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प्राची - मार्च 2016 - संपादकीय / राकेश भ्रमर

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संपादकीय

देश के गद्दार!

र पढ़े-लिखे व्यक्ति को इतिहास की थोड़ी-बहुत जानकारी अवश्य होगी. अभी तक इतिहासकार ही नहीं, भारत का जन-जन यहीं मानता आ रहा है कि अंग्रेजों ने भारत में ‘फूट डालो और राज करो’ की कूटनीति अपनाई. वह अपनी इस कूटनीति में सफल रहे और डेढ़ सौ वर्षों तक भारत पर शासन करते रहे. अंग्रेजों के भारत पर शासन काल के वर्षों पर भी इतिहासकारों में मतभेद रहा है. यह अभी तक सर्वमान्य नहीं हो पाया है कि अंग्रेजों ने भारतवर्ष पर वास्तव में कितने वर्षों तक राज्य किया. खैर, मेरा मकसद यहां इतिहास को सुधारना नहीं है, न मैं इस कोई विवाद खड़ा करना चाहता हूं.

जो बात आज तक किसी भारतीय इतिहासकार, शिक्षाविद्, विद्वान और बुद्धिजीवी ने नहीं बताई, वह मैं आपको बताने जा रहा है. वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों ने न तो भारत में फूट डाली, न फूट डालकर यहां पर शासन किया. अंग्रेजों ने जब भारत में प्रवेश किया, तब मुगल साम्राज्य पतन की राह पर अग्रसर हो रहा था और अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था. भारत के कुछ भागों में पुर्तगालियों और फ्रांसिसियों का पहले से ही अधिकार हो चुका था. पूरा भारत छोटे-छोटे राज्यों और रजवाड़ों में बंटा हुआ था. यहां तक कि एक-दो गांवों का जमींदार भी स्वयं को राजा कहलाने में गर्व महसूस करता था. देश में कोई बड़ा राजा, महाराजा या बादशाह नहीं था, जो छूटभैये राजाओं और जमींदारों को एक सूत्र में बांधकर समस्त भारत को एकजुट रख सकता. सभी राजा अपने राज्य को सुरक्षित रखने के लिए एक दूसरे से आए दिन युद्ध किया करते थे.

ऐसी स्थिति में जबकि देश टुकड़ों में बंटा हुआ था तथाकथित देशी राजा-महाराजा आपस में लड़ रहे थे, तब अंग्रेज जैसी बुद्धिमान कौम को देश की बागडोर संभाल कर शासन करने से कौन रोक सकता था. उन्होंने जब देखा-भारत के राजा-महाराजा आपस में ही लड़ रहे हैं, इनमें पहले से ही फूट पड़ी हुई है, तो उन्होंने देश की इस बदहाल स्थिति का फायदा उठाया. एक-एक कर उन्होंने राजाओं को अपने साथ मिलाना आरंभ किया. उनको उन्होंने अभयदान का आश्वासन दिया. जो राजा स्वेच्छा से उनके साथ मिल गए, उन्हें कोई युद्ध नहीं करना पड़ा और जो अपने को स्वतंत्र राजा समझता रहा, उसे अंग्रेजों ने युद्ध के लिए ललकारा और जो राजा उनके साथ मिल गये थे, उन्हीं राजाओं की मदद से युद्ध में विद्रोही राजा को पराजित कर अपने राज्य में मिला लिया.

इस प्रकार हम देखते हैं कि अंग्रेजों को भारत में राज्य कायम करने के लिए कोई अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ा. भारतीय राजा आपसी फूट के कारण अपना राज्य बचाने के लिए अंग्रेजों से जा मिले या उन्हें युद्ध में पराजित होना पड़ा. ऐसे राजाओं को युद्ध में पराजित करने में अंग्रेजो को देशी राजाओं भरपूर साथ मिल रहा था. अंग्रेजों का साथ देनेवाले राजाओं को बाद में इतिहासकारों ने गद्दार कहा.

