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प्राची - मार्च 2016 - कहानी - दूसरी पारी / दिनेश बैस

कहानी

दिनेश बैस

‘दैनिक जागरण’ झांसी में गत तीस वर्ष से स्तम्भ लेखन. रेलवे से सेवानिवृत. लगभग सभी विधाओं में लेखन. मुख्य और प्रिय विधा व्यंग्य. स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन. आकाशवाणी से प्रसारण.

अनेक साहित्यिक तथा सामाजिक संस्थाओं में सक्रिय. अनेक सम्मान प्राप्त. संयुक्त रूप से एक काव्य-संग्रह प्रकाशित।

सम्पर्कः 3-गुरूद्वारा, नगरा, झांसी-284003

मोः 08004271503

दूसरी पारी

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दिनेश बैस

चानक उन्हें लगा कि बहुत जाले लग गये हैं, घर में. उन्होंने सिर उठाकर छत की ओर नजर दौड़ाई. यहां-वहां छोटी-बड़ी मकड़ियां रेंग रही थीं. खिड़कियों, रोशनदान के सरियों के बीच मकड़ियों ने जाल बुन रखे थे. कमरे का फर्श साफ था, लेकिन अलमारियों में बिछे कागजों पर धूल की पर्त जमी थी. खिड़कियों की चौखटों का भी यही हाल था. वे झुंझलाये-समिधा क्या करती रहती है. कमरा भी साफ नहीं रख पाती है-इसी झोंक में उन्होंने हांक भी लगा दी-समिधा!

-जी...अभी आयी-बात की बात में समिधा पास आकर खड़ी हो गई-क्या चाहिये? क्यों चिल्ला रहे हो?

-कुछ नहीं, तुम जाओ...

उन्होंने खुद को समेट लिया-समिधा भी क्या करे? और सच तो यह है कि

समिधा ही तो सब करती रही है...उन्हें समय पर ऑफिस भेजना, बच्चों के होम-वर्क करवाना, स्कूल के लिये तैयार करना, मां-बाबूजी की देखभाल करना, घर सम्हालना, पास-पड़ोस के शादी-ब्याह, मरे-गिरे के रस्मों-रिवाजों को निभाना, हाट-बाजार...इन सब में कौन-सा काम कम हो गया? इतना ही न कि प्रत्याशा का विवाह हो गया. सुशांत पढ़ने के लिए पूना गया तो वहीं उसे जॉब मिल गया. साथ की अनसुइया के साथ लिव-इन-रिलेशन में है.

यों, देखने से लगता था कि अब वे सभी जिम्मेदारियों से मुक्त थे. सिर्फ वही जानते थे कि मन में एक कसक थी और समिधा के लिये तो एक धक्का ही था कि बेटा ब्याह कर बहू घर नहीं ला पाई. उसका टूटना वे महसूस कर रहे थे. लेकिन बिखरने से पहले खुद को समेट लिया था समिधा ने.

बच्चों की चिंता कम हुई तो दूसरी जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं-बाबूजी अब ज्यादा पराश्रित हो गये थे. उनमें खुद को खपा दिया समिधा ने. फिर वे तो अपनी हर जरूरत के लिये समिधा पर निर्भर थे ही. गाहे-बगाहे चाय की फर्माइश से लेकर जरा पेन तो ढूंढ़ कर दो, भाई तक. उम्र तो आखिर समिधा की भी बढ़ी ही थी.

रिटायरमेंट उनके जीवन में भयानक अहसास लेकर आया था. इसकी भयावहता वह तब नहीं समझ पा रहे थे, जब चार दिन पहले तक काम कर रहे थे. लेकिन आज...? आज यह शब्द उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था. रिटायरमेंट-रिटायरमेंट-रिटायरमेंट, जैसे वे सन्नाटे में कैद हों, बिल्कुल अकेले. घोर अंधेरा हो और उनके सिर पर कोई हथौड़े चला रहा हो-ठक-ठक-ठक.

अजब सा सन्नाटा उनके वजूद में घुलता जा रहा था. एक ऐसा अहसास जिसका कोई भविष्य न हो.

