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प्राची - जनवरी 2016 - कहानी / संपाती / अवधनारायण मुद्गल

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कहानी

संपाती

अवधनारायण मुद्गल

से लगता है कि वह दूर की हर चीज देख सकता है लेकिन नजदीक की कुछ भी नहीं देख पाता. वह आंख के डॉक्टर से मिला है और सभी ने कहा है कि उसकी आंखें बिलकुल ठीक हैं कि उसे भ्रम हो गया है कि उसे किसी ‘साइक्रेटिस्ट’ को दिखाना चाहिए. और उसे लगा है, दूसरों की आंखें देखते-देखते डॉक्टर अपनी आंखें खो बैठा है. बगैर उपकरणों के वे न दूर का देख सकते हैं, न पास का. तब उसे खुशी हुई कि वह कम-से कम दूर का तो देख सकता है.

जब से उसे अपनी दूरदृष्टि का एहसास हुआ है तब से उसे यह भी एहसास हुआ है कि दुनिया बहुत छोटी हो गई है. उसके विचार से ऐसा किसी वैज्ञानिक चमत्कार की वजह से नहीं हुआ है, यह उसकी अंतश्चेतना की महानता और विस्तार का

चमत्कार है.

उसने अकसर सोचा है-जब इतनी बड़ी दुनिया छोटी हो सकती है तब दुनिया के छोटे-छोटे हिस्सों पर बसे ये देश, शहर, मकान, और आदमी और भी छोटे होने चाहिए. और उसे महसूस हुआ है कि ये सब वाकई बहुत छोटे हैं. लेकिन यह मानने के लिए वह कभी तैयार नहीं हुआ कि वह भी उसी अनुपात में बहुत छोटा है. जब भी शीशे के सामने खड़ा हुआ है, उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया है और उसने मान लिया है कि शीशा खराब है, कि हर शीशा खराब होता है, कि वह नजदीक नहीं देख पाता कि पांच फुट सवा तीन इंच का उसे एक छोटा-सा छह या आठ इंची शीशा अपने में कैसे समेट सकता है. इसलिए वह स्वयं छोटा नहीं है.

उसका विश्वास है कि जो कुछ उसकी छोटी-सी आंखों में समा जाता है, वह बड़ा नहीं हो सकता और उसे स्वयं को छोड़कर सभी कुछ उसकी आंखों में समा जाता है. इसलिए उसे स्वयं को छोड़कर सभी कुछ छोटा है.

अपने बारे में सिर्फ मां से सुना करता है कि वह छोटा था. लेकिन मां की बातों पर यकीन कैसे किया जा सकता है, जबकि वह जानता है कि मां को कोई बात ठीक से याद ही नहीं रहती. फिर उसे उसके छोटे होने की बात ठीक से कैसे याद रह सकती है. वह मां से कई बार सिर्फ इसलिए लड़ा है कि वह उसे ‘छोटे’ कहती है. उसने बार-बार मां को समझाया है-मां, तू मुझे बेशक गालियां दे लिया कर लेकिन ‘छोटे’ मत कहा कर.

उसे याद है, एक बार उसकी पत्नी ने कहा था-जरा मेज पर चढ़कर ऊपर से दाल का डिब्बा उठा दो और उसे लगा था कि वह मेज को उससे ज्यादा बड़ा समझती है. बस, वह डिब्बा उठाने की जगह हाथ उठा बैठा था. तब से आज तक उसकी पत्नी ने एक तिनका भी उससे नहीं उठवाया.

जब भी पत्नी के पास पहुंचता है, पत्नी भीगी भेड़ बन जाती है. लगता है जैसे वह कांप रही हो, तब उसके मन में सिर्फ संतोष और प्रसन्नता का भाव ही जागता है. उसे नहीं मालूम रहता कि इनके अलावा और भी कोई भाव होते हैं. उसके बड़े होने की बात ताजा हो जाती है और उसे लगता है कि मकान की छत दीवारों पर नहीं, उसके सिर पर खड़ी है. उसे अजीब-सा बोझ और घुटन महसूस होने लगती है. वह लेट जाता-कमरे में समा पाने के लिए.

