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प्राची - फरवरी 2016 - गुजराती कहानी / मड़ई / उमाशंकर जोशी

 

गुजराती कहानी

मड़ई

उमाशंकर जोशी

कदम बचपन की बात है.

अक्षय तृतीया की सुबह, हाथ में शगुन की लाल सुर्ख कोपर लेकर मकनासी खांट हमारे यहां आये. बड़े भैया के पैर छूकर, ‘घर के आम की है’ कहते हुए उनके सामने कोपर रखी और ओसारे के खम्बे से टिककर बैठ गये. उनके साथ मेरी ही उम्र का उनका बेटा था. उसके सिर पर गमछे के दो फेरे लिपटे हुए थे और गमछे के दूसरे सिरे पर कुछ बांधकर गठरी कंधे पर डाली हुई थी.

‘बेटा, गोवा, घर में जाकर काकी को खोलकर भुट्टे दे आ. गोवा अन्दर गया. गमछा एक ओर रखकर, सिर पर हाथ फेरकर मकनासी खांट बड़े भैया की तरफ थोड़ा खिसककर पलथी मारकर बैठे और उस ओर आश्चर्य से देखते रहे, जिधर बड़े भैया घुटनों पर हाथ की कोहनी टिकाये सिर पर हाथ रखकर बही देख रहे थे. कुछ देर बाद अच्छी बात सुनाने जा रहे हों, इस प्रकार बोले, ‘मैंने कहा, कि...’ पर बड़े भैया का ध्यान बंटा नहीं, अतः खंखार कर काफी जोर से बोले, ‘मैंने कहा कि शामालभाई अब वापस पढ़ने चल जायेंगे, तो लाओ न दो भुट्टे लेता चलूं. आखिर भुट्टे थे कुएं पर के. फिर मेरी ओर घूमकर पूछा, ‘इस साल तो आम अच्छे आये हैं, क्या आम खाने के लिए नहीं

रुकोगे.’ और मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना बड़े भैया की ओर घूमकर कहने लगे, ‘पढ़ाई वहां बच्चों को तनिक भी शान्ति से रहने देती है? पर भैया, बड़े होंगे तब बलिस्टर बनकर एक-एक बोल के हजार रुपये खड़े कर लेंगे.’

बड़े भैया ने कहा, ‘पर अपने गांव के लोग कहां किसी लड़के को पढ़ने के लिए भेजते हैं.’ और तुरन्त ही उन्होंने बही उठा ली. सिरे से बही को पकड़कर उसके पन्ने अंगुली के नीचे से फरफर-फरफर आने दिये, इच्छित पन्ने पर अंगुली दबाई तब पूरे वक्त मुझे लगता रहा था कि मकनासी की जिन्दगी के इतने दिन भैया ने चलाये लेकिन आज के दिन आकर वे अटक गये. उन दोनों के बीच कुछ हिसाब की बातें चलने लगीं. अन्दर से आकर गोवा ओसारे की सीढ़ियों पर बैठा था. मैं पास ही में था. मैंने पूछा, ‘कौन-सी कक्षा में पढ़ते हो.’ वह समझा नहीं या पता नहीं क्या, पर उसने जल्दी जवाब नहीं दिया कि तभी मकनासी जोर से बोल उठे-

‘बड़े भैया आपका तो हम पर पहाड़ जैसा अहसान है. जिन्दगी भर भुला नहीं सकता. मैं गरीब अपनी शक्ति के अनुसार बदला चुकाऊंगा, यह निश्चित समझ लीजिए. इस साल मेरा यह गोवा आपके यहां हलवाही करेगा. फिर तो पूरा न? यों भी बीस रुपल्ली देकर आपको हलवाहा तो रखना ही पड़ता न? तो इतने में मेरे पन्द्रह उतार देना, अतः मेरे सिर से आपका कर्ज उतरा. और अगले जन्म में मुझे आपके यहां बैल बनकर जन्म न लेना पड़े. कैसी मुसीबत के समय आपने मुझे बारह रुपये दिये थे. भगवान आपको बादशाही बक्से.’

बड़े भैया ने फिर ना-नुकर की, ‘यह दस बरस का बच्चा खेती को क्या पार लगा पायेगा?’

‘अरे पिछले साल मैंने पूरे साल भर इसे अपने यहां खेती के काम में तैयार किया है. अपने शामलभाई से तो बड़ा लगता है.’ और मेरी ओर घूमकर बोले, ‘शामलभाई आपको कितने साल हुए.’

मैंने कहा, ‘चौदहवां चल रहा है.’ पर मैं बारह से भी छोटा लगता था.

‘मेरे गोवा को तो आती होली पर पन्द्रहवां बैठेगा, पन्द्रहवां और फिर साल भर में पूरे आदमी की तनख्वाह लायेगा पच्चीस रुपये. और चार बरस में पांच बीसी की कमाई इकट्ठी हो जायेगी तो उसके लिए एक सुन्दर कन्या ले आऊंगा और वह अपनी घर-गृहस्थी शुरू करेगा, फिर हम निश्चिंत.’

मैंने गोवा की ओर देखा. मुझे वह ऐसा लगा कि मानों मेरी अपेक्षा दस साल बड़ा हो. तभी मकनासी ने मुझसे पूछा.

‘कौन सी कक्षा में हो, भाई.’

‘चौथी.’

बड़े भैया ने कहा, ‘चौथी अंग्रेजी, हां.’

‘और अपनी?’ मकनासी ने आश्चर्यचकित होकर मुझसे पूछा.

‘हमारी (गुजराती) सात पूरी करके फिर एक.’ मैं समझाने लगा.

‘देखा बेटा गोवा, ये तुझसे तो काफी छोटे हैं, पर इतने में ही आठवीं पढ़ चुके. अबके तेरी शाबाशी है. देखता हूं कैसे खेती पार लगाता है?’

मैंने पूछा, ‘गोवा को कितना आता है?’ गोवा तो मेरी ओर ही ताकता रहा. मकनासी बोले-

‘बाप, हमारे यहां पढ़ाई कैसी? ‘सब पढ़ने लगेंगे तो हल चलाने वाला भी कोई चाहिए न. हमारी और हमारे पुरखों की पढ़े वगैर ही उम्र कट गई और इसी तरह, देखते ही देखते ये छोकरे भी घसीट लेंगे साठ-सत्तर बरस. धरती तो वही की वही है न.’ बड़े भैया की तरफ देखकर फिर कहने लगे, ‘ये तुम्हारे पिता तो पंचांग में से तिथि मुश्किल से निकाल पाते हैं, और तुम हिसाबी निकले और फिर भाई को बलिस्टर बनाओगे. किसी पूर्वजन्म के पुण्य वाले के भाग्य में ही विद्या होती है. हम तो काला अक्षर भैंस बराबर हैं पर कौन जानता है कि हमारी संतान भी होशियार निकल जाये और नाकेदार की साहबी नौकरी करने लगे, कुछ कहा भी तो नहीं जा सकता.’

