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प्राची - मार्च 2016 - समीक्षा - अन्तर्मन में मंजीरे-सी बजती : डॉ. तनूजा चौधरी की कविताएं / डॉ. मृदुला सिंह

समीक्षा

अन्तर्मन में मंजीरे-सी बजती : डॉ. तनूजा चौधरी की कविताएं

डॉ. मृदुला सिंह

साहित्य के क्षेत्र में काव्य-संसार का अपना ही महत्त्व है. कविता की यात्रा तब से लेकर आज तक कई मुकामों को पार करती हुई विकास के उस सोपान तक पहुंच गई है जो हमारे अन्तर्मन को झकझोरने में सक्षम है. डॉ. तनूजा चौधरी का ये काव्य-संग्रह ‘मां इस्पात की बनी है’’ हमारी संवेदनाओं को जागृत करने में सक्षम हो सका है.

काव्य-संग्रह की शुरुआत ‘बनूंगी स्मिता होंठों की तेरी एक दिन’ से हुई. वास्तव में ये जीवन की ‘सुनहरी रश्मियां’ हैं, जो आशावाद की ओर इशारा करती हैं. वर्तमान में हमारी पीड़ा कितनी ही परेशान करने वाली क्यों न हो, उसका अन्त अवश्य होता है और हम ‘अपने माथे की धूल पोंछने में सक्षम हो पाते हैं. ‘बदलती हवा’ मानवीय चरित्र पर प्रहार करती है. हमारे सम्मान का यह एक भयावह सत्य है कि दोष किसी और का और प्रहार किसी और पर होता है. ‘जितना सोचा संभाल लें खुद को, आदतें फिर मुझी को छलती हैं.’ ये पंक्तियां मानवीय सद्भाव की पराकाष्ठा हैं. हम अपने आपको समयानुरूप परिस्थति के आधार पर कितना ही बदलना क्यों न चाहें पर हमारा उत्तम नजरिया हमको बदलने नहीं देता. ‘रोज जल जाती जनक की जानकी’ पंक्तियों के माध्यम से जहां समाज और जीवन की विडम्बना स्पष्ट होती है वहीं इस काव्य पंक्ति का रचना सौंदर्य भी स्पष्ट होता है. ‘जिन्दगी के दौर’ में भी जीवन और जगत की सच्चाई बयां होती है. ‘बागों की खुशबुओं ने हमसे झूठ कहा था, रोते यहां गुलमोहरों के और देखे हैं.’ वास्तव में दिखाई कुछ देता है, पर आवरण के अंदर की बात कुछ और होती है. भौतिकता का यह समय संवेदनाओं के विपरीत खड़ा है. इसीलिए जब कोई भावनाओं का ख्याल रखता है और ‘दीदी’ कहता है तो यह संवेदनशील मन खुश होकर रो पड़ता है. काव्य-संग्रह की ‘सुर’ कविता कुछ इसी तरह के भाव व्यक्त करती है. ‘आत्मावलोकन’ कविता संग्रह का गर्व कही जा सकती है. इसमें कवयित्री खुद के नकाब खींचने की बात करती है. सचमुच औरों की गल्तियां निकालना आसान है, पर खुद पर आक्षेप आरोपित करना कठिन. इसलिए डॉ. चौधरी को कहना पड़ा ‘दौड़ने की सोच में लोगों पर मत दौड़ो’ क्या पता इस ईर्ष्या में खुद को कुचल दो.’ इस संग्रह की शीर्षक कविता ‘मां इस्पात की बनी है’ मां के व्यक्तित्व को पूर्णतः स्पष्ट करती है. ‘ढूंढ़ती है मेरे लिये घंघुची जिसमें लाल अधिक काला कम हो’ में मातृत्व हृदय ऐसा ही होता है. वह अपने संतान की ज्यादा हित चिंता करता है. जिन माताओं के हृदय में उग्रता का समावेश हो गया है, हम उनकी बात नहीं करते. ‘कविता का जन्म’ की पंक्तियां काव्य-अंश के पकने-फूटने की बात करते हुए इस बात को भी स्पष्ट करती हैं कि ‘वियोगी होगा पहला कवि, ‘और’ आह! से उपजा होगा गान...’

कवयित्री ने प्रकृति का भी पूर्णतः ध्यान रखा है. गंगा के सौंदर्य और उसकी पीड़ा फिर उसका प्रलंयकारी रूप स्पष्ट करते हुए केदारनाथ की विभीषिका की ओर सफलतापूर्वक संकेत किया है.

वस्तुतः संग्रह की सारी कविताएं भाषा, भाव और आन्तरिक लय को परिपक्वता के साथ अभिव्यक्त करने में सफल हो सकी है. एक अच्छे रचना-संसार के लिए कवयित्री साधुवाद की पात्र हैं, हम उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं.

सम्पर्कः हिन्दी विभाग,

शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय,

जबलपुर (म.प्र.)

कृतिः मां इस्पात की बनी है

कवयित्रीः डॉ. तनूजा चौधरी

प्रकाशकः भारती पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, फैजाबाद (उ.प्र.)

मूल्यः ृ250

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बहुत अच्छा लेखा जोखा डा.तनूजा चौधरी की कविता पर..


जयचन्द प्रजापति

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