जब घर में होता है तब बच्चे वहां नहीं होते क्योंकि बच्चों के होने का मतलब होता है-खेल-कूद, शोर-शराबा, धमा-चौकड़ी और वह सब उसके होने पर नहीं होता. वे कोने में दुबककर आंखों की भाषा पढ़ते हैं, गूंगे-बहरों की भाषा बोलते-सुनते हैं. सारा घर सही अर्थों में ‘साइलेंस जोन’ बन जाता है.

वह अकसर सोचता है कि दुनिया जितनी छोटी होती जाएगी वह उतना ही बड़ा होता जाएगा. या वह जितना बड़ा होता जाएगा, दुनिया उतनी छोटी होती जाएगी. मतलब यह है कि दुनिया को छोटा बनाने के लिए उसका बड़ा और बड़ा होना जरूरी है. उसे महसूस होता है कि वह वाकई बड़ा होता जा रहा है.

जब वह ऑफिस में आया था तब एल.डी.सी. था और दो साल में ही यू.डी.सी. हो गया है. और उसे उम्मीद है कि एक दिन साहब का भी साहब बनकर रहेगा. उसमें सारे गुण साहब के ही हैं. वह छोटों को मुंह नहीं लगाता. सभी छोटे उससे डरते हैं इसीलिए खुशामद करते हैं-ठीक उसी तरह जिस तरह वह साहब की करता है. वह जानता है इसी में सबकी भलाई है-उसे उन्नति मिलती है और दूसरों की अवनति रुकी रहती है. उसे साहब की आंख माना जाता है. बड़े बाबू तक उसके सामने गऊ बने रहते हैं और कभी सींगें चढ़ा पाने के इंतजार में जुगाली करते रहते हैं. चपरासी उसका काम पहले, साहब का बाद में करता है. वह कभी साहब को सलामी देना भले ही भूल जाएं लेकिन उसे देना नहीं भूलता क्योंकि वह जानता है कि शाम को सलामियों की बैलेंस शीट चीख उठेगी कि आज एक सलामी कम है.

वह साहब के साथ ही आता है और उन्हीं के साथ उठ जाता है. क्योंकि साहब दोनों समय ताजा सब्जियां खाना पसंद करते हैं और सब्जियों की जैसी परख उसे है वैसी शायद सब्जीवाले को भी नहीं होती.

जब उसका कोई साथी उससे अपने ‘प्रमोशन’ और ‘ओवर टाइम’ के संबंध में बात करता है तो उसे लगता है-साहब रिटायर हो गए हैं और वह उनकी कुर्सी पर बैठ गया है. वह गर्दन को हल्का-सा झटका देकर और आंखों को जरा-सा उठाकर कहता है-अच्छा, देखूंगा. जब बड़े बाबू उससे अपना कोई ‘वाउचर’ पास करवाने की बात करते हैं तब तो उसे कतई शक नहीं रहता कि वह साहब नहीं है और जब साहब अपने किसी काम के लिए कहते हैं तो सिर के बल दौड़ता है, आनन-फानन काम निपटाकर आ खड़ा होता है. महसूस करता है कि वह साहब का भी साहब बन गया है. सारे काम उसके इशारे पर हो रहे हैं.

उसके साथी उसके पीछे उसे ‘वेरी इंपोटेंट फाइल आफ बॉस’ पुकारते हैं. उनका कहना है कि उसे भले ही पता न हो कि किस फाइल में क्या है, लेकिन यह अवश्य पता है कि साहब चाय में कितनी चम्मच शक्कर लेते हैं या कितनी देर में ‘फारिग’ होते हैं.

साहब जब छुट्टी पर जाते हैं तो उसे लगता है, कि ऑफिस एक बेकार की चीज है, कि सारा ऑफिस एक कूड़े का ढेर बन गया है और दुर्गन्ध फैलने लगा है, कि उसे भी छुट्टी ले लेनी चाहिए, कि ऑफिस में मक्खी मारने से अच्छा है घर चलकर बच्चों को मारे. तभी अचानक उसे लगता है अगर उसने भी छुट्टी ले ली तो सारा ऑफिस छुट्टी पर चला जाएगा. वह जानता है कि ये लोग बड़े निकम्में, आलसी और जाहिल हैं. ये मन से नहीं, डर से काम करते हैं. साहब का मतलब इनके लिए ‘डायरेक्ट एक्शन’ है और उसका मतलब ‘इनडायरेक्ट एक्शन’.

