शनिवार, 5 मार्च 2016

प्राची - जनवरी 2016 - निर्माता / लघुकथा / केदारनाथ सविता

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निर्माता

केदारनाथ सविता

राजनाथ राजगीर अपने पुत्र को गांव से शहर दिखाने लाया है. साइकिल पर आगे बिठाकर उसे चौक, घंटाघर, इमामबाड़ा आदि जगहें दिखा रहा है.

वह बाजार में एक ऊंची बिल्डिंग के नीचे बने कटरा बाजार के सामने रुक गया. पुत्र को साइकिल से नीचे उतार कर बोला, ‘‘बेटा देखो, यह नक्काशीदार बिल्डिंग...यह और इसकी सभी दुकाने मैंने बनाई हैं. मैं अकेला मिस्त्री था, बाकी सब लेबर थे. तीन साल तक काम चला था.’’

लड़के को खींच कर एक दुकान पर ले गया, ‘‘देखो पुत्र, यह बिल्डिंग के मालिक के साहबजादे अर्थात् छोटे मालिक हैं. आओ तुम्हें टॉफी दिलवाऊं, पैसा नहीं लगेगा.’’

राजनाथ ने दुकान पर बैठे साहबजादे से कहा, ‘‘छोटे मालिक, नमस्कार! मुझे पहचान नहे हैं न? इस पूरे मकान को मैंने बनाया है.’’

‘‘अच्छा, बनाया है तो क्या मजदूरी नहीं लिया है? दो दिन का काम चार दिन में करते थे. अब किसलिए आये हो?’’

सुनकर राजनाथ अवाक् रह गया. चुपचाप अपने पुत्र को साइकिल पर बैठाकर गांव की ओर चल दिया. उसके मन से सुंदर बिल्डिंग बनाने की खुशी काफूर हो चुकी थी. उसके मन में विचारों का तूफान चल रहा था. अपने मन की बात वह पुत्र से नहीं बता पा रहा था.

राजनाथ ने बचपन में सुना था कि शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले मिस्त्री के दोनों हाथ कटवा लिये थे. इस बात को वह अब तक अफवाह मानता था, परन्तु आज की घटना से उसे इस बात पर यकीन हो गया था. उसे लग रहा था, किसी न किसी दिन कोई मालिक उसके भी हाथ काट लेगा. आज तो महज न पहचानने और टॉफी न देने पर ही बात टल गयी.

अब वह कोई दूसरा काम करने के बारे में सोच रहा था.

सम्पर्कः पुलिस चौकी रोड, लाल डिग्गी, सिंहगढ़ गली (चिकाने टोला), मीरजापुर-231001 (उ.प्र.)

मोः 9935685068

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