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प्राची - जनवरी 2016 - विचार तरंग : निबंधों के संग / डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय

 

विचार तरंग : निबंधों के संग

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय

विचारात्मक निबंधों का संग्रह ‘विचार-तरंग’ बहुविधि निबंध

विधा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें अड़तीस विविध-विषयक निबंध समसामयिक परिप्रेक्ष्य में ज्वलंत समस्याओं के जीवंत दस्तावेज सिद्ध हुए हैं. वस्तुतः निबंध एक ऐसी साहित्यिक विधा है. जिसमें लेखक किसी विषय से संबंधित अपनी वैयक्तिक अनुभूति व्यक्त करता है. जिसे भाषा का गद्यात्मक रूप कहा जाता है. लेखक निबंध में वैयक्तिक अभिव्यंजना को ज्ञानात्मक और भावानात्मक सत्ता के परिपार्श्व में सरस एवं रुचिकर शैली में व्यक्त करता है ताकि पाठकों को रसानुभूति हो सके और उनको नैतिक मूल्यों की जानकारी हो सके. बाबू गुलाबराय के मतानुसार

निबंध उस गद्य-रचना को कहते हैं. जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन स्वच्छन्दता, सौष्ठव और सजीवता तथा आवश्यक संगीत और समबद्धता के साथ किया गया हो. रचना शैली की दृष्टि से

निबंध को चार भागों में विभक्त किया गया है. विवरणात्मक, भावात्मक, विचारात्मक एवं वर्णनात्मक. शैली भी निबंध विधा में महत्व रखती है जिसमें व्यास शैली, समास शैली, धारा प्रवाह शैली एवं तरंग या विक्षेप शैली देखी गई है. यही कारण है कि पाश्चात्य लेखक जॉनसन ने लिखा है कि ‘निबंध स्वच्छन्द मन की वह तरंग है जिसमें तारतम्य और सुगठन न होकर विश्रृंखलता की प्रधानता रहती है. समीक्ष्य कृति ‘विचार तरंग’ इसी क्षितिज का विस्तार करने में सक्षम सिद्ध है.

प्रथम पांच निबंध पावस, शरद, शीत, मधुमास एवं वजपन के प्रतिदर्श हैं. जिनमें आनन्दमय वातावरण को रेखांकित किया गया हे. साथ ही भारतीय संस्कृति एवं शरद ऋतु के सुपावन त्यौहारों-पर्वों को भी सांस्कृतिक समन्वय के परिप्रेक्ष्य में देखा गया है. आलोक पर्व दीपावली तमसो मा ज्योतिर्गमय, दशहरा-असतो मा सद्गमय एवं मृत्योर्मा अमृतंगमय का संदेश देते हैं और यही सम्प्रति उपदेश भी सिद्ध हुआ है. संवेदनशील निबंधकार ने सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के क्षरण और हरण पर क्षोभ प्रकट किया है. तथा मानवतावादी दृष्टि के ह्रास पर चिंता जिसकी परिणति में ‘मनुष्यता का मरण’ निबंध की सर्जना सम्भव हुई है. लेखक का स्पष्ट मत है कि अगर हम सच्चे अर्थों में मनुष्य बन जाएं तो इस वसुधा को स्वर्ग बनने में तनिक भी विलम्ब नहीं लगेगा. अतः हम अन्य सबकुछ बनने की अपेक्षा सच्चे मनुष्य बने.(पृ. 50).

जंगल का क्रन्दन लेखक को आकुल-व्याकुल एवं व्यग्र करता है जो सम्प्रति एक राष्ट्रीय समस्या भी है. शिक्षक दिवस पर व्यंग्योक्ति के माध्यम से तिक्तशब्दों में पीड़ा व्यक्त की गई है क्योंकि शिक्षक के स्थान पर ‘शिक्षाकर्मी, संविदा शिक्षक’ जैसे शब्दों की संरचना पर घोर आपत्ति उठाई गई है. वास्तव में शिक्षा राष्ट्र की मेरुदण्ड होती है और शिक्षक राष्ट्र निर्माता. ‘चिंता का चक्रव्यूह’ मनोवैज्ञानिक निबंध है. जिसे एक मनोविकार के रूप में विवेचित किया गया है. चिंतामुक्ति के लिए सत्संग, सद्ग्रंथों का स्वाध्याय, सद्मित्रों का संग, अपने इष्ट का पूजन भजन, तीर्थाटन एवं प्रकृति का आश्रय आदि को उक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है. सद्सुझाव देते हुए लेखक ने लिखा है, ‘हम चिंताओं से बचें. ये जलती हुई चिताओं के समान है हमारा सर्वनाश करने वाली