यह एक कटु सत्य है कि हिंदू कौम के लोग कभी मिल-जुलकर नहीं रहे. सर्वप्रथम इसे वर्गों और जातियों में बांटकर मनुष्यों के अंदर भेदभाव और छुआछूत का विष घोल दिया गया.कुछ जातियों को शिक्षा और ज्ञान से दूर रखकर उनका शोषण किया गया. यह प्रवृत्ति आज भी जारी है. प्राचीन काल में जो व्यक्ति शक्तिशाली और धनवान थे, वह देश में प्रभुसत्ता और अपने अलग-अलग राज्य स्थापित करने के लिए आपस में लड़ते थे. इसका लाभ केवल अंग्रेजों ने ही नहीं उठाया, बल्कि आदिकाल से ही भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों और लुटेरों का शासन रहा है. विदेशी आक्रमणकारियों और लुटेरों ने हिंदुओं की आपसी फूट, भेदभाव और जातिगत छुआछूत का फायदा उठाया और एक-एक कर वह भारतीय शासकों को पराजित करने में सफल हुए. हिन्दू न प्राचीन काल में एकजुट थे, न आज हैं. हिन्दू धर्म की विसंगतियों और विषमताओं के कारण यह धर्म कभी भी एकता के सूत्र में नहीं बंध सकता. यहां दलित आज भी मंदिरों में प्रवेश पाने के हकदार नहीं हैं. यहां तक कि स्त्रियों का भी कुछ मंदिरों में प्रवेश वर्जित है. ऐसी स्थिति में यह विचारणीय है कि हिन्दू धर्म का अनुपालन करनेवाले लोग एक सूत्र में कैसे बंध सकते हैं. हम केवल ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ का झूठा नारा ही लगाते हैं, उस का पालन नहीं करते.

आज देश में लोकतंत्र है. लोकतंत्र आए अड़सठ वर्ष बीत चुके हैं. समानता का अधिकार देने के लिए संविधान भी बन गया है. उसे लागू हुए भी 66 वर्ष हो चुके हैं, परन्तु आज भी हिन्दू धर्म में एकता नहीं है. लोग बंटे हुए हैं. पहले राजा आपस में सत्ता और अधिकार के लिए लड़ते थे, आज राजनीतिक पार्टियां आपस में लड़ रहीं हैं. दुःखद बात यह है कि आज भी सत्ता का सुख प्राप्त करने के लिए छोटी-बड़ी सैकड़ों राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और निर्दलीय पार्टियां देश में अवतरित हो गयी हैं. इन पार्टियों के नेता देश और राष्ट्र के हितों को दरकिनार कर अपने विरोधियों को सत्ता से दूर रखने, उन्हें नीचा दिखाने के लिए स्वयं इतना निचले स्तर तक गिर गए हैं कि वह देशद्रोह तक करने में नहीं हिचक रहे हैं. जिस प्रकार स्वतंत्रता के पहले देशी राजाओं ने अपने राज्य को बचाने के लिए और अपने विरोधी राजाओं को पराजित करने के लिए अंग्रेजों से हाथ मिलाए थे, उसी प्रकार आज प्रत्येक राजनीतिक दल और उसके नेता देश पर शासन करने के लिए अपनी विरोधी पार्टी के नेताओं को झूठ के पुलिंदे बांधकर कोसते हैं. सत्ता सुख के लिए वह देश के टुकड़े-टुकड़े करने पर आमादा हो गए हैं और अब तो स्थिति इतनी विस्फोटक हो गयी है कि देश पर शासन करने के लिए वह पाकिस्तान की भाषा बोलने लगे हैं.

यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान की सरकारों ने कभी भी भारत का हित नहीं देखा. वह इसको बरबाद करने के लिए सदा कुचक्र रचते रहे. इस देश में रहनेवाले कुछ लोग भी पाकिस्तान की सोच की बढ़ावा देते हैं और जिहाद के नाम पर भारत को बरबाद करने के लिए आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देते हैं. भारत में रहकर भी जो लोग पाकिस्तान के हित की बात करते हैं, उनकी स्थिति उस छिनाल औरत जैसी हो गयी है, जो खाती-पहनती अपने पति का है, उसके घर में रहती है; परन्तु नैन-मटक्का पड़ोसियों से करती है और आंख बचाकर किसी के भी बिस्तर में घुस जाती है. इस छिनाल औरत जैसे लोग न तो कभी भारत के थे और न कभी हुए हैं, न कभी होंगे.

