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प्राची - जनवरी 2016 - पाठकों के पत्र व साहित्यिक समाचार

 

सेवा और सहिष्णुता के उपासक संत तुकाराम

उज्जैऩ : विश्व पटल पर हिन्दी की सफलता एवं संभावनाएं पुस्तक का विमोचन कालिदास अकादमी में सम्पन्न हुआ. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. सरित कुमार चौधरी (महानिदेशक राष्ट्रीय मानव संग्रहालय संस्कृति मंत्रालय, नई दिल्ली) विशेष अतिथि डॉ. शिव चौरसिया, डॉ. पूरण सहगल, डॉ. विद्या, बिन्दूसिंह एवं गुलाबसिंह यादव थे. विशिष्ट अतिथि डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू (इतिहासिविद् प्रख्यात एवं साहित्यकार, उदयपुर) थे. सारस्वत अतिथि श्री ब्रजकुमार शर्मा (इतिहासविद् एवं प्राचार्य), अध्यक्षता डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा (कुलानुशासक वि.वि.वि. उज्जैन) ने की. शिक्षकों की शिक्षकों के द्वारा शिक्षकों के लिये गत बारह वर्र्षों से संचालित राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के द्वारा प्रतिवर्ष हिन्दी के लिए शिक्षकों के द्वारा प्राप्त आलेखों से पुस्तक का प्रकाशित किया जाता है.

समारोह में राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के पदाधिकारियों ने पुष्पमालाओं से अतिथियों का स्वागत राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रभु

चौधरी, उपाध्यक्ष अशोक भागवत, महासचिव डॉ. मनीष शर्मा, सचिव डॉ. माधुरी यादव, कोषाध्यक्ष डॉ. ज्योति मैवाल, डॉ. नैत्रा रावणकर, प्रदेश संयोजक अनिल ओझा, जिला संयोजक चित्रा पाठक ने किया. संचालन पल्लवी किशन ने एवं आभार डॉ. मनीषा शर्मा (संपादक) ने माना.

डॉ. प्रभु चौधरी, उज्जैन (म.प्र.)

विश्व हिन्दी दिवस पर राजस्थान में डॉ. गीता गीत सम्मानित

जबलपुर : विश्व हिन्दी दिवस पर राजस्थान में प्रसिद्ध श्रीनाथ द्वारा में ‘‘हिन्दी लाओ देश बचाओ’’ त्रिदिवसीय समारोह का आयोजन किया गया. प्रथम दिवस 14 सितम्बर को देश के ख्यातिलब्ध हिन्दी साहित्यकारों एवं हिन्दी प्रेमियों द्वारा एक विशाल हिन्दी दिवस जुलूस निकाला गया. पश्चात लगातार तीन दिवस तक हिन्दी सेवी साहित्यकारों, कवियों, संपादकों एवं पत्रकारों को विभिन्न अलंकारों से सम्मानित किया गया. इसी क्रम में साहित्य मंडल श्रीनाथ द्वारा के प्रधानमंत्री श्री श्याम प्रकाश देवपुरा तथा अध्यक्ष श्री नरहरि ठाकर द्वारा संस्कारधानी जबलपुर की प्रसिद्ध हिन्दी लेखिका, अहिन्दी भाषी (बंगलाभाषी) डॉ. गीतागीत को हिन्दी साहित्य भूषण की मानद

उपाधि प्रदान कर अलंकृत किया गया. इस समारोह में देश को प्रख्यात विद्वानों में श्री देवेन्द्र गोयल ‘‘मांझी’’ नई दिल्ली, श्री पूरन शर्मा, जयपुर डॉ. महेश भार्गव, आगरा, डॉ. अकेला भाई, शिलांग, डॉ. जंग बहादुर पाण्डेय, रांची, श्री हितेश कुमार शर्मा, ‘‘बिजनौर’’, डॉ. तारकेश्वर नाथ सिन्हा, जमशेदपुर श्री श्यामसुन्दर भट्ट, ‘‘उदयपुर सहित लगभग 250 विद्वानों की उपस्थिति में डॉ. गीतागीत ने स्वरचित समस्या पूर्ति कविता, ‘‘हिन्दी बने राष्ट्र की भाषा स्वाभिमान की परिभाषा’’ प्रस्तुत करके सराहना प्राप्त की इस कार्यक्रम का संचालन श्रीनाथ द्वारा के श्री विट्ठल पारिख द्वारा किया गया. इस उपलब्धि पर संस्कारधानी वापसी पर त्रिवेणी परिषद द्वारा तथा म.प्र. लेखिका संघ द्वारा महादेवी वर्मा स्मृति समारोह में डॉ. गीता गीत को श्रीफल एवं पुष्प गुच्छ भेंटकर समादरित किया गया. श्री मोहन शशि, श्री ओंकार श्रीवास्तव संत, गौरीशंकर केशरवानी, जयप्रकाश माहेश्वरी, डॉ. हरिशंकर दुबे, जादूगर एस.के. निगम, श्री मणि मुकुल, कौशल्या गोंटिया, श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि, शिव प्रसाद शुक्ल शिब्बू दादा, डॉ. अनामिका तिवारी, डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी, मो. मुइनुद्दीन अतहर, कुंवर प्रेमिल, प्रदीप शंशाक, श्री रमेश सैनी, राजीव शर्मा डब्बू, सुरेन्द्र प्रतिभा वर्मा, डॉ. आनंद तिवारी, राजीव गुप्ता, डॉ. विजय तिवारी ‘‘किसलय’’, डॉ. किरन जैन, श्री राजेश पाठक प्रवीण, पं. रुद्रदत्त दुबे, गिरीश बिल्लौरे, श्रीमती इंदिरा पाठक तिवारी, डॉ. प्रकाश गोलछा, श्रीमती नूतन पांडे, सलमा जमाल, छाया त्रिवेदी, चन्द्रकांता बसेड़िया, डॉ. संध्या जैन ‘श्रुति’, रविशंकर श्रीवास्तव, श्री विजय नेमा अनुज, एम.एल. बहोरिया, श्रीमती

