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प्राची - जनवरी 2016 - लड़की की शादी / कहानी / अमरकांत

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लड़की की शादी

अमरकांत

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मेरे चारों ओर अन्धकार कुंडली मार कर बैठा है. रात को मुझे देर तक नींद नहीं आती. खाने बैठता हूं, तो दो कौर मुंह में डाल कर उठ जाता हूं. उत्साह एकत्र कर किसी दूसरे काम में मन को लगाने की चेष्टा करते ही मेरी हालत उस फुटबाल की तरह हो जाती है, जिसकी हवा सहसा निकल जाय. इस दुनिया को मैं मूर्ख समझता रहा, और हर बार अपनी शक्ति और कौशल से उसको अपने पक्ष में कर लेता रहा. परन्तु अब लगता है, कि मैं इस दुनिया में कुछ नहीं कर सकता.

अपने धन और ख्याति से फूल कर सब से पहले मैंने एक मंत्री के यहां कोशिश की थी. उसका लड़का खूबसूरत था. साथ ही वह एक रोब-दाब की जगह पर काम करता था. काश, कि वह हाथ आ जाता. परन्तु उसका बाप बड़ा होशियार निकला. राज्य की जनता पर शासन करने के अलावा उसने मुझे एक वर्ष तक इतना दौड़ाया कि मेरे पांवों के जूते घिस गये, और आखिर में माफी मांगते हुए कहा, कि अपने एक खास रिश्तेदार की सिफारिश के कारण उसको अपने लड़के की शादी दूसरी जगह करनी पड़ रही है.

इससे भी मेरी आंखें नहीं खुलीं. अब मैं एक कलक्टर के लड़के के लिए कोशिश करने लगा, जो पुलिस कप्तान के पद के लिए चुन लिया गया था. लड़के को देखकर छींक आती थी. बोलता, तो फूल झड़ते. कई बार बुजुर्ग रिश्तेदारों और प्रभावशाली मित्रों का प्रतिनिधि-मंडल लेकर मैं वहां पहुंचा. बातें प्रेम के वातावरण में कुछ इस प्रकार होतीं, कि कोई खास नतीजा न निकलता, और आगे के लिए उम्मीद काफी बढ़ जाती. अन्त में हुआ वही-लड़का अभी शादी के लिए तैयार ही नहीं.

यह सच है, कि दो-तीन और सम्पन्न और खूबसूरत लड़कों के लिए मैंने दौड़-

धूप की, परन्तु उत्तर मुझे दूसरा नहीं मिला. अब मैं एक अनजान जंगल में भटक रहा था. मेरी बुद्धि कांटों पर फन मारने वाले सर्प की तरह क्षत-विक्षत हो गयी थी. साफ बात है, कि मुझसे पहले ही मेरी लड़की की ख्याति पहुंच जाती. वह खूबसूरत नहीं थी. शरीर थुलथुल था, और नाक चिपटी. जनमते ही चेचक से एक आंख जाती रही थी. मैंने सोचा था, कि उसको अधिक-से-अधिक पढ़ाऊंगा, और काबिल बनाऊंगा. लेकिन वह इतनी घमंडी, हठी, क्रोधी और आलसी निकली, कि इन्टर से आगे पढ़ने से उसने इन्कार कर दिया. लाड़-प्यार के कारण वह कोई शऊर-अऊर भी सीख न सकी. खैर, वह मेरी इकलौती सन्तान थी, और मैं उसको बेहद प्यार करता था. मैंने निश्चय किया था, कि जीवन में उसको कोई कष्ट नहीं होने दूंगा, और उसकी अच्छे-से-अच्छे लड़के से शादी करूंगा, क्योंकि मेरा विश्वास था, कि सुख स्वयं नहीं आता, बल्कि वह शक्ति, साहस और चतुराई से खरीदा जाता है...फिर यह कैसे सम्भव नहीं है, कि ऐसे व्यक्ति की लड़की रानी बनकर रहे?