बड़े भैया ने फटाफट कागज तैयार किया और मकनासी की इच्छानुसार हिसाब चुकता कर लिया. बोले, ‘लड़का अगर अच्छा काम करेगा तो इनाम देकर तुम्हें खुश करेंगे. कपड़ों में तो एक कुर्ता, एक धोती, एक गमछा, लट्ठे का फेटा और कोरा की चादर इतना ही न. बरसात बीतते ही अड़पोदरा के जूते मंगवा देंगे. बस हो गया पूरा.’

फिर तो उस दिन भाभी ने मुझसे बहुत सारे चक्कर कटवाये. कभी बाहर से कंडेले आने को कहतीं तो कभी पास के घर से छाछ मांग लाने को कहतीं, और फिर जाने लगता तो कहतीं, ‘बैठ बचू को झूला झुला, मैं ही ले आती हूं.’ मुझे पूरे समय लगता रहा कि गोवा मेरी गतिविधियों पर नजर रख रहा था. कंडे लेने गया तब तो उसने मेरी मदद भी की और सूखे-सूखे निकाल दिये. बड़े भैया ने मकनासी से ढीले पड़े हुए पशु बांधने के खूंटों को फिर से मजबूत गड़वा लिये और यूं ही पड़ी हुई लकड़ी के दो गट्ठों को कटवा लिया. दोपहर में जब भाभी का दुर्गा स्कूल से आया तो भाभी ने उसे और मुझे रसोई से बुलाकर खाने के लिए और यूं ही पड़ी हुई लकड़ी के दो गट्ठों को कटवा लिया. दोपहर में जब भाभी का दुर्गा स्कूल से आया तो भाभी ने उसे और मुझे रसोई में बुलाकर खाने के लिए बैठा दिया. मकनासी और गोवा को बर्दवान में बैठाया. यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि कल मेहमान आये थे तो भी मिठाई नहीं बनी थी और आज इन लोगों के स्वागत हेतु भाभी ने कंसार बनाया है. बर्दवान में जाकर दूसरी बार कंसार परस कर आती हुई भाभी ने कहा, ‘मकना काका, तुम्हारा बेटा घर पर ही है, यही समझना. मेरा शामल है, ऐसा ही गोवा को न समझूं तो भगवान मुझसे पूछेगा.’

शाम ढलने पर गद्गद आवाज से भाई भाभी को जै गोपाल करके मकनासी घर लौट गये. कुछ दूर तक पहुंचाकर गोवा घर आया. छुट्टियां खत्म होने में कुछ दिन बाकी थे, तब तक के लिए गोवा को कुआं-खेत आदि दिखाने का काम बड़े भैया ने मुझे सौंपा. खेत की बाड़ में कहीं खंझ पड़ी हो, तो उन्हें भी ठीक करवा लेना था. उनके हलवाहों के साथ इसे भी मिलाकर, सबके साथ हुक्के पानी की निकटता जोड़ देनी थी.

‘गोविन्दा.’

वह चौंका

‘मुझसे कहा?’ हम ख्ेात की बाड़ के सहारे-सहारे घूम रहे थे. ‘यह ठाकुरों जैसा नाम कहां से ले आये भैया?’ घर में तो फिर उस नाम का इस्तेमाल करने लगा था और उस नाम से पुकारने पर उसे गर्व का अनुभव होता था. वह मुझे अपने से बहुत बड़ा लगता.

‘तो गोविन्दा यह सारी सूखी जमीन तू हरी कच्च कर देगा?’

‘बरसात के दिन आने तो दो, तब इसका पता चलेगा. यह तो क्या, पर हमारे यहां तो इस पूरे कुएं के खेत से भी बड़ा, अकेला बाजरे का खेत है. कितने ही लोग रात-दिन एक करते हैं, तब जाके कहीं कटता है.’

‘तो, तो काफी अनाज होता होगा. इतनी खेती है, फिर भी तेरे पिता ने तुझे पढ़ने के लिये क्यों नहीं बैठाया?’

‘फसल में तो कितनों के हिस्से भी तो होते हैं न. और फिर हमारा तो सारा का सारा खलिहान से ही बनिया उठा ले जाता है. पिताजी कहते हैं कि अनाज के ढेर से कहीं अधिक बड़ा कर्ज का ढेर है.’

‘पर पढ़ो लिखो तो कर्ज तो दस दिन में चुका दिया जा सकता है.’

‘सच बात है.’ उसने चौंककर मेरी ओर देखा.

‘हां, पांच-सात साल में मैं बम्बई यूनिवर्सिटी का ग्रेजुएट हो जाऊंगा तो मुझे अपने यहां कैसी नौकरी मिलेगी, तुझे पता है? और फिर एल-एल.बी. अथवा बैरिस्टर हो जाऊं तो खुद आकर राजा मुझे दिवान न बना ले तो बात हुई.’ उस समय बड़े भैया द्वारा दिमाग में घुसाई गई महत्वाकांक्षाओं को व्यक्त करने का मौका अनुभव करता हुआ मैं बोले जा रहा था. गोविन्दा ताकता ही रह गया. उसका चेहरा किसी प्रौढ़ आदमी के चेहरे की भांति गम्भीर और चिन्तातुर लग रहा था.

‘शामल भाई! तब तो मेरा भाई बलिस्टर नहीं बन सकता?’

मैं खिलखिलाकर हंस पड़ा, वह सब कुछ गम्भीरता से कह रहा था, इसमें कोई शक नहीं था. गोविन्दा ने बात आगे बढ़ाई-

‘इसमें हंसने की क्या बात है? तुम्हारे बाप-दादे कहां पढ़े-लिखे थे? तुम्हारे भैया तुम्हें पढ़ा रहे हैं न. फिर इसी तरह हमारा हौसला भी बढ़ेगा.’

उसने मुझे खिसियाना-सा कर दिया. पर तुरन्त ही उसने मुझे मना लिया.

‘हां, शामलभाई, आप दीवान बनेंगे तो आपके हाथ के नीचे आदमी की जरूरत पड़ेगी ना.’

