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प्राची - फरवरी 2016 - साक्षात्कार / ‘गालियां नहीं देंगे तो क्या आरती उतारेंगे!’ / अमृतलाल नागर

हमारी विरासत

इस स्तंभ के अंतर्गत इस बार हम के.पी. सक्सेना द्वारा अमृतलाल नागर का 1981 में लिया गया साक्षात्कार दे रहे हैं. यह साक्षात्कार सारिका के 16 से 31 मार्च, 1981 अंक में प्रकाशित हुआ था. यह अमृतलाल नागर के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है. वह बहुत जीवंत व्यक्ति थे- हंसोड़, भांग के शौकीन और मजमेबाज. उन्हीं दिनों उनके नवीनतम उपन्यास ‘खंजन नयन’ का एक अंश सारिका में प्रकाशित हुआ था. नागरजी अपनी रचना पर बहुत श्रम करते थे. उपरोक्त उपन्यास लिखने के लिए उन्होंने परासौली तक की पैदल यात्रा की थी.

संपादक

‘गालियां नहीं देंगे तो क्या आरती उतारेंगे!’

अमृतलाल नागर

साक्षात्कार

जैसे मीरा के तई गिरिधर नागर...

तैसे लखनऊ के तई अमृतलाल नागर...पैंतालिस बरस से कलम जो है वह सरपट चल रही हैगी. चौक की बान वाली गली में साहू की हवेली ने कितने ही किस्सों, गपोड़ों और लंतरानियों की जिल्दें मढ़वा ली हैं...‘मुंशी चिर्राउ लाल’ और ‘नवाबी मसनद’ की चाशनी से शुरू हुए तो सूरदास की बलईयों पर जाकर एहसास हुआ कि अरे, हम तू बूढ़े हो चले...तलवार बंद बादशाह से लेकर डलिया बरदार भंगी तक पे, जहां कलम उठायी, एक नया अंदाज पैदा कर दिया. चुनांचे पिछले दिनों फुर्सत के लम्हों में एक चुल सवार हुई कि लाओ बुड्ढन से यादें उगलवा लें...गली में घुसते ही देखते क्या हैं कि हटो बचो! हवेली पर बंदनवार सजी है...सुनहली अचकनों में सजे बूढ़े गाल फुलाए शहनाई फेंट रहे हैं...लकदक आंगन में मंडप...मंगल कलश. मनिहारन...भट्ठी पे हलवाई बैठा है...चौक और सुतिये पुरे. बेटे-बेटियां बाल-बच्चेदार हुए. अब क्या?...कहां पोता...? ऐसा होता तो बॉ (मां-श्रीमती नागर) क्या फोन पे बतातीं नहीं?...नाती सिद्धार्थ ने शंका तोड़ी, ‘‘मामाजी, आज आंगन में रंगराज (मद्रास) की तमिल फिल्म ‘नांदू’ (केकड़ा) की शूटिंग है...’’ ‘शतरंग के खिलाड़ी’ और ‘जुनून’ की शूटिंग के बाद अब दयारे-नागर तमिल फिल्म की रीलों में कैद हो रहा था...इस हंगामे से अलग बाबूजी सरापा ऊन में मढ़े हुए अपने लहीम-शहीम तख्त पर दुबके हुए थे...

‘‘के.पी. अब ठंड बहुत लगती है...ल्यो बनाओ-खाओ. मेरी तमाखू अलग है...तुम अपनी ब्रांड लो!’’ नागरजी ने पानदान सरका दिया...बाहर शूटिंग का हंगामा अंदर दो पीढ़ियां कैद-नागरजी और मैं...

बाबूजी, आपके दौर का नमकीन लखनऊ लंतरानियों का लखनऊ था. गूदा कम, छिलका ज्यादा! यह लंतरानी आखिर होती क्या शै थी?

लंबा तराना...शार्ट फार्म ‘नम-तरानी’. छल्ले में छल्ला. सन् 29-30 में मैं पूरे होश में आ गया था. नवाबी के बाद का गुरूर लोगों के दिल-दिमाग में रचा-बसा था. इसी गली में बटेर मुठियाते बिगड़े नवाब नजर आ जाते थे. जनानी गढ़ईया में तीरंदाज हुआ करते थे...सुबह कोठों पर रियाज. गली में एक बुड्ढन बिसाती गुजरते थे. लंतरानियों के बादशाह. कोठों को हुस्न सप्लाई किया करते थे...बगल में बकसिया दबाए कोठों तले आवाज खींचते थे-‘‘लिवंडर...पीडर...ओटो दिल बहार...माशूकाना ऽऽऽऽ!’’ माशूकें छज्जों पर हाजिर...और लंतरानियां शुरू?