अब तो स्थिति और ज्यादा दुःखद हो गयी है. भारत को बांटने और पाकिस्तान का राग अलापने वाले लोगों के सुर में सुर राजनीतिक पार्टियों के हिंदू नेता भी मिलाने लगे हैं. उनको देश की एकता और अखण्डता से कोई लेना-देना नहीं है, वह ऐन-केन प्रकारेण या तो पाकिस्तान की सहायता से या ‘‘पाकिस्तान जिंदाबाद’’ ‘‘भारत की बरबादी’’ के नारे लगाने वाले भारत के देशद्रोहियों के साथ हाथ मिलाकर भारत पर शासन करने का सपना देख रहे हैं. कांग्रेस के कुछ नेता तो पाकिस्तान में जाकर टी.वी. चैनल में बैठकर यहां तक कहने से नहीं चूके कि वर्तमान सरकार को हटाइए और हमें लाइए, तब आपसे (पाकिस्तान से) बातचीत संभव हो सकती है.

इसी प्रकार की फूट और देश की पतनशील स्थिति का फायदा अंग्रेजों ने उठाया था और आज पाकिस्तान उठाने का सपना देख रहा है. पाकिस्तान ने भारत को बांटने और उसे बरबाद करने के लिए आतंकवादी संगठन बना रखे हैं. यह आतंकवादी संगठन भारत में घुसकर यदा-कदा बम विस्फोट और निर्दोष लोगों की हत्यायें करते रहते हैं. दुर्भाग्य से भारत में रहनेवाले उनके धर्म के लोग उनका साथ दे रहे हैं और उससे ज्यादा दुर्भाग्य की बात तो यह है कि भारत के नेता भी पाकिस्तान और अलगाववादी ताकतों का खुलेआम समर्थन करने लगे हैं. यह खतरनाक स्थिति है. भारत बिखर रहा है. लोग एकता के सूत्र को तोड़कर बिखर रहे हैं और ऐसा केवल राजनीतिक पार्टिंयों की वजह से हो रहा है.

9 फरवरी की रात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो हुआ, और जिस प्रकार ‘‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’’ ‘‘भारत मुर्दाबाद’’ ‘‘भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी, जंग रहेगी’’ और ‘‘कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’’ के नारे लगे, वह केवल ‘‘राष्ट्रद्रोह’’ है. इसके अतिरिक्त कुछ नहीं. फिर भी सी.पी.आई., कांग्रेस तथा कुछ अन्य राजनीतिक दल, जो वर्तमान सरकार के विरोधी हैं, इसे राष्ट्रद्रोह मानने को तैयार नहीं है. उल्टे वह सरकार को ही कोसने में व्यस्त हैं, जैसे देश में जो हो रहा है, उसके लिए सरकार ही जिम्मेदार हैं. ये नेता देशद्रोह के मुद्दे से देश को भटकाकर मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए झूठ का प्रचार करने में लगे हुए हैं. उनको पता है, झूठ का असर जल्दी होता है. चूंकि आज प्रत्येक राजनीतिक दल केवल सत्ता का लोभी है, वह सच्चाई से मुंह चुराकर झूठ पर झूठ बोल कर लोगों को बरगला रहे हैं, परन्तु सच्चाईं को कब तक दबाया जा सकता है. अब भले ही राष्ट्रद्रोह का मुद्दा दब गया है, और बेवजह के हंगामे हो रहे हैं, परन्तु एक दिन सच्चाई सामने आएगी और तभी यही नेता अपना मुंह किसी को नहीं दिखा पाएंगे.

देश में जिस प्रकार राष्ट्रविरोधी और देशद्रोही ताकतें अपना सिर उठा रही हैं, उससे यहीं लगता है कि अब देश में वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गयी है, जैसी अंग्रेजों के भारत आने के समय थी. अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो वह दिन दूर नहीं, जब इस देश पर देशद्रोही और आतंकवादी ताकतों का शासन होगा.

देशद्रोह का समर्थन करने वालों, अभी भी मौका है, संभल जाइए, सुधर जाइए, वरना याद रखो पाकिस्तान केवल मिलिट्री शासन में विश्वास करता है और वहां भुट्टों जैसे नेताओं को फांसी पर लटका दिया जाता है. अगर तुम्हारी ऐसी ही राजनीति रही तो एक दिन तुम्हें भी भुट्टों की तरह फांसी पर लटका दिया जाएगा.

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