उसे बुरा न लगे इस तरह मैंने हां, हां करते हुए आधा हां में और आधा हंसते हुए सब समेट लिया. गोविन्दा मानों अपने मन में ही बात कर रहा हो, ‘और पिताजी भी कह रहे थे न, कि हम तो भले ही काला अक्षर भैंस बराबर हों, फिर भी बच्चे अफसरी करने लायक हो जाएं.’

छुट्टियां खत्म होने पर मैं तहसील के स्कूल में पढ़ने चला गया. मुझे वहां छोड़कर मेरे घोड़े को वापस लाने का काम बड़े भैया ने गोविन्दा को सौंपा था. रास्ते भर गोविन्दा घोड़े के साथ-साथ तेज कदम मिलाता हुआ चल रहा था और हांफता-हांफता बीच-बीच में कुछ पूछ रहा था.

‘तुम दीवाली पर आओ, तब मेरे भाई को पढ़ाना है, हां.’

‘तुम नवरात्रि में नहीं आओगे? ताजा भुट्टे खाने को नहीं मिलेंगे दीवाली पर तो?’

पहुंचने के बाद सब विद्यार्थियों के सामने तो ज्यादा पूछा नहीं पर उन सबकी तरफ वह अलग ही दृष्टि से देखे जा रहा था. मानो प्रत्येक विद्यार्थी में उसे उसका हाथीड़ा दिखाई दे रहा हो.

फिर वापस दशहरे के समय वह ताजा भुट्टे लेकर आया तो अमुक दो-तीन छोटे लड़कों को उसमें से देने के कलए कहा भी और फिर मुझे बुलाकर धीरे से पूछा,

‘इनमें से पढ़ने वाला कोई किसानों का बेटा है?’

‘कुछेक ही. नहीं तो सबके घर से बहुत सारे भुट्टे नहीं आए होंगे यहां?’

‘तुम्हारी तरह किसी के नहीं आते?’

‘नहीं रे. क्या यह समझता है कि बड़े भैया हर साल भुट्टे भेजते थे?’

‘मैंने पूछा तब बड़े भैया ने कहा कि ले जा, पर उनकी पत्नी?’

‘कोई बात नहीं, वो तो सब चलता है. पर मुझे बता तो सही, ये भुट्टे तूने अपने ही हाथों से उगाए हैं?’

‘तो किसके हाथ से? ये सर्दियां उतरी नहीं कि गेहूं का खलिहान तैयार समझो. पर अब होला देने नहीं आऊंगा. मुझे तुम्हारे बड़े भैया की पत्नी डांटती हैं.’

‘कोई डांटेगा नहीं.’

वह वापस घर जाने के लिए निकला तो मैं रास्ते तक उसके साथ गया. कुछ दूर पहुंचने के बाद उसने देख लिया कि कोई सुन तो नहीं रहा है और मेरे कान के पास मुंह लाकर खड़ा हो गया. पर बात इतनी महत्व की थी कि बोलने में भी उसे विश्वास नहीं था.

‘हाथीड़ा काम पर लग गया है, हां. कभी का, इन पन्द्रह दिनों से.’ वह चिल्लाकर बोला और तुरन्त रास्ते पर दौड़ने लगा. मैंने उसे हाथ का इशारा करके और आवाज देकर रुक जाने के लिये कहा, अब मेरी समझ में आता है कि वह रुक सके ऐसी स्थिति में नहीं था. वह मेरी और दूसरे विद्यार्थियों की स्थिति देखने के बाद ऐसा बोलने में शरमा रहा था. उसकी दृष्टि में इस खबर को सुनाना एक बड़ी-समाचार पत्रों में आने वाली किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय विस्फोट की खबर से भी बड़ी घटना थी.

वह थोड़ी-थोड़ी देर में मुड़कर देख रहा था. और दौड़ रहा था. मैंने आवाज दी और रूमाल हिलाया.

‘हां, हां, मुखिया के बेटे के पास पढ़ता है.’

उसने पता नहीं किसका जवाब दिया. मैंने उसे रोकने के लिए फिर से रूमाल हिलाया.

‘हां, हां, तुम आओगे तब स्कूल में भर्ती करवायेंगे.’ उसने फिर किसी अनपूछे प्रश्न का उत्तर दिया और रास्ते के मोड़ के पीछे की ओर अदृश्य हो गया. आंखें पोंछता-पोछता मैं वापस आया और अपनी तथा अन्य विद्यार्थियों की ओर एक दूसरी ही नजर से देखने लगा. मेरे सामने अनेक प्रश्न तैरने लगे. गोविन्दा को क्यों पढ़ने का मौका नहीं मिला? वह अनाज पैदा करता है और हम सब मौज करते हैं. ऐसे लोग मजदूरी करते हैं तभी तो हम पढ़ सकते हैं. वह क्यों मजदूरी करता है? न करे. उसे गरज है इसलिए करता है, उसका हित उसी में होगा. इस प्रकार के अनेक उल्टे-सीधे विचार दिमाग में उथल-पुथल मचा गए. इस घटना के बाद मुझे स्कूल के विद्यार्थियों के प्रति एक प्रकार की नफरत-सी होने लगी थी.

सर्दी की छुट्टियां हुईं तब घर से घोड़ा लेकर गोविन्दा स्कूल के फाटक पर आकर हाजिर हो गया था. पूरे रास्ते वह कुछ न कुछ बोलता ही रहा.

‘कहते हैं कि इस बार जैसे गेहूं तुम्हारे कुएं पर कभी पैदा ही नहीं हुए. देखो न पिछले तीन साल में जितना न मिला हो, उतनी मक्का मैंने इस एक बरसात में पैदा किया है. वही कुआं है, वही खेत.’

‘पर आदमी दूसरा है न?’

‘हां, आदमी कोई अच्छे पांव वाला चाहिए, नहीं तो धरती क्या ना कहती है? जितना ले सको, उतना ले लो न!’

‘तब तो मैं बड़े भैया से कहूंगा कि तुझे जिन्दगी भर के लिए रख लें.’

‘नहीं, नहीं, तुम यह समझते हो कि मेरे कारण इतनी अच्छी फसल हुई है? भूल रहे हो, भूल.’

‘तो.’

‘तुम सोचो जरा. बताओ जरा.’

‘मैंने तो खेती देखी भी नहीं थी, फिर भी कहता हूं कि खेती तुम्हारे कदमों से ही अच्छी हुई है.’

‘कह रहा हूं, मेरे पांव से नहीं. इतना भी समझ में नहीं आता? हाथीड़ा के पांव से.’

