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प्राची - जनवरी 2016 - कहानी / समर्पण / निर्मला तिवारी

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कहानी

समर्पण

निर्मला तिवारी

बात बरसों पुरानी है. पुरानी है, तभी तो संवेदनाओं, भावनाओं और ममता की

सुगंधमयी पवित्र गंगा उछालें ले रही है इसमें. वरना आज के सिर्फ अपने लिए जीने वाले शुष्क रेगिस्तानी माहौल में ऐसा वसन्त कहां?

गंगादेई को बुलवा भेजा था केतकी ने-‘‘जैसी हो उठकर चली आओ गंगादेई, बहुत जरूरी काम है.’’

गंगादेई परेशान. केतकी दिदिया अपनी ससुराल में अच्छी तरह ही रह रही हैं. अभी हाल में कुछ बेहद दुःखदायी घटनाएं जरूर घट गई हैं, लेकिन गंगोदई अपनी दिदिया को जानती है. कैसी भी स्थिति आए, दिदिया के हाथों में विधाता ने अमोघ अस्त्र सौंप रखे हैं. वे न केवल निपट लेंगी, बल्कि जीतेंगी भी वे ही. उनके रहते किसी को कोई तकलीफ नहीं हो सकती. गंगादेई खूब जानती है, फिर ऐसी कौन-सी समस्या आन पड़ी कि गंगादेई को यों खड़े पैर बुलवा रही हैं?

अपनी गृहस्थी में वैसे भी गंगादेई को कोई झंझट नहीं है. अनुपम सुन्दरता और शालीन व्यवहार के कारण उनके ब्याह में कोई रुकावट नहीं आ पाई थी. गोपू जैसा गबरू दूल्हा उन्हें मिला है. बिना दहेज के भी सास-ससुर उसे ब्याह ले गए. आज भी उसकी बलैंया लेते सास अघाती नहीं. बस, एक ही कमी है जीवन में. वह भी कभी न कभी पूरी हो ही जाएगी.

केतकी दिदिया की किस्मत का तारा ऐसा बुलन्द कहां? बचपन में ही चेचक ने चेहरे की सुन्दरता नोच फेंकी थी. ऊपर से ठिगना कद और गहरा सांवला रंग. ऐसे में मां-बाप के घर गरीबी का स्थायी डेरा हो तो मनचाहा वर पाने के सपने, सपने में भी आने में हिचकते हैं.

पर कहावत है न, कि बिल्ली के भागों छींका टूटा. ऐसा ही कुछ घट गया अचानक केतकी दिदिया के साथ. पानी भरने गई जगमोहन पांडे की गृहणी का पैर कूएं की जगत से ऐसा फिसला कि उसकी लाश ही बाहर आ सकी. कोई कुछ न कर पाया. जगमोहन पांडे का चहकता हुआ घर-आंगन सूना हो गया. दो बेटियां और एक बेटा मां खोकर एकदम गुमसुम हो गए. गृहणी के बिना घर उजड़ गया. एक-एक दिन पहाड़-सा भारी हो गया.

व्यथित उदास पांडेजी सलाहों और उपदेशों की बौछारों से बौखलाने लगे-

‘‘पांडेजी, माना कि बहुत बड़ा दुःख आन पड़ा है, मगर भैया, आगे की भी तो सोचना है. ऐसे तो जिन्दगी कटेगी नहीं.’’

‘‘अरे भाई, बच्चे तो जैसे-तैसे बड़े हो जाएंगे. तुम्हारा सहारा कौन बनेगा. बुढ़ापे में कौन एक लोटा पानी देगा.’’

‘‘अभी बुढ़ा नहीं गए हो, सारी उम्र तुम्हारे सामने पड़ी है.’’

‘‘जगमोहन माथा पकड़ कर बैठ जाते. ये सारी बातें क्या वे खुद नहीं जानते? लेकिन अब चालीस पार की उम्र में उनके लिए कहां बैठी है लड़की?’’

भाग्य का अपना ही गुणा-भाग चल रहा था. तभी तो केतकी के अम्मा-बाबू सपनों के कांटों में से सुख की छोटी-छोटी कलियां ढूंढ़ने-बीनने में लग गए थे. चुभते तो थे कांटे, लेकिन सावधानी से वे उन्हें हटाते जा रहे थे.

‘‘उमर में तो बहुत अन्तर है. जोड़ी तो जरा भी नहीं जमेगी.’’