उसे लगता रहा है-जितना उसे मिलना चाहिए, उतना मिल नहीं पा रहा. शायद उसकी गति में कुछ कमी है. यदि यही ढंग रहा तो वह कभी अपनी मंजिल नहीं पा सकता. हांलाकि वह अभी तक यही निश्चय नहीं कर पाया है कि उसकी मंजिल है क्या और जब वह मंजिल के निर्णय में उलझा है, सिर झटककर सिर्फ यही निर्णय ले पाया है कि मंजिल सिर्फ छोटे लोगों की होती है-बड़े लोगों की कोई मंजिल नहीं होती, कि हर मंजिल एक दायरा और हर दायरा छोटा होता है, कि वह हर दायरे से बड़ा होता है.

अब वह दूसरों के सामने और दूसरों के लिए पहेलियों में बातें करने लगा है, कि उसमें एक नया अस्तित्व बोध, नयी संस्कृति और नया संस्कार पैदा हो गया है, कि अब वह विशिष्ट हो गया है और उसे साधारण व्यक्ति या कर्मचारी की तरह नहीं रहना चाहिए कि उसका हर तौर-तरीका, दूसरों से अलग होना चाहिए.

उसने मन ही मन कुछ निश्चय किए हैं. पहला निश्चय है-धीमें चलने की आदत छोड़ देना. दूसरा-लंबी छलांग का रास्ता अख्तियार करना. तीसरा और महत्वपूर्ण निश्चय-छोटी दुनिया के छोटे लोगों को जहां तक हो सकेगा, मुंह नहीं लगाएगा. और चौथा निश्चय अभी किया नहीं लेकिन यह तय कर लिया है कि चौथा निश्चय भी करेगा अवश्य.

पहले वह कभी-कभी सीढ़ियां चढ़कर भी ऑफिस पहुंच जाया करता था जो दूसरी मंजिल पर ही है किंतु अब लिफ्ट के बगैर नहीं जाता. उसे लगता है कि सीढ़ियां छोटे लोगों के लिए हैं. जब भी ऐसा होता है कि वह लाइन में पहले नंबर पर पहुंचता है और लिफ्ट चली जाती है तो वह लिफ्टमैन पर सवार हो जाता है. मन ही मन उसे दर्जनों गालियां देता है और पड़ोस में खड़े व्यक्ति को मजबूर कर देता है कि वह भी उसे भला-बुरा कहे और यह महसूस करे कि दीवाली पर इन लोगों को बख्शीश नहीं दी जानी चाहिए.

अब वह अक्सर अपने साहब की जगह बड़े साहब के ‘पी.ए. साहब’ के साथ दिखाई देने लगा है. उसे विश्वास है कि एक न एक दिन वह पी.ए. साहब के सहारे ही बड़े साहब तक पहुंच जाएगा. आखिर बड़े साहब भी तो सब्जियां खाते ही होंगे. वह मन ही मन मुसकाने लगता है और सोचता है-जब तक वह स्वयं वहां तक नहीं पहुंचता, तब तक उसके विचार, उसकी बातें तो पहुंचती ही रह सकती हैं.

उसे लगता है कि उसकी चाल में तेजी आ गई है. वह दौड़ता हुआ-सा चलता है. जब वह दौड़कर सड़क पार कर रहा होता है और कोई कार या टैक्सी आकर चीं करती हुई रुकती है तो उसे अजीब-सा संतोष होता है. पहले उसे ऐसी परिस्थिति में डर लगता था, दिल घंटों तेजी से धड़कता रहता था. लेकिन अब ऐसा नहीं होता. उसे लगता है उसके अंदर का वी.आई.पी. सड़क पर आ गया है और कोई भी गाड़ी तब तक आगे नहीं बढ़ सकती, जब तक वह सड़क पार न कर ले.