और वह खिलखिलाकर हंस पड़ा. उसके मुफ्त हास्य से मार्ग पर कुछ देर के लिए स्तब्धता फैल गई. मेरी हंसी को मजाक में न ले लिया जाय, इसलिये इच्छा होने पर भी मैं हंसा नहीं. मुझे उससे पूछना था कि हाथीड़ा कुछ पढ़ता-वढ़ता है भी, उसका मन पढ़ाई में लगता है या नहीं, कि इतने में वह बोला-

‘मुखिया के बेटे को जितना आता था, उतना तो सब हाथीड़ा सीख गया है. उल्टे मुखिया का बेटा पिछड़ गया है. शाम होने पर लड़के पहाड़े बोलते हैं, किन्तु हाथीड़ा पंखी उड़ाने के लिए मचान पर चढ़ता है तब भीपूरा दिन पहाड़े गाता है.

‘बड़े भैया तो कहते हैं कि हाथीड़ा बड़ा विद्वान बनेगा.’

बड़े भैया ने किस अर्थ में कहा होगा, यह तो वह ही जानें पर गोविन्दा के सारे चिह्न अनुकूल प्रतीत हो रहे थे. अपने रास्ते में रह-रहकर मुझसे दो-तीन बार कहा, ‘एक बात तो तुम्हें नहीं ही बताऊंगा.’

‘कौन-सी? जानने लायक होगी तो?’

‘तुम एक बार घर-अरे कुएं पर तो पहुंचो, पता चल जायेगा.’

उसने वह ‘एक बात’ न कही हो इतना ही नहीं. पर घर पहुचने के पहले रह रहकर चार-पांच बार गंभीर मुद्रा में उसने कहा, ‘नहीं, नहीं, तुम चाहे जो करो, वह बात तो तुम्हें नहीं ही बताऊंगा.’

उसके सिवा सब बातें उसने मुझे बता दी थीं यह मुझे मान लेना चाहिए. शाम हुई. भाभी का दुर्गा और मैं कुएं वाले खेत पर गये. हमें देखकर गोविन्दा दौड़ता आया और मुझे मेड़ पर घुमाने लगा. ‘देखो इसमें इतना मक्का हुआ, इस खेत में इतने गेहूं होंगे, इस खेत में से मोठ पैदा किये और चना बोना है आदि. मेरी समझ में न आए ऐसी बहुत-सी बातें उसने एक श्वास में कह डालीं. मुझे लगा कि गर्मी में जिस सूखी परती जमीन पर हम एक साथ घूमे थे उसे उसने कितनी हरी-भरी बना दिया है. मैं उसके सामने देखता रहा.

मुझे वह कितना बड़ा!-जैसे दो-तीन पीढ़ी बड़ा आदमी लगा.

‘वह दिखाने ले जा न, गोविन्दा.’ भाभी के दुर्गा ने कहा.

मैंने पूछा, ‘क्या?’

‘कुछ नहीं, चले आओ मेरे पीछे-पीछे.’ कहता हुआ गोविन्दा चलने लगा. रबी के मक्के के दो खेतों और गेहूं के बड़े खेत की मेड़ें जहां मिलती थीं, वहां कुछ छप्पर जैसा दिखाई दिया कि तुरन्त ही वह बोल उठा-

‘देखो, वह मड़ई?’

और खुशी-खुशी वह आधा नाच-सा उठा.

‘किसने बनाई?’

‘मैंने! खम्भे मैंने काटे और उठा लाया हाथीड़ा. पहले उसे सूझा कि हम कूएं के खेत पर मड़ई बनाएं. देखते-देखते हाथों-हाथ इसे खड़ी कर दी. छप्पर ठीक लग रहा है, न भैया?’

हम मड़ई के पास आकर भीतर और आस-पास से उसे देखने लगे. उसे छोटी झोपड़ी कहा जाय तो भी चलेगा. पर झोपड़ी शब्द में तो घर का बोध होता है.

किसान को घर की माया कैसी? उसे तो सर्दी की ओस से बचने के लिए सिर पर छप्पर जैसा कुछ चाहिए. उसे चार खम्भों पर टिका दें तो बड़ा महल हो गया, नहीं तो बड़े छायादार वृक्ष ही हमेशा के लिए छप्पर होते हैं.

‘देखो यहां हाथीड़ा बैठकर पाठ तैयार करता है.’ उसने घास की बैठक की तरफ अंगुली दिखाई. मड़ई के छप्पर के नीचे दोनों ओर दो घास के बिछोने थे और बीच के अलाव में लकड़ी का एक मोटा कुंदा अधजला पड़ा हुआ था. उसके सिरे में से धुएं की पतली लकीर निकल रही थी, वह बीड़ी के धूएं की लकीर जैसी दिखाई देती हुई कुंदे में मानवीयता का आरोपण करने के लिए प्रेरित कर रही थी. खम्भे पर पानी की दो तुंबिया लटकाई हुई थीं. छप्पर पर मिट्टी का काला सकोरा उलटा रखा हुआ था और उसके पास एक छोटी-सी नारियल की कांच-सी रखी हुई थी.

‘यहां बैठकर उसने सारे पहाड़े याद कर लिये.’ गोविन्दा ने उत्साह से कहा. तभी भाभी का दुर्गा मेरी बांह खींचता हुआ बोला, ‘मेरे पास से किताब लेकर बेकार ही फाड़ डालता है. ऐसे कहीं पढ़ा जाता होगा, चाचा?’

और उसने मुंह बिचकाकर ओठों पर आई मखौल भरी हंसी दबा ली. गोविन्दा को यह जरा भी अच्छा नहीं लगा. इतने में सामने की मेड़ से हाथीड़ा दौड़ता-दौड़ता आया. मुझे देखकर उसका चेहरा खिल उठा. आठ-नौ साल का हाथीड़ा गोविन्दा का सर्वस्व था. उसके खुद के शरीर पर अंगरखा भी था, पर हाथीड़ा ने ढीला-ढाला कोट पहन रखा था. घुटनों से कुछ नीची लाल किनारे की धोती लांग लगाकर पहनी हुई थी. उसके सिर पर खादी की मैली कुचैली टोपी थी. आते ही वह हमें आश्चर्य से देखने लगा. एकदम शीघ्रता से भाभी के दुर्गा ने बिल्ली की तेजी से हाथीड़ा के कोट की जेब में हाथ डाला और दो-तीन मोड़ मुड़ी पहाड़े की किताब निकाल ली.

‘देखो इस तरह पढ़ा जाता है. बड़ा पढ़ाकू बना है. मेरी किताब खराब कर दी.’