कई दिनों तक मैं बेपनाह दुःख और निराशा में झूलता रहा. एक उमस भरी शाम को जब मैं अपने बगीचे में छाती पर सिर झुकाये, पागल की तरह टहल रहा था, तो मुझे एक नौजवान की याद आई. मुझे बड़ा अचम्भा हुआ. इस नौजवान से मेरा कभी परिचय नहीं हुआ था. सम्भवतः उससे दो या तीन बार रास्ते में आते-जाते मुलाकात हुई थी, और एक बार किसी सार्वजनिक सभा में. सामने आते ही वह काफी आदर के साथ झुक कर नमस्कार करता. उसके होंठ मुस्कराहट से फूल जाते. आंखें बाहर निकल कर चमकने लगती, गोया कि कुछ कहना चाहता हो. रुखाई से सिर हिलाकर, मैं उसके अभिवादन को स्वीकार करता. आखिर प्रथम बार क्यों मैं उसका ध्यान कर रहा हूं? शायद मानसिक परेशानी और थकान की हालत में कभी-कभी सर्वथा बेकार और असम्बद्ध विचार मन में उठते हैं.

लेकिन दूसरे दिन से ही मैं उस नौजवान की बैचेनी से तलाश करने लगा. यह मैं नहीं जानता. बस, उससे मेरी मुलाकात होनी ही चाहिये, हो सकता है कि भेंट होने पर मैं उससे बात न करूं. शायद मैं उसके चेहरे को फिर से देखना चाहता हूं. दर-असल मैं कुछ कह नहीं सकता. मुझे उस नौजवान पर बेहद गुस्सा आने लगा. शायद मैं उसको डॉटना-फटकारना चाहता हूं.

और दो महीने बाद उससे मेरी ऐसे समय में मुलाकात हुई, जब मैं सारी उम्मीद लगभग खो चुका था. मैं सपरिवार गंगा नहाने गया था. वह अपने कुछ साथियों के साथ एक पंडे की मड़ैया में खड़ा, बालों में कंघी कर रहा था.

अचानक मेरा कलेजा तेजी से धड़कने लगा. पता नहीं, कैसी दहशत ने मुझे दबोच लिया. फिर भी अपनी पत्नी और बेटी को एक दूसरी ही मड़ैया में खड़ा कराके, मैं उधर ही धीरे-धीरे बढ़ गया. जब नौजवान की दृष्टि मुझ पर पड़ी, तो उसने फौरन आईना और कंधी पास की चौकी पर रख दी, और तपाक से झुक कर नमस्कार किया. उसने धोती को लुंगी की तरह पहन लिया था. ऊपर से कुर्ता. माथे पर चन्दन का तिलक. उत्तर में मैं दोनों हाथ जोड़ कर, अत्यधिक मिठास से मुस्कराया.

‘‘मजे में?’’ मैंने उसी ओर बढ़कर पूछा.

पहले वह सकपकाया. शायद उसकी मुझमें आत्मीयतापूर्ण व्यवहार की आशा नहीं थी. तत्पश्चात् वह एक गीदड़ की तरह लपक कर मेरे पास पहुंच गया.

‘‘जी हां,’’ उसने सूखी आवाज में कहा.

‘‘नाम भूल रहा हूं तुम्हारा. जरा...’’ मैंने शेष मन्तव्य कनखी के संकेत से प्रकट कर दिया.

‘‘कृष्ण मोहन.’’

‘‘ठीक, ठीक,’’ मैं इस तरह बोला, जैसे अब उसको पहचान गया हूं, जबकि हालत उलटी ही थी-‘‘अच्छा, तो, भैया कृष्णमोहन, एक बात और पूछूंगा...बात यह है, कि मैं बहुत भुलक्कड़ हूं. अगर मैं इस समय भोजन करूं, और एक घंटा बाद तुम मुझसे पूछो, तो मैं नहीं बता पाऊंगा, कि खाया था या नहीं. मैं जाति-वाति में विश्वास नहीं करता. केवल जानकारी के लिये...हां, तो तुम कौन बिरादर हो?’’