आपका इब्तदाई लेखन लंतरानियों और इत्र बसी खुशबू से रचा था. ‘पीपल की परी’, ‘नवाबी मसनद’ और न जाने कितनी ही ऐसी कृतियां लोगों के बस्तों में महफूज रहती थीं. आपकी कलम ने इस माहौल की रोशनाई क्योंकर हासिल की?

अपने ही लोगां में भय्यन. कभी गली में लौंडों के साथ खेलने न दिया गया. छज्जे की खिड़की में बैठे देखते रहते थे. गलियों में जबान, नफासत, चुहलबाजियां, फब्तियां और मिमिक्री...एक से एक नकलें. मैं चाहता तो बहुत अच्छा एक्टर भी बन सकता था...कंपनी बाग में भूतों के किस्से सुनाये जाते थे. ड्योढ़ी पर ठाकुर चौकीदार गदर के किस्से अपने वर्कदार ढंग से सुनाता था. ये सारे अक्स अचेतन मन पर जमा होते गये. बचपन में ही दूसरा दोस्ता-छापे का अक्षर. पिताजी के दोस्त पं. महेशनाथ शर्मा के घर ढेरों पत्रिकाएं आती थीं...वहीं पर ’सरस्वती’ और ‘गृहलक्ष्मी’ जैसी पत्रिकाओं के मोह ने लपेट लिया...उधर माहौल, इधर अक्षर...अमृतलाल की बेल पर बान चढ़ती गयी.

उस दौर के साहित्यिक लखनऊ की क्या खासियत थी? वह क्या था जिसने आपसे ‘तसनीम लखनवी’ के नाम से लिखवाया.

लल्लू, तुम तो उर्दू दां हो. सुना होगा कि ‘लुत्फे मय तुमसे क्या कहूं जाहिद...हाय कमबख्त, तूने पी ही नहीं.’ होते उस दौर में तो उस मखमली जादू को समझते. बच्चे, शुरू में मेरे पास हिंदी का वातावरण था ही नहीं. पंडित रूपनारायण पांडे के बंगला से अनुवाद पढ़ लेते थे, या दुलारेलाल भागर्व की ‘माधुरी’ और

‘सुधा’. अलबत्ता नशिश्तें और महफिलें खूब होती थीं. दादाजी पं. शिवराम 1902 में इलाहाबाद बैंक के पहले भारतीय मैनेजर होकर आये थे. चौक में ब्रांच खोली थी. लोग अंग्रेज से डरते थे कि कहीं बैंक का पैसा फिरंगी तिड़ी न कर दे...दादाजी को लोगों का कॉनफीडेंस जीतना था. माहौल बनाने लगे...उन दिनों मुसलमान पराया नहीं था. नवाब शीश महल और असगर अली के जनाने तक में जाता था मैं. बेगमों की लच्छेदार बातें...उन्हीं से सलाम करने और दो-जानू बैठने का ढंग सीखा. एक कंपोजिट कल्चर छाया हुआ था...‘तसनीम’ बने हम 1937 में. शरत् बाबू कलकत्ता में बीमार थे. मैं पहली बार कलकत्ता गया उस मनीषी को देखने. लौटने पर मुगलसराय स्टेशन पर पेपर में पढ़ा कि प्रसादजी नहीं रहे...उसी में कहीं किन्हीं नसीम या वसीम (याद नहीं) को पढ़ा. मेरे अंदर ‘तसनीम’ जाग उठा. पुरुषोत्तम दवे एक जेबी अखबार निकालते थे-‘खुदा की राह पर’. उसी में पहली कहानी ‘मुंशी चिर्राउ लाल’ तसनीम लखनवी के नाम से लिखी. बहुत पसंद की गयी. फिर अपने अखबार ‘चकल्लस’ में

धारावाहिक फीचर ‘नवाबी मसनद’ भी तसनीम ने ही चलाया. अब नौबत यह आयी कि ‘अमृतलाल नागर’ छपते दो रुपये पर पेज के पेमेंट पर, और ‘तसनीम लखनवी’ को मिलता था तीन रुपया पर पेज...बस! एक लंबे अर्से तक ‘तसनीम’ मियां ‘अमृतलाल’ पर छाये रहे...

मेरा विश्वास है बाबूजी, कि अगर कोई पाठक ‘नवाबी मसनद’ के बाद सीधे ‘खंजन-नयन’ पढ़े तो उसे लगेगा कि दोनों अलग-अलग लेखकों की कृतियां हैं. इस गहरे गैप के प्रति आप क्या कहेंगे?