मधु सोनी, श्रीमती साधना उपाध्याय, प्रो. वीणा तिवारी, इला घोष, विनीता श्रीवास्तव, डॉ. बैजनाथ गौतम, विजय जायसवाल आदि ने सम्मानित होने पर डॉ. गीता गीत को बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं.

विजय जायसवाल (म.प्र.)

साहित्यकार डॉ. महीप सिंह का निधन

नई दिल्लीः वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार डॉ. महीप सिंह (85) का गुड़गांव के मेट्रो अस्पताल में मंगलवार को निधन हो गया. पुत्र संदीप सिंह ने बताया कि दिल का दौरा पड़ने से दोपहर करीब एक बजे उनकी मौत हो गई. सांस लेने में तकलीफ के चलते उन्हें 16 नवंबर को भर्ती कराया गया था. अंत्येष्टि बुधवार को दिल्ली के पंजाबी बाग में होगी.

महीप सिंह को 2009 में भारत-भारती सम्मान से नवाजा गया था. परिवार पाकिस्तान के झेलम में रहता था. बाद में डॉ. महीप के पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में रहने आ गये थे. यहीं 15 अगस्त 1930 को उनका जन्म हुआ. प्रारंभिक शिक्षा कानपुर में हुई थी. कानपुर के डीएवी कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद इन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की थी. उन्होंने दिल्ली के अलावा देश-विदेश में अध्यापन का कार्य भी किया. इसके अलावा कई देशों की साहित्यिक यात्राएं भी कीं. आर.एस.एस. से भी उनका नाता रहा. फिलहाल, वे गुड़गांव की ही पालम विहार कॉलोनी में रहते थे. उन्हें केन्द्र, राज्य और कई साहित्यिक संस्थानों के क्षेत्र में सम्मानित किया गया. चार दशक से भी लंबी लेखन यात्रा में उन्होंने 125 कहानियां लिखीं. इसमें दिशांतर और कितने सैलाब, लय, पानी और पुल, सहमे हुए, अभी शेष, धूप आदि मील के पत्थर शामिल हैं. उनके उपन्यास ‘यह भी नहीं’ और ‘अभी शेष है’ काफी चर्चित रहे. वहीं, 20 से अधिक लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुई. उन्होंने 50 से अधिक शोध पत्र लिखे. वह पिछले 45 वर्ष से साहित्यिक पत्रिका संचेतना का संपादन कर रहे थे. उन्होंने 1978 में भारतीय लेखक संगठन की स्थापना की थी.

प्रस्तुतिः किरण वर्मा

कवि रमाशंकर ‘विद्रोही’ का निधन

नई दिल्लीः कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ का विगत 8.12.15 को निधन हो गया. विद्रोही नाम से लोकप्रिय रमाशंकर 58 साल के थे. उनके परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी और एक बेटा है.

सूत्रों के अनुसार विद्रोही दिनांक 8.12.15 को एक आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए आईटीओ स्थित यूजीसी के दफ्तर में गए हुए थे. दर्द की शिकायत होने पर उन्हें एलएनजेपी अस्पताल ले जाया गया. जहां उनका निधन हो गया. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के निवासी विद्रोही 1981 में पढ़ने के लिए दिल्ली आए थे. उन्होंने हिंदी विषय में एम ए करने के लिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था, लेकिन आंदोलनों में अपनी सक्रियता के कारण वे पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए. हिंदी और अवधी में कविताएं लिखने वाले विद्रोही का एक कविता संग्रह ‘नई खेती’ नाम से प्रकाशित है.

