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प्राची - फरवरी 2016 - सेवा और सहिष्णुता के उपासक संत तुकाराम / डॉ. प्रभु चौधरी

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  आलेख सेवा और सहिष्णुता के उपासक संत तुकाराम डॉ. प्रभु चौधरी सं सार में सभी मनुष्य का लक्ष्य, धन संतान और यश बताया गया है. इन्हीं क...

 

आलेख

सेवा और सहिष्णुता के उपासक संत तुकाराम

डॉ. प्रभु चौधरी

संसार में सभी मनुष्य का लक्ष्य, धन संतान और यश बताया गया है. इन्हीं को विद्वानों ने वित्तैषणा, पुत्रैषणा और लौकेषणा के नाम से पुकारा है. इन तीनों से विरक्त व्यक्ति ढूंढ़ने से भी कहीं नहीं मिल सकता. संभव है किसी मनुष्य को धन की लालसा कम हो, पर उसे भी परिवार और नामवरी की प्रबल आकांक्षा हो सकती है. इसी प्रकार अन्य व्यक्ति ऐसे भी मिल सकते हैं जिनकों धन के मुकाबले में संतान अथवा यश की

अधिक चिंता न हो. पर इन तीनों इच्छाओं से मुक्त हो जाने वाला व्यक्ति किसी देश अथवा काल में बहुत ही कम मिल सकता है.

इसका आशय यह नहीं कि हम इस प्रकार की आकांक्षा रखने वाला मनुष्य निश्चित ही दूषित समझा जाए. संसार में रहते हुए इन वस्तुओं की आवश्यकता मनुष्य को पड़ा ही करती है और यदि इस आवश्यकता को न्यायानुकूल मार्ग से पूरा किया जाय तो उसमें बुराई अथवा निंदा की कोई बात नहीं है. पर देखने में यह आता है कि बहुसंख्यक लोग इनके लिए गलत उपायों का अवलंबन करते हैं, इनकी लालसा में पड़कर अन्य उच्च श्रेणी के लक्ष्यों को त्याग देते हैं, इसीलिए इन तीनों एषणाओं की ज्ञानी व्यक्तियों ने निंदा की है.

दूसरी बात यह भी है कि चाहे ये तीनों कामनाएं सामान्य दृष्टि से बुरी या हानिकारक हों, पर जब मनुष्य का ध्यान

अधिकांश रूप में इनकी पूर्ति में लग जाता है, तो वह परोपकार, सेवा आदि के अधिक श्रेष्ठ कार्यों की तरफ से प्रायः उदासीन हो जाता है. ऐसी दशा में यदि कोई व्यक्ति सांसारिक एषणाओं की तरफ से चित्त-वृत्तियों को बिल्कुल हटा ले और उनकी आपूर्ति में भी आनंद का अनुभव करें, तो उसको अवश्य ही सच्चा संत कहा जायेगा. तुकाराम इसी श्रेणी के मनुष्य थे. गृहस्थ जीवन के आंरभ में ही जब वे आकस्मिक विपत्तियों के फल स्वरूप सब सांसारिक वस्तुओं से वंचित हो गये, उन्होंने भगवान् को धन्यवाद देते हुए कहा-

‘‘भगवान! अच्छा ही हुआ जो मेरा दिल दिवाला निकल गया. अकाल पड़ा यह भी अच्छा ही हुआ, क्योंकि कष्ट पड़ने से ही तेरा ध्यान आया और सांसारिक लालसाओं से पीछा छूटा. स्त्री और पुत्र भोजन के अभाव से मर गये और मैं भी हर तरह से दुर्दशा भोग रहा हूं, यह तो ठीक ही है. संसार में अपमानित हुआ, यह अच्छा ही है. लोक-लाज भी जाती रही, यह भी ठीक है, क्योंकि इन्हीं बातों से अंत में तुम्हारी शरण में आया.’’

