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प्राची - मार्च 2016 - कहानी - ऊन के वे गोले / शीला त्रिवेदी

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कहानी ...सर्दियां आईं. मैंने ऊन के गोले निकाले, स्वेटर बुना...गोला रुपयों पर लपेटा हुआ था. साथ में एक कागज का पुर्जा भी था- लिखा था-‘मैंने...

कहानी

...सर्दियां आईं. मैंने ऊन के गोले निकाले, स्वेटर बुना...गोला रुपयों पर लपेटा हुआ था. साथ में एक कागज का पुर्जा भी था- लिखा था-‘मैंने ऊन के गोले दस हजार रुपयों पर लपेटे हैं...प्रभा को ये दे देना. ये मेरी ओर से हैं. मेरी बेटी बहुत दुःखी हो गई है. कुछ दो तो लेती नहीं...इसलिए ये जवाबदारी मैंने तुम्हें दी है. स्वेटर बुनोगी तो गोला खत्म होगा...मेरी ये सौगात...स्वेटरके साथ मेरी बेटी को दे देना. कुछ नहीं कर सकी. बस ये छोटी सी भेंट को दे देना...’ नोट मेरी आशीर्वाद से भरे हैं...इसमें एक बेबस मां की ममता है जो ऊन में लिपटी है.’

ऊन के वे गोले

शीला त्रिवेदी

निहाल किसे प्यारा नहीं होता? गर्मी की छुट्टियां हों या और कोई छुट्टियां मन मामा के घर जाने के लिए अधीर हो उठता है. मामा ज्यादा प्यार करते हैं न, क्योंकि उसमें दो मा शब्द हैं. मैं जब छोटी थी, तब मैं भी अपनी मम्मी से कहती थी कि मेरी सभी सहेलियां अपने-अपने मामा के घर जा रही हैं मैं भी अपने मामा के घर जाऊंगी. मां मुझे भी भेज दो न? कितने प्यारे मामा, मौसी के बच्चों के साथ, नाना-नानी के साथ खूब मौज-मस्ती करने और छुट्टियां खत्म होने से पहले अपने घर वापस आ जाते. हर साल यही क्रम रहता.

मेरी नानी बेहद खूबसूरत थीं. एकदम गोरी...गोल चेहरा, तराशे हुए तीखे नयन-नक्श, सघन घुंघराली केश राशि, लाल कुमकुम की बड़ी बिंदी लगाते ही उनका रूप दपदपा उठता. नाजुक सी हरहरी काया. प्रतिदिन प्रातः चार बजे उठकर गेहूं, मक्का पीसतीं, मधुर कर्णप्रिय आवाज में गीत भजन गातीं, कुएं-बावड़ियों से पानी लातीं. बावड़ी की सीढ़ियां धड़ाधड़ उतर-चढ़कर पानी भर लातीं. सबके लिए अति मधुर स्वादिष्ट भोजन बनातीं. उन दिनों गैस कुकर कहां थे? चूल्हा जलातीं- पीतल की बटोही में दाल रखतीं, उसके ऊपर बड़े लोटे में चावल- यही उनका कुकर था. पत्थर की कायरोट (परात) में मक्का या गेहूं का आटा सानकर गोल-गोल, छोटी-छोटी चांद सी रोटी बनाकर बड़े स्नेह से हमें खिलातीं. नानाजी आम रस बनाते- बहुत प्यार से परोसते.

