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प्राची - फरवरी 2016 - कहानी / फ्लैट नं. 44 / तनूजा चौधरी

 

कहानी

फ्लैट नं. 44

तनूजा चौधरी

मेरे पड़ोस का फ्लैट नं. 44 बहुत दिनों से खाली पड़ा था. ‘‘वत्सल विला’’ में रहते हुए मुझे लगभग एक साल हो गया था, पर बगल का फ्लैट अभी तक खाली था. सोसायटी की चहल-पहल पड़ोसी के बिना सूनी लगती थी. ऊपर वाली मिसेज धवन ने बताया था कि मेरे आने के ठीक पहले ही फ्लैट खाली हुआ था. मकान मालिक शेखावतजी शहर के खासे नामी व्यक्ति थे, इसलिए किरायेदारों की तो कोई कमी नहीं हो सकती थी, पर पता नहीं क्यों उन्होंने फ्लैट को खाली रख छोड़ा था.

दोनों फ्लैटों के पीछे की बालकनी एक नीची दीवाल से विभाजित थी. मैं उस बालकनी का उपयोग कपड़ा या मसाले सुखाने के लिए किया करती थी. फिर भी जब तब श्रीमान जी के सामने अपने अकेलेपन का दुखड़ा रोती रहती थी. इस पर वह अक्सर चुटकी लेते-

‘‘एक फ्लैट और दो बालकनी की मालकिन हो. यहीं मनाओ कि फ्लैट खाली रहे.’’

बात तो सच थी, पर इनके और मिनी के जाते ही मुझे पूरा विंग सूना लगने लगता था. बड़े शहरों की सूने फ्लैटों वाली कहानियां मुझे अक्सर चिंतित करती रहती थीं.

एक दिन यह लम्बी प्रतीक्षा समाप्त हुई और भारी कोलाहल के साथ एक ट्रक सामान पड़ोस के फ्लैट में समा गया. फ्लैट की चाबी सौंपने खुद शेखावतजी आये थे. परिवार में अल्ट्रामाडर्न गृहस्वामिनी और उनकी दो बेटियां थीं. पूरे ‘‘वत्सल विला’’ ने खिड़कियों से नजारा लिया. आधुनिक गृहणी और हाफपैंट-टाप पहने दो जवान लड़कियों को देखने के लिए कुछ लोग तो मेरे फ्लोर से बिना वजह गुजरने लगे. कुछ खड़े होकर देख रहे थे.

फुसफुसाहटों का बाजार गर्मा गया. ‘‘शेखावत जी खुद सामान उतरवा रहे हैं.’’ एक ने आश्चर्य से कहा.

‘‘कोई रिलेटिव होगी.’’ दूसरे ने समाधान किया. ‘‘कमाल है परिवार में कोई जेन्ट्स नहीं है. क्या पता इनके शौहर बाद में आयें.’’ खान साहब बोले, ‘‘पर शेखावत जी का आना कमाल है.’’ मिसेज धवन ने कहा.

शेखावत जी नगर के एक विख्यात व्यापारी के बेटे हैं. उनके कई प्रतिष्ठान और बसों का व्यापार है. ‘वत्सल विला’ सोसायटी की मीटिंग में उनका मैनेजर ही आता था. सोसायटी के किसी भी खर्च पर उन्होंने कभी भी कटौती नहीं की. चाहे वो प्लम्बर, वाचमैन का खर्चा हो या दुर्गाजी और गणपति का चंदा. उन्होंने सदा बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की है. उनके जैसे धनाढ्य व्यक्ति के लिए शायद ऐसे खर्च कुछ मायने नहीं रखते थे.

सामान रखने के लिए शेखावत जी के चार-पांच नौकर आए थे. उन्होंने बड़ी फुर्ती से रात होने के पहले ही सब कुछ जमा दिया था. धीरे-धीरे फ्लैट के सामने की भीड़ छंट गयी. दूसरे दिन उस घर की मालकिन मेरे घर पर कर्टसी विजिट पर आयी. घंटी बजी तो मिनी ने दरवाजा खोला. सामने सजी-धजी प्रतिवेशनी खड़ी थी.