‘‘मेरा पूरा नाम है कृष्णमोहन चतुर्वेदी. लेकिन मैं भी जाति-वाति में विश्वास नहीं करता.’’ उसका मुंह काफी लाल हो गया.

‘‘वाह, यह तो बहुत अच्छी बात है. हम हैं भारतीय, और भारतीयता के अलावा हमारी कोई जाति नहीं हो सकती. डाकखाने में हो न?’’

‘‘डाकखाने में?’’ पहले वह चौंका, फिर मुस्कराने लगा. शिष्टतापूर्वक बोला-‘‘मैं तो नगर विद्यालय में पढ़ाता हूं. आपने ही तो वह नौकरी मुझे दिलाई थी.’’

मेरा शरीर सनसनाने लगा, सिर चकरा गया. परन्तु ऊपर से मैं सौम्य मुद्रा धारण किये रहा.

‘‘जानता हूं, भाई खूब याद है,’’ मैंने मुस्करा कर, मृदु स्वर में कहा-‘‘बाल-बच्चे मजे में हैं न?’’

‘‘मेरी अभी शादी नहीं हुई,’’ वह देह को ऐंठता हुआ, बेहद शरमा कर बोला-‘‘गांव में घर के लोग हैं-मां-बाप, भाई-बहन. पिता जी ने मुझसे कहा था, कि शहर पहुंच कर आपके दर्शन कर आऊं. लेकिन मुझे बड़ा संकोच होता था...मुझमें यह भारी कमजोरी है.’’

‘‘कोई बात नहीं. संकोच कैसा? गांव कहां है? बुलन्दशहर जिले में न? देखो...मैं भूल रहा हूं.’’

‘‘नहीं. बस्ती जिले में-गंगापुर. मेरे पिताजी का नाम राममोहन चतुर्वेदी है.’’

‘‘बस-बस. तुम तो घर के आदमी हो. कैसा शर्म-संकोच? आधी रात को भी तुम मेरे घर आओ, तो भी तुम्हारा स्वागत होगा. आया करो...हां, जरा यहां का अपना पता तो लिखा दो. कभी

उधर से गुजरा, तो आऊंगा. कितनी ही बातें पड़ जाती हैं...’’

उसका पता मैंने अपनी डायरी में नोट कर लिया. फिर यह प्रदर्शित करने के लिये, कि उससे मिलने में मेरा कोई खास मतलब नहीं, और मैं बहुत ही व्यस्त आदमी हूं, मैंने अचानक अत्यधिक गम्भीर और किंचित रूखा चेहरा बनाकर, जिसका मुझे काफी अभ्यास है, वहां से चला आया. भीतर ही भीतर मैं बहुत उत्तेजित था. महीनों से दुःख निराशा और असफलता की जो शिला मेरी छाती पर रखी पड़ी थी, वह सहसा हट गयी. कुछ शायद दो या तीन वर्ष पहले एक ऐसा वृद्ध देहाती मेरे एक पुराने मित्र का पत्र लेकर आया था, जो कांवर की तरह झुका था, और जिसकी आंखों में कीचड़ भरा था. उसका लड़का बी.ए., एल.टी. था. मुझे याद नहीं कि उसके लिये मैंने क्या किया. शायद स्कूल की कमेटी के अध्यक्ष के पास फोन किया. लेकिन यह सब मैं नहीं सोचूंगा. मुझे चाहिये एकान्त, कि मैं अपने दिमाग और कल्पना को उन्मुक्त छोड़ दूं एक खिलाये-सिखाये फुर्तीबाज घोड़े की तरह.

