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20 मार्च गौरैया दिवस पर विशेष... अब प्रयास हो गौरैया को बचाने के लिए / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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० स्पेरो की फुदकन फिर लुभाए बच्चों को

हमारे अपने बीच में फुदकने वाली प्यारी से चिड़िया जिसको अंग्रेजी में स्पेरो तथा हिंदी में गौरैया के नाम से पहचाना जाता है। अब अचानक ही हमारे समाज से विलुप्त होती जा रही है। क्या हमने कभी यह सोचा कि प्रकृति की इतनी प्यारी कल्पना के रूप में दी गई नन्हीं पक्षी का हमसे दूर होने के पीछे क्या कारण है? जहां तक मैं समझता हूं खेतों में रासायनिक खादों के उपयोग ने कीड़े मकोड़ों की संख्या कम कर गौरैया के भोजन पर ग्रहण लगा दिया है। यही कारण है कि गौरैया हमसे रूठने लगी है। कुल लंबाई में 14 से 16 सेंटी मीटर की उक्त चिड़िया ने हमारे घरों में बच्चों से लेकर उम्र दराज लोगों को भी अपनी फुदकन से प्रसन्नता प्रदान की है। वजन में 25 से 32 ग्राम की यह चिड़िया हम सभी के घरों की एक सदस्य के रूप में रहती आई है। आज यह एक संकटग्रस्त पक्षी के रूप में देखी जा रही है। भारत सहित यूरोपीय देशों में अब यह कम दिखाई देती है। ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी और चेक गणराज्य में भी इनकी संख्या तेजी से गिर रही है।

आवासीय घरों में घोंसला बनाकर रहने वाली गौरैया चिड़िया की कम हो रही संख्या ने पर्यावरण विदों के लिये नई चिंता पैदा की है। बाग बगीचों में सैकड़ों की संख्या में पेड़ों और शाखाओं पर मंडराने वाली गौरैया अचानक विलुप्ति की कगार पर क्यों है? यह वास्तव में हमारे पर्यावरण के लिये खतरनाक संकेत हो सकता है। खेत-खलिहानों सहित आंगनों में फुदकने वाली बया को देखकर हर किसी का मन प्रफुल्लित हो उठता है, किंतु आज वही चिड़िया हमारी नजरों से ओझल हो रही है। छोटे छोटे कीट पतंगों को खाकर अपना जीवन चलाने वाली गौरैया हमें उन्हीं कीट पतंगों के आक्रमण से होने वाली बीमारियों से भी संरक्षण प्रदान करती है। भोली भाली पक्षी के रूप में हम उस छोटी सी चिड़िया को चावल के दाने चुगाते हुये अपने आसपास इक_ी कर सकते है। कुछ ही दिन से नियमित दिनचर्या से यह हमारे घर आंगन में बेखौफ उतरने वाली मंडराने लगती है। उसी गौरैया चिड़िया के अस्तित्व का प्रश्न जब पर्यावरणविदों के बीच उठाया गया तो पूरा विश्व चिंतित हो उठा और 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस अथवा वल्र्ड स्पेरो डे के नाम से मनाने की घोषणा कर दी गयी, ताकि गौरैया को संरक्षण दिया जाये तो और पर्यावरण की साक्षी उस छोटी की चिड़िया को प्यार और स्नेह मिल सके।

