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प्राची - मार्च 2016 - काव्य जगत

फॉसिल

अविनाश ब्यौहार


बालाई आमदनी
से उन्होंने
सब कुछ
कर लिया
हासिल...!
आगामी समय
में हमें
देखने को
मिलेंगे ईमान
के फॉसिल....!
सम्पर्कः 86, रायल स्टेट कॉलोनी,
माढ़ोताल, कटंगी रोड, जबलपुर-482002
मोः 9826795372

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धर्मेन्द्र गुप्त ‘साहिल’ की गजलें


1
तेरा अहसास पत्थर हो गया है.
सुना है तू भी हिटलर हो गया है.

लिखा हर ईंट पर है नाम जिसका,
वो कैसे घर से बेघर हो गया है.

कहीं तो आग पानी हो गयी है,
कहीं तो फूल पत्थर हो गया है.

भटकता था जो आवारा-सा कल तक,
समय का वो सिकन्दर हो गया है.

दिये हैं आज को दुख-दर्द तो क्या,
हमारा कल तो बेहतर हो गया है.


2
क्या मिलें इस शहर में किसी से.
कोई मिलता नहीं सादगी से.

इस सदी ने दिये जख्म इतने,
बदगुमां हूं मैं अगली सदी से.

सीख पाये कहां कुछ अभी तक,
पेड़-बादल-हवा-चांदनी से.

घर दिवाली में मेरा जला यूं,
डर-सा लगने लगा रोशनी से.

कितने जीवन सुलगने लगे हैं,
जिन्दगी जब मिली जिन्दगी से.

हम बयां कर न पायेंगे उसको,
जो मिला है हमें शायरी से.


सम्पर्कः के, 3/10ए, मां शीतला भवन, गायघाट, वाराणसी-221001
मोः  8935065229

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डॉ. अशोक गुलशन की काव्य रचनाएं

होली पर एक गीत


        

जबसे दूर हुए तुम मुझसे
सभी पड़ोसी करें ठिठोली.
मत पूछो तुम हाल हमारा,
कैसे कटी हमारी होली.
    इधर तुम्हारा पत्र न आया,
    अपने सब बीमार हो गए.
    खाली हाथ रह गया मौसम,
    व्यर्थ सभी त्योहार हो गए.
    देख रहा है घर में फागुन,
    बुझी-बुझी लग रही रंगोली.
कुछ तो तुम अन्याय कर रहे,
कुछ रूठा भगवान हमारा.
उजड़ रहा है मन-उपवन का,
हरा-भरा उद्यान हमारा.
मिलने कभी नहीं आते हैं,
अब हमसे अपने हमजोली.
    रोज मुंडेरे कागा बोले,
    लेकिन कुछ विश्वास नहीं है.
    अपनी इस धरती के ऊपर,
    अपना यह आकाश नहीं है.
    किसको रंग-गुलाल लगायें,
    लेकर अक्षत-चन्दन रोली.
हमने बड़ी चुनौती की है,
पूजे मंदिर और शिवाले.
किन्तु पसीजे नहीं कभी तुम,
कैसे हो पत्थर दिलवाले.
हमें न अब तक मिला कभी कुछ,
खाली रही हमारी झोली.
 

दोहे

निरहू के घर जब लगी, महंगाई की आग.
ऐसे में फिर यह भला, कैसे खेले फाग.
रंग लगायें किस तरह, कैसे खेलें फाग.
जीवन का जब हो गया, सूना सारा राग.
फागुन की बारिश हुई, भीगा तन-मन आज.
रंग-रंग में घुल गया, जीवन का हर राज.
गांव-गली में जब हुई, रंगों की बौछार.
मस्ती में गाने लगे, बाबा राग मल्हार.
आओ मिलकर हम गले, करें दूर सब राग.
किसे पता है यार कब, आएगा फिर फाग.

