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प्राची - फरवरी 2016 - धरोहर कहानी / नया शहर / रामकुमार

 

धरोहर कहानी

नया शहर

रामकुमार

नायास ही उसका हाथ जेब में कुछ ढूंढ़ने-सा लगा. सड़क पर चलते-चलते उसके पांव ठिठक गये.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ सन्ध्या के चेहरे की ओर देखते हुए, वह कहता है-‘‘चलो.’’

बिना एक-दूसरे से कुछ कहे, वे आगे बढ़ते रहते हैं. लोगों की भीड़, कोलाहल, बसें, मोटरें. सड़क के पार मैदान हैं, उजड़ा-उजड़ा हुआ. धूप में तपी हुई सूखी घास और कुछ वर्षों पुराने पेड़. नजर कहीं टिकती नहीं.

‘‘मैं कल सुबह जा रहा हूं.’’

उसका यह वाक्य सन्ध्या आज शाम को चार-पांच बार सुन चुकी है. पहली बार भी जब उसके मुंह से यह सुना था, तो वह चौंक नहीं गई थी. न ही दुख हुआ. मानो इसकी वह एक अरसे से प्रतीक्षा ही कर रही थी.

यह सड़क, ये लोग, ये मकान-सब कुछ पीछे छूट जायेगा. जैसे कल उसकी परछाईं कट जायेगी. उसकी आंखों के सामने कुछ धुंधला-सा होता गया. भीतर फैलती हुई रिक्तता में जैसे कोई चीज टकरा-टकरा कर चारों ओर घूमने लगी.

सड़क छोड़ कर, वे मैदान पार करने लगे. भीड़ और रोशनी और शोर पीछे छूटने लगा. चुपचाप अंधेरे में वे आगे बढ़ने लगे. उसने सन्ध्या का हाथ पकड़ लिया. सन्ध्या को लगा, जैसे बर्फ जैसी कोई ठंडी चीज उसके हाथ में आ गई हो. सन्ध्या ने उसका चेहरा देखने की कोशिश की, लेकिन अन्धकार में कुछ दिखायी नहीं दिया.

‘‘कभी सोचता हूं, कि न जाऊं,’’ वह धीमे स्वर में बोला, मानो अपने-आप से ही बातें कर रहा हो-‘‘जब कभी साल में एक बार घर जाना होता है, तो दूसरे ही दिन यहां की याद आने लगती है. इस बार तो लगता है, जैसे यहां फिर कभी लौट नहीं सकूंगा. दस-पन्द्रह दिनों की छुट्टियों में मैं यहां नहीं आ सकता एक अजनबी की भांति.’’

सन्ध्या की इच्छा हुई, कि वह उसका हाथ छोड़ कर पीछे भाग जाये. वह क्या कह रहा है, इसकी उसे चिन्ता नहीं, लेकिन उसकी आवाज में न जाने क्या है, जो उससे सहा नहीं जाता. जब कभी वह, इस तरह की खोई-खोई बातें करता है, तो उसकी आवाज बिलकुल बदल जाती है. सुन कर, वह अचानक भयभीत-सी हो जाती है.

मैदान से दूर-दूर तक दिखाई देती है शहर की जगमगाती रोशनियां, रात के अंधेरे में भी तेज प्रकाश में डूबी इमारतें. लेकिन मैदान में धुंध अंधेरा है. इक्के-दुक्के लोग तेज चाल से आगे सुनाई देते हुए कोलाहल की ओर भागे जा रहे हैं.

घाट की सीढ़ियों पर वे चुपचाप बैठ जाते हैं. निचली सीढ़ी से पानी टकरा-टकरा कर वापस लौटा जा रहा है. कुछ भी दिखाई नहीं देता. दूर कुछ स्टीमर खड़े हैं, जिनकी धुंधली रोशनियां पानी की काली चादर में चमकती हैं. कभी-कभी किसी का हूटर बज उठता है.

उसने सिगरेट सुलगा ली. माचिस की रोशनी में सन्ध्या उसका चेहरा क्षण भर के लिये देखती है, जिसका आभास होते ही वह तुरन्त माचिस बुझा देता है. फिर अपनी मूर्खता पर स्वयं ही हंसी आती है. परन्तु दुबारा माचिस जलाकर अपने चेहरे पर रोशनी डालने का साहस उसमें नहीं है.

‘‘श्याम को चिन्ता है, कि मेरे चले जाने के बाद उसके कमरे में कौन आयेगा.’’ इस विचार से उसे हंसी आने लगती है. ‘‘उस बेचारे को किराये की फिक्र है.’’