घर-आंगन कच्चा, नानी अपने सुघड़ हाथों से ओरपे बनाकर लीपतीं. कभी-कभी नानी हम बच्चों के हाथों में छोटे-छोटे मिट्टी के घड़े थमा देतीं और कहतीं-नल चल रहे तो पानी भर लाओ. बड़े मजे से हम लोग पानी भर लाते किंतु कई बार मेरे हाथों से मटकियां फूट जातीं, तब नानी गुस्से से कहतीं- ये लड़की तो बहुत शैतान है, कोई काम ठीक से नहीं करती, चल रहने दे, मुझे नहीं भरवाना तुझसे पानी, इससे अच्छा तो मैं ही भर लूंगी. मुझे भी गुस्सा आ जाता. रोज-रोज नानी की डांट सुनकर. नानाजी प्रकांड पंडित थे- कथा पूजा-पाठ करते शाम को ढेर सारी सामग्री, मिठाई, नारियल, रुपये-पैसे लाते. मिठाई और नारियल खाकर हम बच्चे बहुत खुश होते. नानी कहतीं-इस लड़की को कुछ मत दो. आज फिर इसने मटकी फोड़ी है. सुबह से मुंह फुलाकर बैठी है. बड़ी ही अनुशासन प्रिय थी नानी.

नानाजी कहते थे-माफ कर दो, कल से नहीं करेगी. है न बेटा. मुझे गुस्सा आता, दूसरे दिन भी मुझसे मटकी फूट ही जाती. तब अनुशासनहीनता करने पर नानी कहतीं-आज इसे खाना नहीं मिलेगा और हां, अगली बार इसे मत बुलाना. सुनकर मैं रो पड़ती.

दरअसल बात तो यह थी, नानी मौसी के लड़कों को बहुत प्यार करती थीं. लड़कियां उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहाती थीं. वे उनको हमसे अधिक मिठाई नारियल देतीं और हम लड़कियों को सूखे पोटे मूंगफली में ही निपटा देतीं. मुझे उनका यह व्यवहार नागवार गुजरता.

नानी अपने कामों में व्यस्त रहतीं. उनका कठोर अनुशासन देखकर, कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं होती थी. जब तक नानाजी शाम को गांव से नहीं लौटते, अन्न-जल तक ग्रहण नहीं करतीं.

मैं कहती-कुछ तो खा लो, नानी तो कड़क जवाब होता-मुझे भूख-पियास नहीं है. वहां तेरे नानाजी ने भी तो सुबह से कुछ खाया-पिया नहीं होगा. शाम को जब वे आयेंगे तो अपन सब साथ खायेंगे.

वक्त निकालकर अपनी कढ़ाई-सिलाई, बुनाई लेकर बैठ जातीं. क्रोशिए के टेबल-क्लॉथ, थाल-पोश, सप्ताह भर में सुंदर-सुंदर डिजाइन बनाकर बेच देतीं.

मुझे भी सिलाई, कढ़ाई बुनाई में बेहद रुचि थी. मैं नानी के इर्द-गिर्द रहती और बड़े ध्यान से उन्हें काढ़ते-बुनते देखती. नानी डांटतीं- जा खेल, यहां मत बैठ, मुझे अपना काम करने दे. मैं कहती, नानी एक बात पूछूं. मुझे आप बहुत ही अच्छी और प्यारी लगती हो, किंतु ये भेदभाव जो आप लड़के-लड़कियों में करती हो न, मुझे अच्छा नहीं लगता.

नानी चिढ़ जातीं और कहतीं- अच्छा तो अब तू सिखायेगी मुझे, ये सब बातें. जा भाग यहां से, जाकर खेलती क्यूं नहीं.

दिसंबर की छुट्टियां थी. वे बहुत ही सुंदर स्वेटर बुन रही थीं. मैंने धीरे से कहा-नानी कितना सुंदर स्वेटर है, मुझे भी सिखाओ न?

बोलीं-तेरी मां को भी ये सब आता है. उन्हीं से ही सीख लेना.

मैंने कहा-नहीं, मुझे तो आपसे ही ये सीखना है ये कला. उनकी ममता उमड़ पड़ी-चल ऊन सलाई ले, मैं सिखाती हूं तुझे. रोज यही क्रम चलता रहा. मुझे बुनाई-कढ़ाई आ गई तो वे बहुत खुश हुईं. बोलीं-अरे! वाह! तू तो बहुत होशियार है. -आखिर नातिन किसकी हूं.- नानी मेरे यह कहने पर वह बहुत हंसी. आज पहली बार नानी को इतना हंसते हुए मैं पहली बार देख रही थी.