उनकी एक कविता

मैं किसान हूं

आसमान में धान बो रहा हूं

कुछ लोग कह रहे हैं,

कि पगले आसमान में धान नहीं जमता

मैं कहता हूं कि

गेंगले-घोघले

अगर जमीन पर भगवान जम सकता है

तो आसमान में धान भी जम सकता है

और अब तो

दोनों में एक होकर रहेगा-

या तो जमीन से भगवान उखड़ेगा,

या आसमान में धान जमेगा.

बनारस में कथाकार काशीनाथ सिंह का सम्मान एवं ‘समकालीन स्पंदन’ के गजल विशेषांक का विमोचन

साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ कथाकार डॉ. काशीनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश शासन द्वारा ‘भारत भारती’ पुरस्कार प्रदान किये जाने के उपलक्ष्य में वाराणसी में उनका अभिनन्दन ‘‘शंखनाद’’ एवं ‘‘नवरंग’’ संस्थाओं द्वारा दिनांक तेरह अक्टूबर 2015 को स्थानीय पराड़कर स्मृति भवन सभागार में किया गया. इस अवसर पर काशी से प्रकाशित काव्य केन्द्रित पत्रिका ‘‘समकालीन स्पंदन’’ के बहुप्रतीक्षित गजल विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया. डॉ. काशीनाथ सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि अपने शहर में मिले स्नेह और सम्मान की बराबरी किसी से सम्मान से नहीं की जा सकती समकालीन स्पंदन के गजल विशेषांक का विमोचन करते हुए उन्होंने गजल को भाईचारा एवं जुड़ाव की विधा बताया. उन्होंने कहा कि गजल अपने प्रयासों में सफल रही है. ‘मोहल्ला अस्सी’ और ‘रेहन पर रग्घू’ जैसे उपन्यासों से चर्चित डॉ. सिंह ने कहा कि गजल की लोकप्रियता राष्ट्र हित में है. आज हिन्दुस्तानी जबान में अनेक गजलकार इस विधा में योगदान कर रहे हैं. आज की गजल हिंदी और उर्दू में नहीं बंटी. गजल ने हाल के वषरें ने विषय और प्रभाव की दृष्टि से भी अपनी प्रासंगिकता और मजबूती सिद्ध की है.

समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर जनाब मेयार सनेही ने की. इस अवसर पर गजल के मानिंद जानकार एवं ‘गजल के बहाने’ के संपादक डॉ दरवेश भारती, वरिष्ठ शायर जनाब मधुर नज्मी, ‘सोच विचार’ पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ. जितेन्द्र नाथ मिश्र, आकाशवाणी वाराणसी के निदेशक श्री राजेश कुमार गौतम, समालोचक डॉ. रामसुधार सिंह, राजेश्वर आचार्य, अशोक चंद्रा, डॉ. श्रद्धानंद आदि ने विचार व्यक्त किये. संचालन समकालीन स्पंदन के प्रधान संपादक श्री सुरेश उबेराय एवं प्रबंध संपादक श्री गौतम अरोरा ने किया. आरम्भ में स्वागत भाषण करते हुए पत्रिका के संपादक एवं वरिष्ठ गजलकार श्री धर्मेन्द्र गुप्त साहिल ने जानकारी दी कि इस विशेषांक में देश भर के करीब दो सौ शायरों की छः सौ से अधिक गजलें हैं. इसमें जहां दैदिप्यमान नक्षत्र के अंतर्गत गालिब, मोमिन और मीर के कलाम हैं वही समकालीन स्थापित गजलकारों सहित उन नवोदित गजल के हस्ताक्षरों को भी स्थान दिया गया है जो शिल्प के साथ स्तरीय गजलें कह रहे हैं. वक्ताओं ने कहा कि अंक में समाहित कमलेश भट्ट कमल, डॉ. शिवओम अम्बर, डॉ. दरवेश भारती, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, जहीर कुरैशी, गणेश प्रसाद गंभीर आदि के गजल विषयक आलेख अत्यंत उपयोगी हैं. यह मात्र गजल विशेषांक नहीं अपितु एक शोध एवं मार्गदर्शक ग्रन्थ है. समारोह में समकालीन साहित्य में गजल की प्रवृत्तियां, इसकी दिशा एवं दशा पर भी विस्तार से चर्चा की गयी. इस अवसर पर वाराणसी के अनेक लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार उपस्थित थे. इनमें पंडित हरिराम द्विवेदी, सलीम राजा, नरोत्तम शिल्पी, अभिनव अरुण, प्रतिमा सिन्हा, कुंवर सिंह कुंवर, सिद्धनाथ शर्मा, अजित श्रीवास्तव के नाम प्रमुख हैं.

