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प्राची - मार्च 2016 - नारी सशक्तीकरण : सच के आईने में / सुमन

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आलेख नारी सशक्तीकरण : सच के आईने में सुमन ‘‘तेरे माथे पे ये आंचल तो बहुत खूब है लेकिन, इसका एक परचम भी बना लेती तो अच्छा होता .’’ ‘औरत...

आलेख

नारी सशक्तीकरण : सच के आईने में

सुमन

‘‘तेरे माथे पे ये आंचल तो बहुत खूब है लेकिन,

इसका एक परचम भी बना लेती तो अच्छा होता.’’

‘औरत’ शब्द अपने गुलाबी आंचल में अपने कई रूपों को संजोये रखता है, चाहे वह रूप एक बेटी का हो, एक बहू, एक मित्र, एक पत्नी या फिर एक मां का ही रूप क्यों न हो. ये दूधिया निगाहों में सदियों से खुले हुए वे रूप हैं, जो पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये वृक्ष की वे टहनियां हैं जिन्हें कहीं से भी काटो-छांटो, वे फिर उसी जगह से फलने-फूलने लगती हैं. संजीव कुमार अग्रवाल जी के शब्दों में यों कहें कि

‘‘तात सखा या प्रेरणा, हमदम या हमराज

तू ही बता किस नाम से, तुझको दूं आवाज’’

औरत के प्यार व सहयोग में कभी भी पतझड़ का मौसम नहीं आता तो फिर उसके सम्मान, गरिमा में यह पतझड़ का व्यर्थ आगमन क्यों? निरंतर देकर भी जो कभी खाली नहीं होती ऐसी स्त्री न पहले कभी किन्हीं उपाधियों की मोहताज थी और न आज किसी कविता की मुखापेक्षी हैं. नारी हमेशा से ही अपने सम्मान व गरिमा, अस्तित्व प्राप्ति के लिए जद्दोजहद में रही है, अथक संघर्ष करती रही हैं. ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवताः’’ की यह प्राचीन अवधारणा आज विशेष रूप से पुरुष प्रधान समाज की संकीर्ण मानसिकता के समक्ष धराशायी होती जान पड़ती है. कारण घरेलू हिंसा व अत्याचार को चुपचाप सहती विवश स्त्री की परतंत्रता. दिनकर जी ने ठीक ही कहा है किः

‘‘नारियों पर अत्याचार सभी देशों के पुरुषों ने किया था किंतु उन पर जैसा अत्याचार भारतवर्ष में हुआ, वैसा कदाचित् अन्यत्र कहीं नहीं हुआ होगा.’’

(पंत, प्रसाद और मैथिलीकरण- रामधारी सिंह दिनकर)

नवजागरण का सबसे बड़ा नतीजा नारी सशक्तीकरण है. बदलाव की इस झंझा से समाज में बहुत कुछ उलट-पुलट हुआ है. आज स्त्रियां हर क्षेत्र में सक्षम अवश्य हुई हैं. चाहे वह क्षेत्र विज्ञान का हो, साहित्य, राजनीति, शिक्षा, आर्थिक या फिर सांस्कृतिक ही क्यों न रहा हो. पहले के समय के बनिस्पत नारी सशक्त हुई है. इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता-चाहे वह नारी मदर टेरेसा रहीं हों या फिर इंदिरा

गांधी, मीरा कुमार, प्रतिभा पाटिल, सरोजनी नायडू, अमृता प्रीतम, महादेवी वर्मा, लता मंगेशकर, सुस्मिता सेन या फिर सानिया मिर्जा. परंतु केवल ये सब ही वह आधी दुनिया तो नहीं जिसका इतिहास, वर्तमान इतना जगमगाता हो.

इस जीवन का कठोर और कड़ुवा सच तो यह है कि ‘स्त्री’ समाज का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी उपेक्षित और अकेला महसूस करता है. वह स्त्री ऐसी दुःखी बदली के समान है जो प्रेम, उदारता, स्नेह रूपी नीर से लबालब भरी हुई है, जो इस पितृसत्तात्मक समाज रूपी पूरे नभ में तो नहीं अपितु इसके एक छोटे से कोने में भी अपना वजूद कायम कर पाना तो दूर बनिस्बत इसके वह समाज में अपनी पवित्रता ही सिद्ध करती रह जाती है. अपने धवल, श्यामल दामन को आरोपों के कीचड़ साफ करने में ही उनकी पूरी जिंदगी बीत जाती है. फिर चाहे वह अग्निपरीक्षा देती हुई त्रेतायुग की सीता हो, द्वापर की द्रौपदी या फिर कलियुग की निर्भया, जो दिल्ली की चमचमाती, खामोशी, कठोर दिलवाली, नेत्रहीन सड़कों पर मदद और सुरक्षा की गुहार लगाती रही और जिसे इस लोकतांत्रिक कानून व्यवस्था में न्याय मिला भी तो कैसे? निर्भया की नियति देखिए. प्रसिद्ध कानूनवेत्ता श्री अरविंद जैन ने ठीक ही कहा है कि-

‘‘मौजूदा कानून व्यवस्था में न्याय मिलना असंभव है.’’

