हमसे अपने हमजोली.
    रोज मुंडेरे कागा बोले,
    लेकिन कुछ विश्वास नहीं है.
    अपनी इस धरती के ऊपर,
    अपना यह आकाश नहीं है.
    किसको रंग-गुलाल लगायें,
    लेकर अक्षत-चन्दन रोली.
हमने बड़ी चुनौती की है,
पूजे मंदिर और शिवाले.
किन्तु पसीजे नहीं कभी तुम,
कैसे हो पत्थर दिलवाले.
हमें न अब तक मिला कभी कुछ,
खाली रही हमारी झोली.
 

दोहे

निरहू के घर जब लगी, महंगाई की आग.
ऐसे में फिर यह भला, कैसे खेले फाग.
रंग लगायें किस तरह, कैसे खेलें फाग.
जीवन का जब हो गया, सूना सारा राग.
फागुन की बारिश हुई, भीगा तन-मन आज.
रंग-रंग में घुल गया, जीवन का हर राज.
गांव-गली में जब हुई, रंगों की बौछार.
मस्ती में गाने लगे, बाबा राग मल्हार.
आओ मिलकर हम गले, करें दूर सब राग.
किसे पता है यार कब, आएगा फिर फाग.

गजल

नफरत की दीवार गिराओ होली में.
प्यार भरा संसार बसाओ होली में.
आकर मुझसे प्यार जताओ होली में,
दिल से दिल के तार मिलाओ होली में.
लाल-गुलाबी नीले-पीले रंगों से,
तुम अपना घर-द्वार सजाओ होली में.
झूमो-नाचो-गाओ सबके साथ रहो,
खुशियों के उपहार लुटाओ होली में.
स्नेह-प्रेम-सौहार्द भरी पिचकारी से,
रंगों की शुभ धार बहाओ होली में.
प्यार भरी दो मीठी-मीठी गुझिया से,
दोस्त-यार-दो-चार बनाओ होली में.
बैर भाव को ‘गुलशन दिल से दूर करो,
दुश्मन से भी प्यार जताओ होली में.


सपर्कः उत्तरी कानूनगोपुरा,
बहराइच (उ.प्र.)
मोः 9450427019
 

00000000000


 

दोहे

होली कहे पुकार

अरविन्द अवस्थी

देखो फागुन आ गया, ले पुरवाई संग.
पान चबा मुंह लाल कर, और छानकर भंग.
इठलाता पग-पग धरे, हुआ बेशरम आज.
कहता है त्योहार है, ऐसे में क्या लाज.
लोग-लुगाई सब हुए, बेबस और अधीर.
उड़े चतुर्दिक गांव में, रंग, गुलाल, अबीर.
दरवाजे की ओट से, नई-नवेली नार.
जेठउत के ऊपर गई, लोटा भर रंग डार.
कहे चांदनी चांद से, प्रियतम सुन लो बात.
आज न बाहर जाइए, यह होली की रात.
हंसे खेते, वन, बाग सब, नदियां पोखर ताल.
फागुन सबके गाल पर, मल दे रहा गुलाल.
वल्लरियां बेताब हैं, झूमें पाय बयार.
करती हैं अठखेलियां, तरु को बांहें डार.
सजी दिशाएं खिल उठीं, कर सोलह सिंगार.
पवन गुदगुदी कर रहा, करे मसखरी ‘मार’.
अलमस्ती के रंग में, डूबा सारा गांव.
मौका पाकर धूप ने लिया छांव से दांव.
उमर छिपाकर चल रहे, मन्नू काका आज.
भौजी सहसा दिख गई, कैसे आते बाज.
हंसी-खुशी का पर्व है, बुरा न मानो यार.
वैर-अदावत भूलकर, सबको बांटो प्यार.
होली तो जाए चली, आए अगले साल.
कर मलते रह जाओगे, मन में रहे मलाल.
घर में छिपकर बैठना, उचित नहीं व्यवहार.
रंग लगा लग जा गले, होली कहे पुकार.


सम्पर्कः श्रीधर पाण्डेय सदन, बेलखरिया का पुरा, मीरजापुर (उ.प्र.)
मोः 8858515445

00000000000

 

दो गजलें

कुमार नयन

एक
इश्क होता तो मर गया होता.
क्या कहूं क्या न कर गया होता.
साथ हर वक्त मेरा साया था,
वर्ना दुनिया से डर गया होता.
इक इशारा तुम्हारा काफी था,
मैं हदों से गुजर गया होता.
चीखते रहते हैं दरो-दीवार,
तू कभी मेरे घर गया होता.
अश्क टपके नहीं तिरे वरना,
जख्म तेरा ये भर गया होता.
तू न मिलता तो क्या ये सोचा है,
मैं कहां तू किधर गया होता.
मैं बुरा हूं ये तुम जो कह देते,
मां कसम मैं संवर गया होता.