सबसे अधिक चुभने वाला कांटा यही था, जिसे अम्मा ने तर्क की कैंची से कतर कर उखाड़ फेंका था.

‘‘लड़कियों की उमर ढलने में देर नहीं लगती. एक-दो बच्चे होते ही बुढ़ा जाती हैं.’’

बाबू के तरकश में क्या एक ही तीर था? भौंहें सिकोड़कर उन्होंने अम्मा की ओर फिर निशाना साधा- वे अम्मा से पूछ रहे थे, या खुद अपनी तसल्ली करना चाह रहे थे?

‘‘उनके बच्चे तो बड़े-बड़े हैं. वे नई मां को स्वीकार करेंगे?’’

अम्मा की दृढ़ता विश्वास की अडिग दीवार सामने खड़ी थी-

‘‘उन्हें करना पड़ेगा. मजबूरी उनकी भी है. कब तक दूसरों के घर का खाना खाएंगे?’’

‘‘सारे परिवार की देखभाल कौन करेगा?’’

‘‘अपनी केतकी इस ब्याह के लिए राजी हो जाएगी?’’

डरते-डरते ही सही बाबू ने दुधारी तलवार सामने रख दी. यह एक गुड़ भरा हंसिया था. यह एक कड़वा घूंट था जिसे पी कर भी मरना था बिना पिए भी मरना था. इस एक बेताल के प्रश्न ने उन्हें निचोड़ कर रख दिया था. न करें तो बेटी घर में ही बुढ़ा जाए, मां-बाप के बाद कौन? पर करने के लिए बस यही एक अधबुढ़ा है. जहां वे कुछ उम्मीद कर सकते हैं.

केतकी से पूछा गया. केतकी इतनी नादान तो न थी कि सच्चाई न देख पाए. वह क्या देख नहीं रही थी कि जो भी उसे देखने आया, दुबारा न पलटा. जब सुन्दर-सुन्दर लड़कियां भारी दान-दहेज के साथ मिल रही हों तो गरीब की कुरूपा को कौन ब्याहना चाहेगा? फिर केतकी इतनी पढ़ी-लिखी भी न थी, कि अपने पैरों खड़ी होकर जीवन-निर्वाह कर ले. लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज ही कहां था?

असुन्दर तन में क्या मन की उड़ानों पर भी प्रतिबंध होता है? सपनों की बगिया पर क्या केवल रूप का ही अधिकार होता है? उठती उम्र की मीठी-मीठी ख्वाहिशों ने केतकी के मन को भी तो गुदगुदाया था. लेकिन उसकी राह में तो बन्दिशों का दलदल था अपनी मर्जी से राह चुनने की न गुंजाइश थी न संभावना.

झुकी हुई उदास आंखों की चुप्पी को ही केतकी की हां मानकर पांडेजी के घर विवाह प्रस्ताव भेज दिया गया. केतकी को देखने पांडे परिवार से कुछ लोग आए और बड़े गिरे हुए मन से केतकी को अंगूठी पहनाकर चले गए. कहां वह रूपवती गोरी-चिट्टी बहू और कहां यह काली-ठिगनी लड़की. कहीं कोई तुलना नहीं. लेकिन नकारने की भी तो गुंजाइश नहीं. ‘न इनको और न उनको ठौर.’ मजबूरी में किया गया समझौता! चलो ठीक है! जैसी है, गृहस्थी तो संभालेगी. बच्चों को दो वक्त का खाना तो घर में मिलेगा. संझा को दिया बाती तो होगी.

और केतकी? ब्याह के हवन-कुंड में अपनी भावनाओं, कामनाओं, सपनों की आहुति डालकर पांडे परिवार की बहू बनकर आ गई. अपनी इच्छाओं का क्रिया-कर्म करके उसने नए जीवन में पग रख दिया. लगभग पिता की आयु के पुरुष को पति के रूप में स्वीकार करने में केतकी सौ-सौ बार मरी. वह तो जीने-मरने को एक ही तराजू पर तौलकर इस दहलीज के अन्दर आई थी.

नए घर में नबोढ़ा केतकी थी और था जिम्मेदारियों का हिमालय. नई उम्र को जूझना था चौतरफा जवाबदारियों से. मुंह-अंधेरे उठकर घर की साफ-सफाई, नहाना-धोना निबटाकर बच्चों का मनपसंद नाश्ता बनाना, उन्हें तैयार कर स्कूल भेजना, खाना बनाना, बर्तन, कपड़े, सुबह से शाम तक चकरी की तरह घूमती थककर ऐसी चूर हो जाती कि याद ही न आता कि वह अभी युवा है. सपने हैं...! वह तो बस गृहणी बनकर घर में आई और आते ही मां के पद पर प्रतिष्ठित हो गई.

शरद सबसे बड़ा बेटा था. मात्र 4-5 साल बड़ी केतकी को मां कहने में उसे कुछ झिझक, कुछ समय जरूर लगा, लेकिन एक बार जो उसने अपनी इस नई मां को जान लिया, फिर मां-बेटे का रिश्ता अटूट हो गया.

भले ही कुछ साल ही छोटा है. लेकिन बेटा तो बेटा होता है न! मां के ऊंचे पद पर बैठी हूं मैं.

सांवला, सौंदर्यहीन मुख मातृत्व की पावन आभा से चांदनी को परास्त कर रहा था. मन की खूबसूरती ने तन को अदृश्य रत्नों से जगमगा दिया था. केतकी तो रत्न जड़ित प्रतिभा है. पांडेजी अपने भाग्य की सराहना करते थकते न थे, उनके रोम-रोम से असीसों की वर्षा होने लगी. सुधा-सविता और शरद को भूलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा कि उन्हें जन्म देने वाली कोई और थी.

अधेड़ पति की पत्नी केतकी अपने पति को लेकर संकुचित तो होती थी लेकिन अपने बड़े-बड़े बच्चों की वह सफल मां थी. मां का पद पाकर जैसे वह बहुत बड़ी हो गई थी, गर्व से भर

गई थी.

‘‘यह मेरी बड़ी बेटी है और वह छोटी और यह बड़ा बेटा शरद.’’

स्कूल की पढ़ाई पूरी होते ही जगमोहन ने दोनों बेटियों को ब्याह दिया. शरद कालेज की पढ़ाई पूरी कर पिता के काम में सहायता करने लगा. जगमोहन बेफिक्री से पारिवारिक जीवन जी रहे थे. अधेड़ पति के रंग में रंग कर केतकी भी अपने आपको अधेड़ ही मानने लगी थी. गंगादेई बहुत दिनों बाद अपनी दिदिया से मिली तो झुंझला पड़ी.

‘‘यह क्या हो गया है दिदिया तुम्हें? कैसी बुढ़ियों की तरह रहती हो? अभी उमर ही क्या है तुम्हारी? अपनी ओर जरा भी ध्यान नहीं है तुम्हारा.’’

केतकी की निश्छल हंसी माला के शुभ मोतियों की तरह बिखर गई.

‘‘बहन बड़े-बड़े बच्चों की मां हूं, मैं बूढ़ी नहीं तो क्या जवान दिखूंगी? तुम्हारे घर अभी बालगोपाल नही आए है न. इसलिए संज-संवर कर घूम सकती हो. मैं तो जल्द ही बहू लाने वाली हूं घर में. मैं सिंगार-पटार करूंगी, तो बहू क्या सोचेगी? दुनिया क्या कहेगी?’’

गंगादेई बस दिदिया का मुंह ताकती रह गई. कहने को था ही क्या? समर्पण की भी तो कोई सीमा होती होगी?

विधि का विधान भी बड़ा अजीब है. सौत के बच्चों से गोद भर देने के बाद वह जैसे केतकी की गोद भरना भूल ही गया. केतकी को भी तो कोई परवाह नहीं थी. मां-मां कहते आगे-पीछे घूमने वाले बच्चों से तो भरी-पूरी थी ही. अब तो शरद का ब्याह रचाकर घर में बहू भी ले आई थी वह.

सुन्दर नाजुक-सी बहू घर में आई तो केतकी निहाल हो गई. बहू समझदार थी, सास के मन को पढ़़ने में उसने देर न की. सास-बहू का यह रिश्ता जल्द ही दोस्ती में बदल गया. समय पंख लगाकर उड़ चला.

कुछ ही महीनों बाद बहू की तरफ से खुशखबरी पाकर केतकी खिल उठी. अब तो वह दादी बन जाएगी. इतनी कम उम्र में दादी का ऊंचा पद. केतकी के पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे. बहू को हाथों-हाथ ले लिया उसने. पाण्डे जी ने भी भगवान के आगे शीश नवाया था.

‘‘बेटे के घर संतान होगी. मेरा वंश आगे बढ़ेगा. झोली भर दी भगवान. बस, और कुछ नहीं चाहिए.’’