ऐसा खालीपन तो उन्होंने चालीस साल पहले भी नहीं झेला था. जब पढ़ाई की सारी सीमायें समाप्त हो चुकी थीं. रोजगार पास आकर फिसल जाता था. मां-बाबू जी निराश हो चुके थे उनसे. वे खुद अपने आपको बोझ समझने लगे थे. भविष्य का पता नहीं था लेकिन भविष्यहीन नहीं थे. समय के खालीपन को भरने के लिये बहुत कुछ था-रोजगार कार्यालय के चक्कर लगाना. जिला पुस्तकालय की सदस्यता पहले ही थी उनके पास. वहां बैठ कर विज्ञापन देखना. नौकरियों के लिये आवेदन करना. घर में बैठ कर सिर झुकाये-झुकाये भोजन समाप्त करना. रिटेन टेस्ट और इंटरव्यू की तैयारी करना. पोस्ट-मैन की प्रतीक्षा करना कि कुछ भी तो लाये अप्वाइंटमेंट लेटर या रिफ्यूजल लेटर या माशूका के प्रेम-पत्र. उन्हें सबका इंतजार था. कुछ इस अंदाज में कि ‘तेरे कांटों से भी प्यार, तेरे फूलों से भी प्यार’ या कि ‘रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिये आ’-

वक्त है कि तब बचता नहीं था. वक्त है कि अब कटता नहीं है. उन सिगरटों के सहारे भी नहीं जो कब धुंधकते-धुंधकते अंगुलियां जला देती थीं, पता नहीं चलता था. अब सिगरेट के एक-एक कश पर चेतावनी देता है, दिमाग-सिगरेट स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है.

यह चालीस साल उन्हें ऐसे बीत गये लगते थे जैसे वे किसी तेज रफ्तार ट्रेन में सवार हों. खिड़की से देखने पर लगता हो कि सब कुछ उनके सामने से गुजर रहा हो मगर ठहर नहीं रहा हो.सोचने पर लगता कि चालीस सालों की बात जैसे बस कल की ही तो बात है.

लोग आते, बधाइयां देते-सर, दूसरी पारी के बारे में क्या सोचा है? जो भी करें, उसके लिये अडवांस कांग्रेच्युलेशंसन.

कैसी दूसरी पारी- वे सोचते- जिंदगी को क्या पारी में बांटा जा सकता है?

अच्छे-भले आदमी से आप एक दिन कह देते हैं-नाउ यू आर रिटायर्ड- आदमी देह से नहीं दिमाग से रिटायर होता है, मियां! और जो दिमाग से रिटायर नहीं है, उसे आप अचानक रोक देंगे तो क्या होगा. यह तो तेज भागती कार में अचानक ब्रेक लगा देने की तरह हुआ. एक्सीडेंट तो होगा ही, यह हत्या है, मी लार्ड, सजा-ए-मौत, मेंटल डेथ.

बाबूजी को देख कर आश्चर्य होता उन्हें. कैसे समय निकाल लेते हैं. पता ही पता नहीं चलता है. वे रिटायर हुए थे तो पता नहीं, क्या महसूस करते थे. आज बीस साल बाद लगता नहीं है कि कहीं से परेशान हैं. सवेरे घूमना-फिरना, दोस्तों से गपशप, स्नान-ध्यान, भोजन, आराम, शाम को टी.वी. दर्शन. इन सब से समय मिला तो मां से भिड़ लिये बिना किसी बात के. फिर इनका बड़बड़ाना, उनका भुनभुनाना. दो-तीन घंटे निकल जाते इसी में. अम्मा सिर बांध कर पड़ जातीं. उनका रक्तचाप बढ़ जाता. बाबूजी किसी से कुछ कहते नहीं. खुद बदहवास से लौटते, दवाई लेकर. अम्मा का खाने से इन्कार. बाबू जी की चिरौरी-तुम हमाओ मरौ मौं देखो-अम्मां का घबरा जाना. दवाई खा लेना. बाबू जी का शपथ ग्रहण समारोह-त्याई सौं अब कबऊं ऐसो नईं करूंगौ-शाम हो जाती. समय निकल जाता.

आरम्भ में समिधा असहज होती थी. इस उम्र में भी बाबूजी अम्माजी से लड़ते हैं- फिर समझ गई. कमरे में मिलती तो दोनों खूब मजे लेते- बाबूजी ग्रेट हैं. खूब नाटक कर लेते हैं. समिधा लिपट जाती-तुम कभी मत लड़ना. मैं तो मर जाऊंगी.

वे छेड़ते-मरने नहीं देंगे जानम, बी पी की दवा ले आयेंगे.

अब समिधा उनकी छाती में सिर छिपाती, गर्दन में हाथ लपेटती, पैरों में पैर फंसाती तो उन्हें कोई हरारत महसूस नहीं होती. समिधा के सिर को हटाते नहीं. हाथ को गर्दन से छुड़ाते नहीं. उसके पैर का बोझ भी अपने दर्द भरे पैरों पर सहते रहते.पहले ऐसा नहीं था. वे करवट बदल कर उसकी कमर अपने पैरों से कस लेते थे. समिधा निहाल हो जाती-और जोर से कसो. कमर में बहुत पिरा रई है. अच्छा लग रहा है. अब वे कोई प्रतिक्रिया नहीं देते. समिधा झुंझला जाती- छी, क्या हो गया है तुम्हें. रिटायर ही तो हुये हो, सब होते हैं. किस बात की चिंता है. पेंशन मिलेगी. थोड़े कम में गुजारा कर लेंगे.