दो
जो हमारे रकीब होते हैं.
हम उन्हीं के करीब होते हैं.
खूब हंसते हैं, खूब रोते हैं,
वो जो बिल्कुल गरीब होते हैं.
ढूंढ़ते हैं पनाह अश्कों में,
अह्ले दिल भी अजीब होते हैं.
बेबसी पर जमाने वालों की,
रोने वाले अदीब होते हैं.
दौलते-दिल न सबको मिलती है,
लोग कुछ बदनसीब होते हैं.
करते रहते हैं सिर्फ तनकीदें,
जो हमारे हबीब होते हैं.
जानते हैं अदाएं जीने की,
जो भी अह्ले सलीब होते हैं.


सम्पर्कः खलासी मोहल्ला, पो. व जिला- बक्सर-802101 (बिहार)
मोः 0430271604

0000000000


 

कविताएं

अरविंद कुमार मुकुल


खबर
वह मर गया
एक खबर है
इसे छापो
मगर क्या वह आज ही मरा
उस दिन
तुमने नहीं मारा था उसे
जब वह प्यासा था
और तुमने
पानी के बदले
व्यंग्य वाणों का तीर दिया
उस दिन
तुमने तो खबर नहीं छापी थी
उस दिन
हां उसी दिन
जब उसकी प्रेमिका भागी थी
एक मोटे सेठ के साथ
वह रोया था- तुम मुस्काए थे
वह उस दिन भी तो मरा था
मगर उस दिन
तुमने शोकसभा तो नहीं की
और आज
जब वह
मरा ही नहीं/केवल छिप गया
तो तुम उसकी खबर छाप रहे हो
कल इसी खबर को बेचोगे
और अपने मित्र की मृत्यु के नाम पर
100 रु. के पारिश्रमिक से
व्हिस्की या रम की बोतल खोलोगे.

शिकायत
मुझे शिकायत है
स्याही पीली क्यों नहीं होती
धरती लाल
और
सूरज से हरी किरणें क्यों नहीं निकलती
पीली स्याही जल्द ही कागज से उड़ जाती
और ढेर सारे वाद-विवाद हवा बन कापूर हो जाते
फिर हम क्यूं मंदिर मस्जिद का झंझट उठाते
धरती लाल होती
हम सब तप जाते
तप कर
योगी बन जाते
और सूरज की हरी किरणें
सबको ठंडक पहुंचाती
स्याही, धरती और सूरज
तीनों को बदलना होगा
नहीं तो यहां आदमी नहीं शैतान होगा
और शैतान
कविता नहीं समझता
कविता नहीं करता.

सम्पर्कः एल.एफ.-27, श्री कृष्णपुरी,
पटना-800001 (बिहार)

0000000000

 

डॉ. मधुर नज्मी


किसे खबर थी कि बे-रब्त शाइरी होगी
अदब के शहर में में’यार की कमी होगी
मिटा सकेगी महब्बत ही दिल की तारीकी
यही चराग जलेगा तो रोशनी होगी
सितम की तेग चलाता है वो गरीबों पर
अमीरे-शहर की मुझसे न पैरवी होगी
मुझे यकीन है किस्मत संवर भी जायेगी
बहुत खुलूस से जब उसकी वंदगी होगी
जमाना बढ़ के कदम उसके चूम ही लेगा
वफा की राह पर चल के जो शाइरी होगी
इसी लिये तो वो उड़ने से कर रहा था गुरेज
उसे खबर थी फजा में तपिश घुली होगी
अगर वो बारिशे-रहमत न इस पे बरसाये
जमीं की गाद भला किस तरह हरी होगी
वफा का रंग अगर जिंदगी में शामिल है
‘मधुर’ खुलूस-भरी सबकी जिंदगी होगी.

