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प्राची - जनवरी 2016 - हास्य-व्यंग्य / कोई अपनी दुल्हनिया बना लो मुझे / कुंवर प्रेमिल

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हास्य-व्यंग्य

कोई अपनी दुल्हिनिया बना लो मुझे

कुंवर प्रेमिल

‘चांद तारों के गहने पिन्हा दो मुझे, कोई अपनी दुल्हिनिया बना लो मुझे...चांद तारों के...’

यह पुराना-सुराना सा गीत न जाने क्यों मैं बार-बार गाने लगा था. जब भी कभी लिखने-पढ़ने से फुर्सत मिलती और मैं दुल्हिनिया बनने के सपने देखने लग जाता.

एक दिन भीतर के भीतर और भीतर रहने वाले दिल भाई जान ने कहा- ‘‘क्या बात है भाई मियां, अब तो बाकायदा दूल्हा बनने की उम्र भी नहीं है...और तिस पर पुरुष होकर दुल्हिन बनने के गीत गाकर आखिर क्या सिद्ध करना चाहते हैं आप?’’

‘‘और सुनो, मुंह में दांत नहीं (अभी डॉक्टर से बचे-खुचे दांत निकलवाकर आये हो) पेट में आंत नहीं है...ये सब क्या है?’’ मैं इस भीतर वाले की टोंका-टाकी से कभी-कभी परीशान-परीशान सा रहता हूं...अभी कुल जमा पैंसठ का पट्ठा ही हुआ हूं...और पचहत्तरवां साल में शादी करने वाले पट्ठे को क्या कहोगे- जो अभी अभी अखबार की सुर्खियों में था.

औरतों के किस्से रानी-महारानियों से शुरू किये जाएं तो अब तक औरतों के जितने ठाठ हैं उतने हम आदमियों के कहां हैं. खुदा झूठ ने बुलाए आजकल आदमियों का दिल भी औरत बन जाने के लिए यूं ही नहीं धड़कता है. खूबियां ही खूबियां भरी पड़ी हैं औरत में. मेरा वश चले तो मैं आज से ही कुंवर साहिब से कुंवरानी साहिबा बन जाऊं.

एक पांच बहुओं के ससुरजी थे जो बाकायदा औरत बनकर अपनी बहुओं के साथ रहा करते थे. साड़ियां पहनते थे, कजरा लगाते थे. पांव में पाजेब, गले में हार, बिलकुल औरतों का सा था उनका कारबार. कोई पहली बार उनके घर आता या आती तो उन ससुरजी को बाकायदा उन बहुओं की सास ही समझती. बेचारी बहुअें को भी अपनी सास की भरपाई हो जाती.

एक और साहब थे, पुलिस महकमे के बड़े अफसर थे. वे भी नारी वेश में रहते थे, कमोबेश. वह राधा के उपासक थे, बाकायदा राधा बनकर रह रहे थे. कृष्ण की उपासना का समय बीत गया, अब जमाना राधाओं का है. कुड़ी बनकर रहोगे तो ऐश किया करोगे.

कहते हैं पांचों पांडव जब अपने राज्य से निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे, तब अर्जुन बाकायदा औरत बनकर रह रहे थे. बल्कि उस राज्य का सैन्य मंत्री उन पर ऐसा मुग्ध हुआ कि पूछो मत. भीम को बीच में कूदना पड़ा, बड़ी मुश्किलों से उसका मर्दन करना पड़ा. आदमी अगर औरत बन कर सामने खड़ी हो जाए तो औरत के भी छक्के छूट जाएं. हां नहीं तो!

इस समय में हाउस वाइफ के मजे ही मजे हैं. धोबी कपड़े धोए, एक बाई बर्तन धोए, एक झाड़ू-पोंछा तो दूसरी रसोई करे, मालकिन या तो ताश खेले या मन के माफिक घूमा करे. शापिंग करे, क्लब जाए, आदमी के घर लौटने पर हाय तौबा मचाए. सारे टेंशन पति की और पत्नीजी टेंशन फ्री. एक बच्चा या बच्ची पैदा कर ली और उसके बाद उससे भी तौबा कर ली.

औरत के कपड़े- रंग-बिरंगी साड़ियां, लो कट ब्लाउज, कमसिन चप्पलें, लिपिस्टिक, पाउडर, मेंहदी, टैटू के साथ ढेर सारे जेवर, ऐसे ही नहीं होते हैं औरत के तेवर! एक औरत कम-ज-कम एक लाख की होती है.