पर कहां? जो हुआ, उसके बारे में तो किसी ने सोचा भी न था. केतकी की लाज का ठिकाना न रहा. भले ही केतकी की शारीरिक स्थिति युवा थी, लेकिन मन तो बूढ़ा ही चुका था. घर में बहू-बेटा थे. बेटियां ब्याही जा चुकी थी और अब तो वह दादी भी बनने वाली थी.

ऐसे में भगवान ने यह कैसी ठिठौली की? इतने वर्षों बाद केतकी की झोली में खुशखबरी डालकर विधाता शायद मुस्कराया. केतकी हैरान परेशान लोग क्या कहेंगे? बड़े-बड़े बच्चों की मां और अब अपनी सन्तान खिलाएगी?

पांडे जी सकुचाए से. लेकिन घर के सभी सदस्य खुश थे. सबसे, ज्यादा खुश तो शरद.

‘‘छोटी मां, अब मैं भी एक से दो हो जाऊंगा, सबके भाई हैं, मेरा ही कोई भाई नहीं था. जरूर छोटी मां मेरे लिए भाई ही लाएंगी.’’

केतकी की लाज की बाढ़ उतरने लगी और वह भी सबकी खुशियों में शामिल होकर मातृत्व के मधुर अनुभव को घूंट-घूंट पीने लगी.

समय आने पर बहू ने पुत्र को जन्म दिया. घर में खुशियों की बहार आ गई. पाण्डे जी और केतकी निहाल हो गए. कुछ समय बाद केतकी भी मां बनी. पहली बार अपनी सन्तान गोद में आई तो परिपूर्णता का अनूठा एहसास से सराबोर हो गई वह. मातृत्व की इस गरिमा को तो पहली ही बार जाना था. शरद हंस रहा था-

‘‘यह क्या छोटी मां? मैंने भाई मांगा था, आपने बहन दे दी. बहनें तो पहले से थी न! लेकिन यह तो सबसे सुन्दर है. देखो न कितनी प्यारी लग रही है. इसका नाम मैं कुमुद रखूंगा मेरे नाम से मिलता-जुलता.’’

प्यारी-सी गुड़िया घर में खुशियों की गंगा ले आई थी. पांडेजी कभी पोते को दुलराते. तो कभी परी जैसी बेटी को. केतकी दोनों बच्चों को समान प्यार दे रही थी.

‘‘छोटी मां, ठंड शुरू हो रही है. हम दोनों बच्चों के लिए ऊनी कपड़े लेने बाजार जा रहे हैं. कमल को हम ले जाएं अपने साथ?’’

‘‘नहीं शरद! कमल को मेरे पास छोड़ जाओ. उसे ठंड में बाहर मत ले जाओ. नाजुक बच्चा है. कहीं बीमार न हो जाए.’’

बहू की गोद से नन्हें-मुन्ने छुई-मुई से कमल को ले लिया केतकी ने, कैसा पल था वह? किसने केतकी से कहलवाया था-

‘‘मैं संभाल लूंगी, तुम लोग जाओ, मगर जल्दी आ जाना.’’

जल्दी आ जाना! कहां से? कैसे? किस हाल में? सुना जरूर था कि पहाड़ टूटा, बिजली गिरी, लेकिन आज पहली बार जाना कि आसमान कैसे फटता है, कलेजा कैसे टुकड़े-टुकड़े होता है?

जवान बेटा-बहू के मृत शरीर को देखते ही पांडेजी मूर्च्छित हो गए. और केतकी? वह बेहोश हो जाए, तो क्या होगा? उसे तो हर हाल में अपने आपको सचेत रखना है. वह होश खो देगी, तो दो शिशुओं को कौन संभालेगा. बदहवास बूढ़े पति को कौन देखे? कलपती हुई बेटियों को बांहों में समेटने वाला भी तो कोई हो. ‘‘मैं संभाल लूंगी, तुम लोग जाओ.’’ क्यों निकले ये शब्द मुंह से?

तूफान आकर सब कुछ ध्वस्त कर चला गया. अब मलबा समेटना था. मलबे में से घर ढूंढ़कर फिर खड़ा करना था. बेटियां अपने-अपने घर, पांडेजी बेहाल. दो नन्हें बच्चे घर में. कमल बेहद कमजोर नाजुक! पाण्डेजी उसे देखकर कातर हो उठते-

‘‘बिना मां के कैसे जीएगा? ऊपर का दूध तो यह पचा ही नहीं पा रहा है. हर बार उलट देता है. ना, नहीं बच पाएगा अभागा.’’