घर आकर, मैंने जल्दी-जल्दी भोजन किया, और बाहर आराम करने वाले अपने कमरे में लेट गया. तेज हवा की हहराहट के अलावा चारों ओर खामोशी थी. मेरे सामने उस नौजवान का चेहरा उभर आया. पतला, लम्बा शरीर, गोरा रंग, सुडौल नासिका, बड़ी-बड़ी आंखें, ऊंचा ललाट. अच्छी खुराक और आराम से जब उसका शरीर भर जायेगा, और आत्म विश्वास से हीनता गायब हो जायेगी, तो वैसा जवान ढूंढ़े न मिलेगा. परतु पहले मैं अपने को बधाई देना चाहता हूं. वही बातें निकलीं, जिनकी मैंने कल्पना की थी. इसलिये मैं कहता हूं, कि अपनी मृत्यु के समय का भी मुझको पहले से ही पता चल जायेगा. किसी व्यक्ति को देखकर या किसी खास परिस्थिति में पड़कर, मेरे दिमाग में अनोखे विचार और कल्पनायें उत्पन्न होती हैं. दुनिया जैसी है, उसको देखते हुए, यदि कोई अनजान व्यक्ति मुझ को बार-बार नमस्कार करता है, तो इसका मतलब है, कि वह मेरे प्रति कृतज्ञ है, या कुशल होने का आकांक्षी है. इसको कहते हैं विचार. इसीलिये मैं अपने को विचारक और विद्वान कहता हूं. मैं छोटे-से-छोटे विचार की भी अवहेलना नहीं करता. उसको पालता-पोसता हूं. और अन्त में उस पर सवार होकर इस दुनिया को जीत लेता हूं. जाहिर है कि इस दुनिया का शासक घोड़ा या चमगादड़ नहीं हो सकता. इसी से मेरे पास धन है, और शक्ति भी. सोलह वर्ष पहले मैं साधारण कार्यकर्त्ता था. मैं जनसभाओं और साहित्यिक गोष्ठियों में भाषण देता, और जोशीली कवितायें करता. कुछ मामूली विचार उठे, और मेरे पास दो ट्रकों के लाइसेंस आ गये. विचार, विचार, विचार. मैं लोगों से कहता, कि वे चतुर्भुज क्रांति करें. इसके बाद तो देश पाठ्य-पुस्तक समिति का अध्यक्ष. विचार. और आज नगर की जितनी शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थायें हैं, उनका मैं कोई-न-कोई पदाधिकारी हूं. राष्ट्रीय महत्व की बहुत-सी सरकारी और गैर-सरकारी समितियों का सदस्य हूं. मेरे सहयोग के बिना कोई राष्ट्रीय या साहित्यिक आयोजन नहीं होता.

परन्तु मैं बहक रहा हूं. जब तक मुझे सफलता नहीं मिलती, मैं अपनी छोटी-से-छोटी योजना को गुप्त रखता हूं-अपने से भी. आखिर मुझे क्या हो गया है? ऐसी उत्तेजनापूर्ण दहशत का तो मैंने कभी अनुभव नहीं किया. ऐसा लगता है, कि मेरा जीवन, मेरी शक्ति, मेरा धन, मेरी प्रसिद्धि, सब व्यर्थ हो जायेगी. मेरे आगे वैसा ही अंधकार अब भी है, और वैसा ही अनिश्चय. यदि इस बार असफलता मिली, तो मैं क्या करूंगा? अधिक सम्भावना इसी की है. तब शायद मैं आत्म-हत्या कर लूं.

डेढ़ महीना मैं पटाये रहा. ये दिन मेरे किस तरह बीते, इसका बयान नहीं कर सकता. फिर सितम्बर की एक शाम को, जब आकाश बादलों से घिरा था, और तेज हवा चल रही थी, मैं सफेद खद्दर का धोती, कुर्त्ता और टोपी पहन, तथा हाथ में छड़ी ले, उसके यहां पहुंच गया. मकान खोजने में कठिनाई नहीं हुई. लेकिन वह एक ऐसी पतली और अंधी गली में था, कि मुझे उबकाई आने लगी. वह ऊपर की मंजिल में एक कमरा किराया पर लेकर रहता था.

मुझ को देखकर उसका चेहरा फक् पड़ गया, मुंह लाल हो गया, और शर्म-संकोच तथा हीनता के भाव से बदन और हाथ ऐंठने लगा. मैंने बहुत ही स्नेह और आत्मीयता के साथ उसके

कंधे पर हाथ रख दिया, और उसको भीतर खींच ले गया.

‘‘अरे, मुझे इतनी जल्दी भूल गये?’’

वह बेहद दुबक गया था, और आंखें चुरा कर मेरी ओर देख लेता था. एक और मामूली-सी बंसखट पड़ी थी, जिस पर दरी और चादर बिछी थी. दूसरी ओर एक बांस की मेज तथा कुर्सी थी. एक कोने में एक पुराना ट्रंक था, तथा दूसरे में एक स्टोव और कुछ बर्तन एवं कप-सासर पड़े थे.

मैंने हंसकर, उसे बंसखट पर बिठा दिया, और कुर्सी को उसके पास खींच कर, उस पर स्वयं बैठते हुए बोला-‘‘तुम मेरे लड़के के समान हो. इसलिये संकोच-वंकोच छोड़ो. मैं बहुत ही जरूरी काम से इधर आया था. सोचा, कि जरा तुम्हारा हाल-चाल लेता चलूं. यह सच है कि बड़े-बड़े मंत्री और अफसर लोग मुझको अपने यहां बुलाकर गौरव का अनुभव करते हैं. लेकिन मुझे तो गरीब की कुटिया में ही आनंद आता है.’’

कृष्णमोहन ने शिष्टाचार में कुछ बोलने की कोशिश की. लेकिन उसका मुंह खुला-का-खुला रह गया, और उससे कोई आवाज न निकली.

‘‘मैं, भाई, बातें साफ कहता हूं. जब से तुमसे मेरी बातचीत हुई है, मुझे तुम्हारे लिये बड़ी चिन्ता हो गयी है. रोज ही मैं सोचता रहा हूं, कि देखो न, एक होनहार नौजवान इसलिये सड़ रहा है, कि सामाजिक व्यवस्था ठीक नहीं. मैं आदमी को देखकर पहचान जाता हूं. बुद्धिमान और प्रतिभावान मुझको आकर्षित करते हैं. प्रतिभा, कला और संस्कृति को मैं धन और शक्ति से ऊंचा समझता हूं, इसीलिये मैं प्रतिभावान नवयुवकों को उत्साहित करता हूं, उनकी मदद करता हूं, उनको आगे बढ़ाता हूं. इस में जो स्वर्गीय आनन्द है, वह कहीं नहीं. मैं तो पहले ही तुम्हारे पास आ गया होता, लेकिन मेरी लड़की कभी-कभी बहुत परेशान करती

है...’’

मैं जोर से हंस पड़ा. मैं मृदु स्वर में बोल रहा था. कृष्णमोहन का संकोच बहुत हद तक दूर हो गया था, और उसकी आंखें अचम्भे और प्रसन्नता से चमकने लगी थीं.

