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प्राची - जनवरी 2016 - संपादकीय / राकेश भ्रमर

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संपादकीय

नववर्ष आ गया

नया साल आ गया. लोग खुश हैं. पता नहीं क्यों खुश हैं? न तो सरकार ने महंगाई भत्ता बढ़ाने की घोषणा की है, न देश का बजट आया है, जिसमें व्यापारियों और उद्योगपतियों को कोई बड़ी राहत देने की घोषणी की गयी हो. फिर भी लोग खुश हैं. खुशी मनाने के लिए उन्होंने 31 दिसम्बर और 1 जनवरी की रात को अरबों-खरबों रुपये की शराब गड़प कर डाली और लाखों मुर्गों-बकरों की टांगें लोगों के उदर में समा गयीं. न जाने सिगरेट, बीड़ी के कितने पैकेट समाप्त हो गये, कितने टन हीरोइन और चरस लोग पी गये. देसी गांजे के दम भी लोगों ने लगाए और आजकल तो हुक्का बार खुल गये हैं. वहां से आसमान में कितना धुआं उड़ाया गया है, इसका किसी को अनुमान नहीं है, न डॉक्टरों को न आम आदमी को. सभी तो खुशियां बनाने में व्यस्त हैं.

बड़ी अजीब स्थिति है, लोग नया साल आने की खुशी मनाते हैं, परन्तु मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि 1 जनवरी की सुबह बीते 31 दिसम्बर की सुबह से किस प्रकार भिन्न है. 1 जनवरी की सुबह भी सूरज मरा-मरा सा और उदास था, जैसे उसने रात भर भांग खाई हो. वातावरण में वैसे ही धुआं और कोहरा छाया हुआ है, जो लोगों के फेफड़ों में जाकर जमा हो रहा है. इस धुएं से जब आदमी को कोई बीमारी घेरती है या सर्दी-जुखाम होता है, तो वहीं धुआं काले बलगम के रूप में थक्के के थक्के थोक के भाव में बाहर निकलता रहता है. आदमी फिर भी नहीं समझ पाता कि उसकी बीमारी का कारण क्या है? डॉक्टर भी नहीं बताते. वह केवल इलाज करते रहते हैं. वह बीमार के ठीक होने का इलाज नहीं करते, वह तो बस पैसा कमाने के लिए इलाज का ढोंग करते हैं. अगर डॉक्टर सरकारी है, तो महज खानापूर्ति के लिए मरीज का इलाज करता है. अगर वह प्राइवेट अस्पताल का डॉक्टर है, तो बहुत ध्यान देकर इलाज करता है. वह मरीज का इतना ख्याल करता है कि मरीज कभी ठीक ही नहीं होता, लेकिन उसके इलाज का बिल हजारों से लाखों रुपये में पहुंच जाता है और जब डॉक्टर को लगता है कि अब न तो उसके शरीर में खून की बूंद बची है, न बैंक के खाते में एक पाई, तो वह उसे दूसरे अस्पताल में मरने के लिए ‘रेफर’ कर देता है. कई मरीज तो दूसरे अस्पताल में जाने के नाम पर ही दम तोड़ देते हैं.

लोगों ने नये साल के आगमन का स्वागत दिल खोलकर किया, एक दूसरे को बधाई दी. कुछ लोग बधाई देते-देते भगवान को भी बधाई देने पहुंच गये. ऐसे लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं, जो रात में सुरा का पान करते हैं और दिन में स्वर्ग की अप्सराओं का नृत्य देखने के लिए चले जाते हैं. कहते हैं कि खुशी के साथ गम का साया भी साथ चलता है, तो महाप्रयाण पर निकले लोगों के घरों में गम का माहौल छा जाता है और महाप्रयाण पर निकले व्यक्ति के परिजन उसकी यात्रा का मातम मनाते हैं. मनाना नहीं चाहिए. मोक्ष प्राप्त करने के लिए मनुष्य क्या-क्या नहीं करता. घर-परिवार, धन-दौलत और परिजनों को छोड़कर भाग जाता है और दिन-रात साधना करता है कि उसे मोक्ष प्राप्त हो. अब यदि बिना किसी प्रयास के मोक्ष मिल गया तो शोक क्यों? मनुष्य बड़ा अज्ञानी है, कुछ प्राप्त करने के लिए दुखी होता है और जब प्राप्त हो जाता है, तब भी दुखी होता है. उसे कभी ज्ञान प्राप्त नहीं होता, इसीलिए जीवन भर दुःख के सागर में डुबकियां लगाता रहता है.

पैसेवाले तो नए साल के स्वागत के लिए दिल खोलकर खर्चा करते हैं, परन्तु बेचारा मजदूर और किसान क्या खाकर नए साल का स्वागत करे. उसे तो पता भी नहीं चलता कि नया साल आ रहा है और दुनिया के हर कोने में उसके स्वागत के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम और भोज आयोजित किये जा रहे हैं. इस बार एक ही साल में किसान की फसल दो-दो बार बर्बाद हो गयी. पहले रबी की फसल को अतिवृष्टि और ओलों ने बर्बाद किया, उसके बाद खरीफ की फसल कम वर्षा के कारण सूख गयी. अब वह किसी तरह अगले साल की रबी फसल बोने की तैयारी कर रहा है, परन्तु पानी कहीं नहीं है. किसी तरह नलकूप से पानी लेकर बीज बो भी दे तो पता नहीं वह उगेगी या नहीं. अगर उग आई तो इस बात की क्या गारण्टी कि फिर से बारिश और ओले नहीं गिरेंगे और पकती फसल को बर्बाद नहीं करेंगे. किसान फिर भी मेहनत करने से बाज नहीं आता और खेतों में बीज डालता ही रहता है.