विवश आंखें करुणा से भीग जाती. केतकी क्या करे? क्या कहे? अपनी बेटी को हाथ में उठाती तो बिना मां-बाप के मासूम कमल को देखकर कलेजा मसोस उठता. कमल को गोद में लेती तो कुमुद भूख से बिलखकर रोती. पांडेजी सजल आंखो से इकलौते बेटे की इकलौती निशानी को देखते रहते-

‘‘यह न बचा तो मेरे शरद की निशानी ही मिट जाएगी.’’

कैसे बचा लें उसे? केतकी भी क्या करे?

मन की उजड़ती बगिया में किसी कोने में एक बीज उग गया, और चाहते न चाहते हुए भी आकार लेने लगा. क्रमशः जड़ें गहराने लगी.

कुमुद कलेजे का टुकड़ा, आंखों का उजाला जीने का सहारा क्या नहीं थी केतकी के लिए? उसे निहारते आंखें नहीं थकती थी.

गंगादेई के घर हरकारा भेजकर उसे तुरन्त आने के लिए बुलावा भेज दिया केतकी ने.

‘‘जैसी हो तुरन्त उठकर चली आओ. बहुत जरूरी काम है. देर मत करना.’’

गंगादेई पति के साथ आ पहुंची. अपनी दिदिया और नन्हें कमल को देखकर उसका कलेजा मुंह को आ गया.

‘‘ईश्वर ने यह क्या कर डाला दिदिया? इतना छोटा बच्चा. बेचारा बिना मां का हो गया.’’

केतकी गंगादेई को देखकर जैसे जी उठी- हल्की-सी मुस्कान के साथ ठहरे हुए स्वर में बोली-

‘‘ना गंगादेई कमल बिना मां का नहीं हुआ. इसकी नहीं, कुमुद की मां आज मर गई. यह बिन मां की हो गई है.’’

गंगादेई स्तब्ध! यह कैसी बात! दिदिया क्या कह रही हो? शोक के आघात से क्या इनका दिमाग...?

‘‘कमल की मां तो जीवित है. मैं हूं न. यह मेरा दूध पीकर पलेगा. बढ़ेगा. मैं इसे कुछ होने थोड़े ही दूंगी.’’

कुमुद को उठाकर केतकी ने गंगादेई की गोद में डाल दिया-

‘‘इस अभागन को पाल लो गंगादेई, इसकी मां बन जा बहन. मेरी कुमुद को मेरी लाडली को तुम ले जाओ. वादा करती हूं, कभी कहीं देखूंगी तो पहचानूंगी नहीं इसे. अब यह तुम्हारी बेटी है. इसे बिन मां की होने से बचा लो.’’

छोटी बहन के दो पैरों पर हाथ रख दिया केतकी ने. दीन, करुणा में नहाए शब्द, आंसू उमड़ आए. एक विवश मां के आंसू. न बहने देना और न रोक पाना संभव है. पर असंभव को संभव बना दे, वही तो केतकी है.

गंगादेई कंटकित हो गई. कभी दिदिया को देखती, तो कभी अपनी गोद में पड़ी कुमुद को. सारे संसार की दौलत एक ही बार में झोली में आ जाए, तो कौन नहीं बौरा जाता? यह गुलाब का फूल क्या अब सचमुच ही उसका है? यह प्यारी सी बेटी क्या सचमुच ही उसकी हो गई है. सच? इस बोझिल माहौल में अपनी खुशी कैसे छिपाएं गंगादेई?

कैसी है ये दिदिया? बरसों बाद मिले ईश्वर के इस अमूल्य वरदान, इस हीरे की कनी से मुंह मोड़ रही हैं? वह भी सौतेले बेटे की निशानी को बचाने के लिए? इस निर्मोही दुनिया में ऐसा भी कोई करता है क्या?

‘‘मैं दोनों बच्चों को नहीं पाल सकूंगी. कमल की रक्षा करना जरूरी है. कुमुद मेरे साथ रहेगी. तो मेरे अन्दर की ‘मां’ मुझे कमजोर करती रहेगी और मैं कमल के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाऊंगी. तुम्हारे जीजा का यह घर मैं उजड़ने नहीं दूंगी. कमल उनका वंशधर है, इसमें उनके वंश की छवि दिखाई देती हैं.’’