‘‘मां आंटी आई हैं.’’ मिनी ने कुछ ऊंची आवाज में कहा. टी.वी. के सामने बैठे श्रीमान जी ने टी.वी. की आवाज कम करके पलट कर उधर देखा. मैं रसोईघर से बाहर आई तो उसने किसी नर्तकी की मुद्रा में हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘मैं रेनली हूं. आपके पड़ोस में फ्लैट लिया है. आप मुझे रेन कह सकती हैं.’’

‘‘मैं सुधा हूं. ये मेरे पति आदित्यनाथ और ये मेरी बेटी मनीषा. हम लोग मिनी कहते हैं.’’

‘‘मेरी भी दो बेटियां हैं, कुहू और पिहू. बड़ी ट्वैल्थ करके आगे की तैयारी कर रही है, और छोटी टेन्थ में है.’’

‘‘आइए, बैठिए ना!’’ मैंने आग्रहपूर्वक कहा. पतली शिफान की साड़ी में पूरा शरीर विज्ञापित हो रहा था. मुझे अपनी सूती गुंजी-मुंजी धोती पर शर्म आयी.

इस औपचारिक परिचय के बाद रेन बेतकल्लुफी से आने-जाने लगी. मेरी दिनचर्या में आदित्य का ऑफिस जाना, मिनी का कॉलेज और बाइयों से सफलतापूर्वक घर का काम कराना शामिल था. इसके विपरीत प्रतिवेशी ‘रेन’ के परिवार की कोई सुनिश्चित दिनचर्या नहीं थी. काफी दिनों बाद भी परिवार में कोई पुरुष प्राणी नहीं आया. फिर धीरे-धीरे रहस्य खुला कि रेन के पति का कार एक्सीडेंट में देहान्त हो गया था.

दिन चढ़े तक मां-बेटियां सोती रहतीं, फिर लड़कियां केवल ‘स्लिप’ में चाय के कप लेकर हो-हल्ला करती हुई बालकनी में चाय पीतीं. लड़कियों का झरोखा दर्शन काफी अभद्र होता था, इसलिए सोसायटी के सद्गृहस्थ लोगों के दरवाजे धीरे-धीरे रेन के परिवार के लिए बंद हो गये.

रेन के प्रसाधन और प्रसन्नता से कभी भी यह अहसास नहीं होता था कि जवान बेटियों की मां को पिता की कमी खलती है. नौकरी विहीन रेन का ठसकेदार जीवन कई प्रश्नचिह्न खड़े करता था.

रेन के आने के बाद शेखावती जी का सोसायटी में आना-जाना बढ़ गया. लड़कियों के दोस्त दोपहर में आ धमकते और तेज कानफोड़ू संगीत से पूरी सोसायटी को परेशान करते. आदित्य को रेन के व्यक्तित्व समझ में आ गया था. उन्हें रेन से मेरा मिलना-जुलना पसंद नहीं था. एक बार सीढ़ियों पर रेन की बड़ी बेटी कुहू आदित्य से टकरा गयी. ऊपर गैलरी में खड़े अपने ब्यायफ्रेंड से हंसी-मजाक करती कुहू सीढ़ियों पर बिना सामने देखे दौड़ती सी उतर रही थी. टकराते ही उसके हाथ की पॉलीथीन से कुछ डी.वी.डी. बाहर गिर गयीं. आदित्य ने उठाकर दीं और वह समझ गये कि यह बच्चों के लिए नहीं थीं. आवेश में आदित्य बिना कुछ कहे सीधे घर में आये और मुझ पर अपना गुस्सा निकालने लगे.

‘‘खबरदार, मिनी रेन के घर नहीं जानी चाहिए. मुझे सख्त नापसंद हैं ये मां-बेटियां. और तुम भी कुछ कम सोशल बनो.’’

पूरी सोसायटी में चर्चा का केन्द्र बने रेन के परिवार में पुरुष मित्रों की आवाजाही देर रात तक चलती रहती. बड़ी बेटी कुहू तो अपने ब्वायफ्रेंड के साथ दो-तीन दिन लापता रहकर वापस लौटी थी. दूध वाले से मेल मिलाप का यह हाल था कि वह बेडरूम तक चला जाता था. रेन और शेखावत के संबंध पूरी सोसायटी में उजागर हो गये थे. मिसेज धवन तो एक कदम आगे बढ़कर दूर की कौड़ी ले आईं. उन्होंने बताया कि रेन के चाल-चलन की वजह से पति ने आत्महत्या की थी, जिसे शेखावत के पैसों ने दबा दिया. सोसायटी में चलती कानाफूसी को कामवाली बाई ने रेन तक पहुंचा दिया. पर उन्हें देखकर ऐसा नहीं लगता कि उन्हें कोई फर्क पड़ा था.