वह बात-बात में बिगड़ जाता है. साथी भी उससे कन्नी काटने लगे हैं. पहले वह अकसर अपने साहब के केबिन की चिक उठाया करता था, अब बड़े साहब के ‘पी.ए. साहब’ का टेलीफोन उठाया करता है और जाहिर ऐसे करता है जैसे सीधे बड़े साहब से ही बात कर रहा हो. उसके साहब को भी उसकी इन हरकतों का पता चल गया है. वह कुछ खिंचे-खिंचे रहने लगे हैं. लेकिन उसे महसूस होता है जैसे उससे डरे-डरे और सहमे-सहमे से रहते हैं. पहले उसे लगता था, आसमान उसके सिर से सिर्फ आठ इंच ऊपर ठहरा है. अब लगता है आठ इंच नीचे आकर उसके कंधों पर टिक गया है. अगर जरा भी और कोशिश की गई तो पैरों से आठ इंच नीचे पहुंच जायेगा.

पहले वह साहब के न रहने पर ही कभी-कभार छुट्टियां लिया करता था लेकिन अब साहब के रहने पर ही छुट्टियां लेने लगा है वह भी बगैर बताये. छुट्टी लेकर वह घर में ही बंद हो जाता है और महसूस करता है-आज ऑफिस में कलमबंद हड़ताल चल रही होगी. उसे दिखाई देता है-साहब कुर्सी पर पहलू बदल रहे हैं. बार-बार उसके बारे में पूछ रहे हैं और परेशान हो रहे हैं. सारे विभाग में उसी के चर्चें हैं. अकसर उसे लगता है-अब साहब ने चपरासी भेजा होगा उसकी खैरियत जानने और किसी जरूरी काम के बारे में पूछने. चपरासी आधा रास्ता तय कर चुका होगा...अब घर के पास की गली के नुक्कड़ पर आ गया होगा. वह पत्नी को आवाज देता है-देखो, दरवाजा बंद कर लो और कोई पूछने आये तो कह देना-‘‘साहब घर पर नहीं हैं.’’

ऐसी छुट्टी के दिन उसकी पत्नी और डरी रहती क्योंकि उस दिन वह उससे खूब हंस-हंसकर बातें करता है, खूब खाता है और खूब सोता है. शाम को जागते ही पूछता है-कोई आया था और उत्तर ‘नकार’ में सुनकर मन ही मन चपरासी पर भड़क

उठता है.

आजकल वह देर से घर आता है. सड़कों पर अकेले घूमना, थक जाने पर किसी सस्ते से ‘रेस्तरां’ में चाय पीना और मन ही मन लोगों की सलामी की कल्पना करना उसे अच्छा लगता है. वह बार-बार हाथ उठाकर माथा खुजलाने लगता है जैसे सलामी का जवाब देने के लिए ही हाथ उठा हो.

सड़क पर चलते समय उसकी हरकतें ऐसी होती हैं कि लोग उसे घूर-घूर कर देखने लगते हैं. लोगों को घूरता देखकर उसकी गर्दन अकड़ जाती है. लोग उसे देखकर हंसने लगते हैं. वह सोचता है लोग पहले हर बड़े आदमी पर ऐसे ही हंसते हैं और वह भी मुस्कराने लगता है. मन ही मन निश्चय करता है कि एक दिन इन सबको लाइन में खड़ा करके परेड करायेगा. और इस परेड का पहला अभ्यास बीवी-बच्चों से करने के लिए घर की ओर चल देता है.

शाम को ऑफिस छोड़ने से पहले उसे कारण बताओ नोटिस मिली है. उसने पूरा साल अनियमितताओं में बिताया है, अधिकतर बगैर बताये हुए छुट्टियां मनाई हैं. सारी फाइलें अनछुई पड़ी हैं. विभाग से उसका व्यवहार भी अच्छा नहीं रहा. फिर क्यों न उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए?

आज उसका मन घूमने का नहीं कर रहा. साहब, बड़े साहब और बड़े साहब के पी.ए. साहब सभी जा जा चुके हैं. वह मन हीम न सबको गालियां देता हुआ सीधा घर आ गया है और चुपचाप अपने कमरे में जाकर लेट गया है. लेटे-लेटे ही पत्नी को आवाज देता है-‘‘देखो, कल मैं आफिस नहीं जाऊंगा. कोई आये तो कह देना-‘‘साहब घर पर नहीं हैं.’’

आज भी वह यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि वह छोटा है या छोटा हो गया है. वह सोच रहा है, सभी छोटे और नीच हैं, कोई ऐसा नहीं, जिससे मिला जाय या जिसे अपने से मिलने दिया जाय.

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