लेकिन मन-ही-मन वह जानता है, कि किराये के अतिरिक्त श्याम का उस पर अगाध स्नेह भी है. कुछ दिन शायद उसे खाली कमरा देख कर उसकी याद आये, लेकिन फिर आदत पड़ जायेगी. सन्ध्या को भी उसके यहां न रहने की आदत पड़ जायेगी. सब को पड़ जाती है. सिगरेट उसने पानी में उछाल दी.

‘‘सन्ध्या, आज बहुत चुप हो? आज तो तुम्हें बात करनी चाहिए.’’

सन्ध्या चुपचाप बैठी रहती है. वह उसके समीप खिसक आता है, और उसके बाल सहलाने लगता है. वह सिहर-सी उठती है. लेकिन उसे कुछ भी तो पता नहीं चलता.

तभी किसी स्टीमर का हूटर बड़े जोर से बज उठता है. और उसे कोई भूली-सी बात याद आ जाती है. ‘‘एक दिन किसी स्टीमर में बैठ कर घूम आने का प्रोग्राम पूरा नहीं हुआ.’’ वे प्रायः शाम को घाट की सीढ़ियों पर आ बैठते थे, और स्टीमरों को देख कर उनकी चर्चा किया करते थे. उसे लगता है, जैसे केवल यह नहीं, अन्य कितने ही प्रोग्राम पूरे नहीं होते.

‘‘आज आखिरी शाम है.’’

वह आंखें मूंद कर सब कुछ भूल जाना चाहता है. मानो आने वाले कल का अस्तित्व हमेशा के लिये खत्म कर देना चाहता हो.

‘‘मैं चलती हूं.’’ वह चुप बैठा रहता है. चेहरे पर उदासीनता की काई जमी रहती है.

सन्ध्या को उठ कर चले जाना उतनी सहज बात नहीं जान पड़ती. वह घुटनों पर मुंह टिकाये, बैठी रहती है. कहने को कुछ नहीं सूझता.

‘‘बहुत अंधेरा हेा गया है. मां चिन्ता कर रही होगी.’’

सन्ध्या ने फिर कहा.

उसे शान्त बैठे देख कर, वह उठ खड़ी हुई, ‘‘हो सका, तो कल स्टेशन आऊंगी.’’

उसने विरोध किया-‘‘स्टेशन मत आना, सन्ध्या. मुझे स्टेशन पर किसी से विदा लेना बुरा लगता है.’’

सन्ध्या के चेहरे पर किंचित खिन्नता आ गई, ‘‘अच्छा, मैं चलती हूं. तुम्हारी इच्छा हो, तो यहीं बैठे रहो.’’

कुछ देर तक अकेले वहां बैठे रहने की इच्छा होने पर भी, वह उठ खड़ा हुआ. सन्ध्या को बस स्टैंड तक छोड़ आने की आदत पड़ी हुई थी.

पांचवीं मंजिल पर छत से सटा एक छोटा-सा कमरा है, जिस पर कठिनाई से एक चारपाई, एक मेज और कुर्सी रखने भर की जगह है. कमरे की खिड़की के सामने खड़े होकर दूर-दूर तक बिखरे मकानों के कुछ भाग दिखाई देते हैं. हवा दूर तक इतनी तेजी से चलती है, कि दीवार पर लगे कैलेंडर के पन्ने प्रायः फड़फड़ाया करते हैं, और रात को चारपाई पर लेटे-लेटे कितनी ही देर तक वह उन पन्नों की फड़फड़ाहट सुनता रहता है.

पिछले दो वर्षों से वह इसी कमरे में रह रहा है. दिन भर समय-असमय उसे बाहर जाना पड़ता है, कभी पास ही किसी इलाके में, कभी शहर के दूसरे सिरे पर. कुछ ट्यूशनें, कुछ अखबारों के कालम, कभी रेडियो का कोई-कोई प्रोग्राम इन्हीं से जीविका चलती है. पर पिछले कुछ महीनों से वह महसूस करने लगा है, जैसे इतनी भागदौड़ से उसका शरीर और मन दोनों इन्कार करने लगे हैं. और जो अनिश्चिन्तता सदा घेरे रहती है, वह अलग. खाने-पीने का कोई नियमित प्रबन्ध नहीं. कभी दो ट्यूशनों के बीच दो खाली घंटे किसी पार्क की बेंच पर बिताने पड़ते हैं, कभी बहुत थकान हो जाने पर भी एक प्याला चाय पीने की जरूरत को पूरा नहीं किया जा सकता. बस में सीट न मिलने पर खड़े-खड़े पांव कांपने लगते हैं. जैसे गिर पड़ेगा.