इसलिए न औरत की साख होती है. उसके सामने आदमी हमेशा टुटपुंजिया सा दिखता है. फटीचर सा, चेहरे पर हवाइयां उड़ाता सा, बदहवास सा, मजनू-आवारा सा. न कोई ग्लैमर न सूरत पर कोई चकाचौंध. अरे भैया औरत, आसमान में बनते इंद्रधुनष सी होती है. नजरें एक बार चेहरे पर जम जाएं तो फिसलने का नाम तक नहीं लेतीं.

भैये, अरे काहे का आदमी. दिन भी पेट की जुगाड़ में मुंह पितरा जाता है. आंखें बाहर निकल आती हैं. पैसा कमाने के चक्कर में कमर टेढ़ी हो जाती है. दो जून की रोटी के लिए दिन भर खटना पड़ता है. रुपया-रुपया रटना पड़ता है. रुपया सपने में भी नजर नहीं आता है. जैसे-तैसे नजर आया भी तो घरवाली को देखते ही उसकी गोद में उचक जाता है. बिना काम करे घरवाली पैसेवाली और आदमी हमेशा खाली का खाली.

‘कुड़ियों का है जमाना’- किसी फिल्मी गीत की कड़ी आपने भी सुनी होगी. मुसीबत से पाना है छुटकारा तो ‘फीमेल’ में कन्वर्ट हो जाओ. सिक्का नारी का ही चलता है. हर जगह औरत की चलती है. अच्छा कभी आपने किसी महिला को रेल या बस में खड़े-खड़े यात्रा करते देखा है.

नहीं न, देखेंगे भी नहीं. कोई न कोई उठकर जगह बना देता है. औरत की नजरें इनायत के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता है. और तो और, औरत का रूमाल ही आदमी के लिए बहुत कुछ होता है. मेरे मित्र हैं दामोदरदासजी, उन्हें कॉलेज में पढ़ते समय किसी कुड़ी ने एक रूमाल क्या दे दिया था, अभी भी दिल से लगाए बैठे हैं उसे.

सुनीता जी ने स्पेस में सात चक्कर लगाए. मैं इसी चक्कर में हूं कि कुंवरानी बनकर अगली बार स्पेस में पहुंच भर जाऊं. पूरे इक्कीस चक्कर लगाऊंगी. वह तो फिर भी जमीन पर लौट रही हैं- मैं वहां से लौटने का नाम तक न लूंगी. इतिहास बन जाएगा. मैंने अपनी बीवी से चाट-पकौड़े बनाना सीख लिया है. वहां भी बनाऊंगी. आने वालों को भर-भर पानी के बताशे खिलाऊंगी.

देखो जी, मैं औरतजी के रुतबे से पूरी तरह प्रभावित हूं. मेरी पत्नीजी मुझ पर ऐसा हुकुम चलाती हैं कि मेरा मन पत्नी बनने के लिए तरस-तरस जाता है. मौज-मस्ती करना है तो औरत का रूप धरो. कार में घूमो, रास्ते भर जलपान करो. खुद कार में पसरी रहो और पतिदेव को बार-बार दौड़ाओ- यह लाओजी- वह लाओ. औरत होती ही है आराम तलबी के लिए. मेकअप ऐसा करो कि आदमी हुकुम का गुलाम बना रहे. मुझे तो पिंकीजी पर रह-रहकर तरस आ रहा है. औरत बनकर पूरी तरह छाई हुई थीं. खूब इनाम-इकराम झटक रही थीं. क्या जरूरत थी उन्हें अपनी लिव इन पार्टनर से लफड़ा करने की, अच्छी भली औरत बन गई थीं, बनी रहतीं. स्वर्णपदक हथियाती रहतीं.

मैं यदि एक बार औरत बन गई तो ताजिंदगी औरत ही बनी रहूंगी. जरा-जरा सी बात पर हाय रब्बा-हाय रब्बा करूंगी. हाथ भर कर चूड़ियां पहनूंगी, ऐसी लहरियादार साड़ी पहनूंगी कि पूछो मत- पूरी कुंवरानी दिखूंगी. चौबीसों घंटे लिपिस्टिक से होंठ रंगे रहूंगी. कमर मटकाना सीख लिया है, आते-जाते ऐसी कमर मटकाऊंगी कि देखनेवालों की नजरें नहीं हटेंगी.

बालों के छल्ले देखकर हो जाएगी अच्छे-अच्छों की बल्ले-बल्ले. सामने कोई पड़ गया तो कहूंगी- अरे परे हट मुटल्ले. अरे चौबीसों घंटे, आठों पहर मेरे होंठों पर एक ही गीत रहेगा- चांद-तारों के गहने पिन्हा दो मुझे, कोई अपनी दुल्हिनियां बना लो मुझे...चांद तारों के.

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सम्पर्कः एम.आई.जी.-8, विजय नगर, जबलपुर-482002

मोः 9301822782

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