रेन को देख कर ऐसा कभी नहीं लगता था कि उसे अपने ‘कम्पेनियन’ के जाने का कोई दुःख था. एक बार मैंने हल्के से पति का प्रसंग निकाला तो उसने बात बदल दी. वह जब-तब मेरे घर में अपनी भटकती बेटियों के लिए चाबी थमा कर खुद ब्यूटी पार्लर चली जातीं. इसी तरह एक दिन वह बेमौसम बरसात सी शाम को आ धमकी-

‘‘हैलो सुधा! क्या कर रही हो?’’

‘‘बस शाम की तैयारी. वह आते ही होंगे. आते ही उन्हें नाश्ता चाहिए.’’

‘‘तुमसे एक फेवर चाहिए. थोड़ा मेरे साथ मॉल तक चली चलो, प्लीज!’’

आदित्य की सख्त हिदायत और रेन के उच्छृंखल व्यवहार को देखते हुए भी मैं कभी-कभी उसकी बातों से पसीज जाती.

‘‘अभी नहीं, मुझे काम है.’’

‘‘चलो न, जल्दी लौट आएंगे.’’

और वह मुझे अपने साथ मॉल ले जाकर ही मानी.

मैं कभी-कभी सोचती कि क्या कोई औरत इस तरह अपना पिछला जीवन धो-पोंछकर दूसरे मर्दों के साथ गुलछर्रे उड़ा सकती है. इसके पीछे का कारण न समझ पाने की वजह से मैं कभी-कभी आदित्य के सामने रेन का पक्ष लेती, तो वह आगबबूला होकर कहते, ‘‘सोशल एक्टीविस्ट बनने की जरूरत नहीं है.’’

रैन ने एक मॉल से एक सिल्क की शर्ट और महंगा परफ्यूम खरीदा था. उसकी हजारों की खरीदारी देखकर मेरा माथा ठनका. पर मैं चुप रही. वापसी में घर के लिए कुछ फल खरीद लायी, जिससे आदित्य के सामने बहाना बना सकूं कि फल खरीदने गयी थी.

बहुत जल्दी ही परफ्यूम और शर्ट का राज खुल गया. शेखावत की बी.एम.डब्ल्यू. सोसायटी में आयी. कार से उतरकर शेखावत की पत्नी धड़धड़ाते हुए रेन के फ्लैट तक गयी. बाहरखड़ी रेन कुछ घबड़ा गयी.

‘‘कैसी हैं आप?’’

‘‘जिसका आदमी तुम जैसी तवायफ के चक्कर में हो, वह कैसी हो सकती है.’’

यह कहते हुए उन्होंने फटी शर्ट उसकी तरफ फेंक दी और परफ्यूम उसी के सामने फोड़ कर चली गयी. मैं गैलरी से सरक कर अपने फ्लैट में आ गयी.

थोड़ी देर बाद अपने मगरमच्छी आंसू बहाने के लिए रेन मेरे पास आ गयी. कहने लगी-

‘‘शेखावत जी बड़े अच्छे हैं. वी आर गुड फ्रेंड्स. मैं विधवा हूं, तो लोग बात बनाते हैं...’’

और भी न जाने कितने झूठे किस्से रेन सुनाती रही. मैंने खुद शेखावत को देर रात आते और सुबह बालकनी में नाइट ड्रेस में चाय पीते देखा है. मैं उसकी हरकतों से ऊब गयी थी. बाइयों के सशक्त सूचनातंत्र ने मुझे कई दूसरी घटनायें भी बताई थीं, इसलिए मैंने चिढ़कर कहा, ‘‘अगर तुम्हें यह वाकई बुरा लगा हो तो खुद को इससे दूर क्यों नहीं रखती हो. तुम्हें नहीं लगता है कि तुम्हारी बेटी भी काफी बिगड़ गयी है. अपने बच्चों और खुद को संभालो, न कि दूसरों के घर उजाड़ो.’’