के.पी., हर किताब एक सीढ़ी है, ऊपर उठने को. एक ही व्यक्ति के क्रमिक विकास की आईनादार है मेरी हर किताब. ‘वाटिका’ (1935) मेरा पहला कहानी संग्रह था...उसकी हर कहानी को अमृतलाल आगे भी मोटे-मोटे उपन्यासों में कहीं न कहीं रूपांतरित हुआ है. मैं इसे गैप नहीं मानता. मीनार की पहली और आखिरी सीढ़ी के बीच गैप होता है कहीं? ‘तसनीम लखनवी’ मेरे अंदर आज भी जिंदा है...डार्मेंट कह लो, मरा नहीं है...

‘विष और अमृत’ के बाद आपकी लगभग सारी कृतियां सामाजिक परिवेश से हटकर पौराणिक धरातल पर आ गयी हैं. तुलसी, सूर, नैमिष...कहीं वह उम्र की मांग तो नहीं?

निःसंदेह साहित्यिक लेखन. किसी भी विषय को लेकर किसी कामनर से इंटरव्यू करता हूं तो अत्मिक तुष्टि मिलती है. वह मेरा वी.आई.पी. होता है...किस भकुए ने की है इतनी जद्दोजहद? ड्राइंग रूमों में बैठकर क्रांति बघारने वाले बहुत हैं. मिलता क्या है? पड़ाव का जो सुख मुझे मिला है, वह मेरा अपना खजाना है.

कम लोग जानते हैं कि आपने फिल्मों में भी अभिनय किया है, मंच पर भी...आज का जदीद थियेटर किस हद तक हाजमे में आता है...कहां अपच होती है?

यार, ड्रामा टेक्नीकली खूब बढ़ा है. ईर्ष्या होती है नयी-नयी डिवाइसेज देखकर. मगर विषय वस्तुतः में गायब हो गया है. कहीं वे समस्याएं नहीं उभरतीं जो जीवन से जुड़ी हों. मात्र हईया छू लेना काफी नहीं है. आज का मंच व्यावसायिकता की ओर

अधिक उन्मुख है. ठीक है. उससे भी कुछ काम हो सकता है. मगर कुछ नार्म्स होने चाहिए.

पुराने फिल्मी यारों-सहसवारों की कुछ यादें?

मर गये सुसरे सब प्यारे-प्यारे साथी. किशोर साहू और महेश कौल मेरी मुट्ठी में घुले थे...पृथ्वीराज, जयराज, और नियामपल्ली में खूब छनती थी. किशोर के पिता बाबू कन्हैयालाल साहू खूब पढ़ाकू थे, किशोर ने डांट-डांटकर मुझसे फिल्म लिखवाई. किशोर के जरिए ही अशोक कुमार के साथ बैठकें जमने लगीं. अशोक साइन्स का आदमी था, मगर बहुत सज्जन...बहुत प्यारा. रात-रात भर गप्पें...उन दिनों में ‘गुड़िया का घर’ फिल्म (इब्सन के ‘डाल्स हाउस’ पर) के डायलाग सिनेरियो लिख रहा था. बलराज साहनी भी आ जुड़े. इस फिल्म में बलराज और पत्नी दम्मो (दमयन्ती) दोनों काम कर रहे थे. यों बलराज से दोस्ती सन् 37-38 की थी. फिल्मों से पहले की...भांग पार्टियां खूब चलती थीं.

बाबूजी, प्रायः आप सारा श्रेय बॉ को देते रहे हैं. बॉ के साथ तय की हुई मंजिलं बताइये.

लल्लू, तेरी यह जो बॉ है न, उससे मैं दिन में एक बार जरूर झगड़ा करता हूं. मैं भूल जाता हूं, तो वह झगड़ा कर लेती है. दोनों भूल जाते हैं तो नाती-पोते लड़वा देते हैं. इस औरत ने लेखन के लिए मुझे इतना मुक्त किया है कि मैं इसका एहसान जिंदगी भर नहीं भूल सकता. तेरी बॉ को बस इसी में संतोष है कि मैं बैठा लिखता रहूं. मेरा लिखा तब पढ़ा भी नहीं इसने. दूसरे बताते हैं, तो तृप्ति समेट लेती है...इतना कुछ झेला है इस प्रतिभा नागर (बॉ) नाम की औरत ने कि पूरी किताब लिख सकता हूं. एक पल नहीं चल सकता इसके बिना. अब तो छोटी-छोटी जरूरतों के लिए बच्चों की तरह, मैं भी आवाज लगाता हूं- बॉ ऽ ऽ ऽ! (उन्मुक्त हंसी)

बकौल शख्से, फ्रीलांसिंग में आज माचिस वाला बीड़ी को और बीड़ी वाला माचिस को तरस जाता है! आपने दो बेटों, दो बेटियों को ढंग से स्थापित किया और साहू की हवेली का रुतवा बरकरार रखा...फ्रीलांसिंग में कैसे?