प्रस्तुति- अभिनव अरुण

राजस्थान साहित्य परिषद ने डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव को किया सम्मानित

प्रशासन के साथ-साथ हिंदी साहित्य और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं एवं साहित्यकार व लेखक श्री कृष्ण कुमार यादव को राजस्थान साहित्य परिषद् की ओर से सम्मानित किया गया. श्री यादव को यह सम्मान उनके हनुमानगढ़ प्रवास के दौरान राजस्थान साहित्य परिषद, हनुमानगढ़ की तरफ से इसके संस्थापक एवं अध्यक्ष श्री दीनदयाल शर्मा, वरिष्ठ बाल साहित्यकार और सचिव श्री राजेंद्र ढाल ने शाल ओढाकर, नारियल फल देकर एवं प्रशस्ति पत्र देकर अभिनन्दन और सम्मानित किया.

श्री शर्मा ने कहा कि श्री कृष्ण कुमार यादव का हनुमानगढ़ में आगमन सिर्फ एक अधिकारी के रूप में ही नहीं बल्कि साहित्यकार, लेखक और ब्लॉगर के रूप में भी हुआ है और उनके कृतित्व से हम सभी अभिभूत हैं. इस दौरान दून महाविद्यालय, हनुमानगढ़ के प्राचार्य श्री लक्ष्मीनारायण कस्वां, श्रीगंगानगर मंडल के डाक अधीक्षक श्री भारत लाल मीणा सहित तमाम अधिकारीगण और साहित्यकार उपस्थित रहे.

प्रस्तुति- राजेंद्र ढाल

जन चेतना कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’ के 30 वर्ष पूरे होने पर लखनऊ में भव्य प्रदर्शन

लखनऊः यहां 14 नवम्बर, 2015 को दिल्ली के श्री किशोर श्रीवास्तव द्वारा तैयार की गई जन चेतना कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’ के 30 वर्ष पूर्ण करने के अवसर उसका बाल दिवस के उपलक्ष्य में ‘‘हमराह फाउंडेशन’’ के सौजन्य से भव्य आयोजन किया गया. प्रदर्शनी का उद्घाटन सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक डॉ. सुधाकर अदीब और अध्यक्षता वरिष्ठ व्यंग्यकार और अट्टहास पत्रिका के संपादक श्री अनूप श्रीवास्तव ने की. इस अवसर पर स्वच्छ भारत विषय पर अनेक बच्चों को एक चित्रकला प्रतियोगिता के जरिये पुरस्कृत भी किया गया. समारोह का संचालन टीवी एंकर कु. विपनेश माथुर (नोएडा) ने किया और आभार व्यक्त किया संस्था की अध्यक्ष श्रीमती रीता प्रकाश ने.

इस अवसर पर डॉ. अदीब ने श्री किशोर की व्यंग्य चित्रकारी, गायन, अभिनय आदि क्षेत्रों की प्रतिभाओं का जिक्र करते हुए उन्हें बहुमुखी प्रतिभा का धनी कलाकार बताया और कहा कि उनकी प्रदर्शनी के कार्टून केवल हंसाते या गुदगुदाते ही नहीं हैं अपितु वे संदेशपरक भी हैं जिनकी आज हमारे समाज में बहुत जरूरत है. कार्यक्रम के अध्यक्ष पद से बोलते हुए श्री अनूप श्रीवास्तव ने जन जागरूकता के लिये ऐसी प्रदर्शनियों की आवश्यकता पर बल दिया. उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रदर्शनी के माध्यम से श्री किशोर द्वारा दहेज, जातपात, कन्या भ्रूण हत्या, भ्रष्टाचार, परिवार नियोजन, सांप्रदायिकता, पर्यावरण, यौन उत्पीड़न और भाषा आदि संबंधी उठाये गये मुद्दे इस प्रदर्शनी को एक मिशन का रूप देते हैं.

इससे पूर्व इस प्रदर्शनी के बारे में बोलते हुए संस्था के

पदाधिकारी श्री आशीष मौर्य ने बताया कि इस प्रदर्शनी के अब तक सौ से भी अधिक प्रदर्शन दिल्ली सहित झांसी, ललितपुर, साहिबाबाद, मथुरा, आगरा, देवबंद, खुर्जा, गाजियाबाद, बिजनौर, गोरखपुर (उ.प्र.), अंबाला छावनी (हरियाणा), जबलपुर (म.प्र.), शिलांग (मेघालय), बेलगाम (कर्नाटक), सोलन (हि.प्र.), हिम्मत नगर (गुजरात), नांदेड, कोल्हापुर, मुंबई (महाराष्ट्र), भरतपुर, राजसमन्द, सलूम्बर, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान), खटीमा (उत्तराखंड), पटियाला (पंजाब) और गंगटोक (सिक्किम) में हो चुके हैं. और इसे कई राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत भी किया जा चुका है.