दुर्गा ने फिर मुंह बिगाड़ा और जब किसी ने उसकी बात नहीं सुनी तो मेरी ओर देखते हुए हंसते-हंसते कहने लगा, ‘ये ठाकरड़े क्यों पढ़ने के चक्कर में पड़ते हैं.’

गोविन्दा का मुंह उतर गया. हाथीड़ा का आश्चर्य आंसू तक पहुंच गया. मुझे यह नहीं सूझा कि क्या करना चाहिए. पर फिर तुरन्त ही जेब से चार पैसे निकाल कर मैंने दुर्गा को दिए. यह ले, इसकी तू अपने लिए नई किताब ले आ. यह पुरानी इसे दे दे.’

दुर्गा खुश हो गया. क्योंकि पट्टी-पहाड़ा एक पैसे में ही मिल जाता है, यह मैं जानता था. किताब मिलने पर हाथीड़ा खुश हो गया. गोविन्दा अजीब आभार भावना से नीचे देखता रहा. ‘तुम्हारे जैसे न हों तो फिर हमारी पढ़ाई कैसे हो?’

मैंने कहा, ‘कल हम हथीड़ा को स्कूल में भर्ती करा देंगे. मास्टर जी मेरे पहचान के हैं, इसलिए खास ध्यान रखेंगे.’ गोविन्दा बेहद खुश हो गया और फिर सब लोग खुश हो गए.

‘अब तो वह बात बतानी है न?’

‘अरे तुम भी कैसे हो? वह बात तो तुम्हें बता भी दी न अभी, छप्पर से बिछौने तक.’ गोविन्दा खिलखिला के हंस पड़ा.

और उसकी मड़ाई पर फिर से एक दृष्टि डालकर मैं घर चला आया.

एक दिन मैं टहलता हुआ मड़ई तक पहुंचा. छप्पर पर मेरी दिशा में सूखने के लिए एक गमछा लटकाया हुआ था, अतः मैं एकदम वहां तक पहुंच गया तो भी मड़ई के नीचे बैठे दोनों भाइयों को मेरे आगमन का पता नहीं चला. उनकी बातचीत सुनकर मैं आगे बढ़ता-बढ़ता रुक गया. दोनों भाई खाते-खाते बातें कर रहे थे.

‘देख अब तू पढ़ने में कसर रखे तो तेरी जिम्मेदारी.’

‘मुझे पहाड़ों में मास्टर साहब पहला नम्बर देते हैं. उस दुर्गा ने इसीलिए तो वह किताब वापस ले ली. पर अब उसका कुछ काम भी नहीं है.

‘कुछ नहीं, हमें क्या? जहां तक पढ़ सकते हैं, वहां तक पढ़ना है. शामल भैया तुम्हें बलिस्टर बनाए बगैर नहीं रहेंगे.’

‘जा, जा, पागल की तरह क्या बोलता है?’ हाथीड़ा अपनी जाति की प्रथा के अनुसार बड़े भाई को भी तुकारे से ही बुलाता था.

‘हां, हां, तुझे बंबै हुन्नरशीटी का गाजरवेट (बम्बई यूनिवर्सिटी का ग्रेजूएट) बनायेंगे और कहते थे...’

मैंने बड़ी मुश्किल से हंसी रोक रखी थी.

‘और वे दीवान बनेंगे तो तुझे कम से कम तहसीलदार तो बना ही देंगे.’

‘किसे? मुझे?’

‘हां, हां, इस इतने से हाथीड़े को बड़ा तो होने दे. क्या कोई पेट से तहसीलदार बनकर जन्म लेता है?’

‘हाऽ...हाऽ...हाऽ...’ हाथीड़ा हंस पड़ा. ‘मैं तहसीलदार बनूंगा तो तुझे क्या बनाऊंगा. बता तो?’

‘मुझे? मुझे तो तू चपरासी बनायेगा. या फिर तू अपने घोड़े पर चढ़कर रास्ते पर जा रहा होगा और मैं अपने कुएं पर काम कर रहा होऊंगा तो तू मुझसे बेगार करवायेगा.’

‘हाऽ...हाऽ...हाऽ...’ हाथीड़ा हंस पड़ा.

‘तो, तो जरूर मैं तहसीलदार बनूंगा. लो, तो बस पढ़ ही डालूं.’

‘देख हंसी में मत उड़ा देना. बापू कह रहे थे. मुझे यहां छोड़ा था तब से इस होली पर मुझे पन्द्रहवां लगेगा. इसलिए मैं पूरे आदमी की तनख्वाह ला सकूंगा. और फिर चार-पांच साल में अच्छा सा पैसा इकट्ठा हो जाएगा तो बापू मेरा घर बसवा देंगे. और मैं अपनी जिन्दगी खींच लूंगा. अपने लीम्बा काका की तरह या बापू की तरह या अपने लोगों की तरह. पर तू? तुझे तो पढ़ते ही जाना है. आगे-पीछे देखे बगैर. इस मड़ई से जगमगाता तेज प्रकट करना है, समझा कुछ?’

‘इसमें मड़ई का क्या है?’ बड़े भाई की सारी बात सुनकर, थोड़ा कुछ समझकर भी जब हाथीड़ा को कुछ नहीं सूझा तो बोल उठा.

‘अरे वाह. तू आखिर में ऐसा ही बदला चुकायेगा क्या? इस मड़ई की जगह बड़ी हवेली बनवाना. किसी दिन तहसीलदार से दीवान के पद पर पहुंचे तो,’ उसने मुंह का कौर नीचे उतारा और साफ गले से आगे बोला, ‘मेरी तरह तेरे-मेरे बच्चे-हममें से किसी के भी बच्चे, पढ़े बिना न रहें, यह देखना. अरे तू बड़ा आदमी बनेगा तो तुझे यहां सकूल बनवाने में क्या तकलीफ पड़ेगी?’

‘वह तो ठीक है पर मुझे स्कूल के लिए देर हो जायेगी, मेरा नम्बर चला जायेगा. ला थोड़ी सी कढ़ी दे तो अपने में से, टुकड़ा गीला हो इतनी सी.’

मैं थोड़ा खिसक कर उनके सामने गया. गोविन्दा उसके सिकोरे में से थोड़ी-सी कढ़ी हाथीड़े की कांचली में डालने जा रहा था तो चौंक उठा, जो थोड़ी कढ़ी थी उसमें से थोड़ी नीचे फैल गई. मैंने कहा-

‘घर से ज्यादा कढ़ी क्यों नहीं लाता है?’

‘एक आदमी को चाहिए उससे तो ज्यादा ही देते हैं.’