मैं कहने लगा-‘‘बात यह है कि मेरी लड़की को कभी-कभी अजीब झक सवार हो जाती है. एक दिन बोली-‘‘पापाजी, मैं शहर के ऐतिहासिक स्थानों को फिर से देखना चाहती हूं. और आपको भी साथ चलना पड़ेगा. हार कर उसके साथ जाना पड़ा. क्या करूं, वह मेरी अकेली सन्तान है. वह मेरी लाखों की जायदाद की उत्तराधिकारिणी है. उसकी उपेक्षा तो मैं भी नहीं कर सकता. तुमने तो उसको देखा है न? देखने में वह खूबसूरत तो बहुत नहीं है, लेकिन उसका दिल मक्खन की तरह मुलायम है. घमंड उसे छू भी नहीं गया है. गरीबों के लिये तो उसका दिल स्नेह से भरा रहता है. घर में कई नौकर-चाकर हैं, लेकिन सब-कुछ वही करती है-गृहस्थी के सारे काम-धाम. और इस व्यस्तता में भी पता नहीं वह कैसे निकाल कर, टैगोर, टालस्टाय, शेक्सपियर, बर्नांड शा, विवेकानंद, गालिब बगैरा का भी अध्ययन कर लेती है. उससे बहस करके तुमको आनन्द आयेगा. अपने तर्को से वह तुम्हें लाजवाब कर देगी. उसको शान-शौकत और प्रदर्शन पसन्द नहीं. कहते तो संकोच होता है, लेकिन तुम तो निकट के हो-वह शादी एक ऐसे साधारण नौजवान से करना चाहती है, जो गरीब,

सीधा-सादा और आदर्शवादी हो. इस प्रश्न पर मेरा उसका बड़ा झगड़ा हाता है. बताओ, मैं ऐसा कैसे होने दूं? बड़े-से-बडे मंत्रियों और अफसरों के लड़के मेरी लड़की से शादी करने के लिये लालायित हैं. मैं अपनी इज्जत पर कैसे आंच आने दूं?’’

सहसा चुप होकर, मैं कमरे के बाहर देखने लगा. जैसे किसी के आने की प्रतीक्षा हो, या कोई और महत्वपूर्ण बात याद आ गयी हो. लेकिन वास्तविकता यह थी, कि मैं अपने झूठ से बेहद डर गया था, और मुझे आशंका हुई थी-व्यर्थ में ही-कि कृष्णमोहन मेरे रहस्य को ताड़ गया. उसका मुंह मूर्खतापूर्ण आश्चर्य के भाव से उसी तरह खुला था, और आंखें श्रद्धा के भाव से भरी थीं.

‘‘हां, मैं तुमसे यह पूछने आया हूं, कि क्या तुम किसी दूसरी लाइन में काम करना पसन्द करोगे...मेरा मतलब है, टीचर लाइन को छोड़कर?...समझो, कि 800 रुपये तनख्वाह होगी.’’ मैंने सिर घुमाकर, उसकी आंखों में साहस के साथ घूरते हुए कहा.

उसकी आंखें बैगन की तरह निकल आईं. उसने सूखी आवाज में पूछा-‘‘वह कैसे? मैं तो-’’

‘‘यह मुझ पर छोड़ो. मैं किसी मंत्री और अफसर से कह दूं, तो तुम कल ही मोटरवाले हो जाओ. मैंने हजारों को ऐसा बना दिया है. मैं जिसको प्यार करता हूं, उसके लिये क्या नहीं कर सकता? साथ ही मुझमें यह खराबी अवश्य है, कि जिस पर मैं नाराज हो जाता हूं, उसको मैं नेस्त-नाबूद भी कर देता हूं. बस, तुम हामी भर दो.’’

‘‘जी हां...आपकी कृपा-’’

‘‘भैया, कृपा वगैरा की बात न करो. मैं किसी पर एहसान नहीं करता. एहसान करने के लिये मैंने आज तक कुछ किया ही नहीं. मैं तो एक तुछ व्यक्ति हूं...अच्छा, तो ठीक है न? इस बात को अपने तक ही रखना बस, चलता हूं.’’

मैं लापरवाही से उठ खड़ा हुआ, और हाथ उठाकर, दरवाजे की ओर बढ़ गया. कृष्णमोहन ने हड़बड़ाकर खड़े होकर, नमस्कार किया. सहसा मैं घूम गया, और माथे पर अंगुली रखते हुए, जैसे कोई भूली बात याद आ गयी हो, धीरे से बोला-‘‘हां, भाई, मुझ को एक बात याद आ गयी. कोई खास बात नहीं...हां, इससे तुम्हारा भला जरूर होगा. साफ-साफ बताना. बताओगे न?’’