इस अवसर पर लखनऊ के कला प्रेमियों सहित फेसबुक, वाट्सअप और ट्यूटर आदि सोशल साइट्स से जुड़ी देश के विभिन्न स्थानों की अनेक कलाप्रेमी हस्तियां भी उपस्थित थीं. जिनमें सर्वश्री राम प्रकाश वर्मा (कानपुर), नवीन शुक्ला (झांसी), राकेश श्रीवास्तव (इलाहाबाद), पूजा श्रीवास्तव (कानपुर), कादम्बिनी पाठक (दिल्ली), सुमन श्रीवास्तव (बाराबंकी), मीता राय (गाजियाबाद), जीतेन्द्र चतुर्वेदी (बहराईच), अनुराग मिश्र गैर (लखनऊ), अरुण नागर (उरई), आशा पांडे ओझा (माउन्ट आबू), पूनम प्रकाश शुक्ल (मुंबई), आशीष मौर्य, अनुराग अस्थाना, अमित सक्सेना (लखनऊ) और रचना श्रीवास्तव (इलाहाबाद) आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं.

प्रस्तुतिः आशीष मौर्य

व्यास बन इतिहास को अक्षर तो दे कोई

(मरहूम कहानी लेखक मुख्तार अहमद की याद में कवि गोष्ठी)

मीरजापुरः 15 नवम्बर 2015, जाने-माने कहानीकार मरहूम मुख्तार अहमद की पहली पुण्यतिथि पर शेर खां की गली, वासलीगंज स्थित शायर इम्तियाज अहमद ‘गुमनाम’ के आवास पर कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया. इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ शायर आसी मछलीशहरी ने की. संचालन किया केदारनाथ सविता ने. इसमें डेढ़ दर्जन से अधिक कवियों और शायरों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया.

भवेशचंद्र जायसवाल ने पढ़ा- कितना सुखद है छत के नीचे से बारिश का मजा लेना, गर्म कपड़ों में ठंड को सेलिब्रेट करना.

केदारनाथ सविता ने सुनाया- तुम्हारे दो नयन, चुपके से

धीरे से, जब मेरी ओर उठे, सच मानो मेरे भीतर सैकड़ों दीप जल उठे.

गोष्ठी में इम्तियाज अहमद गुमनाम, आसी मछलीशहरी, ताबिश इकरामी, आनन्द संधिदूत, अतउल्लाह सिद्दीकी, सलिल पांडेय, शुभम् श्रीवास्तव, हाशिम अंसारी, नन्दिनी वर्मा, फसीहउद्दीन ‘फसीह’, श्याम अचल, इरफान कुरैशी और हौसिला प्रसाद मिश्र आदि ने अपनी एक से एक बढ़ कर एक कविताएं सुनाईं.

अंत में अध्यक्ष महोदय के वक्तव्य और आयोजक गुमनाम के आभार प्रदर्शन के बाद गोष्ठी का समापन हुआ.

प्रस्तुतिः केदारनाथ सविता, मीरजापुर

कथाकार राजेन्द्र दानी को गायत्री कथा सम्मान

(9 अन्य साहित्यकारों को गायत्री सृजन सम्मान पाथेय साहित्य कला अकादमी का आयोजन)

जबलपुरः ‘स्मृति शेष’ कथाकार एवं कवयित्री ‘स्व. गायत्री तिवारी’ संवदेनशील, सजग कथाकार थीं. उनकी नारी केन्द्रित कहानियां जीवन के गहरे राग से उपजी हैं. उनमें संघर्ष है, जिजीविषा है और गायत्री कथा सम्मान से विभूषित हुए कथाकार ‘राजेन्द्र दानी’ की भाषा में सादगी है. उनकी कहानियां हमारे समय की गुत्थियों को सुलझाने, समझने की कुंजी हैं. उनमें तलाश है, प्यास है. श्री दानीजी के कृतित्व से प्रदेश गौरवान्वित हुआ है.

उक्त आशय के उद्गार पाथेय साहित्य कला अकादमी द्वारा आयोजित ‘स्व. (डॉ.) गायत्री तिवारी जन्म स्मृति समारोह’ के मुख्य अतिथि डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी एवं अध्यक्ष विधिवेत्ता श्री राजेन्द्र तिवारी ने व्यक्त किये.

श्री राजेश पाठक ‘प्रवीण’ द्वारा संचालित कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत श्री प्रेमनारायण शुक्ल, आनन्द कुमार तिवारी तथा डॉ. हर्ष कुमार तिवारी ने किया.

अतिथियों के साथ श्रीमती मोहिनी तिवारी, डॉ. भावना शुक्ला एवं प्रो. दीपिका ने कथाकार राजेन्द्र दानी को शॉल, श्रीफल, मानपत्र एवं पांच हजार की राशि भेंटकर सम्मानित किया.

समारोह में श्रीमती साधना उपाध्याय, प्रो. वीणा तिवारी, छाया त्रिवेदी, प्रभा पाण्डेय ‘पुरनम’, डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे, डॉ. प्रेमलता नीलम, अश्वनी कुमार पाठक (सिहोरा), राकेश माहेश्वरी (नरसिंहपुर), प्रभात दुबे (जबलपुर) को ‘गायत्री सृजन सम्मान’ से सम्मानित किया गया.