मुझे याद है वो दिन जब मेरे आदरणीय पिता जी शाम 4-5 बजे से घर के मुख्य द्वार के बाहर सोफे पर बैठ जाया करते थे और गौरैया चिड़िया को चावल के दाने चुगाया करते थे। यह दिनचर्या उनके द्वारा कई वर्षों तक जारी रही। तब उस समय विशेष पर स्वयं ही गौरैया चिड़ियों का झुंड मेरे घर के मुहाने उतर आता था। कभी पिताजी के घर पर न होने से उन चिड़ियों का कलरव इस प्रकार गुंजायमान होता था, मानो सभी एक साथ उन्हें पुकार रही हो। यह एक सच्ची दास्तान है, जिसके साक्षी हमारे पारिवारिक सदस्यों के साथ पड़ोसी भी माने जा सकते है। जिस स्थान पर चिड़िया चावल चुगने उतारा करती थी, उसी स्थान पर छोटे बच्चों की धमाचौकड़ी भी हुआ करती थी। कभी भी ऐसा भी होता था, जब बच्चों की शोर गुल चिड़ियों को मैदान में नहीं उतरने देती थी तब मेरे पिताजी नाराज होते हुये बच्चों को डांटने डपटने लगते थे। हम लोगों को बड़ा आश्चर्य होता था कि वे बेजुबान पक्षी ठंड और बरसात में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराया करते थे। गर्मी के दिनों में जब गौरैया नहीं दिखती थी, तब तो मेरे पिता यह कहने से भी नहीं चुकते थे कि इस घोर कलयुग में मौसम ने भी पक्षियों का जीना दूभर कर रखा है। उन्हें चिड़ियों को दाना चुगाये बिना मानो बेचैनी लगने लगती थी, और वे शाम से लेकर रात तक 8-9 बजे तक भी चावल की डिब्बी हाथ में लिये वहीं बैठे रहा करते थे। आज जब मुझे गौरैया दिवस पर वह दृश्य याद आ रहा है तो बरबस ही मैं अपने पिताजी के पक्षी प्रेम को प्रणाम किये बगैर भला कैसे रह सकता हूं। अब मेरे आदरणीय पिताजी इस दुनिया में नहीं है, किंतु उनकी यह शिक्षा हमें कहीं न कहीं पक्षियों का प्रेम का पाठ जरूर पढ़ा रही है।

होम स्पेरो के रूप में पहचान बना चुकी गौरैया किसी पारिवारिक सदस्य से कम स्थान नहीं रखती है। विश्व में जितने भी पक्षी है, उनमें गौरैया ही परिवारों के अंदर अपना घोसला बनाकर सुख दूख की साझेदार के रूप में सामने आती है। बहुत सी गौरैया चिड़िया सामान्य रूप से कृषि क्षेत्रों में अपना डेरा डाले रहती है। साथ ही बहुत सी ऐसी प्रजातियां प्राकृतिक रूप से अपना जीवन यापन करती है। पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि हाऊस स्पेरो उस स्थान पर रहना पसंद करती है, जहां मानव का निवास होता है। वैज्ञानिकों और पक्षी विशेषज्ञों का ऐसा भी मानना है कि अनाज के दानों को खाने वाली गौरैया विशेष रूप से घरों में अपना ठिकाना बनाती है। इसी प्रकार सुडान में पायी जाने वाली गोल्डन स्पेरों खेतों में रहकर कीट पतंगों को खाकर अपना जीवन यापन करती है। भीषण गर्मी के दिनों में गौरैया चिड़िया का जीवन बड़ा कठिन हो जाता है, उसे न तो पानी मिल पाता है और न ही भोजन। यही कारण है कि इन दिनों गौरैया हमें दिखाई नहीं पड़ती। उनका पूरा कुनबा ठंडे प्रदेशों की ओर पलायन कर जाता है। इस बात की चिंता हमें करनी होगी कि हम इन पक्षियों को अपने बीच कैसे रोके? इसके लिये हमें उनके घोसले के आसपास पानी की पर्याप्त व्यवस्था करने के साथ ही धान और गेंहू की बालियों में भरपूर दानों के साथ घोसलों के आसपास ही उपलब्ध कराना होगा।