कुछ तो फेमली बैकब्राउंड का हल्का-सा बेस था. हजारपती तो था ही. बाकी सब पत्नी का त्याग. आज पहली बार मुंह खोल रहा हूं कि तेरी बॉ ने मुझे लेखक बनाने के लिए धीरे-धीरे सारा जेवर बेच दिया. जेवर का मोह किसी औरत के दिल से पूछ...अपनी दूरअंदेसी से एक-एक पाई बचायी बॉ ने...उधर मेरे लेखन का धुआंधार क्रम बना रहा. तीन हफ्ते पेट के लिए लिखता था, एक हफ्ता मन के लिए? नहीं समझा?...तीन हफ्ते रेडियो और अखबार का आर्डर लेखन, ताकि रोटी आ जाये. फिर एक हफ्ता अपने मन का...ऊपर से हम तीन भाई (सिने छायाकार स्व. रतनलाल नागर, तथा आर्ट्स कॉलेज के विभागाध्यक्ष श्री मदनलाल नागर)...कभी तीन नहीं रहे...हाथ कभी नहीं फैलाया किसी के आगे. मिल-बांटकर दुख-सुख झेल लिया. बस, नाव घाट लग गयी.

बरसों पहले राजनीति के संदर्भ में आपने कहा था कि, जो छोटा जानवर काटे, वह चिकवा...बड़ा काटे तो कसाई...काटते सब हैं. आज के संदर्भ में इस शीशे का परिवर्तित रूप क्या होगा?

भय्यन, यह फिकरा मेरा नहीं, बल्कि हमारी पार्टी के नेता, भगवती बाबू का था...आज की राजनीति में चिकवा तो हो गया पंसारी, और कसाई, पूरा स्मगलर समाज. आज दो नंबर की नहीं, बल्कि दस नंबर की कमाई वाले का राज है. स्लोगन खूब लगते हैं. तबीयत खुश हो जाती है. पहले पार्टियां चंदों से चलती थीं...अब होर्डरों की चरणरज से. अब भय्ये, वे इंटरेस्ट उनका देखेंगे कि हमारा? महंगाई इसी कारण है. जो कुछ चल रही है वह नेताओं-नेताओं के बीच. पब्लिक से सारे संबंध अखबारी हैं...यह जो तुम्हारी ‘सुलहेकुल’ या क्या है...वह एक नेता का नारा है. चार चमचे इधर-उधर महफिलें सजा देते हैं. जो अंडरस्टैंडिंग होनी चाहिए, वह कहां है ससुरी? सब बनावटी नौटंकी है. ऊंचे से ऊंचे घर का मुसलमान मेरे घर खुश होकर शीशे के गिलास में पानी पीता था...कभी पीतल के गिलास की कामना नहीं करता था. एक खामोश अंडरस्टैंडिंग थी. वह थी सुलहेकुल...

सामन्ती युग के नैतिक पतन पर आपने खूब-खूब कलम चलायी है. दो जुमले आज की टोपी शाही नैतिकता पर भी!

जुमले क्या, दो रुपये दीजिए तो लाल टोपी पहनकर आपके जुलूस में शामिल हो जाऊं...दूसरा तीन दे तो पीली पहनकर उसके जुलूस में लग जाऊं...ट्रक में 5 रुपये खाना देकर ले चलो तो तीसरे की जिंदाबाद बोलता रहूं. जहनियत यह कर दी है कि भीड़ को भेड़ बना दिया है...तुम हमें मूर्ख बनाओ...हम साथ दें...हमारी चेतना आर्य समाज और गांधी के बाद उठायी ही नहीं गयी. सन् 47 के बाद मूल्य सिर्फ पैसा रह गया...कुतिया के पिल्लों जैसे दनादन मंदिर बनते गये. सिर्फ-प्रदर्शन. भक्ति कहां है? मशहूर तवायफ थी एक नजीर बाई. एक दर्फ नैतिकता के नाम पर मेरे मुंह पर चांटा-सा मार दिया. बोली-‘हमारे आचरण को क्या कहते हो नागरजी? आपके मुहल्ले की लौंडिया यारों को लेकर घंटे भर को हमारा कमरा किराये पर लेने आती है.’