सम्मानितों को मानपत्र, शॉल, माला आदि से सम्मानित करने में योग दिया डॉ. कामना श्रीवास्तव, मनीषा गौतम, शशिकला सेन, आशा रिछारिया, इंदिरा पाठक ‘तिवारी’, प्रो. दीपिका, डॉ. प्रवीण मिश्र, यशोवर्धन पाठक, राजेन्द्र विश्वकर्मा, राजीव गुप्ता ने.

डॉ. गायत्री तिवारी ‘स्मृति शेष’ के व्यक्तित्व-कृतित्व पर श्रीमती साधना उपाध्याय तथा श्री दानी जी के विषय में डॉ. स्मृति शुक्ल ने अपने विचार व्यक्त किये.

आभार प्रदर्शन किया डॉ. तनुजा चौधरी ने.

इस अवसर पर स्वं. (डॉ.) गायत्री तिवारी के जीवन पर

आधारित एक ‘स्मारिका’ का विमोचन भी हुआ.

कार्यक्रम को सफल बनाने में स्वस्तिवाचक पं. श्याम सुन्दर तिवारीर, राकेश श्रीवास, सुरेन्द्र पटेल, प्रभात टॉक, राहुल रजक आदि का योग रहा एवं डॉ.सुमि. ने भी आभार माना.

प्रस्तुतिः डॉ. भावना शुक्ल, नई दिल्ली

पत्र-पत्रिकाएं

1. हरिगंधा (मासिक)

संपादकः राजेश कुमार खुल्लर

पताः निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी, अकादमी भवन-पी-16, सेक्टर-14, पंचकुला

मूल्यः ृ60

2. दाल-रोटी (त्रैमासिक)

संपादकः अक्षय जैन

पताः 13, रश्मन अपार्टमेंट, उपासनी हॉस्पिटल के ऊपर, एल.एस. रोड, मुलुंड (प.), मुंबई

मूल्यः ृ15

3. हमारी धरती (द्वैमासिक)

संपादकः सुबोध नन्दन शर्मा

पताः ए-15, नई कॉलोनी, कासिमपुर पावर हाउस, अलीगढ़ (उ.प्र.)

मूल्यः ृ25

4. समकालीन अभिव्यक्ति (अर्धवार्षिक)

संपादकः उपेन्द्र कुमार मिश्र

पताः फ्लैट नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली-30

मूल्यः ृ15

5. सेवा संदीपन (मासिक)

संपादकः कैलाश चन्द्र अग्रवाल

पताः ‘सेवाधाम’ सेवा नगर, हिरण नगरी, सेक्टर-4, उदयपुर (राजस्थान)

मूल्यः ृ5

6. सनद (त्रैमासिक)

संपादकः मंजु मल्लिक मनु

पताः गायत्री निवास, दूसरा तल, सी-2/70, न्यू अशोक नगर, दिल्ली-96

मूल्यः ृ25

पुस्तकें

1. सैर धरती आकाश पाताल की (यात्रा वृतांत)

लेखिकाः कविता रायजादा

प्रकाशकः राष्ट्र भारती परिषद्, दयालबाग, आगरा

मूल्यः ृ60

2. सेमल के श्वेत परिन्दे (गीत-गजल संग्रह)

कविः प्रमोद कुमार ‘सुमन’

प्रकाशकः अंजुमन प्रकाशन, 942, मुटठीगंज, इलाहाबाद

मूल्यः ृ250

3. विश्व पटल पर हिन्दी (विविध)

संपादकः डॉ. मनीषा शर्मा

प्रकाशकः रंग प्रकाशन, 33, बक्षी गली, राजवाड़ा, इंदौर-4

मूल्यः ृ200

4. विचार तरंग (निबंध संग्रह)

लेखकः सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’

प्रकाशकः पाथेय प्रकाशन, 112, सराफा वार्ड, जबलपुर

मूल्यः ृ200

5. भटके हुए राही (कहानी संग्रह)

लेखकः देवेन्द्र कुमार मिश्रा

प्रकाशकः उद्योग नगर प्रकाशन, 695, न्यू कोट गांव, जी.टी. रोड, गाजियाबाद (उ.प्र.)

मूल्यः ृ300

6. आधुनिक हिन्दी साहित्य की उत्कृष्ट कहानियां

संपादकः डॉ. अखिलेश पालरिया

प्रकाशकः आर.के. पब्लिकेशन, 1/12, पारस दुबे सोसायटी, ओवरी पाड़ा, एस.वी. रोड, दहिसर (पूर्व), मुंबई

मूल्यः ृ300

7. दर्पण के उस पार (लघुकथा संग्रह)

लेखकः डॉ. राजकुमार घोटड़

प्रकाशकः एस.एन. पब्लिकेशन , 7/12, ए-75, श्रीराम कॉलोनी, निलोठी एक्सटेंशन, नागलोई, नई दिल्ली

मूल्यः ृ250

आपने कहा है

आसमान को छू रही प्राची

मुझे अक्टूबर का अंक प्राप्त हो गया है.

