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प्राची - जनवरी 2016 - कहानी / सूखे पत्तों से ढकी पगडंडियां / एम. टी. वासुदेवन नायर

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कहानी

सूखे पत्तों से ढकी पगडंडियां

एम. टी. वासुदेवन नायर

ड़ी दोपहर की धूप में अन्तराल बनाते पीपल के पेड़. नीचे चार-पांच दूकानें, मुसाफिरों के सिर का बोझा उतारकर रखने के लिए पत्थर का चबूतरा और एक कूआं. चबूतरे के पास बस रुकी. कंडक्टर ने कहा-

‘जगह यही है.’

वह जल्दी से उतरा.

बस चढ़ाव पार कर जब तक आंखों से ओझल नहीं हुई तब तक वह छाया व शीतलता के उस द्वीप में खड़ा रहा. सहयात्रियों ने कहा था कि उस जगह से करीब दो मील पैदल चलना होगा. उसे रास्ता मालूम नहीं. आगे एक दूकान थी, जिसमें चूने से लिखा साइन-बोर्ड टंगा था. दुकानदार से उसने दर्याफ्त किया-

‘अमुक स्थान के लिए किधर से जाना है?’

श्रोता को जरा-सी नाराजगी महसूस हुई. उसने उसे छिपाया भी नहीं.

‘वहां एक सज्जन से मिलना है. रास्ता कौन सा है?’

दुकानदार को बात पसन्द नहीं आई. फिर भी उसने विस्तार से रास्ता समझा दिया. आगे एक सराय मिलेगा. वहां से एक गली से होकर चलिएगा तो खेत आएगा. खेत पार करने पर कच्चा रास्ता है. कच्चे रास्ते से उत्तर की दिशा में बढ़ें. तब प्याऊघर मिलेगा. उसके बाद-वही है. नजदीक ही है, एकदम नजदीक.’

वह तहमद बांधे चलने लगा.

मंदिर के अहाते से नीचे उतरते हुए थोड़ी-सी कसरत करनी पड़ी. मोटे कंकड़ों से भरा रास्ता. उतरने पर एक तंग पथ पर पहंचा. दोनों तरफ बेलों और पौधों की घनी झुरमुट के कारण रोशनी नहीं आ रही थी. यह है तो दिलासे की बात. मगर थोड़ी दूर चलते-चलते लग रहा था कि रास्ता कभी खत्म नहीं होगा.

खेत में उतरते-उतरते वह पसीने से तर हो चुका था. फटी छाती वाले खेत झूठे सपने के समान सूने-सूने पड़े थे. उनकी मेड़ से होकर वह धीमी चाल से बढ़ा.

यात्रा काफी कठिन थी. इस समय घर पर रहता तो आम की डालियों की छांह से सुहावने कमरे में आराम से पड़ा सोता. छुट्टी में घर आने पर सुस्ती का मजा उठाने की सुविधा रहती है. अपनी नौकरी के स्थान पर वो समय हवा की तरह उड़ जाता है. व्यस्तता होती है.

सफर में तकलीफ जरूर होती है. इसके बावजूद उसके दिल में एक ख्याल उठा. यह तो एक अहसास है, निराला अहसास. शायद ऐसा अहसास, जिसे स्मृति-भंडार में हीरे-जवाहरात की तरह संजोकर रखा जा सकता है.

शहर लौटकर दोस्तों को इसका पूरा हाल बताएगा. मगर क्या वे समझ पाएंगे?

बात कल ही सूझी. ताज्जुब सूझने में नहीं, बल्कि इसका है कि कल तक बात क्यों नहीं सूझी.

उसी समय विस्मृति के अंधकार से मन के संसार में उस आदमी ने प्रवेश किया. सोचने पर एक आवेगहीन मानसिक भाव का अनुभव हुआ न ममता, न घृणा. लगा कि वह अपना कोई नहीं है.

उसने कोई झूठा उत्तर दिया.

‘जल्दी आओगे न?’

‘जी हां.’

छुट्टी में मां लड़के को अपने ही पास देखते रहना चाहती है.

खेत पार कर लाल मिट्टी से भरे कच्चे रास्ते पर पहुंचा, नदी रेगिस्तान-सी. आग उगलती रेत के चौड़े पाट से माफी मांगती हुई छोटी जलधारा किनारे से कह रही थी. दूकानदार का बताया प्याऊघर भी पार कर चुका. उसके बाद एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर है. अब किसी से पूछ लेना चाहिए.

इतने में खेत से अनन्नास की झुरमुट से होकर एक छाता कच्चे रास्ते पर दिखा? कुछ क्षणों में वह उस छाते के पास पहुंचा. एक बुजुर्ग थे. कानों में चांदी के फूल, हजामत किया हुआ रूखा चेहरा, गंजे सिर पर पसीने के झरने बह रहे थे.

‘वरुनिक्करा मना यहां से कितनी दूर है?’

बुजुर्ग ने छाता दाहिने कंधे से उठाकर बाएं कंधे पर धारण किया. दो बार आंखें झपकाने-खोलने के बाद पूछा, ‘ऐ.’

‘वरुनिक्करा मना कितनी दूर है?’

उसने अपने गांव का नाम बताया.

‘मना जाने की जरूरत?’

‘कोई खास बात नहीं, अप्पन नंपूतिरि से मिलना है.’

‘क्या अदालत से आ रहे हो.’

सुविधा ने रास्ता बतला दिया-सीधे चलो तो घाट मिलेगा. घाट के इस बाजू से खेत में घुसकर एक पगडंडी पार करो तो मना का मुख्य द्वार मिलेगा.

बुजुर्ग ने बात को और स्पष्ट किया. दो पगडंडियां हैं. झाड़ी के पूरब के रास्ते से ऊपर चढ़ना होगा.

उन्होंने बात यहीं छोड़ी नहीं. वरुनिक्करा मना के पुराने इतिहास का चिट्ठा खोल दिया, ‘पुराने जमाने में वे बड़े भूस्वामी थे. मेरे अहाते के भी मालिक वही थे.’

‘अब तो सिर्फ नाम ही बचा है. बड़े मालिक के दिनों में ही सब कुछ खतम हो गया.’

‘बड़े नीच थे.’

‘मगर अप्पन नंपूतिरि सज्जन हैं. भोले हैं.’

‘आखिर धन होने से भी क्या लाभ? उनके बाद परिवार का नामोनिशान तक नहीं होगा.’

‘उस परिवार के लोगों पर ही श्राप पड़ा है.’ बुजुर्ग ने कहा, ‘शंकरन ज्योतिषी ने प्रश्न-परीक्षा कर बताया है. नागराज का कोप है.’

देहात के ये किस्से बड़े मजेदार लग रहे थे.

‘उस परिवार में न धन, न वैभव होगा, न संतान.’

‘बात सही है न?’

बड़े नंपूतिरि ने दो-दो ब्याह किये. बड़ी पत्नी तालाब में डूबकर मर गई. उसके संबंध में भी एक कहानी है. कहते हैं, बड़े नंपूतिरि ने उसे लात से मार-मारकर जान से मार डाला था.

लात मारकर किसी के प्राण हरना. बात सुनकर सिहरन महसूस हो रही थी.

बुजुर्ग धीमी आवाज में विस्तार से बता रहे थे. बड़े नंपूतिरि ने सांझ के वक्त तालाब के स्नानघर में अपनी पत्नी को नौकर के साथ पाया था. दूसरे दिन तालाब की सतह पर लाश दिखाई पड़ी. बताया गया कि मिर्गी का प्रकोप था.

दूसरी पत्नी ने व्रत-उपवास के बाद पैंतालीस वर्ष की अवस्था में बच्चा जना. बच्चा नहीं रोया. तीसरे दिन मां को सन्निपात हो गया.

पूर्वजन्म का सुकृत...पूर्वजन्म का सुकृत.

घाट के नजदीक पहुंचने पर खेत से ऊपर चढ़ने की ठीक जगह से अवगत कराया.