‘‘सच तो यह है कि भगवान अपने सेवक को सांसारिक सफलता मिलने ही नहीं देते, वे सब जंजालों से मुक्त रखते हैं. अगर वे उसको वैभवशाली बना दें तो उसमें अभिमान उत्पन्न हो जाय. अगर वे उसे गुणवती स्त्री दें तो मन में उसी की इच्छी लगी रहे. इसलिए वे उसके पीछे कर्कशा स्त्री लगा देते हैं. तुकाराम कहते हैं कि इन सबको मैंने प्रत्यक्ष देख लिया, अब मैं संसारी लोगों से क्या कहूं.’’

संत तुकाराम का जन्म पूना के निकट देहूं गांव में संवत् 1665 वि. में एक कुनवी परिवार में हुआ था. इस जाति वालों को महाराष्ट्र में शूद्र माना जाता है और वे खेती-किसानी का

धंधा करते हैं, पर तुकाराम के घर में पुराने समय से लेन-देन का धंधा होता चला गया था और उसके पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. इसलिए उनकी बाल्यावस्था सुखपूर्वक व्यतीत हुई. जब वे तेरह वर्ष के हुए तो उनके माता-पिता ने घर का भार उनको देकर स्वयं तीर्थों में भगवत् भजन करने के उद्देश्य से चले गये. तुकाराम उसी आयु में दुकान का हिसाब-किताब करने में होशियार हो गये थे और पिता ने उनका विवाह भी कर दिया था, पर वे स्वभाव से अत्यन्त सरल, सेवाभावी और सत्यवादी थे.

इसका परिणाम यह हुआ कि दुनियादार लोगों ने उनका कर्ज चुकाना तो बंद कर दिया और जैसे बने उन्हें ठगने की कोशिश करने लगे.

लोगों की ऐसी मनोवृत्ति देखकर उनका चित्त सांसारिक व्यवहारों से विरक्त होने लगा. पर घर में कई प्राणियों स्त्री, भाई, बहिन आदि का निर्वाह उनके ऊपर था, इसलिए फुटकर सामान की दुकान खोल ली. पर वे कभी झूठ नहीं बोलते थे. कभी किसी को ठगते नहीं थे. सबके प्रति उदारता का व्यवहार करने लगे और दुकान में घाटा लग गया. जिन लोगों को उन्होंने उधार दिया था, वे तो देने का नाम नहीं लेते थे, पर जिनको लेना था वे फौरन नालिश करके घर पर जब्ती-का हुक्म ले आये. ससुरालवालों ने एकाध बार सहायता भी की, पर सरलता के कारण लोग उनको किसी न किसी प्रकार से ठगते ही रहे और उनकी आर्थिक दशा गिरती ही रही.

कई बार उन्होंने माल ले जाकर बेचने का कार्य शुरू किया. एक बार मिर्च लेकर किसी दूर के स्थान में बेचने को गये. वहां जो रुपया मिला उसको लोगों ने नकली सोने के कड़े देकर ठग लिया. दूसरी बार स्त्री (द्वितीय पत्नी) ने दो सौ रुपये कर्ज दिलाकर व्यापार करने को भेजा. उसे पचास रुपया लाभ भी हुआ. पर वहीं पर एक ब्राह्मण ने आकर अपना दुःख रोया और इतनी अधिक विनती की कि सब रुपया उसी को देकर चले आये. इस पर स्त्री ने उनको बहुत खरी-खोटी सुनाई और दण्ड दिया.