एक दिन मैंने पुनः अपनी बात दोहराई-नानी आप बेटियों से ज्यादा खुश नहीं रहतीं.- तो वे गंभीर हो गईं. बोली-तू अभी छोटी है. बेटा, मेरे मन की व्यथा को नहीं समझेगी. मेरे तीन बच्चों में दो बेटों और एक पहली बेटी को खोया है. मां का दिल, दिन-रात रोता है उनके लिए और ये तेरा मामा. मेरा गोद लिया बेटा है. इसे मैंने अपने जिगर के टुकड़े की तरह पाला है, किंतु जब से बहू आई है, उसकी नजरें ही बदल गई हैं. तेरे नाना इतनी मेहनत करते हैं, वो भी इस उम्र में, इसकी उसे फिक्र नहीं. बस वो तो अपने बीवी-बच्चों में मशगूल है. मैं अपना मन, कढ़ाई सिलाई बुनाई में लगाकर चार पैसे कमा लेती हूं. हाथ फैलाना मुझे पसंद नहीं. आज अपने बेटे होते तो ये दिन नहीं देखते पड़ते. पांच साल की उम्र में विवाह हो गया था. नौ वर्ष की उम्र में माता-पिता ने ससुराल भेज दिया था. घर में पांच ननदें, अंधी सास और बूढ़े ससुर थे. इनकी सेवा करते-करते जिंदगी गुजर गई बेटियों का क्या बेटा. वे तो पराया धन है, सोन चिरैया की तरह उड़ जाती हैं.

नानी की बातें सुनकर मेरा बाल-मन बहुत व्यथित हुआ. सोचा, नानी कितनी दुःखी हैं और मैं शरारतें करके उनका दिल हमेशा दुखाती रहती हूं. मैंने नानी से माफी मांगी.नानी ने मुझे अपने सीने से लगा लिया, दोनों बहुत रोई, अब प्यार की बरसात हुई. मम्मी ने नानी के मोतियाबिंद का ऑपरेशन भी करवाया.

मामा शाम को आते, बड़े खुश होते किंतु मामी कभी खुश नहीं होती. नानी को बहुत ताने देतीं. कहती-बहुत प्यार है अपने नाती-नातिनों से, छुट्टियां पड़ी नहीं कि जनता-जनार्दन यहां हाजिर. मुझसे नहीं बनेगा इतना काम...नानी चुप रहतीं. हम बच्चों का सारा काम वहीं करती. फिर भी मामी जली-कटी सुनाने से बाज नहीं आतीं. बच्चे आते हैं तो पहलवानों की तरह काम आती हैं और यूं देखो तो बीमार होने का नाटक. गेहूं बीनने में कंकर नहीं दीखते. क्रोशिया सलाई कैसे फटाफट चलाती हैं. नानी खामोश ही रहतीं. आते वक्त सभी बच्चों को चुपचाप रुपये पैसे-कपड़े दे देतीं. एक बार टाइफाइड हो गया उन्हें तो मैंने बहुत सेवा की. खाना बनाना, उनके कपड़े सीना वगैरह...तो बहुत खुश हुईं. कहतीं-ये लड़की तो बड़े काम की निकली और मैं कहती रही कि इसे अगली बार नहीं बुलायेंगे. मैं कहती छोड़ो भी नानी, मैं भी तो कम शैतान थी.

इसी बीच मेरा विवाह हो चुका था. मुझे लेक्चरर की नौकरी भी मिल गई थी. नानी बेहद खुश थीं. मेरे पहले बेटे के जन्म पर सारे मुहल्ले में मिठाई और नारियल बांटे. एक दिन अचानक मेरे बाबूजी का हार्ट अटैक से निधन हो गया. सारा घर-संसार बिखर गया. नाना-नानी को गहरा सदमा पहुंचा. मेरी मम्मी के लिए वे बेहद चिंतित रहतीं. बाबूजी की मृत्यु के पश्चात् जब मम्मी नानी के घर गईं तो वे बेहद रोईं. आते वक्त कुछ रुपये और चावल वगैरह देने लगीं तो मम्मी ने मना किया. फिर भी मां की ममता के आगे मम्मी जी को झुकना ही पड़ा.