‘‘जी हां.’’ श्रद्धा एवं कृतज्ञता से जैसे कृष्णमेाहन पिघल गया था.

‘‘ठीक है. समझ गया मैं. मुझे पूरी उम्मीद है, कि तुम मेरी राय को ठुकराओगे नहीं. अगर तुम मेरे कहे अनुसार चले, तो कुछ ही वर्षों में मैं तुमको बहुत बड़ा आदमी बना दूंगा. हर इन्सान की जिन्दगी में एक ही अवसर आता है. इस अवसर को बिरले ही पकड़ पाते हैं. जो इस अवसर को पकड़ लेता है, वह बहुत ऊंचा उठता है. जो नहीं पकड़ता, वह जिन्दगी भर रोता है...तुम्हारे घर वाले तुम्हारी शादी कब करेंगे?’’

‘‘मैं नहीं जानता,’’ उसके मुंह से किसी तरह निकला.

‘‘भाई, ठीक-ठीक बताओ.’’ मेरे स्वर में रुखाई थी.

‘‘शायद अगले वर्ष, गर्मी में.’’

‘‘ठीक है. ठीक है. मैं तुम्हारे संकोच को समझ रहा हूं. लड़के को ऐसा होना चाहिए. ठीक है...लेकिन तुम भी जानते हो, कि जमाना तेजी से बदल रहा है. लड़के को मर्जी के खिलाफ आज कुछ भी नहीं किया जा सकता. मैं केवल तुम्हारी मंजूरी चाहता हूं. तुम्हारे पिताजी को तो मैं राजी कर ही लूंगा. मेरे कहने को वह टाल भी नहीं सकते. वह पुरानी नैतिकता और आदर्श में फले-फूले हैं. वह उसकी बात तो जान देकर भी मानेंगे, जिसने उनके साथ एहसान किया हो. हांलाकि मैं इसलिए कभी एहसान नहीं करता.बात यह है, कि एक मेरे दोस्त हैं. नाम अभी नहीं बताऊंगा. इस प्रान्त के बहुत बड़े आदमी हैं. इसी शहर में बहुत बड़ा बंगला है, कई मकान किराये पर हैं, कई फर्मो में शेयर हैं, बैंक में लाखों का बैलेंस है. अगर वह किसी भी सेठ से तुम्हारे लिये कह दें, तो तुम कल ही दो हजार तनख्वाह झाड़ने लगो.

‘‘अपनी ही बिरादरी के हैं. तो उनकी एक लड़की है- एकलौती सन्तान, मेरी ही तरह. भाई, बहुत सुन्दर तो नहीं, लेकिन बड़ी काबिल, काफी पढ़ी-लिखी, घर-गृहस्थी में निपुण. सारा परिवार बड़ा ही सरल. हां, तो वह मेरे मित्र पक्के गांधीवादी हैं. खुद उन्होंने एक बहुत ही गरीब विधवा ब्राह्मणी से शादी की थी. वह तो अपनी लड़की की शादी हरिजन से करने को तैयार हैं. लेकिन मेरे कहने से उनका दिमाग कुछ बदला है...तुम कहो तो उस लड़की से मैं तुम्हारी शादी तै करा दूं.’’

मैं बड़ी तेजी से बोल रहा था. मेरे मुंह के कोरों पर झाग आ गया था. कृष्णमोहन का चेहरा तेजी से उतर गया. उस पर जैसे स्याही पुत गयी. वह कुछ बोल न सका, और नीचे देखने लगा.