समिधा के लिये रिटायरमेंट की क्षतिपूर्ति पेंशन थी. उनके लिये रिटायरमेंट का प्रश्न उनके वज़ूद से चिपक कर रह गया था.

वे खुद आश्चर्य चकित थे कि समिधा के साथ अजान ऊर्जा से भरे रहना कहां तिरोहित हो गया.

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बहुत भावभीनी सी पार्टी दी थी ऑफिस वालों ने. सब उनकी विनोदप्रियता और काम के प्रति समर्पण से अभिभूत थे. सब कायल थे कि वे अगर आ गये हैं तो ऑफिस का वातावरण बोझिल नहीं रह सकता था. वरिष्ठतम् होने के बावजूद टेबल-टेबल पर जाकर सबसे मिलना. उनके दुख-सुख पर चर्चा करना, समझना. बात-बात में चुहल और चुटकुले. लगता था-जैसे कोई लाइव कॉमेडी शो चल रहा हो. लोग उनके पास ऑफिस और घर की समस्यायें लेकर आते, बुजुर्ग की तरह नहीं, बड़़े भाई और दोस्त की तरह. समाधान लेकर जाते. नये भर्ती लड़के अंकल से शुरू होते, ‘सर’ या ‘भाई साहब’ पर दोस्ती में आ जाते.

अधिकारी उन्हें इस बात के लिये पूछते कि ‘नहीं’ कभी उनके मुंह से निकलता नहीं था. किसी प्रोजेक्ट पर चर्चा के मध्य सहयोगी आशंकित रहते कैसे होगा सर.

वे कहते-हो जायेगा, सर-

स्वाभाविक था, जिम्मेदारी उन पर आ जाती थी. वे खुद नहीं जानते थे कि प्रोजेक्ट कैसे पूरा होगा. करने बैठते तो हो जाता था.उन्हीं सहयोगियों की युक्तियों से होता जो चर्चा के मध्य आशंकित रहते थे. काम पूरा होने का श्रेय कभी वे खुद को नहीं देते.टीम-भावना को देते. उनका मंत्र था-काम खुद बताता है कि कैसे होगा. आप तो शुरू करिये.

अकारण नहीं था कि चीफ ने अपने उद्बोधन में शिकायत की थी- आप हमारे ‘शकी परसन’ रहे हैं. अफसोस कि आप हमें अपना विकल्प देकर नहीं जा रहे हैं.

बार-बार सोचा कि ऑफिस ही चले जाया करें. घंटे दो घंटे दोस्तों के साथ बैठ कर, उनके काम में हाथ बंटा कर चले आया करेंगे. उनके यथार्थ बोध ने चेताया- रोजगार बरगद की तरह होता है. आश्रय देता है. रिटायरमेंट पत्ता टूट जाने की तरह होता है.दोबारा वृक्ष पर उसके लिये स्थान नहीं होता है.

बाबू जी की इच्छा थी कि बाहर वाले कमरे में छोटी-मोटी दुकान डाल ली जाये. आमदनी हो न हो, चार लोग आकर बैठेंगे.समय कट जायेगा.

समिधा ने बार-बार झिड़का, यों ही घर में बैठ कर घुटते रहोगे. यह नहीं कि सबेरे घूमने निकल जायें. कितने बड़े-बूढ़े सवेरे घूमने जाते हैं. उन्होंने तो बाकायदा वृद्ध मंडल ही बना लिया है.हंसते हैं. बात करते हैं. अब तो रामदेव का एक चेला योग सिखाने भी आने लगा है. साथ ही बीमारियों की दवा भी बता देता है.

वे जानते थे इन वृद्ध-मंडलों का सच. वे कभी तरुणाई से निराश नहीं हुये. जानते थे कि पीढ़ियों का अंतर है. सोचने, महसूस करने का अंतर रहेगा ही. उनकी पीढ़ी से उनके बुजुर्ग संतुष्ट नहीं रहे तो अबकी पीढ़ी से उनकी पीढ़ी सामंजस्य कैसे बैठा सकेगी.