तीन क्यारियां लांघने पर खेत के दूसरे सिरे पर पहुंचा. गली से आगे बढ़ा कि एक झाड़ी के भीतर से भूत की तरह एक छोकरा उछल पड़ा. उसने पूछा-

‘उधर देख रहे हैं न, वही फाटक है.’

फाटक ढह चुका. बांसों का एक अस्थायी फाटक पार करने पर, जाने क्यों उसका मन कुछ उद्विग्न हो उठा. उसने अपने मन को आश्वासन देने का बारंबार प्रयास किया.

‘इसे मजाक ही समझिएगा, मजाक...’

लम्बा चौड़ा अहाता. दोपहर की धूप बहुत नहीं फैली थी. आम, जामुन और जंगली पेड़ बड़े होकर सूखे, सूखे खड़े थे. उन बड़े तगड़े पेड़ों के घने सिरों पर दोपहर को भी मानो रात छिपी रहती है. नीचे घने-घने झाड़ और सरहद पर बांसों की झुरमुट के बीच से नीरवता छाई है. पेड़ों की झुरमुट के बीच से मटमैली मिट्टी की दीवारें और काई खपरैलों से छाया मकान दिखाई देता है.

समय उन सीमा रेखाओं के भीतर कैद था.

बिना जाने ही उसके पैरों की तेजी घट गई. सूखी गोलमिर्च की बेलों से लिपटे पेड़ों के बीच से-बिखरे सूखे पत्तों से ढंकी हुई वह पगडंडी मना के आंगन पर पहुंचाती है. ठूंठ बने नारियल के पेड़ों के बीच में पीले-पीले केले के पौधे. थोड़ी दूरी पर उत्तरी दिशा में ब्रह्मराक्षस का चबूतरा. उसने देखा, सरहद पर बांस की झुरमुट के नीचे बेलों से ढंके अंधेरे को हृदय में छिपाये हुए सांपों का मंदिर...

पैरों के नीचे सूखे पत्ते मसल गये.

वह आंगन पर पहुंचा.

गला खखारकर देखा कि कोई है तो नहीं. आंगन में एक तरफ सेम का थाला है.

गरमियों में न सींचने के कारण जड़ पीली हो गई है. उसके थाले में कालिख लगी टूटी ढिबरी पड़ी है. वह अनिश्चय में और थोड़ी देर तक खड़ा रहा.

बरामदे पर चढ़ने की पहली सीढ़ी के नीचे पड़े, बड़े पत्थर पर पांव टेके उसने आवाज दी, ‘क्या यहां कोई नहीं है.’

कोई प्रतिक्रिया नहीं.

उसने और जोर से पूछा, ‘क्या यहां कोई नहीं है.’

फिर खामोशी. कुछ क्षण बाद भीतर कहीं एक दरवाजा खुलने की आहट. गहरे कुएं के नीचे से उठती रुलाई की आवाज जैसी. दरवाजों की चर्राहट.

बरामदे की तरफ का दरवाजा कुछ खुला. सफेद बालों वाला एक सिर बाहर झांकने लगा.

‘कौन?’

उसका स्वर मानों सूख रहा था. बड़ी मुश्किल से उसने बात पूरी की.

‘यहां के मालिक से मिलने आया हूं.’

खीझ और कुढ़न से भरी आवाज द्वार से सुनाई दी. ‘वही तो पूछा, कौन हो?’

वह धीरे से बरामदे पर चढ़ा. दरवाजा कुछ और खिसक गया. उसके सामने पकी, बढ़ी दाढ़ी वाला एक बेजान चेहरा देखा.

‘मुझे पहचानते नहीं होंगे.’

उसकी आवाज कांप रही थी.

‘कहां से आ रहे हो?’

‘मैं हूं. जानकी का बेटा राघवन?’

दरवाजे के किवाड़ पूरे खुले. वह कमजोर सूरत बरामदे पर आ गयी. धुंधली पीली आंखें उस पर कई बार फिरीं.

क्षण भारी लग रहे थे.

दोनों कुछ कह नहीं सके.

उसके दिल से कितनी ही बातें गुजर रही थीं.

‘बैठो.’

‘नहीं मैं खड़ा रहूंगा.’

‘शिष्टाचार की कोई जरूरत नहीं. पुराना रोब-दाब खतम हो चुका है.’

वह राख के रंग के बरामदे पर सकुचाते हुए बैठ गया. सामने मोटे खम्भे के आगे वृद्ध खड़े थे. वे बारंबार उसकी तरफ देख रहे थे.

उस समय वह स्मरण कर रहा था, ‘ये मेरे पिताजी हैं.’

उसने पहले उन्हें नहीं देखा है. देखने की इच्छा भी नहीं हुई थी.

आज पहली बार सामने उन्हें देख रहा है.

यह एक अनुभूति है.

कल ही उसने इनके बारे में सोचा था. कल सोचने का कारण?

मामूली दिन था. संध्या के समय वह आंगन में टहल रहा था. मां आंगन के बेल के चबूतरे पर दीप जला रही थी. उस वक्त मां के विषय में कई ख्याल उठे.

बाद में दीपदान के सामने बैठी मां जब मौन नामावली जप रही थीं तब भी उसके विचार मां पर ही केन्द्रित थे. दीपदान की ज्योति में भगवान का ध्यान निमीलित नेत्रों से करती मां को देखा तो मन में अज्ञात दुःख की रेखाएं उभर उठीं. उस झुर्रीदार माथे पर भस्तम के निशान स्पष्ट दीख रहे थे. जुलाई की लकीरों-सी गहरी रेखाएं गालों पर अंकित हैं.

वे बुजुर्ग उस समय भी चुपचाप उसकी तरफ देख रहे थे. उनकी उंगलियां मैले जनेऊ से खेल रही थीं.

‘राघवन, समझ आने के बाद पहली बार देख रहे हो न?’

‘जी हां.’

क्षण फिर से भारी हो गये.

‘उम्मीद नहीं थी कि मिलेंगे...’

मिलने के लिए ही वह आया था. पिता के पैरों से लिपटकर फूट-फूटकर रोना नहीं चाहता था. वात्सल्य के अश्रुजल से पुलकित होने की इच्छा भी नहीं थी. सिर्फ एक बार देखना चाहता था.

वह सूचित करना चाहता था कि पच्चीस वर्ष पहले उस पुराने परिवार के उत्तर वाले कमरे में रोता पड़ा नन्हा बच्चा, अब बड़ा हो चुका है.

‘क्या नौकरी करता है?’

उसने अपनी नौकरी का परिचय दिया.

‘उम्र तो मेरी काफी हो चुकी...अब प्रभु के बुलावे की प्रतीक्षा में बैठा हूं.’

उसने कुछ नहीं कहा.

सूर्यास्त का समय था. सोचते-सोचते आखिर उसके विचार भूली-बिसरी स्मृति से टकरा गये-पिताजी.

उसने पितृहीन संतानों की कथाएं पढ़ी हैं. सोचने पर मजा आया. अपने पिता तो हैं, जिन्दा भी हैं. सिर्फ इक्कीस मील दूर. मगर, इक्कीस मील कितनी दूर थे.

रात को अंधेरे में खुली आंखों से लेटे-लेटे उसने सोचा, नौकरी की जगह लौटने के पहले, एक बार क्यों न जाऊं.’

उन्होंने इस बीच जाने क्या कहा. उसके कानों में वह बात नहीं पड़ी.

‘अब राघवन की उम्र...’ उन्होंने मन-ही-मन हिसाब लगाया-‘पच्चीस साल की है न.’

‘हां.’

‘मुझे पूरा पता है. जाते वक्त पेट के बल रेंगता था.

कीड़ा-सा रेंगता वह बेसहारा बच्चा अब बड़ा हो चुका है.

दोनों कुछ नहीं बोले. खामोशी दोनों को राहत दे रही थी. उस नीरवता के हृदय में अनन्त सागर गरज रहे थे.

उसकी आंखों से वह जराजीर्ण रूप अदृश्य हो गया. दीपदान की ज्योति में बैठी आंखें बन्द कर प्रार्थना करती एक दुबली औरत उनमें दीख रही थी.

माता जी ने कभी पिता के विषय में कुछ नहीं कहा. मां को मालूम है कि वे इक्कीस मील दूर जीवित हैं. यह बात उसके दिल के कोने में सोई पड़ी थी. सूरज जब बांसों की झुरमुट के ऊपर पहुंचा तब तेज धूप आंगन को तपाने लगी.

‘धूप है, भीतर चलो.’

‘नहीं, यहीं...’

‘वह जमाना कभी का बीत चुका. अन्दर आओ.’

उसे महसूस हुआ कि वे धूप की अपेक्षा रोशनी से ज्यादा डरते हैं.

वे दरवाजा पार कर अन्दर गये.

वह उनके पीछे-पीछे चला. वह चौखट पार करते हुए उसे स्मरण आया, ‘कुर्त्ता पहना हुआ एक शूद्र युवा शायद पहली बार उस द्वार से भीतर प्रवेश कर रहा है.’

भीतर की ड्योढ़ी में अंधेरा है. अहसास हुआ कि उन काले कोने में सदियां सोई हुई हैं. अंधेरी ड्योढ़ियां पार कर एक विशाल स्थान पर पहुंचे. यहां रोशनी है. धुंधली रोशनी छन-छनकर भीतर आ रही है. दक्खिन तरफ जमीन पर बैठे वे पंखा हाथ से झलते हुए बोले-

‘झिझक-हिचक छोड़ दो, बैठ जाओ.’

वह संकोच पूर्वक बैठ गया. उस बड़े सहन के बीच में एक चबूतरा है. पुराने दिनों में उस पर जुही की बेलें लहलहायी होंगी.

दूसरी तरफ बन्द पड़े दरवाजे. अंधेरे की बांबियां. क्या वहां प्रेत छिपे हुए हैं.

वे न जाने किससे कुछ कहते जा रहे थे.

रास्ते में मिले बुजुर्ग के शब्द उस समय हमें याद आये. उसी की प्रतिध्वनि वह फिर से सुन रहा है.

बन्द दरवाजे की तरफ देखते हुए उसने पूछा, ‘क्या और कोई नहीं है?’

‘प्रभु हैं.’

‘सहायता के लिए.’

उसने बात स्पष्ट करने की कोशिश की. उन्होंने शान्त भाव से कहा-

‘अकेला वह काफी है.’

थोड़ी देर बाद कुछ याद कर बूढ़े ने पूछा.

‘क्या प्यास लग रही है? पतला मट्ठा होगा.’

‘नहीं चाहिए.’

वह हवेली के चार कोनों में खड़े खंभों पर आंख गड़ाये बैठा था. उसके अशांत मन में कुछ दृश्य उभरे आ रहे थे.

संध्या दीप की ज्योति में मन्दिर के भीतर भगवान की मूर्ति के सामने अंजलि-बद्ध होकर खड़ी एक ग्राम-कन्या. माथे पर चंदन और जूड़े में तुलसी धारे वह जब चलने लगती है तब मन्दिर की सीढ़ी पर खड़े पुजारी नंपूतिरि की आंखें उसे आशीर्वाद देती हैं.

‘कौन है?’

‘पश्चिमी मुहल्ले की है.’

‘पश्चिमी मुहल्ले में.’

‘किसी जमाने में बड़ा सम्पन्न परिवार था. अब सिर्फ नाम ही बचा है.’

और एक दिन की गोधूली-बेला. बुजुर्ग खड़ाऊं जोर से जमीन पर धरते हुए देहलीज पर चढ़ते हैं और बहन को आवाज देते हैं-

‘लक्ष्मी.’

बहन विनम्रता से द्वार पर आ खड़ी हुई.

‘एक बात सुनाऊं?’

वह औरत सिर झुकाए खड़ी थी. मतलब यह कि भैया कुछ भी कहें.

‘मंदिर के पुजारी नंपूतिरिजी हैं न.’

‘मंदिर गये बहुत दिन हो चुके हैं.’

‘नहीं, कुछ नहीं. वे मीनू के साथ...’

बहन कुछ कहने लगी, ‘उसे अब...’

‘वह सब मुझे मालूम है. वे वरुनिक्कारा मना के अप्पन हैं. किसी भी जगह के हां, ब्राह्मण हैं. हमारे परिवार के लिए यह सुकृत की बात है.’

बहन को कुछ नहीं कहना है.

‘परसों विवाह के योग्य शुभ घड़ी है.’

भाई खड़ाऊं खट्-खट् करते आंगन पर उतरे और तालाब की तरफ चले गये. बहन ने आंखें पोंछ लीं.

हवेली के खम्भे के उस पार अंधेरे में एक निःश्वास हवा में घुल गया.

भीतरी कक्ष के भीतर पांच व्यक्तियों वाला बड़ा दीपदान एक और अनुष्ठान को साक्ष्य देता है.

दूसरे वर्ष एक दिन संध्या समय देहलीज पा खड़ाऊं की आहट उठी-

‘लक्ष्मी.’

द्वार पर बहन आई.

‘क्या बड़े भाई ने पुकारा?’

‘हां एक बात बताना है. वे चले गये.’

‘कौन?’

‘नंपूतिरिजी.’

बहन मौन.

‘सुना है कि बड़े नंपूतिरिजी का स्वर्गवास हो गया, इसलिए मंदिर की पूजा छोड़ दी और गांव चले गये.’

बहन ने दरवाजे की आड़ में खड़े-खड़े आंचल से आंखें पोंछ लीं.

सोलह साल पहले की एक संध्या उसे स्मरण है.

भीतरी अंधकार में कहीं एक सिसकी गल रही है...

उस मौन-भवन के वातावरण को परेशान करता हुआ एक नन्हा बच्चा उत्तर वाले कमरे में जगकर रो रहा है.

वह बच्चा बड़ा हो गया है-वह बच्चा बड़ा हो गया है.

उसकी सांस खुद घुट रही थी.

‘राघव.’

बूढ़े की पुकार ने उसे चौंकाया.

‘तुमसे छोटे कितने हैं.’

‘कोई नहीं.’

उसने भारी आवाज में कहा.

जब कुछ और क्षण सरक गये तब उससे रहा नहीं गया. बेचैनी से कुछ तड़पता सा...पसीना छूट रहा था. हांफता हुआ वह उठा. उठ खड़ा हो गया.

‘हूं?’

‘अब आज्ञा दीजिए.’

शून्यता की भंवर के समान वे धुंधले नयन उसके चेहरे पर गड़े रहे.

‘हूं.’

वह आवाज मानो एक मूर्ति के होंठों से फूट रही थी.

उसे कुछ सांत्वना का अनुभव हुआ.

‘हूं, देर नहीं करनी चाहिए.’

अंधेरी ड्योढ़ी से वह फिर से बरामदे पर पहुंचा.

‘चलूं, फिर मिलेंगे.’

‘शायद नहीं मिलेंगे.’

आंख उठाकर देखने की हिम्मत दोनों में नहीं रही. वृद्ध ने भर्राई आवाज में कहा, ‘एक ही बात कहनी है.’

उसने मानों वह सुनने के लिए अपना सिर एक तरफ झुकाया.

‘उसे राघव का ही सहारा है...जानकी तो...’

वह चुपचाप ईंट की सीढ़ियां उतर रहा था. चट्टान की सीढ़ी पर क्षण भर रुका रहा. पीछे से मंत्रों-सी फुसफुसाती आवाज में उसने सुना-

‘राघव जाओ, तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल होगा.’

वह चला. काली परछाइयों से सूखे जीर्ण पत्तों से भरी पगडंडी से वह बढ़ा.

वह एक बार मुड़कर देखना चाहता तो था, मगर हिम्मत नहीं रही.

दोपहर की धूप में अंधकार की शरण मांगने वाला वह माहौल चारों तरफ कांप रहा था.

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