और आगे-

‘जाती हूं, जाती हूं, अब मैं और नहीं रुक सकती

इस अन्याय समक्ष मरुं मैं, कभी नहीं झुक सकती.’’

-मैथिलीशरण गुप्त

नारी के वजूद के लिए हर काल में आवाज उठाई तो जरूर गई है परंतु वह इतनी मंद थी कि स्त्री विरोधी खापों के कानों तक नहीं पहुंच पाई या अनसुनी कर दी गयी.

‘‘आवाज निकली तो है होंठो से मगर मद्धिम

बंद कमरों को सुनाई देने वाली नहीं’’

-दुष्यंत कुमार

आज भी भारत के अनेक गांव ऐसे हैं, कस्बे और छोटे शहर मौजूद हैं जहां घरों की लड़कियां केवल इसीलिए अच्छी संस्थाओं में पढ़ाई जाती हैं ताकि उन्हें अच्छे वर मिल सकें. तो क्या अच्छी शिक्षा का अर्थ उनके लिए मात्र अच्छी श्ठतपकमे पद ूंपजपदहश् बनना ही है? 70 के दशक में भी यही स्थिति थी जिसे रघुवीर सहाय जी ने बड़ी ही खूबी के साथ अपनी कविता में प्रस्तुत किया है जहां गीता में द्रौपदी जैसे चरित्र को तो जानें परंतु सीता बने रहने की ही मांग यह पुरुष प्रधान समाज करता है क्योंकि उसे विद्रोह पसंद नहीं है :

‘पढ़िए गीता

बनिए सीता

फिर इन सब पर लगा पलीता

किसी मूर्ख की हो परिणीता...

भर-भर भात पसाइए’’

आज भी महिलाओं का शिक्षा स्तर पुरुषों के मुकाबले कई देशों में कम ही है. और इसके पीछे कारण हैं पुरुषों की संकीर्ण मानसिकता. सऊदी अरब जैसे देश में गत वर्ष (2015) ही महिलाओं को मताधिकार प्राप्त हुआ परंतु इसके पीछे महिलाओं का अथक संघर्ष की दर्दभरी कहानी छिपी है. सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि महिलाओं की निजी जिंदगी के निर्णय क्षमता की बागडोर भी पुरुष अपने ही हाथों में थामना चाहता है. चाहे वह हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री (भूपेंद्र सिंह हुड्डा) हों या शरद पवार जैसे नेता और या फिर कर्नाटक के मौजूदा राज्यपाल. यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या महिलाओं के रहन-सहन, वेशभूषा, बाहर घूमने-फिरने का समय आदि के मानदंड यही पुरुष ही तय करेंगे? स्वामी विवेकानंद जी ने उचित ही कहा है-

‘‘जब तक महिलाओं की स्थिति नहीं सुधरती, वह शिक्षित नहीं होती तब तक दुनिया के कल्याण की कोई संभावना नहीं है, किसी पक्षी का एक पंख हो तो उड़ना संभव नहीं है. इसीलिए उसे पहले शिक्षित करें, तब वह अपना निर्णय खुद लेगी, तुम उसके निर्णय लेने वाले कौन होते हो.’’

‘‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे

बोल कि जुबां है आज भी तेरी.’’

नारी सशक्तीकरण के कई और भी अपवाद हैं जैसे बेसहारा ‘महिला आश्रम’ और ‘वृद्ध-आश्रम’ में रहती महिलाएं और ‘अनाथालय’ में जिंदगी काटती, महिलाएं एवं लड़कियां और इन आश्रमों की हकीकत हम सब भली प्रकार से जानते हैं. देह-व्यापार में फंसी महिलाएं, बच्चियों के पीछे कारण है छोटी आयु में मां-बाप की मृत्यु, निर्धनता, लालच, मरती मानवीय संवेदनाएं, सौतेले मां-बाप द्वारा दुर्व्यवहार, उपेक्षा दुःखी पारिवारिक या वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट पति या ससुराल द्वारा अत्याचार की यह स्थिति है. पुरुष के लिए व्यभिचार की खुली वैधानिक छूट से रखैल, वेश्या, कॉलगर्ल या लिव इन रिलेशन सब उसी पुरुष-वर्ग के आनंद की संस्थाएं हैं. पूंजी के इस शर्मनाक खेल में औरत को भोग-उपभोग की सुंदर वस्तु बनाया जा रहा है. बिस्तर से लेकर विज्ञापन तक स्त्री ही तो केंद्र में नजर आती है. और यह सिर्फ अमेरिका जैसे विकसित देश में ही नहीं है, भारत जैसे विकासशील देश में भी यही हालत है. ये कैसा विकास है?