गजल

नफरत की दीवार गिराओ होली में.
प्यार भरा संसार बसाओ होली में.
आकर मुझसे प्यार जताओ होली में,
दिल से दिल के तार मिलाओ होली में.
लाल-गुलाबी नीले-पीले रंगों से,
तुम अपना घर-द्वार सजाओ होली में.
झूमो-नाचो-गाओ सबके साथ रहो,
खुशियों के उपहार लुटाओ होली में.
स्नेह-प्रेम-सौहार्द भरी पिचकारी से,
रंगों की शुभ धार बहाओ होली में.
प्यार भरी दो मीठी-मीठी गुझिया से,
दोस्त-यार-दो-चार बनाओ होली में.
बैर भाव को ‘गुलशन दिल से दूर करो,
दुश्मन से भी प्यार जताओ होली में.


सपर्कः उत्तरी कानूनगोपुरा,
बहराइच (उ.प्र.)
मोः 9450427019
 

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दोहे

होली कहे पुकार

अरविन्द अवस्थी

देखो फागुन आ गया, ले पुरवाई संग.
पान चबा मुंह लाल कर, और छानकर भंग.
इठलाता पग-पग धरे, हुआ बेशरम आज.
कहता है त्योहार है, ऐसे में क्या लाज.
लोग-लुगाई सब हुए, बेबस और अधीर.
उड़े चतुर्दिक गांव में, रंग, गुलाल, अबीर.
दरवाजे की ओट से, नई-नवेली नार.
जेठउत के ऊपर गई, लोटा भर रंग डार.
कहे चांदनी चांद से, प्रियतम सुन लो बात.
आज न बाहर जाइए, यह होली की रात.
हंसे खेते, वन, बाग सब, नदियां पोखर ताल.
फागुन सबके गाल पर, मल दे रहा गुलाल.
वल्लरियां बेताब हैं, झूमें पाय बयार.
करती हैं अठखेलियां, तरु को बांहें डार.
सजी दिशाएं खिल उठीं, कर सोलह सिंगार.
पवन गुदगुदी कर रहा, करे मसखरी ‘मार’.
अलमस्ती के रंग में, डूबा सारा गांव.
मौका पाकर धूप ने लिया छांव से दांव.
उमर छिपाकर चल रहे, मन्नू काका आज.
भौजी सहसा दिख गई, कैसे आते बाज.
हंसी-खुशी का पर्व है, बुरा न मानो यार.
वैर-अदावत भूलकर, सबको बांटो प्यार.
होली तो जाए चली, आए अगले साल.
कर मलते रह जाओगे, मन में रहे मलाल.
घर में छिपकर बैठना, उचित नहीं व्यवहार.
रंग लगा लग जा गले, होली कहे पुकार.


सम्पर्कः श्रीधर पाण्डेय सदन, बेलखरिया का पुरा, मीरजापुर (उ.प्र.)
मोः 8858515445

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दो गजलें

कुमार नयन

एक
इश्क होता तो मर गया होता.
क्या कहूं क्या न कर गया होता.
साथ हर वक्त मेरा साया था,
वर्ना दुनिया से डर गया होता.
इक इशारा तुम्हारा काफी था,
मैं हदों से गुजर गया होता.
चीखते रहते हैं दरो-दीवार,
तू कभी मेरे घर गया होता.
अश्क टपके नहीं तिरे वरना,
जख्म तेरा ये भर गया होता.
तू न मिलता तो क्या ये सोचा है,
मैं कहां तू किधर गया होता.
मैं बुरा हूं ये तुम जो कह देते,
मां कसम मैं संवर गया होता.

दो
जो हमारे रकीब होते हैं.
हम उन्हीं के करीब होते हैं.
खूब हंसते हैं, खूब रोते हैं,
वो जो बिल्कुल गरीब होते हैं.
ढूंढ़ते हैं पनाह अश्कों में,
अह्ले दिल भी अजीब होते हैं.
बेबसी पर जमाने वालों की,
रोने वाले अदीब होते हैं.
दौलते-दिल न सबको मिलती है,
लोग कुछ बदनसीब होते हैं.
करते रहते हैं सिर्फ तनकीदें,
जो हमारे हबीब होते हैं.
जानते हैं अदाएं जीने की,
जो भी अह्ले सलीब होते हैं.