धन्यवाद.

आसमान को छू रही, प्राची परम महान.

तमस मिटाने के लिये, बनी हुई दिनमान.

सुमन प्रफुल्लित चतुर्दिक, सुरभि-रहे विखराय.

मधु पराग पाने यहां, भ्रमर रहे मंड़राय.

पत्रिका श्रेष्ठता के पायदान पर निरन्तर आगे बढ़ रही हैं. मेरी तरफ से बधाई.

सनातन कुमार वाजपेयी, जबलपुर (म.प्र.)

‘चीफ की दावत’ श्रेष्ठ कहानी

प्राची सितम्बर 2015 में प्रकाशित सनातन कुमार वाजपेयी ‘‘सनातन’’ ने अपने पत्र में मेरी लघुकथा ‘मां की निशानी’ की प्रशंसा की है. इसके लिए उन्हें व आपको धन्यवाद. झांसी के बृज मोहन कहानीकार को बुन्देलखण्ड साहित्य कला अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया है, यह मेरे लिये प्रसन्नता का विषय है. भीष्म साहनी की कहानी ‘‘चीफ की दावत’’ उनकी श्रेष्ठ कहानियों में से है. यह कहानी अभी ‘‘आजकल’’ पत्रिका में भी छपी थी.

केदारनाथ सविता, मीरजापुर (उ.प्र.)

सोच और अभिव्यक्ति में चुटीलापन

प्राची का हर अंक समय से मिल रहा है. धन्यवाद.

आपके हर सम्पादकीय को ध्यान से पढ़ता हूं. आपकी सोच और अभिव्यक्ति के चुटीलेपन तथा कौशल की मन ही मन प्रशंसा भी करता हूं. रचनाओं के चयन में आपकी सूझ-बूझ की सराहना जितनी भी की जाय, कम है. कहानियां प्रभावित करती हैं.

मधुर गंजमुरादाबादी, उन्नाव (उ.प्र.)

सराहनीय प्रयास

आपकी पत्रिका का दिसम्बर अंक मेरे सामने है. मुखपृष्ठ आकर्षक है. विचारमग्न प्रणयी जोड़ा भारतीय ग्राम्य-जीवन के प्रतीक रूप में दिखाई दे रहा है. आपने सिन्धी की सुंदर कहानियों को चयन किया है. आपका प्रयास सराहनीय है. सिन्धी साहित्य के संबंध में आपका संपादकीय आपकी बेबाक लेखनी का प्रमाण है. सिन्धी कथा साहित्य का विका संबंधित संकलित लेख भी बहुत अच्छा बन पड़ा है. भले ही आपने यह सामग्री यहां-वहां से संकलित की हो, परन्तु उसका संयोजन बहुत अच्छा है. कहानियों के बारे में कहने के लिए बहुत कुछ है, परन्तु सभी कहानियों के बारे में कहने का मतलब है, बहुत कुछ कहना और इतना कुछ एक पत्र में कहना संभव नहीं है. बस इतना ही कहना चाहती हूं कि सभी कहानियां सुंदर, पठनीय और संग्रहणीय हैं. आपके साथ-साथ देवी नागरानी को भी बधाई!

रेखा भवनानी, मुलुंड, मुंबई

प्राची का नवम्बर अंक प्राप्त हुआ. धन्यवाद! सदा की तरह आपकी संपादकीय न केवल पढ़ने के लिए बल्कि पढ़ने के बाद कुछ सोचने पर मजबर करती है. प्रत्येक मास नए-नए और सामयिक विषयों पर कलम उठाना आपके ही वश की बात है. संपादन, रचनाओं का चयन और फिर चुटीले व्यंग्य के साथ साफ-सुथरी संपादकीय लिखना तो कोई आपसे सीखे. कहानियां, आलेख और कविताएं भी हमेशा की तरह प्रभावित करती हैं. प्राची के समस्त परिवार को बधाई!

श्रीप्रकाश वाजपेयी, मथुरा (उ.प्र.)

प्राची के माध्यम से एक विशेष पत्र पुत्र

वधुओं के नामः पुत्र वधु हो तो ऐसी

र घर की बुनियाद उस घर की पुत्र वधु होती है. घर की लक्ष्मी ही वही हुआ करती है. अपनी मेहनत, लगन और समझदारी-एक्रागता से वह घर का संचालन पूरी दम-खम के साथ करती है. इस तरह घर की लाडली पुत्र-वधु का दर्जा भी हासिल करती है.

जिस घर में ऐसी कुशाग्र पुत्रवधुएं हों उस घर का नक्शा बदलते फिर देर भी नहीं लगती है. ये अपने घर-परिवार का नाम रोशन तो करती ही हैं, समाज/परिवार में अपनी विशिष्ट पहचान भी बनाती हैं.