मजदूर और किसान के लिए क्या नया साल और क्या पुराना साल? यह तो पैसेवालों के चोंचले हैं, जो मौज-मस्ती करने के नए-नए तरीके ईजाद कर लेते हैं. बाजारवाद सबके ऊपर हावी है. अब लोग वह सारे त्योहार मनाने लगे हैं, जिनमें केवल पैसे का दिखावा होता है, पैसे का बाजार लगता है और लोग दान-चंदा देकर पानी की तरह पैसा बहाकर त्योहारों, उत्सवों और आयोजनों को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां हैं.

राहुल गांधी बेकार का रोना रोते हैं कि वह गरीबों की लड़ाई हमेशा लड़ते रहेंगे. गरीबों की लड़ाई तो उनकी दादी ने भी लड़ी थी, उनके पिताश्री ने भी और अब वह भी कमर कसकर गरीबों के हित के लिए लड़ाई लड़ने की दिन-रात कसमें खाते रहते हैं और जब कसमें खाते-खाते ऊब जाते हैं, तो चुपचाप विदेश में मौज-मस्ती के लिए निकल जाते हैं. राहुल की गरीबों के लिए लड़ाई लड़ने का एक फायदा उनकी पार्टी को अवश्य होता है कि वह गरीबों के मत के सहारे सत्ता में आ जाते हैं और गरीब हमेशा के लिए गरीब ही रह जाता है. अब यह भी कोई समझाने की बात है कि राहुल भैया ने अगर गरीबों को अमीर बना दिया तो वह फिर किसकी लड़ाई लड़ेंगे और जब उनके पास कोई लड़ाई नहीं रह जाएगी, तो वह सत्ता में क्या करने के लिए आएंगे. सत्ता कोई भड़भूजे का काम तो है नहीं. यहां आकर नेता गरीबों की लड़ाई लड़ता है और खुद अमीर बनता रहता है.

राहुल भैया से मेरी एक गुजारिश है कि वह गरीबों को नए साल की भी थोड़ी-बहुत जानकारी दें कि वह किस प्रकार उसका स्वागत करके छोटी-मोटी खुशियां अपने दामन में भर सकें. वह अपने संसदीय क्षेत्र में जाकर मिनरल वाटर पीते हैं और गरीबों का दिया हुआ पानी का लोटा पीछे सरका देते हैं. ऐसे में गरीब को पता कहां चलेगा कि उसे क्या करना है, क्या नहीं करना है. उसे भी बिसलेरी का पानी देने के लिए राहुल को कोई उद्यम करना चाहिए, केवल भाषण देने से न तो गरीब अमीर होंगे, न वह शिक्षित हो सकेंगे.

राहुल भैया कम से कम अपने मतदाताओं को इतनी जानकारी तो दे ही सकते हैं कि खुशियां प्राप्त करने के लिए कौन से देश की यात्रा करनी चाहिए. वह अपनी विदेश यात्रा को गुप्त रखते हैं. इससे गरीब जनता को विदेश के बारे में कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती. उनसे अच्छी तो उनकी मां सोनिया गांधी हैं, जो मीडिया को बताकर जाती हैं कि वह अपने मेडिकल चेक-अप के लिए अमेरिका जा रही हैं. इससे इतना तो साबित हो जाता है कि अपने देश में प्रर्याप्त मेडिकल

सुविधाएं नहीं हैं कि आम आदमी अपने जुखाम का इलाज भी भारत में करवा सके. राहुल भैया अगर इस तरफ भी ध्यान दें, तो अच्छा होगा. गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों की जो हालत है, वह किसी से छिपी नहीं है. उससे बेहतर तो जानवरों के अस्पताल हैं. मेरा मतलब जहां अमीरों के कुत्तों का इलाज होता है. शहरों में उनके लिए बड़े-बड़े वातानुकूलि केयर सेंटर हैं. कम से कम इसी तरह के केयर सेंटर गरीबों के लिए भी राहुल भैया को गांवों में खोलने चाहिए, ताकि गरीब वहां अपना इलाज नहीं तो बाहर से देखकर ही सेहतमंद होने के सपने देखता रहे.

यह कोई पहला नया साल नहीं है, न अंतिम. न जाने कितने नववर्ष आए और चले गए. गरीब आदमी रुपये की तरह दुबला होता चला गया, नेता डॉलर की तरह पूंजीवादी हो गए और मालामाल होकर इसी देश में फलफूल रहे हैं. जिनको फलना-फूलना चाहिए, वह सूख रहे हैं, और जिनको देश की सेवा करनी चाहिए, वह गुब्बारे की तरफ फूल रहे हैं और फूट भी नहीं रहे हैं.

नए साल में मैं किस मुंह से अपने पाठकों, लेखकों और शुभचिंतकों को शुभकामनाएं दूं, समझ में नहीं आ रहा है, क्योंकि नए साल के पहले महीने से ही मैं प्राची का मूल्य 20 रुपये से 30 रुपये करने जा रहा हूं. कोई भी पाठक मुझे माफ नहीं करेगा.

अंत में लोगों से मेरा यही निवेदन है कि अब जब कभी कोई नेता आपके पास वोट मांगने आए और आपकी लड़ाई लड़ने की बात करे, तो आप उससे यही कहिएगा, भैया, अपनी लड़ाई तो मैं आप लड़ लूंगा. आप तो बस मेरे लिए इतना करो कि इस वर्ष नए साल के जश्न में मुझे भी अपने साथ ले चलो. देख तो लूं कि अमीर लोग नया साल कैसे मनाते हैं.

देखते रहना, नेताजी कहीं चुपके से भाग न जाएं.

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