यूनिवर्सिटी के पास से गुजरने पर कभी जब वह लड़के और लड़कियों के झुंडों को निश्चिन्तता के साथ हंसते-बोलते देखता, तो उसे लगता है, जैसे उसकी जिंदगी के कुछ वर्ष चोरी हो गये हों, जिनका पता उसे पहले नहीं लग सका. उस रात को श्याम उससे कितनी ही देर तक बातें करता रहा. ‘‘पहले-पहल अपना शहर छोड़कर किसे बुरा नहीं लगता? फिर धीरे-धीरे आदत पड़ जाती है. फिर ऐसी बंधी हुई नौकरी क्या आसानी से मिल सकती है? प्रोवीडेंट फंड, पेंशन, एलांउस. अभी दो सौ हैं. लेकिन यहां के मुकाबले में पांच सौ से कम नहीं. तुम्हारे बदले कोई और होता, तो इस खुशी में बड़ी-सी दावत देता.’’ श्याम ने हंसने की चेष्टा की, जो उस सन्नाटे में बहुत भयानक जान पड़ी.

वह चुपचाप दीवार से पीठ टेके, कंबल में लिपटे घुटनों पर कोहनियां टिकाये, खुली खिड़की मे से बाहर ताक रहा है. वह शायद श्याम की बातों में भाग लेना चाहता है, लेकिन होंठ बन्द ही रहते हैं. कई बार प्रसन्न होकर, स्वर में उत्साह भर, उसने आज स्वाभाविक रूप से बातें करने की कोशिश की. लेकिन कुछ देर बाद कोई बड़ा भारी बोझ उसे अपने ऊपर काले बादल की तरह मंडराते हुआ दिखाई देने लगता.

‘‘यहां जो सुबह से रात तक सारे शहर में तरह-तरह के काम किया करते हो, उससे तो यह दस से पांच तक की नौकरी कहीं बेहतर है.’’

श्याम कोशिश कर रहा है, किस तरह की बातों से वह उसके चले जाने का दुख कम कर सके. परन्तु उसके स्वभाव को जानते हुए उसे शक है, कि ये तर्क क्या उसके भीतर फैली हुई रिक्तता को भर सकेंगे.

किसी नये शहर में पहुंच कर पहले-पहल एक अजनबी की भांति कैसी खीझ और ऊब होती है. मकान, सड़कें, पराये चेहरे, एक ऐसी परछाइयां जान पड़ते हैं, जिनका जीवित वस्तुओं से कभी कोई सम्बन्ध न रहा हो. रिस-रिस कर बहती सूखी पपड़ियों की पांत सब पर जमीं रहती है. तब सान्त्वना केवल यह सोच कर मिलती है, कि यहां केवल चन्द दिन ही बिताने पड़ेंगे. परन्तु अब सदा के लिये उस अजनबी शहर में बस जाने की कल्पना ही दूभर है.

‘‘लो, सिगरेट पियो.’’

श्याम का स्वर उसे चौंका देता है. वह चुपचाप एक सिगरेट निकाल कर, सुलगा लेता है. पास ही ग्यारह के घंटे बजे. वह उन्हें गिनने लगा, लेकिन बीच में ही क्रम टूट गया.

‘‘क्या बात है.’’ वह श्याम से पूछता है.

‘‘ग्यारह.’’

रात बहुत तेजी से बीती जा रही है. अभी कुछ ही देर पहले तो दस के घंटे बजे थे. तब भी वह उन्हें गिन नहीं सका था, और उसे श्याम से पूछना पड़ा था.

बाहर घना अन्धकार फैला है. सड़क पर लगे बिजली के खंभे की रोशनी में सामने एक पुराने पांच-छह-मंजिले मकान की कोई दीवार दिखाई देती है. इस दीवार के साथ उसने पिछले वर्षों में बहुत आत्मीयता के संबंध जोड़ लिये हैं. कई बार इस दीवार का ओर-छोर, इसकी आकृति, इस पर जमा हुई वर्षों की दरारें और स्मृतियों के अवशेष जानने का कौतुहल उसके मन में उठा. लेकिन वह रहस्य कभी नहीं खुला. मकान में कोई नहीं रहता, क्योंकि उसके गिर जाने का डर है. लोग उसके गिरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

श्याम को नींद आ रही है. वह बहुत कठिनाई से अपनी जमुहाई रोकने की चेष्टा कर रहा है, लेकिन कभी-कभी असफल हो ही जाता है.