अचानक नानाजी के पेट में भयंकर दर्द उठा और नानाजी की मृत्यु हो गई. नानी पर तो दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा. कुछ दिनों में ही काफी कमजोर हो गई थीं. कारण खाना-पीना बहुत कम कर दिया था. मन होता तो खातीं वरना यूं पड़ी रहतीं. इसी बीच अचानक मेरे इकलौते पुत्र की ग्यारह वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गई. नानी मुझसे मिलने आईं. बेहद रोइंर्. उनके भीतर का समुद्र आंसुओं के रूप में बह निकला. बहुत व्यथित थीं. कहती-हे ईश्वर! मुझे कितने दुःख और देगा? इनकी बजाय मुझे उठा लेता. बहुत रोईं, चुप कराना मुश्किल था. दुःख के पहाड़ टूट पड़े थे. और कितना धैर्य रखतीं.

चार-पांच वर्ष बीते ही थे कि एक दिन नानी भी चल बसीं. मामी ने पता नहीं क्या कह दिया था. बहुत पूछा, लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं बताया. उस दिन से अन्न-जल त्याग दिया, मौन

धारण कर लिया. भीतर ही भीतर घुटती रहीं और चुपचाप दुनिया भर के गम अपने आंचल में समेटे चल दीं. हम सब बहुत दुःखी थे. नाना-नानी का प्यार बहुत याद आता रहा.

तेरहवीं के दिन हम सब अपने-अपने घर लौटने वाले थे. मामी बोलीं-शीलू, ये ऊन के गोले लेती जाना. अभी पन्द्रह दिन पूर्व ही नानी ने कहा था-ये शीलू को दे देना. कहना इस ऊन से प्रभा (मेरी मम्मी) का स्वेटर बुन देना...मेरी रुलाई फूट पड़ी. मम्मी का स्वेटर इसी सर्दी में बना दूंगी...नानी की अन्तिम प्यार-भरी निशानी अपनी बेटी के लिए...सर्दियां आईं. मैंने ऊन के गोले निकाले, स्वेटर बुना...गोला रुपयों पर लपेटा हुआ था. साथ में एक कागज का पुर्जा भी था- लिखा था-मैंने ऊन के गोले दस हजार रुपयों पर लपेटे हैं...प्रभा को ये दे देना. ये मेरी ओर से हैं. मेरी बेटी बहुत दुःखी हो गई है. कुछ दो तो लेती नहीं...इसलिए ये जवाबदारी मैंने तुम्हें दी है. स्वेटर बुनोगी तो गोला खत्म होगा...मेरी ये सौगात...स्वेटर के साथ मेरी बेटी को दे देना. कुछ नहीं कर सकी. बस ये छोटी-सी भेंट को दे दना...ये नोट मेरे आशीर्वाद से भरे हैं...इसमें एक बेबस मां की ममता है जो ऊन में लिपटी है. हो सके तो अपनी नानी को माफ कर देना बेटा, क्योंकि मैं बेटियों को बस इतना ही चाहती हूं. पत्र पढ़कर मेरे हृदय का बांध टूट गया...नानी कितनी महान थी, मैं समझ नहीं पाई. ऊन का बचा एक गोला आज भी मेरे पास है, जो नानी की सदा याद दिलाता रहता है.

संपर्कः 71-72, नर्मदा नगर, मंगलम् होटल के पीछे,

जोबट, जिला-आलीराजपुर-457990 (म.प्र.)

मोः 9424021414

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रचनाकार: प्राची - मार्च 2016 - कहानी - ऊन के वे गोले / शीला त्रिवेदी
प्राची - मार्च 2016 - कहानी - ऊन के वे गोले / शीला त्रिवेदी
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