जब उस प्रदेश में भयंकर अकाल पड़ा तो एक बूंद पानी मिलना कठिन हो गया, वृक्ष सूख गये, पशु बिना चारे के मर गये. तुकाराम के घर में अन्न का दाना भी न था. किसी के दरवाजे पर जाता तो वह खड़ा भी नहीं होने देता, क्योंकि दिवाला निकल जाने से उनकी साख पहले ही जाती रही थी. घरवाले भूखों मरने लगे. तुकाराम हद से ज्यादा परिश्रम करते, पर तब भी पेट नहीं भरता. सब पशु और पहली स्त्री तथा बच्चा इसी में मर गये. इस प्रकार कष्ट सहन करते-करते तुकाराम का मन संसार से विरक्त होने लगा और वह अपना अधिकांश समय परमात्मा के ध्यान और भजन में लगाने लगे. उसकी दूसरी जीजाबाई का स्वभाव बड़ा झगड़ालू और लड़ाकू था. इससे घर में रह सकना और भी कठिन हो गया था. गांव के लुच्चा-लफंगा व्यक्ति भी उनको अक्सर छेड़ते रहते थे. वे उनको देखकर कहने लगते-‘‘और भगवान का भजन करो, हरि के नाम ने तुझे निहाल कर दिया.’’

ऐसी परिस्थिति में भी तुकाराम घर छोड़कर साधु-संत नहीं बने, पर उन्होंने चित्त शुद्धि के उद्देश्य पर कुछ समय एकांतवास करने का निश्चय किया. इसलिए वह निकटवर्ती ‘भामनाथ’ पर्वत पर चले गये और वहां पन्द्रह दिन तक भगवान का ध्यान ही करते रहे. जब यह बात गांव में फैली तो तुकाराम की पत्नी जीजाबाई बड़ी दुःखी हुई. स्वभाव से वह लड़ाकू और झगड़ा करने वाली अवश्य थी, पर साथ ही पतिव्रता भी थी. उसने तुकाराम के छोटे भाई कान्हाजी को उन्हें ढूंढ़ लाने को भेजा. इधर-उधर फिरते-फिरते भामनाथ पर उसकी तुकाराम के साथ भेंट हुई. वह उन्हें समझा-बुझाकर घर ले आया.

अब तुकाराम ने संसार के झगड़ों को सदा के लिए मिटाने का निश्चय किया. उन्होंने पिता के समय के दस्तावेज (ऋण-पत्र) निकाले, जो कर्ज लेने वाले थे लिखकर दिये थे. उन सबको वह गांव के पास वाली इन्द्रायणी नदी में डुबाने चले. यह देखकर छोटे भाई ने कहा-‘‘आप तो ‘साधु’ हो गये, परन्तु मुझे तो बाल-बच्चों का पालन करना होगा. अगर आप इन सब रुपयों को इस तरह डुबो देंगे तो मेरा काम कैसे चलेगा?’’ तुकाराम ने उत्तर दिया-‘‘ठीक है, तुम इनमें से आधे दस्तावेज निकाल लो और अलग रहकर अपनी गृहस्थी चलाओ. मेरा सब भार तो विट्ठल भगवान पर है. अब मेरा जीवन-क्रम सदा ऐसा ही रहेगा और मेरा निर्वाह भगवान पांडुरंग ही करेंगे. पर मैं यह नहीं चाहता कि मेरे कारण तुमको किसी भी प्रकार की हानि पहुंचे. इसलिए तुम अपना भाग लेकर अलग हो जाओ और मेरी चिंता न करो.’’ यह कहकर उसे आधे ऋण-पत्र कान्हाजी को दे दिए और अपने हिस्से के उसी समय नदी में प्रवाहित कर दिए. इस घटना का वर्णन करते हुए कुछ समय पश्चात संत तुकाराम के शिष्य ने लिखा था-

जब तक अनुभव न हो तब तक पुस्तकों में लिखा ज्ञान प्रायः निरर्थक रहता है. इसी प्रकार हमारा जो धन दूसरों के कब्जे में है, वह भी व्यर्थ होता है. इससे मन में शान्ति हमेशा खराबी पैदा होती रहती है. अमुक मनुष्य के पास से इतना लेना है, पर देगा या नहीं देगा? जाने क्या होगा? इस प्रकार तरह-तरह की चिंताएं और दुराशा मन में लगी रहती हैं. इसलिए तुकाराम ने अपने सारे कागज-पत्र इंद्रायणी नदी में डाल दिये. इसके पीछे उन्होंने कभी द्रव्य का स्पर्श नहीं किया. दरिद्रता के सब प्रकार के दुःख उन्होंने सहन कर लिए, मांगकर भी निर्वाह कर लिया, पर द्रव्य को कभी न छूने का निश्चय करके वे धन के फंदे सदा के लिए छुटकारा पा गये.’’