सम्पर्कः खलासी मोहल्ला, पो. व जिला- बक्सर-802101 (बिहार)
मोः 0430271604

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कविताएं

अरविंद कुमार मुकुल


खबर
वह मर गया
एक खबर है
इसे छापो
मगर क्या वह आज ही मरा
उस दिन
तुमने नहीं मारा था उसे
जब वह प्यासा था
और तुमने
पानी के बदले
व्यंग्य वाणों का तीर दिया
उस दिन
तुमने तो खबर नहीं छापी थी
उस दिन
हां उसी दिन
जब उसकी प्रेमिका भागी थी
एक मोटे सेठ के साथ
वह रोया था- तुम मुस्काए थे
वह उस दिन भी तो मरा था
मगर उस दिन
तुमने शोकसभा तो नहीं की
और आज
जब वह
मरा ही नहीं/केवल छिप गया
तो तुम उसकी खबर छाप रहे हो
कल इसी खबर को बेचोगे
और अपने मित्र की मृत्यु के नाम पर
100 रु. के पारिश्रमिक से
व्हिस्की या रम की बोतल खोलोगे.

शिकायत
मुझे शिकायत है
स्याही पीली क्यों नहीं होती
धरती लाल
और
सूरज से हरी किरणें क्यों नहीं निकलती
पीली स्याही जल्द ही कागज से उड़ जाती
और ढेर सारे वाद-विवाद हवा बन कापूर हो जाते
फिर हम क्यूं मंदिर मस्जिद का झंझट उठाते
धरती लाल होती
हम सब तप जाते
तप कर
योगी बन जाते
और सूरज की हरी किरणें
सबको ठंडक पहुंचाती
स्याही, धरती और सूरज
तीनों को बदलना होगा
नहीं तो यहां आदमी नहीं शैतान होगा
और शैतान
कविता नहीं समझता
कविता नहीं करता.

सम्पर्कः एल.एफ.-27, श्री कृष्णपुरी,
पटना-800001 (बिहार)

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डॉ. मधुर नज्मी


किसे खबर थी कि बे-रब्त शाइरी होगी
अदब के शहर में में’यार की कमी होगी
मिटा सकेगी महब्बत ही दिल की तारीकी
यही चराग जलेगा तो रोशनी होगी
सितम की तेग चलाता है वो गरीबों पर
अमीरे-शहर की मुझसे न पैरवी होगी
मुझे यकीन है किस्मत संवर भी जायेगी
बहुत खुलूस से जब उसकी वंदगी होगी
जमाना बढ़ के कदम उसके चूम ही लेगा
वफा की राह पर चल के जो शाइरी होगी
इसी लिये तो वो उड़ने से कर रहा था गुरेज
उसे खबर थी फजा में तपिश घुली होगी
अगर वो बारिशे-रहमत न इस पे बरसाये
जमीं की गाद भला किस तरह हरी होगी
वफा का रंग अगर जिंदगी में शामिल है
‘मधुर’ खुलूस-भरी सबकी जिंदगी होगी.

सम्पर्कः काव्यमुखी साहित्य अकादामी,
गोहना मुहम्मदाबाद, जिला- मऊ 276403 (उ.प्र.)
मोः 9369973494

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तीन कविताएं

डॉ. अनुराधा ‘ओस’

सो गया कहीं
गाड़ियों के शोर में
पंछियों का सुर
दब सा गया है कहीं
फिल्मी गीतों से
ढोलक की थाप
दब सी गयी है कहीं
डबलबेडों ने हरा दिया
चारपाइयों को कहीं
महफिलों ने छोड़ दिया
तनहाइयों को कहीं
हीरों की चमक से
दब गयी फूलों की आभा
गंगा के नीर से
शुद्ध है मिनरल वाटर अब कहीं
जाम टकराते हैं, अब तो महफिलों में,
खो गई गुलाबों और केवड़ों की सुगंध
अब कहीं.