बंद रास्तों में भी अवरोधों की चट्टानों को तोड़ पग-पग आगे बढ़ने की कोशिश करती दिदिया को देखकर गंगादेई विस्मित थी-

‘‘कमल को मैं पूरा न्याय देना चाहती हूं. विधाता से उसके जीने का हक छीनना चाहती हूं. मां-बाप तो खो ही चुका है, उसका जीवन विधाता को भी नहीं छीनने दूंगी, चाहे उसकी कोई भी कीमत मुझे चुकानी पड़े.’’

केतकी का मन भावों से बढ़कर बांध तोड़ने पर उतारू था. उसकी सहज मीठी वाणी आज वेदना की चाशनी में डूबकर अनूठी ही लग रही थी. गंगादेई बस, एकटक मुग्ध नजरों से दिदिया को ताक रही थी.

‘‘तेरे जीजा ने मुझे क्या नहीं दिया? घर-परिवार, मान-सम्मान, प्रेम...और सबसे बढ़कर आश्रय! मुझे तो ऊपर वालों ने कुछ दिया ही नहीं था. आज उन्हें मुझसे कुछ चाहिये. वे तो कुछ कहते नहीं, लेकिन तुम्हीं बताओ गंगादेई, मैं कैसे आंखें बंद कर लूं? कैसे होने दूं, जो हो रहा है?’’

बहन के मन की पीड़ा बहन को सिर से पैर तक भिगो गई.

‘‘लेकिन दिदिया, तुमने भी तो अपने फर्ज में कसर नहीं छोड़ी, फिर क्यों? क्यों अपना कलेजा छोड़कर इस तरह खाली हो रही हो?’’

केतकी की आंखों में बेपनाह वेदना का सागर मचल उठा. हृदय का सारा प्यार दुलार आंखों से बेटी पर उड़ेलकर उसने निर्ममता से नजरें घुमा ली.

‘‘शायद तुम ठीक कह रही हो, लेकिन बहन, यह हिसाब तो मेरा है, तुम्हें कैसे समझाऊं? इस समय मेरी दो आंखें हैं-कमल और तुम्हारे जीजा बस. इतना ही समझ पा रही हूं कि वो अपने बेटे की निशानी को बचाना चाह रहे हैं और मैं? मैं उनकी इच्छा को कैसे मरने दूं? ईश्वर का दिया अमृत पिलाकर अगर मैं कमल को जिला लूंगी, तो कोई कुछ कहे न कहे, मैं अपने आगे गर्व से खड़ी हो सकूंगी और बहुत बड़े पश्चाताप और शर्मिन्दगी से बच जाऊंगी.’’

केतकी अपने आपमें गहरे उतर गई-

‘‘बेटी के बिना जी लूंगी. मगर उस ग्लानि स्वार्थ और निर्ममता का बोझ हरगिज-हरगिज न उठा पाऊंगी.’’

लंबी सांस खींचकर केतकी फिर बोली-

‘‘गंगादेई, बस इतना समझ लो कि कमल मेरे बेटे-बहू की आखिरी निशानी है. मेरे पति की डूबती नाव की पतवार है वह, मेरी बेटी को तो तुम जिला लोगी, मुझे विश्वास है लेकिन कमल? उसे अगर मैंने नहीं सभांला तो वह नहीं बचेगा.’’

आशंका मात्र से कांपकर केतकी ने कमल को सीने से चिपका लिया. आंचल से अच्छी तरह ढंक लिया. अपने दुर्भाग्य से अनजाना नन्हा शिशु तृप्त भाव से सो गया.

छलछलाई आंखों से पांडेजी अपनी पत्नी को देख रहे थे, रोम-रोम से सौन्दर्य झर रहा था उस असुन्दर शरीर से. ठिगना कद आसमान की ऊंचाइयों को नाप रहा था, गहरा सांवला रंग और ऐसा आभा-मंडल? त्याग, समर्पण, ममता का ऐसा इन्द्रधनुष तो कभी किसी ने न देखा होगा.

गंगादेई भरी गोद और भारी मन से बिदा हो गई. दिदिया ने आज उसे जो उपहार दिया था, उसे देकर दिदिया कंगाल नहीं हुईं, बल्कि अमूल्य दिव्य धन की स्वामिनी हो गई थी. अपनी दिदिया के चरणों में नतमस्तक हो गई थी गंगादेई.

संपर्कः 1720, सरस्वती कालोनी,

पी.एन.बी. कालोनी रोड,

चेरीताल, जबलपुर-482002

मो. 9479640496

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