महिला को महिला बनाए रखने में बाजार का बहुत बड़ा फायदा है. सौंदर्य प्रसाधनों एवं प्रतियोगिताओं की होड़ इसका पुख्ता प्रमाण है. मनोरंजन, ऐश्वर्य एवं उपभोग की वस्तु के रूप में उन्हें कच्चे माल की तरह इस्तेमाल किया जाता है. इंटरनेट/साइबर स्पेस किशोरों एवं युवाओं को एक मुक्त परिवेश मुहैया कराता है जहां बिना किसी रोक-टोक या पाबंदी के वे कैजुअल सेक्स के सागर में गोते लगाते हैं. कोई भी साइट खोलिए- श्भ्वज ळपतसेश् या इसी के समकक्ष न्योता देते विज्ञापन आपको आ जकड़ेंगे. क्या अब कोई इस बात को नकार सकता है कि आज बाजार ही विश्व की धुरी है.

प्रो. सघीश पचौरी के शब्दों में कहें तो-

‘‘जब भी किसी चैनल की रेटिंग गिरने लगती है वह अचानक सुहाना-सेक्स, गर्म पोर्न की ओर दौड़ लगाने लगता है.’’

‘‘उड़ने को मुक्त किया तुमने

लेकिन पर काट लिये.’’

आजादी के बाद के परिदृश्य को टटोलें तो देश के भीतर एवं बाहर विश्व में भी महिलाओं की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन तो हुआ परंतु उसके समग्र योगदान में यह नाकाफी प्रतीत होता है. यदि स्त्री-समुदाय आधी दुनिया है, तो क्या भरे कलश की चंद ही बूदों से उसे संतुष्ट हो जाना चाहिए? क्या हमेशा बात यौन शुचिता को लेकर ही होती रहती है लिंग-शुचिता की क्यों नहीं? क्या वजह है कि महिला आरक्षण अभी तक लटका हुआ है? यही नहीं पंचायत आदि के जो राजनीतिक पद महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाते हैं बहुधा उन पदों पर अपने घर की महिलाओं को बिठाकर पुरुष ही सत्ता पर काबिज रहते हैं. आखिर यह स्थिति कब तक बनी रहेगी? इस दोहरेपन को चुनौती देना अब अनिवार्य हो गया है.

प्रश्न अनेक हैं नागदंश जैसे, पर उत्तर तो साझे प्रयास से ही मिलेंगे. आवश्यकता है संवेदनशील मर्दों एवं जुझारू औरतों की जो घुटने न टेकें...आगामी पीढ़ी में अपने जैसी एक पंक्ति तो खड़ी कर ही जाए. प्रश्न औरत बनाम आदमी का नहीं है शायद वास्तविक प्रश्न हैं औरत और आदमी दोनों के एक साथ इंसान बन जाने की. औरत भी व्यक्ति ;पदकपअपकनंसद्ध है, इस बात पर मुहर लगाने की आवश्यकता है.

बहरहाल, ऐसी नारी-जाति की ख्वाहिशों को पूजा करने के लिए हम अपनी इस व्यस्त, स्वार्थी, तेज रफ्तार से अविराम दौड़ती हुई इस दो पल की जिंदगी में से एक उम्र नहीं तो कम से कम एक दिन तो जरूर चुरा लेने की हिमाकत तो कर ही सकते हैं. हमें इस अविराम जिंदगी में एक छोटा-सा विराम अवश्य देना चाहिए; ताकि हम स्त्री को जायज इच्छाओं को पूर्ण करने में सहयोग दें सकें जिसने समाज की इकाई (व्यक्ति) की अपने हाथों से रचना की और वह इसकी हकदार भी है. पुरुष-वर्ग को उसका साथ हमेशा देना चाहिए, क्योंकि वृक्ष का साथ मिल जाए वो लताएं आसमान भी छू देना जाती हैं. कैफी आजमी (प्रसिद्ध शायर) का यह शेर कितना सटीक जान पड़ता है.

‘‘उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे.’’

वक्त जिस गति से विकृत होता जा रहा है ऐसे में क्या हर युवक स्त्री के सामने यह शपथ ग्रहण करने की हिम्मत रखता है कि वह नारी-जाति का अपमान न खुद करेगा और न ही कहीं पर होते देख खामोश रहेगा. आइए, स्त्री के सम्मान और सुरक्षा का प्रण लें ताकि आने वाले कल में स्त्री की कमी न खले. सारी दुनिया की प्रत्येक सभ्यता ‘नारी-जाति’ को सलाम करती है.

‘‘जब नारी में शक्ति सारी,

फिर क्यों नारी हो बेचारी

हर आंगन की शोभा नारी,

उससे ही बसे दुनिया प्यारी.’’

 

सम्पर्कः 463/7 अशोक मोहल्ला

भूतों वाली गली, नांगलोई, दिल्ली-41

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रचनाकार: प्राची - मार्च 2016 - नारी सशक्तीकरण : सच के आईने में / सुमन
प्राची - मार्च 2016 - नारी सशक्तीकरण : सच के आईने में / सुमन
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रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2016/03/2016_74.html
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