आज के बदले पर्यावरणीय माहौल में गौरैया की झलक पाने हम और हमारी पीढ़ी लंबा इंतजार करने से भी पीछे नहीं रहती है। आज से लगभग दो दशक पूर्व हमें गौरैया चिड़ियों के साथ अन्य पक्षी हाई टेंशन तारों पर अटूट कतार के रूप में बैठे दिख जाया करते थे, किंतु एक तस्वीर लेने के लिये आज के पक्षी प्रेमियों को जंगल-जंगल घूमना पड़ रहा है, तब भी दिल को लुभाने वाली तस्वीर नहीं मिल पा रही है। समाचार पत्रों में ऐसे ही पक्षियों की नयनाभिराम फोटो छापने की इच्छा रखने वाले एक पत्रकार का कहना है कि कमर में कैमरा लटकाये कई दिन घूमने के बाद सैकड़ों किमी दूर जो गौरैया का दल दिखाई दिया वह भी पहले की तुलना में एक चौथाई से कम ही था। घरों में घोसले में रहने वाली गौरैया भी अब हमारे घरों का पता भूल चुकी है। मुझे वह दिन अच्छी तरह याद है, जब हाऊस स्पेरों गर्मियों में कूलर के पीछे अपना घोसला बनाकर रहा करती थी। गर्म होते वातावरण में हमसे दूर से भाग रही गौरैया को अपने बीच रखने हमें पर्याप्त घोसले बनाने उसे अवसर प्रदान करना होगा। खुली छतों पर कुछ लकडिय़ां इस प्रकार से सजाना भी सुकून भरे परिणाम दे सकते है, जिसमें गौरैया अपना घोसला बना सके।

जब से शहरों में मोबाईल टावरों की संख्या कुकुरमुत्ते की तरह अनगिनत रूप से बढ़ चली है, तभी से हाऊस स्पेरों का जीवन संकट में पड़ गया है। मोबाईल टॉवरों से निकलने वाली तरंगों का दुष्परिणाम ही पक्षियों की कम हो रही संख्या के लिये जवाबदार है। वन विभाग अधिनियम के अंतर्गत बनाये गये वन्य प्राणी संरक्षण कानून की अनदेखी भी शिकारियों पर सख्ती नहीं कर पा रही है। गौरैया के अलावा तोतों को पकडक़र बेचने वाले बहेलिये भी खुले आम बाजार में अपना सौदा करते घुम रहे है, किंतु जंगल का कानून मौन है। कटते जंगल और बढ़ता तापमान भी पक्षी प्रजाति की छोटी गौरैया के लिये नकारात्मक वातावरण के रूप में सामने आ रहा है। पर्यावरण को सहज बनाते हुये और मानवीय जीवन के साथ गौरैया जैसी चिड़िया का अस्तित्व बनाये रखने के लिये जरूरी है कि हम उनके घोसलों केा संरक्षण प्रदान करें। साथ ही घोसले बनाकर उसमें सुविधापूर्ण जीवन यापन के लिये विलुप्त हो रही गौरैया को पानी से लेकर दाने की व्यवस्था उपलब्ध करायें।

सूरज की पहली किरण धरती में पडऩे से पूर्व भोर के समय गौरैया की चहचहाहट कानों में मिश्री घोल जाती थी। सूरज ढलने के साथ बाग बगीचों में फिर वही चीं-चीं की आवाज सुनने हम बेताब हो उठते और अपनी कदमों को बगीचों की ओर बढ़ा देते। अब यह सपना ही रह गया है। न तो बाग बगीचों का अस्तित्व बच पा रहा है और न ही उन बागों की शहजादी कही जाने वाली गौरैया। अब तो बाग बगीचों का स्वरूप भी पेड़ पौधों के प्रादर्श के रूप में प्रकृति से दूर भागता दिख रहा है। जहां रंगीन फौव्वारे तो है किंतु हरे भरे पेड़ नहीं, जहां बच्चों के उछल कूद के लिये झुले और मिकी माऊस तो है, किंतु ऐसे पेड़ नहीं जहां बया घोसले बना सके। मनुष्य के खाने पीने की सारी सुविधाएं तो एक से बढक़र एक है, किंतु फूलों का रस और मकरंद चुसने के लिये गौरैया के लिये न तो फुल है और न ही मकरंद। इन सारी विपरीत परिस्थितियों में गौरैया का मित्रता की संकल्पना महज बेमानी से अधिक कुछ नहीं कही जा सकती है। मोबाईल के रिंगटोन में ही हम कलरव का आनंद ले पा रहे है और उसी मोबाईल की गैलेरी में वॉलपेपर के रूप में गौरैयों से मिला पा रही है।

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छग)

मो. नंबर 94255-59291

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