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प्राची - जनवरी 2016 - नारी अस्मिता / नारी आज और कल / डॉ. शिल्पी सिंह

 

नारी अस्मिता

नारी आज और कल

डॉ. शिल्पी सिंह

नारीवाद एक ऐसा विचार है जो पुरुष व स्त्री के मध्य असमानता को अस्वीकार कर नारी के सबलीकरण की प्रक्रिया को बौद्धिक व क्रियात्मक रूप में प्रस्तुत करता है. नारीवाद एक विचारधारा भी है और आंदोलन भी. आज लिंग केन्द्रीयता समाज की व्यवस्था का अंग है. इसमें नारी का शरीर एक वस्तु बन जाता है. वस्तु जिसका उपयोग-उपभोग अपनी इच्छानुसार किया जा सकता है. नारी वस्तु है या व्यक्ति, यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है.

लिंग का सामाजिक व सांस्कृतिक भेद संस्थागत होता है और यह भेद सार्वभौमिक है. हालांकि इस भेद को प्रकट करने के तरीके भिन्न-देश और काल से भिन्न होते हैं. चाहे वह परिणाम शक्ति व प्रभुता से अलग रहता हो पर फिर पुरुषों के सामने निम्न स्थिति मानने जैसी बात हो. अगर कोई महिला अपने पुरुष साथी की अपेक्षा ज्यादा काम करती है तो भी इसे परिवार अथवा समाज में वो स्थान प्राप्त नहीं होता जिसकी वह अधिकारी है.

सभी साहित्यकारों व पुस्तकों में भी नारीवाद पर खूब चर्चा होती है परंतु वास्तविकता में उन्हें फुटनोट की भांति प्रस्तुत किया जाता है. वस्तुतः मानव समाज का इतिहास महिलाओं की सत्ता, प्रभुता एवं शक्ति से दूर रखने का इतिहास है और इसलिये प्रत्येक देश, प्रत्येक काल, प्रत्येक जाति, प्रत्येक धर्म में महिला को पुरुषों के बराबर न आने देने की संरचनात्मक सांस्कृतिक बाध्यताएं बनायी हैं.

महिला विमुक्ति आंदोलन में मुख्यतः दो धारणाओं पर बल दिया जाता है- 1. समानता का अधिकार, और 2. भेद-विभेद का अधिकारवाद.

समानता का अधिकार पुरुष व स्त्री इन दोनों में समानता का प्रतिपादन करता है और यह मानता है कि जो कार्य पुरुष कर सकते हैं, वही कार्य उतनी ही दक्षता से महिला भी कर सकती है, जबकि भेद-विभेद का अधिकारवाद पुरुष व महिला जगत में शारीरिक व प्राकृतिक भेद की सार्वभौमिकता को स्वीकार करता है.

एक लिंग के रूप में महिलाओं की विषम व शोचनीय स्थिति को समझाने के लिये यह आवश्यक है कि पुरुष वर्ग आगे आकर इस कार्य में महिलाओं की मदद करे तथा उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें और उनके सर्वांगीण विकास के लिए परंपरागत व संरचनात्मक परिवर्तन की पहल करें.

आज देश-विदेश में नारी विकास पर खूब चर्चा हो रही है. आज जरूरत है कि वैचारिकी में परिवर्तन के साथ-साथ नारी को आर्थिक शक्ति प्रदान करना पड़ेगा, तभी वह सशक्त होगी. आज महिला शोषित है, क्योंकि वह आर्थिक रूप में स्वतंत्र नहीं है. आज आंकड़े जो उपलब्ध हैं उसमें यह खूब चर्चा होती है कि महिला शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हुई है, परंतु जो पढ़-लिख गयी हैं, क्या उन्हें रोजगार मिल पा रहा है. एक तो शिक्षा ग्रहण करने के लिए उन्हें इतना संघर्ष करना पड़ता है फिर विवाह के बाद रोजगार मिलना व उसको निभा पाना भी मुश्किल भरा होता है, क्योंकि परिवार के साथ बच्चों का भी पालन-पोषण करना पड़ता है.

जरूरत है कि हमारी सरकार हमें सामाजिक रूप से

अधिकार प्रदान करने के साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत करे, स्वावलंबी बनने में मदद करे. महिलाएं चाहे उच्च वर्ग की हों या निम्न वर्ग की, वह प्रत्येक स्तर पर शोषित, वंचित व निर्बल हैं. उन्हें आरक्षण के साथ रोजगार की आवश्यकता है, जिससे उनकी समाज में तो प्रतिष्ठा तो बढ़ेगी ही व परिवार में स्थिति मजबूत होगी. जरूरत है सामाजिक सर्वेक्षण व अनुसंधान की. जो महिलाएं सक्षम हैं उन्हें रोजगार प्रदान किया जाये. महिला केवल सजावटी वस्तु नहीं हैं, बल्कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व है. वह भी समाज के विकास में बराबर की भागीदार है.

नारी की स्थिति में अनेक बदलाव आए हैं. उन बदलाओं को प्रायः सामाजिक, सांस्कृतिक व विपणन शक्तियों ने प्रभावित किया है. नारी के गृहकार्य को आर्थिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त नहीं रही है. किसी नारी का प्रभावी स्वरूप व व्यवहार व्यक्तिगत गुण हो सकता है. पर नारी की परिस्थिति में सबलीकरण की प्रक्रिया, समूहगत, संस्कारगत परिवर्तनों से ही संभव है. हमें अब ‘‘मौन चुप्पी’’ की संस्कृति से ऊपर उठना होगा.

नारीवाद में मानवीयता आवश्यक है. समाज के मानदण्डों में बदलाव लाने के लिये संघर्ष करना पड़ेगा और पुरुष समाज को इससे जुड़ना पड़ेगा तभी असमानता को समाप्त कर महिला सबलीकरण को बौद्धिक व क्रियात्मक बल मिलेगा. निश्चय ही समानता की तरफ यह समाज का पहला और निश्चित कदम होगा.

सम्पर्कः सेक्टर- 19, 316 सत्यम् खण्ड,

वसुन्धरा, गाजियाबाद (उ.प्र.)

मोः 9810876600

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