सोमवार, 7 मार्च 2016

प्राची - फरवरी 2016 - बाल कहानी / मेहमान बसंत / सुषमा श्रीवास्तव

 

बाल कहानी

मेहमान बसंत

सुषमा श्रीवास्तव

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‘‘अरे लाली!’’

‘‘हूं!’’

‘‘सुन रही है सर की आवाज?’’

‘‘हां, लगता हैं परिंदे मेहमान आने वाले हैं.’’

‘‘चल उठ, आलस छोड़ और उनके खाने-पीने का जुगाड़ कर.’’

एक घने पुराने आम के पेड़ पर हरियर तोते और उसकी पत्नी लाली ने बसेरा किया हुआ था. नन्हें-नन्हें दो बच्चे भी उनके परिवार में आ गये थे. दोनों उनकी देखभाल में जुटे रहते. पेड़ के पीछे एक बड़ी दीवार थी. उसके बाद एक पतली नदी बहती थी.

हरियर तोते ने पेड़ की एक मोटी शाख पर घास-फूस इकट्ठा कर पक्षियों के लिए बसेरा बनाया था. दूर-दूर से पक्षी आते, अपनी थकान मिटाते, लाली के जुटाये फल खाते और उड़ जाते. मैना, कोयल, गौरैया से तो उनकी गहरी दोस्ती थी. अतिथि सत्कार उन्हें बहुत प्रिय था.

साल बीत चुका था. सर्दी धीरे-धीरे कम हो रही थी. हरियर तोता और उसकी पत्नी लाली अपने नन्हें बच्चों के साथ गर्म बिछौने में दुबके हुए थे. तभी सर्र-सर्र कर कोई उनके बसेरे पर आ बैठा था. वह थी गीतिका मैना, साथ ही कूकू करती हुई कोयल भी आ बैठी थी.

‘‘ओ लाली भौजी! हमारे साथ मेहमान भी आये हैं.’’ वह फिर कूकी कूऽऽ कूऽऽ

गीतिका मैना भी चहकी...‘‘कोइली दीदी, सच ही तो- तुम अकेली कब आती हो?’’

कोयल ने कहा- ‘‘हां, लाली भौजी आज हमारे मेहमान हैं ‘‘बसन्त’’ ऋतुरात बसन्त. उन्हें किसी घोंसले, बसेरे की जरूरत नहीं. वह तो सारी प्रकृति पर छा जाते हैं.’’ कोइली की कूक सुन कर पक्षी जुटने लगे थे. उन्हें कोयल से खूब कहानियां सुननी थीं. क्योंकि कोयल जब भी यहां आती दुनिया जहान की बातें बताती थी और कोयल को भी हमजोलियों की बातें सुननी थीं. हरियर तोता इस खुशी में ऊपर तक उड़ गया. सच तो कितनी सुगन्धित हवा चल रही थी. सब कुछ बदला-बदला सा था. उसके पेड़ पर भी कोमल हरी पत्तियां आ गई थीं और बौर भी. सभी पक्षी खुशी में चीं चीं, क्रींक क्रींक करने लगे. सभी पंछी एक साथ बोले, ‘‘कोइली, आज के अपने मेहमान बसंत के बारे में कोई कहानी सुनाओ न.’’

‘‘हां, हां, क्यों नहीं.’’ कोइली ने कहा...

‘‘बसंत तो सभी ऋतुओं का राजा है. इसीलिये इसे हम कहते हैं ऋतुराज बसंत. कटकटाते जाड़े के बाद बसंत आता है. इस ऋतु में न ज्यादा सर्दी होती है न ज्यादा गर्मी. कितने मजे की बात है. आओ ऊपर आओ. देखो चारों ओर खेतों में सरसों फूली है. हरे-हरे नर्म पत्ते पेड़ों पर आ गये हैं और आम के इस पेड़ पर-कूकती कोयल यानी मैं...कोइली’’ और वह हंस पड़ी. सभी पक्षी चहचहाने लगे.

‘‘कोइली, आगे बोल!’’

‘‘हां, हां बताती हूं. बसंत पंचमी इस ऋतु का प्रमुख त्योहार है. यह अंग्रेजी कैलेन्डर से प्रायः फरवरी माह में पड़ता है और हिन्दी कैलेन्डर से फाल्गुन माह में पड़ता है. इस दिन सब लोग सरस्वती पूजा का त्योहार मनाते हैं. माता सरस्वती विद्या-बुद्धि की देवी हैं. लोग मानते हैं कि जिन लोगों पर उनकी कृपा होती है उन्हें अच्छे विचार, विद्या, बुद्धि का दान मिलता है. मौसमी फल-फूलों से माता सरस्वती की पूजा होती है. इस दिन पाटी-पूजा की जाती है. उसके बाद बच्चे अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत करते हैं. उन्हें विश्वास होता है कि इस तरह विद्यारंभ कर उन्हें हर समय सफलता मिलेगी.’’

‘‘तो कोइली दीदी, क्यों न हम बसंत पंचमी का त्योहार मनायें. हमें तो विद्या-बुद्धि की आवश्यकता अधिक ही है.’’ सभी पक्षी चहचहाये- ‘‘पूजा हम भी करेंगे.’’

कोइली ने अपने गले में पड़े झोले से माता सरस्वती का एक चित्र निकाला और शाख पर रख दिया. लाली और हरियर तोते, पूजा की थाली लेकर आ गये. उन्होंने फल-फूल, कुमकुम, हल्दी से, शुभ्र वस्त्र धारण किये वीणावादिनी माता सरस्वती की पूजा की. सभी पक्षी चित्र ध्यान से देख रहे थे. सभी पक्षियों ने कोइली के बताने पर अपने-अपने पैरों से एक दूसरे पर रंग छिड़का.

पक्षियों को पाटी-पूजा का बहुत उत्साह था. पहले गीतिका मैना ने माटी के ढेले से पेड़ के तने पर ‘ऊँ’ बनाया. फिर उसके सिखाने पर दूसरे पक्षियों ने भी ‘ऊँ’ बनाया और एक दूसरे को टीका लगाया.

‘‘लो पूजा हो गई और हो गया हम सब का विद्यारंभ संस्कार!’’ कोइली ने कहा.

‘‘कोइली दीदी, आपने यह नहीं बताया कि सरस्वती माता के साथ वह ‘हंस’ महाशय क्या कर रहे हैं?’’ लाली तोती ने पूछा.

कोइली ने कहा, ‘‘हां भौजी, हंस सरस्वती माता को बहुत प्यारा है. देवी इसी पर सवारी करती हैं और हमेशा साथ रखती हैं. इसका कारण भी है, वह यानी ‘हंस’ अपनी विवेक बुद्धि से अच्छा-बुरा पहचान सकता है. देवी के श्वेत वस्त्र यानी सच्चाई का रंग, देवी के हाथों में वीणा, आनंद है संगीत है और पुस्तक, बुद्धि और ज्ञान को दिखाती है. जिसके जीवन में यह सब गुण होते हैं वह जीवन में सफल होता है.’’

‘‘मैना दीदी, हम पक्षी भी पढ़-लिखकर दूर-दूर की जानकारी लेकर अपनी खूबियां बढ़ा सकते हैं. जब हम सब मिलकर त्योहार मनाते हैं तो इससे दोस्ती बढ़ती है. आपसी समझ-बूझ बढ़ती है.’’ कोइली ने फिर कहा.

‘‘हम ऐसा ही करेंगे.’’ सब पक्षियों ने कहा.

अब हरियर तोता और उसकी पत्नी लाली ने सब दोस्तों को प्रसाद खिलाया और फिर सब पक्षी उड़ चले बसंत ऋतु का आनंद लेने. हरियर तोता और लाली सबसे आगे थे.

सम्पर्कः आस्था, 19/1152, इन्दिरा नगर, लखनऊ (उ.प्र.)

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