‘‘कितने बजे गाड़ी जाती है?’’ गाड़ी छूटने का समय मालूम होने पर भी श्याम ने पूछा.

‘‘सात बजे.’’

‘‘एक डेढ़ घंटा पहले स्टेशन पहुंच जाना चाहिये, नहीं तो बैठने तक की जगह नहीं मिलेगी.’’

वह श्याम की ओर देख कर, मुस्कुराने लगता है. पिछले दो-तीन वर्षों में श्याम ने उसकी बहुत मदद की है. जब उसके पास ट्यूशनें नहीं रहती थीं, तब बिना किसी हिसाब के वह उसकी जेब में रुपया या रेजगारी डाल दिया करता था, जबरदस्ती उसे अपने साथ खाना खिलाने ले जाता था. कोशिश करने पर भी शब्दों में वह उसके अरमानों का शुक्रिया नहीं कर सका. लगा जैसे वह श्याम के साथ अन्याय होगा.

‘‘सामान सब बंध गया?’’ श्याम को उसका मौन अखरने लगा.

वह हंसा. ‘‘सामान है ही कितना? एक बक्स और एक बिस्तर.’’

‘‘और किताबें?’’

‘‘किताबें सब छोड़े जा रहा हूं. रखना चाहो, तो रख लेना, नहीं तो किसी कबाड़ी के हाथ बेच देना. मुझे अब किताबों की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

श्याम ने इस समय इस विषय पर अधिक कहना उचित नहीं समझा. अपनी पुस्तकों के प्रति उसे कितना मोह है, यह बात श्याम जानता है. वह उन्हें किसी बक्स में बन्द करके रख देगा.

एक जिज्ञासा, जो श्याम के मन में कई बार उठी है, वह है सन्ध्या के विषय में जानने की. क्या उसके जाने से सन्ध्या को बहुत बुरा लगा है? क्या सन्ध्या ने उसे रोका नहीं? पर सन्ध्या के विषय में वे दोनों कभी अधिक बातें नहीं करते थे. जितना वह बतलाता था, उतना ही श्याम को मालूम था. जब उसके जाने की बात उठी थी, तब पहला विचार श्याम को संध्या का ही आया था. पर आज सन्ध्या का नाम तक लेने में उसे हिचक हो रही है.

‘‘अब सो जाओ. लम्बा सफर है. पता नहीं, रेलगाड़ी में सो सकोगे या नहीं.’’ श्याम बोला.

‘‘हां, अब सोना चाहिये.’’ उसने सिगरेट खिड़की से बाहर उछाल दी.

श्याम अपने कमरे में चला गया. उसने अपने कमरे की बत्ती बुझा दी. थकान होने पर भी वह चारपाई पर लेट नहीं सका. वह जानता है, कि आज रात को बहुत देर तक नींद नहीं आयेगी. वह खिड़की के पास जा खड़ा हुआ. बाहर हवा नहीं है. दूर-दूर तक रोशनियां फैली हैं. घर अंधेरे में दिखाई नहीं देते. रात में यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता, कि मकान एक-दूसरे से इतने सटे हुए इतनी दूर तक चले गये हैं.

उसे लगता है, जैसे अब कुछ भी करने को बाकी नहीं रह गया है. कई दिनों का संघर्ष और अनिश्चितता आज यकायक समाप्त हो गये हैं. भीतर भी सब खाली-खाली लगा. जैसे वहां कोई कभी कुछ था ही नहीं. कभी-कभी आवेग का बवण्डर बड़ी तेजी से उठता, परन्तु जल्दी ही अपने आप शान्त हो जाता. वह भी शान्त है.

सुबह का धुंधला-सा अंधेरा. टैक्सी चुपचाप स्टेशन की ओर भागी जा रही है. ‘अंधेरे में मैं ऐसे यह शहर छोड़ कर जा रहा हूं, जैसे कोई बड़ा भारी जुर्म करके भाग रहा होऊं.’ उसने सोचा.

‘‘इस बार सर्दियों में तुम यहां नहीं रहोगे,’’ श्याम बोला. वह जानता है, कि वह कितनी उत्सुकता से सर्दियों की इन्तजार करता था.

टैक्सी की खुली खिड़की में से आती हवा के स्पर्श से यह अनुमान लगाया जा सकता है, कि सर्दियां अब दूर नहीं. लेकिन वह उसके विषय में सोच नहीं रहा. खाली वीरान सड़कें, पटरियों पर सोये हुए लोग, सोया हुआ शहर.

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