हैं.’ (पृ.63)

‘पशु एवं मानवीय संवेदनाएं’ में संवेदनशीलता के धरातल पर वैयक्तिक अनुभूति को समष्टिगत करते हुए तथ्यान्वेषण के लिए ईश्वरीय सत्ता एवं प्रारब्ध पर विश्वास रखने के लिए कहा गया है. नदी की आत्मकथा प्राकृतिक धरोहरा के संरक्षण की आत्मकथा है, गाथा है जिसमें अस्तित्व की सार्थकता को इंगित किया गया है. ‘संवेदनाओं की विदाई’ पर लेखक क्षोभ प्रकट करता है तथा परहित को धर्म की संज्ञा देता है क्योंकि ‘मानवीय संवदेनाएं एवं मानव मूल्य ही मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं. (पृ. 77)

मानव को त्रिगुणात्मक सृष्टि की अनुपम कृति स्वीकारते हुए मानवीय मूल्यों की संस्थापना में संपूर्ण समाज की सजगता एवं सहभागिता की अनिवार्यता चिंतनशील लेखक ने स्वीकार की है क्योंकि ‘मानवीय मूल्यों से ही समाज में सद्भावना की निर्मिति होती है. (पृ. 83) ‘विकासशील भारत एवं भ्रष्टाचार’ निबंध में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार का सर्वेक्षण-निरीक्षण प्रस्तुत किया गया है. फिर भी भारत सम्प्रति विकसित राष्ट्रों में गिना जाता है.

सर्वशिक्षा अभियान के अन्तर्गत ‘स्कूल चलो अभियान’ को वर्ण्य-विषय बनाया गया है तथा शैक्षिक-जगत की कमियों को भी इंगित किया गया है ताकि शिक्षा में सुधार हो सके.

‘भ्रष्टाचार एवं लोकपाल’ निबंध में भी राजनीतिक परिवेश को दृष्टिगत रखते हुए नैतिक गुणों के विकास पर बल दिया गया है. ‘अतः अधिक अच्छा हो कि प्रतिभावान, चरित्रवान, ईमानदार एवं सद्गुणी व्यक्ति ही शासन एवं सत्ता में आगे लाए जाएं.

(पृ.108)

दया, ममता, ईमानदारी, नैतिकता, परोपकार, सचरित्रता, आदि को ‘चरित्रबल’ शीर्षकान्तर्गत विवेचित किया गया है क्योंकि चरित्रनिर्माण का मूल तत्व संकल्पशक्ति है. जिस व्यक्ति में जितना अधिक संकल्प बल होता है, वह उतनी ही दृढ़ता एवं निर्भीकता से अपने लक्ष्य की ओर सतत् अग्रसर होता है. (पृ.111)

भारतीय संस्कृति को विश्व की प्राचीनतम संस्कृति घोषित करते हुए स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि ‘अपनी विराट पाचन शक्ति, धार्मिक आस्थाओं, आध्यात्मिक साहित्य एवं शाश्वत मूल्यों के कारण अनेक संकटों के बाद भी हमारी संस्कृति अपनी जीवन्तता बनाए हुए हैं. राष्ट्रभाषा हिन्दी की दशा और दिशा पर संवेदनशील हिन्दी प्रेमी लेखक ने गहरा दुःख प्रकट किया है क्योंकि आजतक हिन्दी जनवाणी होती हुई भी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है.

आन्तरिक सुरक्षा के समक्ष चुनौतियों को स्वीकारते हुए उनका समाधान ढूंढ़ने का सुझाव दिया गया है तथा भारतीय राजनीति के मूल तत्व को भी रेखांकित किया गया है. विश्वकल्याण में भारतीय युवाओं की सशक्त भूमिका स्वीकार्य की गई है क्योंकि भारत आदिकाल से विश्व का गुरू रहा है. जिसके मूल में आध्यात्मिक शक्ति है. भारतीय स्वतंत्रता, भारतीय गणतंत्र, लोकतंत्र आदि