सम्पर्कः काव्यमुखी साहित्य अकादामी,
गोहना मुहम्मदाबाद, जिला- मऊ 276403 (उ.प्र.)
मोः 9369973494

000000000000

 

तीन कविताएं

डॉ. अनुराधा ‘ओस’

सो गया कहीं
गाड़ियों के शोर में
पंछियों का सुर
दब सा गया है कहीं
फिल्मी गीतों से
ढोलक की थाप
दब सी गयी है कहीं
डबलबेडों ने हरा दिया
चारपाइयों को कहीं
महफिलों ने छोड़ दिया
तनहाइयों को कहीं
हीरों की चमक से
दब गयी फूलों की आभा
गंगा के नीर से
शुद्ध है मिनरल वाटर अब कहीं
जाम टकराते हैं, अब तो महफिलों में,
खो गई गुलाबों और केवड़ों की सुगंध
अब कहीं.

मैंने देखा है
मैंने देखा है
चंद लोगों को
एक टुकड़ा आसमान को तरसते
शीत की रात में ठिठुरते
मैंने देखा है
चंद लोगों को
भूख से मरते,
चीथड़े में बदन लपेटते
मैंने देखा है
चंद लोगों को
मानवता शर्मशार करते
इंसानियत की धज्जियां उड़ाते
उस क्षण दुःख के सागर में
डूब जाता है मन
दुःख होता है अपनी लाचारी पर

तलाश ही लूंगी
सागर में सीप की तरह
फूल में सुगंध की तरह
चाहे दूर हो कहीं भी
तलाश ही लूंगी मैं
अंधेरे में किरण की तरह
बादल में जल की तरह
तलाश ही लूंगी मैं
नदी में नाव की तरह
धूप में छांव की तरह
तलाश ही लूंगी मैं
नयनों में नीर की तरह
अधरों पर स्मित की तरह
तलाश ही लूंगी मैं
आकाश में सूर्य की तरह
दिलों में प्रेम की तरह
तलाश ही लूंगी मैं

सम्पर्कः  डॉ. अशोक कु. सिंह चंदेल
ग्राम+पोस्ट, मोहनपुर भवरख, जिला- मीरजापुर, (उ.प्र.)
मोबाइलः 09451185136

00000000000

 

केशव शरण की गजलें


1
खोल दो और रट करोगे क्या.
प्यार का बंद पट करोगे क्या.

रात काफी खुली न मधुशाला,
दूर हो या निकट करोगे क्या.

रच रहे हैं कुचक्र अपने ही,
सत्य तो है प्रकट करोगे क्या.

दल बना भी अगर शरीफों का,
आ घुसे चोरकट करोगे क्या.

सूक्ष्म चिंगारियां बुझानी थीं,
उठ रही है लपट करोगे क्या.

इक चुनौती तनी हुई रस्सी,
तुम न इस योग्य नट करोगे क्या.

जब न सुलझा सके अभी तक तुम,
एक पुरपेच लट करोगे क्या.

2
वो न आई बुला चुका हूं मैं.
जिन्दगी को भुला चुका हूं मैं.

जश्न का इंतजार है बाकी,
वेशभूषा धुला चुका हूं मैं.

जब छलकना नहीं रहा जब-तब,
राज तब ये खुला, चुका हूं मैं.

रात झक मारता हुआ बैठा,
ख्वाहिशों को सुला चुका हूं मैं.

ये धुआं आसमान में कैसा,
जब परों को फुला चुका हूं मैं.

हो गयी है मिठास ही संकट,
जो लूहू में घुला चुका हूं मैं.

छू लिया आसमान को उसने,
दोल जिसको झुला चुका हूं मैं.


सम्पर्कः एस 2/564, सिकरौल,
वाराणसी-221001 (उ.प्र.)
मोः 9415295137

000000000000000

 


000000

गजल

मेमने, लेकर दुशाले जा रहे हैं

आचार्य भगवत दुबे


दुश्मनी के हल निकाले जा रहे हैं
मंत्रणा को तेग-भाले जा रहे हैं
दूर क्या होंगी भला धर्मान्धताएं
मजहबी भेजे उजाले जा रहे हैं
भेड़िये का आज फिर सम्मान होगा
मेमने लेकर दुशाले जा रहे हैं
इस तरह सद्भावना फैला रहे हैं
फिर गड़े मुर्दे निकाले जा रहे हैं
लोकहितकारी बजट है देख लीजे
हमसे फिर छीने निवाले जा रहे हैं
देश की छवि स्वच्छ कैसे हो सकेगी
सांसद कीचड़ उछाले जा रहे है
सरफरोशी के अमर इतिहास से फिर
नाम वीरों के, निकाले जा रहे हैं

सम्पर्कः पिसनहारी मढ़िया के पास,
गढ़ा, जबलपुर-482003 (म.प्र.)
मोबाइलः 09300613975

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *