विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

प्राची - जनवरी 2016 - बाल कहानी / बूढ़े बाबा बड़कन हाथी / सुषमा श्रीवास्तव

image_thumb[1]_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb_thumb

 

बाल कहानी

image_thumb[1]

बूढ़े बाबा बड़कन हाथी

सुषमा श्रीवास्तव

राई में जंगल थे. दूर-देर तक फैले घने जंगल. इधर हाथी बहुत पाये जाते थे. यह हाथी जब भी निकलते, तब झुंड में निकलते. हां, अपने छोटे-छोटे नन्हें बच्चों का बहुत ध्यान रखते थे. बड़े हाथी बाबा ने, उन्हें कहीं भी झुंड से अलग खेलने को मना कर रखा था परन्तु अक्सर यह नन्हें हाथी बड़ों की आंख बचा कर शैतानी करते और इधर-उधर घूमने लगते. सर्कस वाले और ऐसे जानवरों की चोरी करने वाले लोग, उन्हें आराम से पकड़ लेते. आदमी छल, कौशल, बुद्धि में सबसे ही आगे रहा है. वहां हाथियों का बल फीका पड़ जाता. लेकिन उसके बाद बावले हाथी क्रोध में, सब तहस-नहस कर डालते.

ऐसे ही हाथियों का एक विशाल समूह तराई के वन में रहता था. उसमें दल के प्रमुख हाथी थे, सबसे बूढ़े हाथी बाबा. जैसा वह चाहते थे, वैसा ही होता था. इन हाथियों को पता चला कि कई जंगलों में जानवरों ने मनुष्यों की तरह त्योहार मनाये हैं. उन्होंने मिल-जुलकर रहना शुरू कर दिया है. बूढ़े हाथी ‘बड़कन महाराज’ ने सभी को बुलाया. पूछा कि यह खबर कौन लाया.

‘बेलूराम’ ने आगे बढ़कर पूंछ हिलाई.

‘‘बूढ़े बाबा! जब मैं नदी की ओर उतर रहा था, तो वहां लोग बात कर रहे थे कि वानर वन में दशहरा, गुटरगूं वन में जन्माष्टमी और जुगनूलोक में दीवाली मनाई गई. वह....अहिंसा की बात करते थे.’’

‘‘बेलूराम अहिंसा, यानी जीव हत्या न करने का वादा, शेर महाराज कैसे निभायेंगे. पर पलाश वन में भी मेलजोल का त्योहार होली विराट शेर महाराज ने स्वयं ही मनवाया.’’

‘‘अच्छा, आश्चर्य है.’’ फिर कुछ सोचते हुए बोले....‘‘पर हम तो स्वयं ही शाकाहारी हैं. हमें मिलजुल कर प्रेम से रहने में क्या ऐतराज हो सकता है. इससे आपसी डर तो समाप्त हो ही जायेगा, क्यूं बेलूराम?’’ बूढ़े बाबा की बात पर सभी हाथियों ने अपनी सूंड़ें हिलाईं.

बेलूराम इस झुंड का सबसे ताकतवर हाथी था. वह लतायें और बेलें बहुत शौक से खाता था. इसी से उसका नाम बेलूराम पड़ गया।

बेलूराम ने अपनी नन्हीं आंखें उठाकर बाबा की ओर देखा और एक चिंघाड़ मारी, दूसरे हाथी भी धीरे से सूंड़ हिलाने लगे. बाबा के सामने किसी को बोलने की आज्ञा नहीं थी पर इस समय वह स्वयं सोच में पड़े थे.

‘‘चारों तरफ जंगलों में इतनी नई-नई बातें हो गईं और हमें मालूम ही नहीं जबकि हमारा बस्तियों में भी आना-जाना है.’’ बाबा ने कहा.

‘‘बाबा! आप इस समय हमारे सभी साथियों को बोलने की आज्ञा दें. हम सबकी सहमति से ही कोई सुझाव मानेंगे.’’

बूढ़े बाबा ने सहमति से सिर हिलाया.

बेलूराम ने पूछा, ‘‘और किसी साथी ने कुछ सुना या देखा?’’

‘‘जी हां, ‘हरियर’ तोते के बसेरे में सरस्वती पूजा का त्योहार सारी मेहमान चिड़ियों के साथ मनाया गया,’’ ‘रोटी राम’ हाथ ने चिग्घाड़ मारी.

‘‘तो बूढ़े बाबा, हम इतने समझदार और उपयोगी, श्रमशील, ताकतवर जानवर हैं कि हमें प्रगति की दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहिए.’’ बेलूराम ने कहा.

‘‘परन्तु यह कैसे होगा?’’

‘‘हम भी त्योहार मनायेंगे.’’ बेलूराम ने कहा.

‘‘पर सब त्योहार तो उन्होंने मना लिए.’’ बूढ़े बाबा बोले.

‘‘आपने ठीक कहा, पर हम जो त्योहार मनायेंगे वह इन सभी त्योहारों से अधिक महत्त्वपूर्ण है.’’

बूढ़े बाबा ने फिर कहा, ‘‘बेलूराम अपनी बात साफ-साफ कहो.’’

‘‘बाबा और हमारे सभी साथियों हम जिस जगह रहते हैं, यह पेड़, जंगल, जानवर, जमीन, बस्तियां यह सभी हमारा देश भारत है. अपने देश को राष्ट्र भी कहा जाता है. हमारे कुछ त्योहार ‘राष्ट्रीय’ कहे जाते हैं, जिन्हें मना कर हम अपने देश भारत को सम्मान देते हैं.’’

‘‘अच्छा तुमने पहले कभी नहीं बताया.’’

‘‘हम लोग अक्सर जुलूस में जाते रहे हैं. वहां झुण्ड के झुण्ड लोग सज-धज कर परेड करते हैं और एक झण्डे को सलामी देते हैं.’’

सभी हाथियों ने अपनी सूंढ़ें हिलायी. सारे हाथी ये सब सुनकर आश्चर्य में पड़े थे.

‘‘बाबा! आप यह तो मानते हो कि स्वतंत्रता सबको प्यारी है. परन्तु बहुत पहले कुछ लोग विदेशों से आये और यहां व्यापार करने लगे. फिर चालाकी से उन्होंने सारे राजकाज पर कब्जा कर लिया. वह इंसानों को भी सताते थे और हम जानवरों को भी, शिकार कर मारकर खा जाते थे. उस बात को बहुत दिन हो गये.’’

बूढ़े बाबा चिग्घाड़े- ‘‘याद आया बेलूराम, हमारे बाबा भी अपने बीस साथियों के साथ ले जाये गये थे. महावत सुन्दर कपड़े पहने थे. हाथियों को भी सजाया गया था. फिर जाकर एक झंडे को सलामी दी गई थी. पता चला था कोई बहुत बड़ी बात हुई है. आजादी मिली है, हरे, सफेद और नारंगी रंग का झंडा था. बीच में एक गोल-चक्र. बंदूकों के धमाके भी हुए थे, पर किसी को डर नहीं लगा, क्योंकि हम समझ चुके थे कि यह किसी अच्छे काम के लिये है.’’

बूढ़ी हथिनी दादी धीरे से मुस्कराई.

‘‘चलो तुम्हें याद तो आया, हम तो समझे थे तुम्हारे दिमाग में गोबर भरा है.’’

‘‘वाह बाबा! आपने हमारी मुश्किल आसान कर दी. वही आजादी का दिन 15 अगस्त हर वर्ष मनाया जाता है. इसे हम राष्ट्रीय त्योहार कहते हैं. सभी देश में रहने वाले उस तिरंगे झंडे को नमस्कार करते हैं. छोटे बच्चे हाथ में छोटे झंडे लेकर भारत माता की जय बोलते हैं. इस खुशी में सब जगह रोशनी होती है, मिठाई बांटी जाती है. मन में सोचते हैं कि हमारा देश सबसे आगे रहे, किसी की बुरी नजर इस पर न पड़े.’’

‘‘वाह बेलूराम, यह राष्ट्रीय त्योहार तो बहुत अच्छा है.’’

तभी बूढ़ी हथिनी ने सूंड़ हिलाई-

‘‘अरे! यह सब दूर-दूर घूमे फिर बच्चे हैं. सब जानते हैं कि दुनिया में क्या हो रहा है और यह हमारे बुढ़ऊ हैं, यहीं बैठे-बैठे हुकुम चलाते हैं. मैं बुढ़िया हो गई लेकिन आज तक जंगल से बाहर नहीं गई और तो और कोई इनके आगे बोल भी नहीं सकता.’’

‘‘तुम चुप रहो, यह राजकाज है.’’ बूढ़े बाबा ने क्रोध से आंखें टेढ़ी कीं.

‘‘नहीं, अब यह सब नहीं चलेगा. सबको अपनी बात कहने का हक है.’’ बूढ़ी हथिनी ने फिर सूंड़ हिलाई.

‘‘बोलो मेरे बच्चों, जिसको जो मालूम हो यह बताये.’’

सारे हाथी खुशी से चिग्घाड़े-

‘रोटी राम’ हाथी आगे बढ़े- बगैर रोटी खाये रोटी राम का मन नहीं भरता था. इसीलिये उनका नाम रोटी राम पड़ गया. उसने कहा-

‘‘बूढ़े दादा, बूढ़ी दादी, इसी तरह का एक और त्योहार है जो सारे देश में मनाया जाता है 26 जनवरी. इसकी शुरुआत आजादी के तीन साल बाद हुई. आजादी तो मिली पर पूरा कामकाज कैये चलाया जाये जिसे एक बड़ी किताब में लिखा गया. उसे संविधान कहा गया. फिर सारे देश में उसी के अनुसार कार्य होने लगा. सब कुछ अपने जैसा ही. उसे ‘गणतंत्र दिवस’ कहा गया. उस दिन भी वही, बड़ी परेड निकलती है और झंडे को सलामी दी जाती है. सब की बात सुनी जाये, सबको कहने का हक हो. इसी बात को कहते हैं, लोकतंत्र.’’