‘‘भाई, तुम चुप क्यों हो गये?’’ मैंने कुछ रुखाई से कहा-‘‘मैं तुमसे निश्चित जवाब चाहता हूं. मैं जानता हूं, कि तुम मेरी बात नहीं टालोगे. इससे मेरे दिल को बड़ा धक्का लगेगा. लेकिन मैं इसकी परवाह नहीं करता. हर व्यक्ति आज स्वतंत्र है. वैसे तुम्हारा जीवन बदल जायेगा. लाखों के मालिक हो जाओगे. पत्नी ऐसी पढ़ी-लिखी मिलेगी, कि तुम्हारी गृहस्थी को स्वर्ग बना देगी. तुम्हारे मां-बाप और परिवार के लोगों का दुःख सदा के लिये खत्म हो जाएगा. उनके प्रति भी तो तुम्हारा कर्त्तव्य है. बस, एक बार ‘हां’ कर दो. फिर मैं सब देख लूंगा.’’

‘‘दो दिन का समय चाहता हूं.’’ उसका डूबता हुआ स्वर था.

‘‘ठीक है. तीन दिन का समय लो. आज है सोमवार. मंगल, बुध और बृहस्पतिवार तक तुम सोचो, और शुक्रवार को मुझे आकर बता दो. ठीक?’’

‘‘जी हां.’’

मैं चला आया. बाहर आते ही, उस पर मुझ को बड़ा गुस्सा आ गया. स्वीकृति को टालने की उसे हिम्मत ही कैसे हुई?

तीन दिन तक मैं धैर्य धारण किये रहा. जब चौथे दिन शाम तक उसका कोई जवाब नहीं आया, तो मैं समझ गया कि उसको प्रस्ताव मंजूर नहीं. शायद वह मेरे पास कभी नहीं आयेगा, और न उसका उत्तर ही. मुझे लगा, कि क्रोध और निराशा से मैं पागल हो जाऊंगा. इस अपमान का बदला मैं जरूर लूंगा. जो मेरी इच्छा को ठुकरायेगा, उसको फल भुगतने के लिये तैयार रहना चाहिए. स्कूल की मास्टरी तो कल ही चली जायेगी. लेकिन इतना ही काफी न होगा. कोई कड़ा दंड.

मैं गलती पर था. उसी दिन दस बजे रात को एक अपरिचित नौजवान मुझे एक लिफाफा दे गया. वह कृष्णमोहन का पत्र था. उसमें लिखा था.

‘‘पिछले तीन दिन मैं जिस परेशानी और उलझन में रहा, उसको बता नहीं सकता. मैं जानता हूं, कि इस दुनिया में आप मेरे सबसे बड़े हितैषी हैं, इसलिये आप से कुछ छिपाऊंगा नहीं. जब मैं शहर में पढ़ता था, तो एक लड़की से मेरी जान-पहचान हो गयी थी. उससे मैंने शादी का वादा किया था. वह एक गरीब घर की मामूली लड़की है. उसकी बातें मुझे याद आती रहीं, और मुझे कष्ट पहुंचाती रहीं. परन्तु सबसे बड़ा है इन्सान का कर्त्तव्य. आपने मेरे और मेरे कुटुम्ब के साथ जो एहसान किया है, उसको मैं भूल नहीं सकता. उस उपकार का बदला नहीं चुकाया जा सकता. मुझे धन से मोह नहीं. उससे अधिक मैं सिद्धांत और कर्त्तव्य और आदर्श को प्यार करता हूं. कर्त्तव्य-पालन के लिये मैं सारी दुनिया का विरोध कर सकता हूं, चना-सत्तू खाकर रह सकता हूं. आपका प्रस्ताव तो मामूली बात थी. यदि आपने जान देने को भी कहा होता, तो मैं उसके लिये तैयार हो जाता...’’

पत्र कुछ और लम्बा था.

बहरहाल उसी वर्ष गर्मी में कृष्णमोहन की मेरी लड़की से शादी हो गयी बहुत धूम-धाम से. इसके पूर्व डेढ़ हजार रुपये मासिक वेतन पर वह एक फर्म में मैंनेजर हो गया था. मुझे पक्का विश्वास है, कि वह जिन्दगी भर मेरी लड़की का आज्ञाकारी पति बना रहेगा.

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