गुस्ताखी माफ, एक महीन-सी बात पूछ रहा हूं! आपने अपनी कृतियों में खूब बलइयां ली हैं...प्यार, यानी इश्क, मंजिल तक की लंबी गर्द में कुछ यादें तो महफूज होंगी ही...

इशारतन इतना समझ लो यार, कि अगर कुछ गुनाह न किये होते तो कोठे वालियों के इंटरव्यू न लिये होते. मगर एक बात पुख्ता समझ लो कि पड़ोस में नजरें नहीं खोलते थे...

और माडर्न रोमांटिसिज्म?

सारी बराबरी का दावा करते हुए भी, औरत आज भी हमारे हाथों की गुड़िया है. सी पुट्स इटसेल्फ लाइक दस बिफोर अस. बंधा समाज टूटा...जमीन साफ हुई...मगर उस जमीन पर बना कुछ नहीं...बिखराव ही अधिक हुआ. औरत भी बिखर गयी, मूल्य भी. यही है तुम्हारा सो कॉल्ड माडर्न रोमांटिसिज्म. या और कुछ है?...

आपकी किताबी ताली सिर्फ इंट्रेन्स (हाई स्कूल) तक रही. फिर भी भाषाओं पर आपका हक कलफदार है. आपसे लेकर पारिजात (पोता) तक शिक्षा के स्तर में जो सरपट गिरावट आयी है, उसका मूल कारण क्या है?

हमें बंधा हुआ समाज मिला, उन्हें बिखरा हुआ. आखिर वह चेतना कहां से आयेगी? तब एक नशा-सा लगता था पढ़ने का, जिससे भाषा मिलती थी, आधार मिलता था. अब वह बात नहीं है. स्तर वगैरह सब किताबी बातें हैं. असल में वह इन्वेस्टीगेशन इंसटिंक्ट नहीं है अब. इस चीज को दुनिया के कोई मास्साब घोलकर नहीं पिता सकते!

कुछ पुराने हमसफर होते हैं जो बूढ़े कदमों तक साथ देते हैं! आपके पुराने संगी-साथी?

हां, हैं! लखनऊ में ज्ञनचंद जैन हैं. पांचवीं क्लास से अब तक साथ निभा रहे हैं...एक बाबू राजकिशोर खरे हैं. गोविंद बिहारी अलबत्ता न रहे. आगरा में डॉ. रामविलास शर्मा हैं. सन् 34 से लंगड़ फंसा है. क्यों चिपके हैं अब तक इन सबसे? इन्क्यूजिटिवनेस ऑव लविंग...खरे तो चलते-फिरते इन्सायक्लोपीडिया हैं. यादों में महफूज हैं मास्साब केसरीनरायण लाल श्रीवास्तव. हिन्दी और अंग्रेजी पढ़ाते थे. नवीं क्लास में विन्सेंट स्मिथ की ‘अकबर’ इस लच्छेदार ढंग से पढ़ायी कि आज तक याद है. अठन्नी महीना हम सबसे लेते थे और किताबें खरीद लेते थे. फिर उन्हीं किताबों का रस पिलाते थे. अब है कोई ऐसा? एक पं. माताप्रसाद शर्मा को नहीं भूल सकता. कोर्स की किताब भी बतर्ज पौराणिक उपाख्यान पढ़ाते थे. कभी नहीं भूल सकता इन्हें के.पी...कभी नहीं!

नौकरी के प्रति सदा आपके मन में विरक्ति रही. क्यों?

पहले तो मन में सुपरमेसी जागी. दादा बैंक में मैनेजर थे. उनके साथ महफिलों में जाता था. फिर पिताजी का दौर देखा...पी.एम.जी. ऑफिस में थे वह. इकलौती औलाद था, सो डॉक्टरी पढ़ाने की हुलास जगी थी. पर मेडिकल कॉलेज उन दिनों कलकत्ता में था, आंखों से ओझल होने देते? पिताजी दफ्तर जाते और कोई पूछता तो भारी मन से कहते-डेढ़ लाख की जेल में छह घंटे की कैद झेलने जा रहा हूं...उनकी यह बात मेरे कच्चे मन पर कांटे जैसी चुभती थी. पिताजी चल बसे तो मामाजी ने ऑल इंडिया यूनाइटेड इंश्योरेंस कंपनी में लगवा दिया. इसके पहले पी.एम.जी. ऑफिस में भर्ती परीक्षा थी. मैं जानबूझकर आगरा खिसक गया कि नौकरी की तख्ती गले में न बांधनी पड़े...इंश्योरेंस के दफ्तर में कुल टोटल 18 दिन रहा. डिस्पेचर का काम. मोहर लगाओ, डायरी पर चढ़ाओ. एक बार बगैर डायरायज किये बड़े साहब के पास भेज दिया, फटकार पड़ी. दूसरी बार तार खोल लिया, तो और सख्त लताड़ हुई. बस, हो गयी नौकरी. अगले दिन साहब के बंगले पर इस्तीफा छोड़कर भाग खड़ा हुआ. अमृतलाल नागर आउट ऑव गवर्नमेंट सर्विस! चल यार, लेखक ही ठीक है.

पुरानी किताबें पलटते हैं तो अपना ही दशकों पहले लिखा हुआ क्या-क्या नक्श छोड़ जाता है?

अपनी पुरानी किताबें पढ़े अर्सा हो गया. मगर हां, आज भी अपनी ही कोई फड़कती हुई लाइन मिल जाती है तो मुंह से ‘वाह’ निकल जाती है. जैसे किसी को अपने ही जवान बेटे का तुतलाता बचपन याद आ जाये. ओरिजनल फ्लैशबैक...जुड़ी हुई सारी यादें, सारे संदर्भ ताजा हो उठते हैं. मजा आता है.

बेटे-बहुएं अपने-अपने ऑफिस में होते हैं और बॉ घर के दस कामों में! आप खाली-खाली! कैसे कटते हैं सन्नाटे के ये क्षण?

भली कही, बच्चा! मैं कभी खाली ही कहां रहता हूं? हर समय कुछ न कुछ पढ़ता रहता हूं. कुछ नहीं होगा तो डाबर की दवाइयों का सूचीपत्र ही पढूंगा. आई एम ऑलवेज इंगेज्ड. सन्नाटे के खाली क्षण क्या होते हैं, आज तक पता ही नहीं लगा पंडित को.

बेटियों के ब्याह में आपने सामर्थ्य भर दिया! साहित्यिक मनोभूमि अलग...यथार्थ का खुरदुरा धरातल अलग! क्या कुछ महसूस किया इस लेन-देन पर?

मुझसे क्या मतलब? शादियां मेरी बीवी ने करायीं. बरसों पहले एक-एक चीज जोड़कर रखती रही दहेज की. मेरी आदर्शवादिता को यह सब पसंद नहीं था. मगर मैं बॉ का दिल नहीं दुखाना चाहता था. कह चुका हूं ना कि उसके मुझ पर बहुत एहसान हैं. बेटे-बेटियां उसके. मैं काहे को छोटी-छोटी खुशियों में आड़े आऊं.

क्या आप अपनी ही किसी कृति को दोबारा लिखने की कामना करते हैं कि कुछ रह गया जो अब जोड़ लूं?

हां! सिर्फ ‘एकदा नैमिष...’ जिस स्प्रिट में मैंने इसे लिखा था वह संदर्भ अपरूटेड हो जाने के कारण पाठक की आधुनिक चेतना में कम आयी. जो बातें ‘नैमिष’ को लेकर मेरे मन में जागी थीं, उनमें नये ढंग से नये पाठक के लिए एनालाइज करके लिखना चाहता हूं. ‘नैमिष’ जैसा कंसेप्शन ऑव यूनिटी मुझे कहीं नहीं मिला...लिखूंगा, कभी जरूर लिखूंगा.

हिंसा का एक जलता हुआ लावा जो आज हर ओर बढ़ रहा है, आपको क्या सोचने पर मजबूर करता है? आपकी कलम चुप क्यों है?

आर्थिक और सामाजिक हीनता...मानव मूल्यों का शून्य हो जाना...पैसे और ईश्वर के बीच युद्ध ठन जाना...यहीं कारण हैं इस हिंसा के. लिखूंगा इस पर भी. एकदम इक्वल और अपोजिट रिएक्शन का मैं कायल नहीं. शेक्सपियर की तरह कलम तोड़कर कोई अलग थोड़ा ही बैठ गया हूं.

समाज का वह कौन-सा वर्ग विशेष है जिसे रोशनाई में ढालने की कामना अभी आपके मन में शेष है?

ढईया छूकर बाम्हन से लेकर मेहतर तक मन भर गया है. सिर्फ एक वर्ग मन कचोटता है-सफरिंग क्लास. मेरे ही मोहल्ले की गली में ऐसा घर है जहां आठ जनों के बीच सिर्फ दो पराठे बनते हैं और उसके आठ टुकड़े होते हैं. लड़कियां एक-एक टुकड़े के लिए चोटियां पकड़कर लड़ती हैं. नैतिक मूल्य कहीं हैं ही नहीं...सिर्फ पेट है. सिर्फ इस पेट और सर्वहारा के ह्रास पर लिखना चाहूंगा, यही वर्ग विशेष मन को बहुत खदबाता है.

जिंदगी में सारी नफासत, नजाकत और शायस्ता पहलू खोते जा रहे हैं. लखनवी अदीब होने के नाते आपने इसे शिद्दत से महसूस किया होगा न?

समाज का बिखराव है यह सब. मगर तुम देखना कि वह लतीफ और शायस्ता पहलू फिर लौटकर आयेंगे. क्यों? इसलिए कि बारह से लेकर पचीस तक की उम्र में गुजरे आदर्श बहुत सूझते हैं. जब लड़कों का विद्रोह ठंडा होगा तो उस लताफत का फिर रेनेसां होगा. जिंदगी का ढर्रा बदलेगा. तुम्हीं कहो यार, कि एक ही दाल कम तक अच्छी लगेगी? कभी तो हींग-जीरे का बघार दोगे. यह बघार ही फाइनर वैल्यूज का रेनेसां होगा.

नागर होने के नाते नागरी का प्यार आपके मन में बड़ी शिद्दत से है! कमरे की वाल-क्लाक का डायल तक हिंदी में है! अंग्रेजी में इनविटेशन कार्ड आये तो जाते ही नहीं. इस परिप्रेक्ष्य में आप उन बुजुर्ग अदीबों को क्या कहेंगे जो हिंदी को बदबूदार गालियां देते हैं?

पहले उन गालियों का कारण ढूंढ़ो के. पी. ये वह बुजुर्ग हैं जिन्होंने रोटी और शोहरत पायी दूसरे माध्यम से. देश आजाद हुआ तो ग्रुपों में बंट गया. ये लोग भी ढह गये. अब अपनी निष्ठा दिखाने के लिए गालियां नहीं देंगे तो क्या आरती उतारेंगे? ये सब परवर्टेड मांइड हैं. इन्सानियत इतनी परवर्टेड हो गयी है कि लोग शो ऑफ के चक्कर में टुच्चेपन पर उतर आये हैं. जबसे दो भाषाओं की सुन रहा हूं, मन लड़खड़ा रहा है. अर्थतंत्र से मनुष्य इतना टूट गया है कि आवाज नहीं उठा सकता. उर्दू को मैं भी मानता हूं, मगर ऑफिशियल लैंग्वेज सिर्फ एक चाहता हूं. उर्दू जैसी मीठी जबान को मारना नहीं चाहता, यार! मगर उसका माहौल बनाओ! भाषाओं का तमाशा अच्छा नहीं लगता.

धुआंधार जासूसी नाविलें पढ़ने का यह शौक. तख्त पर ओमप्रकाश शर्मा गड्डी लगे रखे हैं, क्यों?

आज का नहीं के. पी., इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. पिताजी नक्खास से दो ही चीजें लाते थे-मशीनों के पुराने पुर्जे और सेक्सटन ब्लैक के जासूसी नाविल. वह खाली वक्त में मिस्त्रीगीरी करते थे, मैं सस्पेंस पढ़ता था. जब जरा साइकिक पहलू भी रखो...गंभीर लेखन के बाद हाई टेंशन ऑव मांइड को सन्नाटे में लाना पड़ता है. अपने टेंशन को शून्य करने के लिए ‘रीजन’ से दूर जाना पड़ता है. यह काम जासूसी नावेल मजे में कर सकते हैं. उपन्यास लेखन के दौरान उत्पन्न हुए क्रिटिकल तनाव को यह

धर-पकड़ साहित्य ढीला कर देता है. मजा आता है और रिलेक्स हो लेता हूं...

आपका कमरा पुरातत्व के टुकड़ों और खंडित मूर्तियों से पटा पड़ा है! क्या कभी इन उपलब्धियों को संस्मरण रूप में संजोया आपने?

अभी तक सिर्फ एक लंबा लेख लिखा है. सन् 56 में छपा था. के. पी. 1000 बी.सी. से लेकर 1891 तक का गुम्मा (ईंट) है मेरे पास. पुरातत्व विभाव की बहुत मदद की है. वे आज भी मेरी इस धुन को अक्नॉलिज करते हैं. ‘लक्ष्मण टीला’ की खुदाई से बहुत कुछ मिला है मुझे...वीरवर लक्ष्मणजी ने लखनऊ बसाया, इस पर काफी कुछ कहा है मैंने.