बूढ़ी दादी चिग्घाड़ी-

‘‘बूढ़े बाबा! तुम्हारी बातें पुरानी हैं. यह बच्चे समझदार हैं.’’

बूढ़े बाबा अपनी न चलती देख कर खिसिया गये.

सभी हथिनियों ने भी चिग्घाड़ना शुरू कर दिया-

‘‘बूढ़ी दादी जिन्दाबाद! बूढ़ी दादी रानी है.’’

इधर से सारे हाथी चिल्लाये- ‘‘नहीं, बूढ़े बाबा राजा हैं.’’

झगड़ा होते देख बूढ़े बाबा जोर से चिग्घाड़े, यह सभी हमने सद्भाव के लिए बुलाई है. आपकी इच्छा जानकर, अब हम राजकाज के लिए बूढ़ी दादी को ही आगे कर रहे हैं.’’

जोर की चिग्घाड़ हुई-

‘‘बूढ़ी दादी की जय!’’

बेलूराम बोले, ‘‘हम क्या बात कर रहे थे, यहां तो कुछ और ही होने लगा. आपको हम बताने जा रहे हैं कि 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अलावा 2 अक्तूबर भी राष्ट्रीय त्योहार है.’’

‘‘उसमें क्या होता है?’’ एक हाथी ने पूछा.

इसे कहते हैं ‘‘गांधी जयन्ती.’’

‘‘साथियों वह जो आजादी की लम्बी लड़ाई हमारे देशवासियों ने लड़ी, उसमें बहुत सी जानें गईं. इसकी अगुवाई एक महान देशभक्त नेता महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी ने की. उन्हें सब प्यार से बापू- राष्ट्रपिता कहते हैं. उन्होंने यह लड़ाई सत्याग्रह शांति, अहिंसा से लड़ी.’’

‘रोटी राम’ ने पूछा, ‘‘वह क्या होता है?’’

‘‘यानी हम बस सच्चाई को मानते हैं, मारधाड़ में विश्वास नहीं करते. चाहे हम पर कितनी भी गोली चलाओ, हम आगे ही बढ़ेंगे....यही था उनका सत्याग्रह. इसी से हमें आजादी मिली. 2 अक्तूबर को हम उन्हीं बापू का जन्मदिन मनाते हैं.’’

‘‘राष्ट्रीय त्योहार!’’

‘‘हां भाई, हां रा-ट्रीय त्योहार, जिन्हें सब जाति वर्ग के, छोटे-बड़े सब लोग मनाते हैं...यानी पूरा देश. तभी तो यह राष्ट्रीय त्योहार है.’’

‘‘वाह! वाह!’’ सारे हाथी हर्षोल्लास से चिग्घाड़े- ‘‘हम यह त्योहार जरूर मनायेंगे.’’

‘‘क्यूं नहीं, पहले हम जानवरों को कोई कुछ भी नहीं समझता था. शिकार करता था और खा जाता था. लेकिन अब आदमियों के राजकाज में, हम जानवरों की रक्षा के लिए, कुछ खास लोग हैं. यहीं नहीं, हममें से ही, राष्ट्रीय पशु-पक्षी भी चुने गये हैं. अब हमें कोई मार नहीं सकता. शिकार नहीं कर सकता, न हमारे अंग नोच सकता है. जो लोग ऐसा करते हैं उन्हें जेल की हवा खानी पड़ती है. तो ऐसे राष्ट्र और राष्ट्रीय त्योहारों को हम क्यों नहीं मनायेंगे.’’

‘‘जरूर मनायेंगे.’’ बेलूराम ने कहा.

‘‘पर कैसे?’’ जोर से आवाज आई.

बूढ़े बाबा बोले- ‘‘साथियों हम तो हमेशा ही ऐसे जुलूसों में हिस्सा लेते रहे हैं. दूसरों की खुशियों में खुशी मनाना- यह तो सबसे बड़ा त्योहार है. हम अपनी सूंड़ें उठाकर झंडे का सम्मान करेंगे. बोलो साथियों, भारत माता की जय!’’

तभी बूढ़े बाबा हड़बड़ा उठे, ‘‘अरे इन बातों में हम यह तो भूल ही गये, अब हमें काम पर जाना है.’’ सभी हाथी खुशी में अपनी सूंड़ें उठा कर चल पड़े. सबसे आगे बूढ़े बाबा थे.

सम्पर्कः आस्था, 19/1152, इन्दिरा नगर, लखनऊ (उ.प्र.)

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget