शनिवार, 5 मार्च 2016

प्राची - जनवरी 2016 - स्मरण / धर्मवीर भारती : सार्थक समतल की तलाश / डॉ. शकुन अग्रवाल

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स्मरण

धर्मवीर भारती : सार्थक समतल की तलाश

डॉ. शकुन अग्रवाल

प्रख्यात कवि कथाकार समीक्षक डॉ. धर्मवीर भारती का जन्म सन् 1926 में इलाहबाद में हुआ. वहीं इनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और प्रारम्भ में ये इलाहाबाद विश्वविध्यालय में हिंदी के

प्राध्यापक रहे. सन् 1960 में ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक के सम्पादक बनकर मुम्बई चले गये. और 1988 में सम्पादक पद से सेवानिवृत्त होकर बम्बई में बस गये.

उनकी 89 वीं जन्मतिथि के अवसर पर, आज के जीवन की अनर्थक मूल्यहीन, अर्थहीन स्थिति के बीच, उनके काव्य की सार्थकता और प्रखर रूप में उभर कर सामने आती है. आस्था-अनास्था, सत्य-असत्य, नैतिकता-अनैतिकता जैसी पारम्परिक शब्दावली से जूझते हुए और युगीन मूल्यान्धता के बीच भारती अपने काव्य के माध्यम से लगातार नये युगबोध, नये अर्थ और मूल्यों की खोज में जुटे रहे-

भटके हुए व्यक्ति का संशय

इतिहासों का अंधा निश्चय

ये दोनों जिसमें पा अक्षय

बन जाएंगे सार्थक समतल

ऐसे किसी अनागत पाठ का

पावन माध्यम भर है

मेरी आकुत प्रतिभा-1

यद्यपि भारती रोमानी संसार के प्रति अपना मोह नहीं छोड़ पाते तथापि उनकी प्रमुख काव्य कृतियां- अंधायुग, कनुप्रिया, सात गीत वर्ष आदि में एक आकुल छटपटाहट है, जीवन और जगत के अर्थ को पा लेने और व्यक्त करने की.

‘कनुप्रिया’ में यह बेचैनी मुखर है-

यह कल की अनन्त पगडण्डी पर

अपनी अनथक यात्रा तय करते हुए

सूरज और चंदा,

बहते हुए अंधड़

गरजते हुए महासागर

......................

इनका अंतिम अर्थ आखिर क्या है? -2

‘‘अर्थ की तलाश में व्याकुल और व्यस्त भारती ने अपनी बहुत सी रचनाओं में उन मूल्यों और संभावनाओं की ओर स्पष्ट संकेत किया है जिनकी उन्हें तलाश है-

‘‘मूल्यपरक दायित्व को स्वीकार न कर जो मूल्यहीन स्वतन्त्रता पर ही आग्रह करते है उनकी वैयक्तिकता कितनी बंजर और शून्य, कुहासायुक्त, दिशाहीन भूल भुलैया में भटक जाती है.’’-3

इसके साथ ही कवि ‘‘अंतरात्मा की पुनर्प्रतिष्ठा’’, ‘‘सृजन की ताकत’’ और ‘‘भावाकल तन्मयता’’ की बात करता है. भारती और उनके समकालीन कवि, लेखकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अर्थहीन लगने वाले मानव जीवन में नये अर्थ-संदर्भो के निर्माण की थी. भारती ने इस चुनौती को बड़ी खूबसूरती से स्वीकारा. अर्थहीनता मानवीय नियति नही वरन अर्थ का सृजन मानवीय नियति है-

यह विश्वास उनके साहित्य का मूल बिंदु है. इसलिए वह मनुष्य की सृजन शक्ति को सर्वोपरि मानते है-

‘‘भूख, लाचारी, गरीबी हो मगर

आदमी के सृजन की ताकत

इन सबों की ृाक्ति के ऊपर ’’ -4

वस्तुतः भारती का काव्य तमाम संशय, त्रासदी,बेचैनी, अनास्था में से मनुष्य के लिए आस्था, मर्यादा और सत्य के कणों को बटोर लेने का प्रयास है.

 

सन्दर्भः

सात गीत वर्ष, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 53

कनुप्रिया, तृतीय संस्करण, पृष्ठ 70

मानव मूल्य और साहित्य, पृष्ठ 128

दूसरा सप्तक, पृष्ठ 188

सम्पर्कः असोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,

श्यामा प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय

मोः 09911409460

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