‘पर हाथीड़ा और तू दो हो, तो दो आदमी जितना लाते तो?’

‘रोटला (बाजरे की मोटी रोटी) एक ज्यादा मिलता है, वही क्या कम है.’

‘थोड़ी और कढ़ी लाने में क्या जाता है? तेरे कारण हाथीड़े को हैरान होना पड़ता है न.’

‘पर हाथीड़ा कहां हलवाही कर रहा है.’

‘हां, हां, भूल ही गया, हाथीड़ा कहां हलवाहा है?’ और हाथीड़े की ओर देखकर मैंने कहा, ‘दौड़-दौड़ स्कूल की घंटी कभी की बज चुकी है.’ और तुरन्त ही खाना छोड़कर वह गोविन्दा से ‘तू खा लेना.’ कहता हुआ दौड़ा. ‘पढ़ने में कितना मन है इसका?’ कहकर, मैं भी, दोनों भाइयों के वार्तालाप की जुगाली करता हुआ चल पड़ा.

छुट्टियां खत्म होने को थीं. एक दो दिन बाद ही मुझे स्कूल जाना था. रात में दुर्गा को चुप कराने के लिए सिर पर हाथ फेरते-फेरते भाभी ने कहा-

‘शामल, स्कूल कब खुल रहे हैं?’

‘इस सोमवार को, क्यों?’

‘क्यों, तेरे बदले में उस ठाकरड़े को पढ़ने भेजना है. तेरे भैया आएं तो उसका तय कर दे. बड़ा पढ़ाकू है भाई.’ और दुर्गा की पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘राजा बेटा चुप हो जा.’

मैं तो बुद्धू की भांति देखता ही रह गया. गोविन्दा की भांति किसी के यहां हलवाही करने गया हूं, ऐसा परायापन मुझे अपने ही घर में लगा. भाभी ने हाथ का पंजा ऊंचा किया, ‘वे ठाकरड़े के बच्चे मेरे दुर्गा के ऊपर नम्बर रखेंगे? और घर की रोटियां उन्हें खिलाकर अपनी दुर्गा को रुलाऊंगी ऐसा नहीं होगा? मेरी तो मति मारी गयी है, क्यों?’

फिर तो उन्होंने न जाने कहां से उस पट्टी पहाड़े वाली किताब की बात भी निकाली और मुझसे और मुझसे सफाई मांगी गई. बड़े भैया के आने पर बड़ी मुश्किल से बात निपटाई. अगले दो दिन रहा, उस दौरान मैंने दुर्गा को पैसे देकर, पटाकर, परीक्षा समाप्त होने पर वापस आते वक्त उसके लिए कुछ लाऊंगा, ऐसी रिश्वत देकर अगर वह खुद पहला नम्बर लायेगा तो इनाम का लालच दिखाकर-और मेरे सामने तो वह बिल्कुल सच था, इसीलिए अनेक तरह से भुला-फुसलाकर, डर-रिश्वत से उसको अपने पक्ष में किया. उसके द्वारा अथवा उसको पटाने पर भाभी के मन को मनवा सका. मुझे लगा कि गोविन्दा में-और उसके कारण हाथीड़े में जितना रस ले रहा हूं, उतना भाभी के दुर्गा में, अथवा अपने में कभी मैंने नहीं लिया. और अब तो हाथीड़े के कारण दुर्गा में रुचि बढ़ने लगी थी. मुझे लगा कि होली पर आऊंगा तब तक हाथीड़ा निर्विघ्न पढ़ सकेगा. घर से कुछ खास ज्यादा तो खाने के लिए देना होता नहीं, और लड़के बेचारे मड़ई में पड़े रहते हैं. हाथीड़ा पंखी उड़ाने अथवा दूसरा कुछ मोटा-मोटा काम कर देता अतः उसका बोझ हमारे घर पर नहीं था.

मुझे स्कूल पर छोड़कर गोविन्दा वापस आ रहा था. कोई बात नहीं सूझी इसलिए मैंने उसकी मनपसन्द बात छेड़ी, ‘मैं होली पर तो आऊंगा. तब तक या उसके बाद हाथीड़ा बाल पोथी कर लेगा और पहली में आयेगा. गर्मी में उसे पहली और दूसरी दोनों लिखा दूंगा. बहुत होशियार है.’

‘हां, खेती के काम में भी क्या कम होशियार है? मड़ई का काम मैंने तो क्या किया है. सारा काम उसी का है. क्यारी सींचने में, बैलों को चराने में कहीं भी मुझसे कम नहीं.’

‘वाकई मुझसे भी होशियार है.’

‘नहीं, नहीं यह क्या कहा? तुमसे तो क्या होशियार होगा? पर अभी तो उसे काम करने देता हूं, पर गर्मियों से बिल्कुल स्टाप. बस जितना पढ़ सके, उतना ही पढ़ता चले. काम करने वाले हम बैठें हैं न. मजबूत बांहों वाले.’

‘सब ठीक कर देंगे.’

अच्छा कहता हुआ वह घोड़ा पकड़कर रास्ते की ओर मुड़ा, घोड़े पर बैठा भी नहीं. अनुभवी व्यक्ति हो, दुनिया की चिन्ता का भार सिर पर हो और वह बेचारे चौपाये प्राणी पर अपना भार लादने की इच्छा न रखता हो, ऐसे परिपक्व पुरुष की भांति मुझे वह प्रतीत हुआ.

माघ महीने में मैंने बहुत राह देखी. रास्ते पर भांति-भांति के अनेक आकार वाले मनुष्य गुजर जाते थे. तो इन सब में एक गोविन्दा भी हो सकता है, यह घटना कैसे असम्भव हो गयी, यह मेरे लिये उलझन बन गई. पिछले साल के किसान ने पेशगी पैसे दिये होंगे और बंटवारे की खेती में कुछ अड़चन आने पर चूक गया होगा और फिर पैसे लौटाये नहीं होंगे. अथवा और कुछ-तो उसके खिलाफ बड़े भैया ने केस चलाया था. और आज उसकी सुनवाई थी, अतः आये थे. होला की पोटली मुझे पकड़ाते हुए बोले-

‘ठाकरड़ा कह रहा था कि बड़े भाई को होला दे आऊं, मुंह में जुबान ही नहीं टिक रही थी, ले.’

ताजा, मीठा काफी सारा पांच सेरेक होला मेरे हाथ में आते ही दूसरे विद्यार्थियों को मुझसे कितनी ईर्ष्या हुई होगी, यह तो मैं ही जानता हूं. उस समय मुझे तीव्रता से यह अहसास हुआ कि गोविन्दा मेरा जबरदस्त शुभचिंतक बालक है.