निबंध राष्ट्रीय चेतना मुखरित करने में सफल सिद्ध हैं क्योंकि ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गणतांत्रिक शासन प्रणाली के अन्तर्गत हमारे राष्ट्र का बहुमुखी विकास हुआ है. (पृ.166)

श्रीमद्भागवत गीता और श्रीरामचरित मानस से साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए विद्वान लेखक ने प्रमाणित किया है कि ‘सेवा निरपेक्ष साधन है.’ वसुधैव कुटुम्बकम् एवं सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामया, के स्वर्णिम सिद्धांत आदर्शराज्य एवं आदर्श स्थापित करने में सक्षम है-जिसे स्वीकार करने की आवश्यकता है. पौराणिक

धर्म ग्रंथों के माध्यम से ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में गुरु-शिष्य की महत्ता’ को विवेचित किया गया है जो युग-युगान्तर से विश्वस्तर पर चलती आ रही है. ‘श्रमिक एवं भारत’ निबंध में साम्प्रतिक आवश्यकता के अन्तर्गत श्रमिकवर्ग की समस्याएं रेखांकित की गई हैं. जिओ और जीने दो’ के सिद्धांत का अनुपालन करने वाले लेखक का स्पष्ट मत है कि ‘श्रमिक वर्ग अत्यंत सम्मानित वर्ग है. राष्ट्र निर्माण में उसकी अहम भूमिका रहती है. अतः उसे समुचित सम्मान एवं साधन दिया जाना अपेक्षित है. (पृ.186)

देश के विकास में मातृभाषा के योगदान को भी स्वीकृति दी गई है. प्रतिभा का पलायन भी चिंता और चिंतन का विषय है. जातिगत आरक्षण नीति को समाज को विखण्डित करने की एक साजिश बताया गया है. कन्याभ्रूण, बालश्रमिक, इक्कीसवीं सदी और नारी जैसे राष्ट्रीय समस्याओं पर सुधी साहित्यकार ने गम्भीर चिंतन-मनन करते हुए त्वरित समाधान प्रस्तुत किया है जिसके मूल में लम्बा जीवन का ठोस आनुभविक धरातल है. कृति का अंतिम निबंध, बालकों के विकास में बालसाहित्य की भूमिका है जिसके माध्यम से लेखक ने अपनी अध्ययनशीलता का परिचय इन पंक्तियों में दिया है-‘बच्चों को संस्कारित करना, उन्हें समाजोपयोगी शिक्षा की व्यवस्था करना प्रत्येक माता-पिता, अभिभावकों, पूर्ण समाज एवं शासन का सर्वोपरि दायित्व है. (पृ.222)

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि समाज शुभैषी लेखक ने ‘विचार-तरंग’ कृति में विषय चयन की उपयुक्ता, विवेचन की मौलिकता, क्षेत्र-विस्तार की मर्यादा, स्वतः परिपूर्णता, वैयक्तिक अभिव्यंजना, संक्षिप्तता एवं रोचकता का विशेष ध्यान रखा है. जीवन और जगत के ज्वलंत विषय के रूप में इन निबंधों का लेखन सूक्ष्म, गहन एवं गम्भीर चिंतन से लेखन ने किया है जिसके पीछे निबंधकार की ज्ञानात्मक और भावात्मक सत्ता दोनों का समन्वित योगदान है. सेंट व्यूव ने ठीक ही कहा है कि ‘निबंध साहित्य की सबसे कठिन विधा है. इसमें लेखक को अपने गम्भीर व्यक्तित्व एवं गागर में सागर भरने की सामर्थ्य का परिचय देना होता है.

लेखक ने रचनाधर्मिता का सफल निर्वहन करते हुए राष्ट्रीय चेतना के फलक पर मानवीय मूल्यों की स्थापना करने का अथक प्रयास किया है जिनकी कारयित्री प्रतिभा के सुफल के रूप में ‘विचार-तरंग’ कृति का प्रणयन सम्भव हुआ है. कृति स्वागत योग्य है. कृतिकार की दीर्घायु की अनन्त कामनाएं. अस्तु.

 

कृतिकारः सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’

प्रकाशकः पाथेय प्रकाशन, जबलपुर

प्रथम संस्करणः 2015

मूल्यः दो सौ रुपये मात्र

संपर्कः 8123 ए, शिवपुरी,

अलीगढ़ (उ.प्र.) 202001

मोः 9897452431

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