ईमानदारी से घर-कार्य में संलग्नता, बच्चे, पति, सास-ससुर की देखभाल उन्हें पुत्र वधु से कुल वधु के दर्जे तक बढ़ाने का सद्कार्य करती है. प्रशंसाा की पात्र बनकर ढेर सारी प्रशंसा भी अर्जन करती हैं.

कुछ समय से वृद्धाश्रमो में बूढ़े-बूढ़ियों की बढ़ती संख्या पुत्रवधुओं के फेवर में नहीं जा रही है. उनमें अपने सास-ससुर के प्रति अन्यमनस्क रहने का आरोप लगने लगा है. वृद्धों का क्रन्दन, परिवार की कलह को उजागर करती अनेकानेक घटनाएं इधर-उधर, अखबारों के माध्यम से आती रहती हैं. यह एक चिंतनीय विषय है.

ऐसा नहीं है कि सारी पुत्रवधुएं ऐसी होती हैं. उनमें से कइ ऐसी भी हैं जो अपने पुत्र वधु होने की सार्थकता को भली भांति उजागर करती हुइ दिखाई देती हैं. मैं ऐसी एक पुत्र वधु का जिक्र इस आलेा के माध्यम से करना चाहूंगा जो अन्यों के लिए उदाहरण हो सकती हैं...और वह पुत्र वधु है ‘प्राची’ के संपादक राकेश भ्रमर जी की पुत्र वधु. भ्रमर जी दिल्ली में रहकर सी.बी.आई. में एक जिम्मेदार अफसर हैं तो उतने ही जिम्मेवार लेखक/संपादक भी हैं. एक बंधे बंधाए समय में नौकरी/लेखन/प्रकाशन/संपादन का गुरुतर भार संभालने में उनका अधिकांश समय निकलना लाजिमी है. इधर जबलपुर में रहती उनकी पुत्र वधु भी कम श्रमसाध्य नहीं हैं. परिवार की सारी जिम्मेवारियों का निर्वहन करते अपने ससुर के कार्य में हाथ बटाने का गुरुतर भार संभालते हुए प्राची का प्रबंधन भी उनके जिम्मे आता है, जिसे वह सहज ही सरल भाव से संपादित करती ैं. जिसका श्रेय भी वह लेना पसंद नहीं करतीं. मैं उनकी कार्यविवरणी कुछ इस प्रकार रख रहा हूं.

अव्वल तो प्राची की डाक जबलपुर के पते से ही आती है. पूरी डाक को दिल्ली तक सुरक्षित पहुंचाने की उनकी जिम्मेवारी के साथ प्रकाशनोपरांत पत्रिका लेने के लिए सदर तक का आवागमन. पत्रिका प्राप्ति के बाद डाक से भेजने की तैयारी और लोकल पत्रिका वितरण ठंड/बरसात/गर्मी में नियत समय में करने की उनकी यह सक्षमता जरूर उन्हें विशेष बनाती है. सदस्यों की सूची और उनकी अवधि, सदस्यता फीस इत्यादि की पूरी कार्यप्रणाली उनके अकेले के जिम्मे यानी पत्रिका प्रबंध संपादन करते हुए भी कोई श्रेय लेना उनकी ऐसी किसी महत्त्वाकांक्षा में सहयोगी नहीं...न ही पत्रिका में उनका नाम प्रबंध संपादक के कॉलम में...न ही उन्हें किसी तारीफ...की कोई जरूरत...न अपने नाम की चिंता. पूरा कार्य निर्लिप्त भाव से, अपना स्वयं का कार्य समझकर संपादित करते रहना. इसके साथ ही साथ बच्चों की पढ़ाई, घर की साफ-सफाई, साज-सज्जा इत्यादि के सारे कार्य भी अकेले के बलबूते पर. सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं-पुस्तकों का रखरखाव ऊपर से...

‘पुत्र वधु हो तो ऐसी’- मैं उन तमाम पुत्रवधुओं को एक एक्जामपलर पुत्र वधु की छवि पेशकर यह बताना चाहता हं कि कभी अपने घर-परिवार के कामों को कभी जुल्म न समझें, बल्कि हंसी-खुशी उसे संपादित कर अपने समय का सदुपयोग भी करें. अपने परिवार की खुशियों मे बराबर की साझीदार बनें. उस परिपक्वता को लाऐं जो भ्रमरजी की पुत्र वधु में, मैं एक अर्से से महसूस कर रहा हूं. नए वर्ष के उपलक्ष में उन सभी बेटियों को जो किसी न किसी घर की पुत्र वधु हैं, रौनक हैं, सम्मान से जीने की सलाह देता हूं. परस्पर सहयोग के साथ रहने की सलाह देता हूं. मैं उन सबको शुभ आशीर्वाद भी इस लेख के माध्यम से देकर अपना पत्र समाप्त करता हूं. धन्यवाद!

डॉ. कुंवर प्रेमिल, विजयनगर, जबलपुर (म.प्र.)

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