जीवन को सुखी बनाने के लिए ऐसे कार्यो से बचना आवश्यक है, जिनमें अन्य लोगों से विवाद, झगड़ा और संघर्ष होने की विशेष रूप से संभावना रहती है. लेन-देन अथवा ब्याज पर रुपया उधार देने का पेशा प्रशंसनीय नहीं है. इसमें प्रायः अभावग्रस्त व्यक्तियों के शोषण की भावना निहित रहती है और इसीलिए इन पेशो को करने पर व्यक्तियों में स्वार्थपरता की भावना बढ़ जाती है, साथ ही अन्य व्यक्तियों के प्रति उनमें सहानुभूति की भावना भी कम हो जाती है. तुकाराम की प्रकृति जन्म से ही इस कार्य के अनुकूल नहीं थी, इसलिए उन्हें इस पुश्तैनी पेशे में आरंभ से ही असफलता होने लगी और बाद में उसके कारण वे नई-नई कठिनाइयों में फंसते चले गये. इसलिए दस्तावेजोंकेा नष्ट करके अपने मन को इस उलझन से मुक्त कर लेना उचित ही था. अध्यात्म मार्ग के पथिक को जीवन निर्वाह का पेशा भी ऐसा चुनना चाहिए, जो अपनी आंतरिक प्रकृति के अनुकूल हो और जिसमें अन्य व्यक्तियों के अनहित की कोई संभावना न हो करके वे नदी के पास किसी पर्वत पर चले जाते और वहां ज्ञानेश्वरी अथवा ‘एकनाथी भागवत’ का पारायण करते. इसके बाद जो समय बचता उसमें नाम-जप करते. संध्या के समय गांव में वापस आकर मंदिर में कीर्तन सुनते और फिर स्वयं आधी रात तक कीर्तन करते. पिछली रात को थोड़ी देर सो लेते थे. फिर ब्रह्ममुहूर्त में उठकर नित्य कर्मों में लग जाते थे.

इस प्रकार विरक्त अवस्था में रहकर उन्होंने भूख-प्यास, निद्रा, आलस्य को जीत लिया. गीता के अनुसार ‘युक्ताहार विहार’ होने से सब इन्द्रियां वश में आ गईं. समय-समय पर वे तीर्थयात्रा को भी जाते थे, पर वे तीर्थ आसपास के ही होते थे. अपने पूर्वजों के नियमानुसार आषाढ़ और कार्तिक की पूर्णिमा पंढरपुर को जाते ही थे. ज्ञानेश्वर की जन्मभूमि ‘आलंदी’ तथा एकनाथ निवास स्थान ‘पैठण’ उनके गांव के पास ही थे. फिर एक बार तेईस-चौबीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने समस्त भारत के तीर्थ की यात्रा करके भारतीय समाज की अवस्था और तत्कालीन समस्याओं की जानकारी प्राप्त की. पर तीर्र्थों की दशा उस समय भी बहुत त्रुटिपूर्ण हो गई थी और सब जगह

धर्म-जीवियों ने उनको पेट भरने का साधन बना लिया था. इसलिए सब तीर्थों को देख लें पर उन्होंने यही कहा-

वाराणसी गया पहिली द्वारका.

परि नये तुका पंढरी च्या.

अर्थात् ‘‘काशीजी की यात्रा की और द्वारका भी देखी, पर हमको तो पंढरपुर ही सर्वोत्तम लगता है.’’

 

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रचनाकार: प्राची - फरवरी 2016 - सेवा और सहिष्णुता के उपासक संत तुकाराम / डॉ. प्रभु चौधरी
प्राची - फरवरी 2016 - सेवा और सहिष्णुता के उपासक संत तुकाराम / डॉ. प्रभु चौधरी
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