मेरा उग्र रूप देखकर रेन के घड़ियाली आंसू रुक गये और वह वापस चली गयी. फिर कई दिनों तक सन्नाटा रहा. उसके न आने से मैंने और आदित्य ने चैन की सांस ली. पर यह अन्तराल अधिक लम्बा नहीं था. रेन की बेटी के भागने और लौट आने का सिलसिला बदस्तूर जारी था. मैं सोचती थी कि अगर रेन अपना वैधव्य और स्थिति पहचान जाती तो शायद बेटियों को मजबूत सहारा दे रही होती.

एक दिन तो हद हो गयी. रेन रात में लगभग दौड़ती हुई आयी-

‘‘भाभीजी, कुहू अपने दोस्तों के साथ पार्टी में थी. तभी पुलिस की रेड पड़ी और पुलिसवाले उसे भी पकड़कर ले गये हैं. प्लीज आप मेरे साथ थाने चलिये.’’

मैं और आदित्य सकते में आ गये. अब तो रेन के परिवार ने सारी सीमाएं लांघ ली थीं. आदित्य ने मुझे इशारे से मना किया.

‘रेन सोसायटी के प्रेसीडेंट से बात करो, मैं कैसे चल सकती हूं.’’

‘‘नहीं भाभी, आप ही चलिए, सिर्फ थाने तक. अंदर मत आइयेगा.’’ वह लगभग गिड़गिड़ाने लगी.

‘‘तुमने शेखावत जी को फोन क्यों नहीं लगाया?’’

‘‘अभी इन सब बातों के लिए समय नहीं है. आप बस चले चलिए, प्लीज.’’

उसकी लड़की थाने में थी और वह मेरी सामने रो रही थी, यही सब सोचकर मैं उसके साथ ऑटो में बैठ गयी. उसने ऑटो थाने से कुछ दूरी पर रुकवाया. थाने के बाहर भीड़ थी. वह लगातार फोन किये जा रही थी, पर कहीं भी फोन नहीं उठ रहा था.

‘‘तुम थाने में जाकर मिलो.’’ मैंने कहा.

‘‘देखती हूं,’’ पर वह थाने के अंदर नहीं गयी. तभी एक फोन आया और वह कहने लगी-

‘‘अब याद आयी मेरी? फोन क्यों नहीं उठा रहे थे?’’

‘‘........’’

‘‘मैं नहीं, कहां, मैं तो यहां बिलकुल अकेली पड़ी हूं.’’

‘‘........’’

‘‘नहीं, कोई नहीं सिर्फ मैं हूं.’’

‘‘........’’

‘‘कुछ तो करो डियर, प्लीज!’’

‘‘........’’

‘‘हां, हां, सबकुछ मानूंगी. पहले कुहू को थाने से छुड़वाओ.’’

‘‘........’’

‘‘ओ.के., मैं चौराहे पर मिलती हूं.’’

‘‘........’’

‘‘हां बाबा हां.’’

और उसने फोन बंद कर दिया. चेहरे पर चमक आ गयी थी.

‘‘किसका फोन था? तुमने यह क्यों कहा कि तुम अकेली हो?’’ मैंने गुस्से से पूछा.

‘‘अरे, कहना पड़ता है यार! छोड़िये यह बस, आप ऐसा करिए कि सड़क के उस पार से कोई ऑटो लेकर लौट जाइए. मैं चलती हूं.’’ कहकर बिना मेरी तरफ देखे उसने ऑटो आगे बढ़ा दिया. मैं अपमानित सी खड़ी रह गयी. उसने एक क्षण भी रुकने की जरूरत नहीं समझी. थाने के पास गहन अंधेरे में फुटपाथ पर मैं सुन्न-सी खड़ी थी. आवेश और क्रोध के मारे मेरी आंखें बह चलीं. मैं खुद को धिक्कारने लगी कि मैं आयी ही क्यों थी. मुझे आदित्य का कहना मानना चाहिए था.

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संपर्कः 2 ए.पी. कॉलोनी, पंचपेढ़ी, जबलपुर-482002

मोः 9425387990

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