उन वृद्ध मंडलों में हवा खाना, योग करना तो ठीक है. यह थोड़ी देर का होता है. उसके बाद शुरू होती है, बतरस. ‘आजकल के लड़के-लड़कियों’ से बात शुरू होती है. अड़ोसी-पड़ोसियों के घरों में झांकती-झूंकती अपने घर में घुस जाती है, जब से वह कुलच्छन घर आयी है, तब से लड़का पराया हो गया. अब तो सब कुछ लुगाई है. हम कुछ नहीं. इससे फुर्सत मिलती है तो गार्डन में आयी लड़कियों-औरतों को घूरना. आंखों और बातों में उनकी नापजोख करना. आक्थू कर देने वाले अश्लील जोक्स, फिर जोरदार ठहाके- योग गुरु सिखाते हैं, खूब हंसो, खुल कर हंसो, हंसना स्वास्थ्य के लिये लाभप्रद है. यों इन वृद्ध मंडलों में कट्टर आदर्शवादी भी होते हैं मगर आत्मा-परमात्मा के बीच की दूरी नापने से ही फुर्सत नहीं मिलती थी उन आदर्श के अवतारों को.नल में पानी नहीं आ रहा है तो भी भगवान की मर्जी- परम

विकासहीन उनके साथ बैठना उबाऊ लगता था उन्हें. इससे तो बेहतर कि अपने घर बैठें किताबें उलट-पलट लें. फोन पर दोस्तों से बतिया लें. हालांकि यह सब भी कब तक...?

‘दर्द का हद से गुजर जाना होता है, दवा हो जाना’

अतं में वे उबर गये. धुंध छंटने लगी. अवसाद घटने लगा-

‘हिम्मते मर्दां, मदद-ए-खुदा’. ‘बीती ताहि बिसारि के आगे की सुधि लेहि’. ‘जब हर ओर अंधेरा हो, तब भी प्रकाश ढूंढ़ने निकल पड़ो.’ ‘निराशा से प्रयास भले.’ और भी अनगिनत आप्त वचन उन्हें याद आ रहे थे. कभी के पढ़े सुने.

उन्होंने सोचा, यह सब बातें क्या बच्चों की हौसला अफजाई के लिये सिखाई जाती हैं? बच्चे तो वैसे भी ऊर्जा के पुंज होते हैं.उन्हें कोई क्या सिखायेगा.

फिर क्या जवानों में जोश भरने के लिये सुनाई जाती हैं? अरे नहीं. जवानों में कोई क्या जोश भरेगा. उनके जोश के सामने तो दुनिया छोटी पड़ जाती है. उनके हौसलों को तो सागर प्रणाम करता है. उनके कदमों में बिछ जाता है. और जिनमें जोश भरना पड़े, वे जवान कैसे? वो किस फिल्म का गाना है- वे सोचते- संतोष आनन्द ने लिखा था. मुकेश ने स्वर दिया है. कौन-सी फिल्म है, भाई- वे दिमाग पर जोर देते- हां याद आ गया...‘क्रान्ति’-

‘वो जवानी जवानी नहीं, जिसकी कोई कहानी न हो.’

उनके दिमाग में कौंधा, यह सब बातें तो वास्तव में उम्र के ढलान पर दौड़ रहे लोगों को प्रेरित करने के लिये कही गई होंगी.उन्हें बूस्ट अप करने के लिये कही गई होंगी कि आदमी अंधेरे से नहीं हारता है. रोशनी तलाशने का साहस न जुटा पाने से डरता है. उन्हें लगा कि रिटायर नौकरी से हुये हैं, जिंदगी से नहीं. उम्र बढ़ी है तो अनुभव भी बढ़ा है. अनुभव किस दिन काम आयेगा?

उन्हें याद आया कि पढ़ने के दिनों में वे लिखा भी करते थे.ग्रेजुएशन करने से पहले उनके लेख छपने लगे थे. उन पर प्रतिक्रियाएं होने लगी थीं. पत्र-पत्रिकाओं से उनके लेखों की मांग आने लगी थी और कि अगर उन्हें रोजगार नहीं मिल गया होता तो आश्चर्य नहीं कि वे कोई ‘एक्टविस्ट’ होते क्योंकि वे करनी और कथनी एक मानने वाले नौजवान थे. जो कहते-लिखते थे, वह करके भी दिखा सकते थे.

तो फिर आज क्या बदल गया है? समाज को, दुनिया को तो आज भी बदलने की जरूरत है. वे लिखेंगे-वे संकल्पित होने लगे. अनुभवों ने उन्हें बहुत सिखाया है.

वे अपनी मेज की धूल झाड़ रहे थे. कागज कलम तलाश रहे थे. चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था. ओठों पर किसी गीत की पैरोडी की मचल रही थी-

हां इक शगल चाहिये, जिंदगी के लिये.

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बुजुर्गों में नई उम्मीद का संचार करती सशक्त कहानी।

एक सशक्त एवं सार्थक कहानी पढ़कर अच्छा लगा

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