होली की छुट्टियों में किसके लिए क्या ले जाया जाय, इसकी उलझन हुई, और कुछ भी न ले जाने का मार्ग सुगम निकला. घर पहुंचा कि तुरन्त दुर्गा ने कुछ मांगा भी सही, और मैंने उसको

सीधा उत्तर नहीं दिया, पर दो-तीन दिनों के बाद इस बीच के समय की सारी रामायण गोविन्दा ने मुझे कह सुनाई.

‘तुम कहते थे न कि कढ़ी क्यों ज्यादा नहीं लाता है. पर पीछे से तो रोटला भी बन्द कर दिया और मुझे अकेले खाने में से हम दोनों पूरा करते रहे. वो तो मुखिया का हलवाहा किसी दिन थोड़ा बचा तो दे देता है, इससे पूरा होता...और किसी दिन बड़े भैया की पत्नी कहती कि घर पर ही खाकर जा. इसलिये मुझे अकेले ही रोटले का डूचा जैसे-तैसे गले के नीचे उतारना पड़ता और हाथीड़ा भूखा तरसता रहता सारे दिन. पहले तो हाथीड़ा ही खाना लेने जाता था. लेकर आता होता तो रास्ते में दुर्गा और उसके साथी हाथीड़ा के पीछे कुत्ते दौड़ाते और इस मड़ई में गुदड़ी पड़ी है यह. किसकी समझ रहे हो? अपने घर की नहीं है. मुखिया के हलवाहे ने ला दी है...पर मेरे मन पर कुछ असर नहीं पड़ता. हाथीड़ा नम्बर पहला रखता है. अब तुम आये हो तो दो-दो तीन-तीन किताबें पढ़ाकर अंगरेजी में भर्ती करवा दो.’ और कुछ देर रुककर बोला, ‘मेरी आंखों के सामने हाथीड़े को पढ़ा-लिखा देख लूं तो जन्म सुधर जाये.’

यह सब सुनना मेरे लिये कठिन था. पर भाभी की बात सुननी उससे भी कठिन था. बड़े भैया और मैं रात का खाना खा रहे थे कि तभी वे बोलीं, ‘अब अपना शामल तो पढ़ चुका. बहुत हुआ. इस दुर्गा को भी बाल-पोथी से आगे नहीं पढ़ाना है. पढ़ाई में एकदम कमजोर है. आखिरी नम्बर लाता है. घर बैठे सीख लेगा चिट्ठी-पत्री लिखना. शामल उस ठाकरड़े को पढ़ाता है तो इतना दुर्गा को नहीं सिखायेगा?’

इतने ठण्डे कटाक्ष से वह बोल रही थीं कि मेरे गले का कौर अधबीच में ही अटक गया. थोड़ा पानी पीने के लिए गिलास लिया और गिलास की ओट में देख लिया कि बड़े भैया की आंख में क्या है? बड़े भैया हमेशा ही कम बोलने वाले हैं अतः उनकी नजर ही मेरे लिये काफी थी. यों देखा जाय तो, वैसे भी मैं पूरी नजर से उनके सामने शायद ही कभी देखता.

दूसरे दिन भाभी ने मुझे आड़े हाथों लिया? ‘ये ठाकरड़े तुम्हारे कुछ लगते हैं? और दुर्गा तो दुश्मन का होगा? कभी उससे पूछा भी है कि तुझे कितना आता है. रोज मास्टर पीटते हैं.’

फिर तो ठोकर लगने से थोड़ा भी दुर्गा गिर पड़ता, या खाते-खाते खांसी आ जाती या जल्दी-जल्दी पानी पीते वक्त नाक से थोड़ा निकल जाता तो उन सब प्रसंगों पर मेरी शामत आ जाती.

अंधेरा हो गया था. मैं देर से घर आया था. बाहर ओसारे में बैठा था. भीतर से भाभी की आवाज आ रही थी, ‘आप कहते हैं, पर इस शामल में भी कुछ अक्ल है. उस गोविन्दा के भाई को सिर पर चढ़ा रखा है. उस ठाकरड़े को कुछ शरम भी है. आज दुर्गा का हाल हुआ स्कूल में? बता तो अपने पिताजी को.’

और हिचकियों की ताल भरता हुआ गीत गा रहा हो ऐसे राग तानकर दुर्गा अपनी आप बीती सुनाने लगा.

‘हमें पहाड़ा नहीं आया आ जा... इसलिए ए ए...’वह रुक गया.

बड़े भैया की आवाज सुनाई दी, ‘इसलिए क्या? कह दे न झटपट.’ थोड़ा भी बोलना पड़े यह उन्हें अच्छा नहीं लगता. उन्होंने अपनी जुबान का बहुत कम उपयोग किया होगा. कोई दूसरा भी बात करते समय जुबान पर शब्दों को सहलाया करे, यह उन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं था.

‘इ...स...लि...ए हाथीड़ा पहला नम्बर था. हं...हं...हं...अं...अं...अं...हं...अं.’

‘तुझे पहाड़े नहीं आए इसलिए वह पहला नम्बर था. कैसी बात करता है? जा अपनी मां को ही सुना.’

रसोई से बाहर निकलकर भाभी चीख उठीं.

‘अब आप भी क्या बच्चे बनते हैं?’ और दुर्गा की ओर मुड़कर बोलीं, ‘तू भी क्या अपने पिता जैसा बन रहा है? कह डाल न कि फिर मास्टर ने हाथीड़ा से कहा कि सबके गालों पर एक-एक तमाचा जड़ दे और उसने सटाक से जड़ दिया. जड़ क्यों न देगा. घर की रोटियां खाकर तो उसके हाथ में ताकत जो आ गयी है. दुर्गा को थप्पड़ खिलाने की हममें कहीं कम उमंग है.’

दुर्गा धीरे से बुदबुदाया, ‘मास्टर ने कहा कि हाथीड़ा तमाचे मार, इसलिए...’

हां! फिर हाथीड़ा होंगे अपने घर के मुझे तो लगता है कि आ बैल मुझे मार वाली जैसी स्थिति शामल ने कर दी है. उसे क्या.’ उन्होंने मुझे भी काफी सुना दिया. उनका पारा उतरने के बाद बड़े भैया ने मात्र गिने-चुने दो वाक्य कहे-

‘अब यह होली तो परसों आ गई है. अक्षय तृतीया के दिन देख लेंगे. मैं तो इतना जानता हूं कि मकनासी का हिसाब इस साल में निपट जाय तो बस.’