भांग आपकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है, मजबूती भी. क्या कभी ऐसा हुआ है कि लेखन का प्रवाह भाग के अभाव में टूट गया हो?

अव्वल तो भय्यन, भांग का अभाव कभी हुआ ही नहीं. ‘बंदी’ के दिनों में भी मोरारजी मुझ पर हावी नहीं हो पाये. सब भोलेनाथ की कृपा रही. यार लोग अपने बगीचों से खूटकर दे जाते रहे. 1931 में पं. विनोदशंकर व्यास की कृपा से जो बनारस में सिल-बट्टा चला, सो आज भी बदस्तूर है. भांग मुझे लेखन का कच्चा माल देती है. अगली सुबह जो लिखना होता है, उसकी पूरी रूपरेखा भांग रात में बना देती है...होली और शिवरात्री छोड़कर सुबह कभी नहीं छानता. रात में तरंग का ताना-बाना सुबह खुले दिमाग से कागज पर उतार देता हूं. वैसे अब तो डिक्टेट करके लिखाता हूं...चालीस बरस से बमभोले यों ही चला रहे हैं भय्यन!

आज जो कुछ नया लिखा जा रहा है उसका मूल रूप आपकी लेखन धारा से बहुत अलग है. नवलेखन के प्रति आपकी क्या आस्थाएं हैं?

समाज की खोज हो तो रही है, दोस्त...मगर सतही तौर पर. सेक्स की प्राब्लम अधिक उछाली गयी है. थोड़ा अर्थतंत्र भी खंगाला गया है. पर सेक्स के पीछे जो गहराइयां हैं वह नहीं आ पा रही हैं. मुंशी प्रेमचंद ने मुझे ‘यामा, दि पिट’ पढ़ने पर जोर दिया था. अमर कृति है, यार! सेक्स, है पर कितना गहरा! वह गहराई अब बताओ किसी समकालीन कृति में? मैं भला किसी को क्या मंत्र दूंगा? क्या आस्थाएं आकूंगा? हर तरफ तो गुरू लोग हैं. मुझे इन ‘गुरुओं’ से सीखना है. मगर एक बात कहे बगैर नहीं रह सकता. रिपीटीशन बहुत हो रहा है. एक कृति चर्चित हो जाती है तो उसी की पंचशाखाएं लिखी जाने लगती हैं. यह दोहराव-तेहराव मुझे बहुत बोर करता है. बाकी तो सब अपने-अपने युग के अलभ-बरदार और मसीहा हैं ही.

भगवान आपको शतायु करे! सूरदास के बाद अब क्या इरादा है?

शतायु? अमां यार, अब मैं मिसफिट हूं. फेंक आओ राजी-खुशी तुम सब अपने कंधों पर, यही कामना है. अब मन डूबता है. अपने कोटे से ज्यादा काम कर लिया. जो गया तो छोटे-मोटे डेढ़-डेढ़ सौ पन्नों के उपन्यास लिखूंगा, नए मध्यवर्गीय समाज के क्रमिक विकास पर. उसकी भाषा सरल होगी...चटखारेदार होंगे. पुराने ढंग के मुहावरों और कहावतों पर अंदर सोया पड़ा ‘तसनीम लखनवी’ जागेगा. गंभीर काम बहुत हो गया. मगर यह सब अभी लाउड थिंकिंग है. देखो, हो पाता है या नहीं. चल जरा इनकी तमिल फिल्म के एक-दो शॉट देखें!...

गर्म टोपा-शाल उतारकर बाबूजी खादी का तहमद पहने बाहर आते हैं. आंगन में शूटिंग चल रही है! हो हल्ला मच रहा है? ढोलक की थाप पर सोहाग के गीत!...नागरजी आवाज देते हैं ‘बॉऽ ऽ ऽ यार पान खत्म हो गये!...के. पी. की भी जुगाली बंद है!...’

हवेली के दरोदीवार इस तिलिस्मनुमा बूढ़े की बुलंद आवाज कब तक गुंजाए रखेंगे, कोई नहीं जानता. अलबत्ता इस शख्स ने जिंदगी के हर पत्थर को ढोया नहीं, तराशा है!...दरवाजे पर अब भी शहनाई बज रही है. नागरजी की बड़ी बेटी डॉ. अचला नागर के एक ताजा छपे लेख का शीर्षक याद आ जाता है-इत्र में डूब रही हरेक लड़ी सेहरे की...!

(साभारः सारिका, 16 मार्च - 31 मार्च, 1981)

(अगले पृष्ठ पर अमृतलाल नागर की कहानी ‘प्रायश्चित’)

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