मैंने देखा है
मैंने देखा है
चंद लोगों को
एक टुकड़ा आसमान को तरसते
शीत की रात में ठिठुरते
मैंने देखा है
चंद लोगों को
भूख से मरते,
चीथड़े में बदन लपेटते
मैंने देखा है
चंद लोगों को
मानवता शर्मशार करते
इंसानियत की धज्जियां उड़ाते
उस क्षण दुःख के सागर में
डूब जाता है मन
दुःख होता है अपनी लाचारी पर

तलाश ही लूंगी
सागर में सीप की तरह
फूल में सुगंध की तरह
चाहे दूर हो कहीं भी
तलाश ही लूंगी मैं
अंधेरे में किरण की तरह
बादल में जल की तरह
तलाश ही लूंगी मैं
नदी में नाव की तरह
धूप में छांव की तरह
तलाश ही लूंगी मैं
नयनों में नीर की तरह
अधरों पर स्मित की तरह
तलाश ही लूंगी मैं
आकाश में सूर्य की तरह
दिलों में प्रेम की तरह
तलाश ही लूंगी मैं

सम्पर्कः  डॉ. अशोक कु. सिंह चंदेल
ग्राम+पोस्ट, मोहनपुर भवरख, जिला- मीरजापुर, (उ.प्र.)
मोबाइलः 09451185136

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केशव शरण की गजलें


1
खोल दो और रट करोगे क्या.
प्यार का बंद पट करोगे क्या.

रात काफी खुली न मधुशाला,
दूर हो या निकट करोगे क्या.

रच रहे हैं कुचक्र अपने ही,
सत्य तो है प्रकट करोगे क्या.

दल बना भी अगर शरीफों का,
आ घुसे चोरकट करोगे क्या.

सूक्ष्म चिंगारियां बुझानी थीं,
उठ रही है लपट करोगे क्या.

इक चुनौती तनी हुई रस्सी,
तुम न इस योग्य नट करोगे क्या.

जब न सुलझा सके अभी तक तुम,
एक पुरपेच लट करोगे क्या.

2
वो न आई बुला चुका हूं मैं.
जिन्दगी को भुला चुका हूं मैं.

जश्न का इंतजार है बाकी,
वेशभूषा धुला चुका हूं मैं.

जब छलकना नहीं रहा जब-तब,
राज तब ये खुला, चुका हूं मैं.

रात झक मारता हुआ बैठा,
ख्वाहिशों को सुला चुका हूं मैं.

ये धुआं आसमान में कैसा,
जब परों को फुला चुका हूं मैं.

हो गयी है मिठास ही संकट,
जो लूहू में घुला चुका हूं मैं.

छू लिया आसमान को उसने,
दोल जिसको झुला चुका हूं मैं.


सम्पर्कः एस 2/564, सिकरौल,
वाराणसी-221001 (उ.प्र.)
मोः 9415295137

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गजल

मेमने, लेकर दुशाले जा रहे हैं

आचार्य भगवत दुबे


दुश्मनी के हल निकाले जा रहे हैं
मंत्रणा को तेग-भाले जा रहे हैं
दूर क्या होंगी भला धर्मान्धताएं
मजहबी भेजे उजाले जा रहे हैं
भेड़िये का आज फिर सम्मान होगा
मेमने लेकर दुशाले जा रहे हैं
इस तरह सद्भावना फैला रहे हैं
फिर गड़े मुर्दे निकाले जा रहे हैं
लोकहितकारी बजट है देख लीजे
हमसे फिर छीने निवाले जा रहे हैं
देश की छवि स्वच्छ कैसे हो सकेगी
सांसद कीचड़ उछाले जा रहे है
सरफरोशी के अमर इतिहास से फिर
नाम वीरों के, निकाले जा रहे हैं

सम्पर्कः पिसनहारी मढ़िया के पास,
गढ़ा, जबलपुर-482003 (म.प्र.)
मोबाइलः 09300613975

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