होली की शाम बहुत देर तक दुर्गा घर में दिखाई नहीं दिया, अतः भाभी घबराई, मुझे बाहर ओसारे में किताब पढ़ता हुआ देखकर रुकीं.

‘कुछ परवाह है तुम्हें? सब पढ़-लिखकर बड़े पण्डित हो रहे हो. मेरा बेटा इस नये दिन में किसी की टक्कर में आ जाएगा तो इसकी परवाह है किसी को? और ऊपर से सिकड़ी वाले बटन डालकर गया है.’

दूसरा घण्टा भी निकल गया. अंधेरा हुआ कि भाभी का दिल बैठ गया. उन्होंने मुझे फटकारा, ‘निर्लज्ज बड़ा आया पढ़ाकू. मेरे बेटे की जान ही लेने बैठा है न. दीवाली से उस पर जोंक चिपका दी है तो बेचारा सूख के कांटा हो गया है, और जला-भुना मेरा लड़का घबराकर...’

क्रोध से उनकी जुबान भी कांपने लगी थी और इस अशुभ वाक्य को वे आगे बोल न सकीं. मैं उठा और सारे गांव में तलाश करके अन्ततः यह मानकर वहां गया कि कुएं पर होगा. फाल्गुनी पूनम का चांद खेत की क्यारियों को दूध से भर रहा था. कुएं की जगत पर मुखिया का हलवाहा और दूसरे हलवाहे घास के बिछौने पर पड़े थे. जाकर मैंने पूछा.

‘दुर्गा को देखा है क्या?’

मेरी आवाज से मुखिया के हलवाहे ने करवट बदली और आश्चर्य से उठ खड़ा हुआ.

‘अरे, होली सुलगा दी अभी से?’ कहता हुआ वह पूर्व दिशा में मड़ई की ओर देखता रहा.

‘कहां, अपने खलिहान की ओर?’ कहता हुआ गोविन्दा उठ बैठा और पश्चिम दिशा की ओर देखता रहा. बिजली का करंट छू गया हो ऐसे सब इकट्ठे होकर खलिहान की ओर दौड़े.

बुद्धू की तरह मैं खड़ा-खड़ा देखता रहा. दो होलियां जल रही थीं.

जलती हुई मड़ई के इर्द-गिर्द आठ-दस बच्चे खुश होकर उछल-कूद मचा रहे थे. आग की लपटों के प्रकाश में मैंने दुर्गा को भी उनके बीच उछलता-कूदता देख लिया.

दूसरी ओर से गोविन्दा हाथीड़े और एक-दूसरे लड़के की बाहें घसीटता हुआ लाया. ‘गेहूं का पूरा खलिहान जला डाला. बड़े भैया मेरा क्या करेंगे. मुझे जिन्दगी भर कोई हलवाही पर नहीं रखेगा.

हाथीड़ा रोते-रोते बोल रहा था.

‘मुझसे इस मगन ने कहा कि, वह दुर्गा मड़ई की होली जलाने आए हैं, तो फिर क्या हम दुर्गा का खलिहान नहीं जला डालेंगे?’

और वह जोर-जोर से रोने लगा. मगन भी रो रहा था. गोविन्दा की आंखों में से आंसू निकल रहे थे, पर उसके गले से कोई आवाज नहीं निकल पा रही थी. खलिहान को बुझाने में लगे हलवाहों का कोलाहल सुनाई दे रहा था. मैं तो अवाक् ही रह गया था. पिछले साल एक किसान का भैया ने पीछा पकड़ रखा है, वह मुझे याद आया. मकनासी खांट का खाता निपट जाता. अब उसकी जगह पर इस खलिहान के हर्जाने में जिन्दगी भर एक लड़के को मजदूर बनकर रहना पड़ेगा क्या? ऐसी आशंकाएं मुझे होने लगीं. और होली के बाद का गोविन्दा का पन्द्रहवां साल, उसको पूरे आदमी की तनख्वाह, चार-पांच साल की कमाई के पांच बीसी रुपये, सुन्दर कन्या, घर-बार सब गेहूं के खलिहान में धूं-

धूं जल रहे थे...और किसी भी तरह से हाथीड़े की पढ़ाई, भविष्य की बलिस्टर की पदवी, तहसीलदारी, स्मारक के रूप में मड़ई के स्थान पर हवेली का निर्माण, ये सब स्वप्न मड़ई की जलती ज्वालाओं में भस्म हो रही थी.

धधकती अग्नि ज्वालाओं के आसपास होली खेलने वाले उछल-कूद कर रहे थे.

लेणादेणी कटशुं पूरी, लीछुं एटलुं देशुं रे,

खबरों रे लेशुं होलीने वायदे, लाल केशा

दोनों होली की लपटें हवा के झोंके से थोड़ी झुकीं और फिर सीधी हुईं. फिर धीरे-धीरे ढलने लगीं. पर इसके अलावा एक तीसरी होली गोविन्दा के हृदय में सुलग उठी थी और उसकी लपटें बढ़ती जा रही थीं. निश्वास भरकर वह बोला-

‘हाथीड़ा, तू बलिस्टर बन जाए तो इतने खलिहान का नुकसान तो पलक झपकते ही चुका दे ना.’ जैसे मुझे उत्तर देना हो, ऐसे मेरी ओर देखकर बोला, ‘तुम बड़े भैया से कह देना कि मेरे पिता को इसमें शामिल न करें. हाथीड़ा पलक झपकते ही भर देगा.’

जन्म-जन्मान्त्तरों से मृगजल के पीछे दौड़ने की आदत हो गई हो और उसमें जब इस प्रकार भ्रम-भंग हो जाए तब उल्टे दुगुने जोर से मृगजल की आतुरता कैसे बढ़ती है, यह गोविन्दा की हालत से पता चलता था. सहन करने की जन्म-जन्मान्तरों की शिक्षा के बाद इस जहर से घंट की क्या औकात है-इस तरह से वह मड़ई की बुझती जा रही लपटों की ओर देख रहा था और मैं उस बढ़ती चांदनी में उस छोटे बुजुर्ग व्यक्ति की वेदना की आंखों में से

दूध की भांति टपकता देख रहा था, कि कहीं दौड़कर खेत के उस छोर पर पहुंचे हुए होली खेलने वालों का फाग सुनाई दिया-

तम्मारे अम्मारे हिसार चूकते

लाल केशा (तुम्हारा हमारा हिसास पूरा हो गया, लाल केशा)

सामने, मड़ई की लपटें उसके छप्पर की राख पर सो जाना चाह रही थीं.

अनुवादः मृदुला पारीक

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