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प्राची - मार्च 2016 - स्त्री-फर्श से अर्श : एक विमर्श डॉ. भावना शुक्ल

आलेख

स्त्री-फर्श से अर्श : एक विमर्श

डॉ. भावना शुक्ल

या, ममता और स्नेह की प्रतिमूर्ति तथा शक्ति में चामुंडा रूपी नारी को देश के निर्माण की आधारशिला माना जाता है. नारी का स्थान सदा से ही इस धरा पर आदरणीय-सम्मानीय स्थान रहा है. हमारा धर्म गूंज-गूंजकर उद्घोष कर निर्देश देता है- ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं.

नारी का एक और पक्ष है उसका स्वावलंबी जीवन. प्राचीन काल की बात यदि हम कहें तो नारी को हम ब्रह्मविद्या में पारंगत और युद्ध क्षेत्र में भी कार्यरत पाते हैं. मध्ययुग की ओर ध्यान आकृष्ट करें तो इस युग में महिलाओं को अबला कहकर अधिकारों से वंचित कर दिया.

देखा जाए तो नारी नर से विशिष्ट मनी जाती है- लेखक के कथनानुसार ‘‘क्योंकि वह नर को अपने गर्भ में धारण करती है. नर के जीवन की जननी, उसके जीवन की धात्री, उसके जीवन की पालिका, जीवन पर धरती पर अवतरित होते ही उसकी आरंभिक भावनाओं का प्रथमाधार होने के कारण नारी नर से विशिष्ट है।’’ (1)

नारी की भूमिका हर रूपों में श्रेष्ठ है. वेद पुराणों में लिखा गया है कि नारी के बिना कोई यज्ञ सद्कार्य पूर्ण नहीं हो सकता.

वैदिक युग में पुरुष विद्वान और स्त्रियां विदुषी होती थी जैसे गार्गी, मैत्रेयी आदि. स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे. वे सही मायने में सहधर्मिणी होती थीं. किन्तु मध्ययुग से

आधुनिक काल तक स्थितियों में काफी परिवर्तन हुआ. वर्तमान काल में स्त्री शिक्षा के प्रसार से नई चेतना का संचार हुआ. फलस्वरूप स्त्रियों ने विविध क्षेत्रों में प्रवेश किया- लेखन, पत्रकारिता, नाटक, सिनेमा, पुलिस, सेना, राजनीति, चिकित्सा, औद्योगिक क्षेत्र आदि इत्यादि. नारी इन विविध क्षेत्रों में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है. महिलाओं में मानांशीलता, कर्तव्यपरायणता, अथक परिश्रम व लगन, सतत जागरूक दृष्टि व वचनबद्धता के बल पर देश के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है.

स्त्री पक्ष को लेकर यह बात साफ तौर पर देखी गई है कि उसका कर्ता पुरुष ही रहा है इसलिए उसके लिए न्याय और सजाओं का विधान भी पुरुष वर्चस्व के हाथ रहा है.

नारी का पद मां, बहन, बेटी, भार्या के रूप में प्रतिष्ठित है जो साक्षात रूप मई ममता, स्नेह, प्रेरणा का रूप लेकर हमेशा दुनिया में बनी रही है.

हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श कई रंगों में उपस्थित है- ‘कहीं प्रत्यक्ष कहीं परोक्ष, कहीं आड़ा, कहीं तिरछा. पुरुष स्त्री वादियों की भी अपनी अलग कोटि है. ‘पर स्त्रियों का एक अनुभूति मण्डल होता है (बलात्कार यौन शोषण, घर का न घाट का होने की स्थिति, भावहीन यांत्रिक संभोग, गर्भधारण, दूध पिलाना, अंतहीन घरेलू कैद आदि) पुरुष लेखक जिसकी सूक्ष्म तरंगें (गहनतम परकाया के बावजूद) पूरी तो नहीं पकड़ सकते जो पुरुष झेलते हैं- बतौर एक नागरिक अबकी स्त्रियां भी झेलती ही हैं- सड़क का यथार्थ- इसके अलावा यह सब.

स्त्री-विमर्श से जुड़ी हर स्त्री मुख्यतः एक ऐक्टिविस्ट ही है क्योंकि समस्याएं मिल बांटने का सहज घरेलू तरीका ही आज अंतरराष्ट्रीय विस्तार पा गया है. एक सखी तत्व हर स्त्री में नैसर्गिक होता है- विमर्श बस इसे धार ही देता है. एक स्त्री दूसरी की नैसर्गिक सखी तो होती ही है, सब परितप्त जनों और प्रकृति तक की अनन्य सखा भी वह होती है. ‘चिपको आंदोलन इसका भास्वर प्रमाण है. छठें दशक में लिबरल फेमिनिस्टों परमाण्विक शस्त्र विरोध और अबके स्त्रीवाद का युद्ध और दंगा-विरोध भी इसी के प्रमाण हैं. (2)

कहा जाता है कि स्त्री जितनी सुशिक्षित, गृहविज्ञान में कुशल और कार्य में दक्ष होगी वह उतनी ही कुशलता के साथ आंतरिक भाग का संचालन कर सकेगी. इस कारण स्त्री शिक्षा पर जोर दिया गया. स्त्री जाति की सत्ता को समझाया गया. गत शताब्दी ‘महिला जागरण’ की रही. 8 मार्च विश्व महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है. राजा राममोहन राय ने 1818 में सती प्रथा का

विरोध किया और उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप 1829 में लार्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया. बाल-विवाह, विधवा विवाह, बहू पत्नी प्रथा के विरुद्ध लडते हुये राजा राममोहन राय स्त्री के पक्षधर नजर आते हैं. स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी स्त्री शिक्षा पर जोर दिया. इस प्रकार अमेरिका से शुरू हुआ यह आंदोलन भारत में स्त्री जाति की चेतना का स्वर बन गया.

साहित्य में स्त्री-विमर्श के अंतर्गत स्त्री द्वारा लिखा गया और स्त्री के विषय में लिखा गया साहित्य ‘साहित्यिक स्त्री-विमर्श’ माना जाता है तथा इसके मूल में अनुभव की प्रामाणिकता का तर्क दिया जाता है. स्त्री विमर्श के संबंध में यह विवाद का विषय रहा कि यह स्त्री के लिए सुरक्षित क्षेत्र है या लेखक होने के नाते पुरुष की भागीदारी की संभावना भी कहां बनती है. इस मत को लेकर

विरोधाभास की स्थिति है. महादेवी वर्मा ने ‘स्त्री प्रश्न’ को पुरुष के लिए नारी चित्रण अधिक आदर्श बन सकता है, परंतु अधिक सत्य नहीं. पुरुष के लिए नारी तत्व अनुमान है और नारी के लिए अनुभव; अतः अपने जीवन का जैसा सजीव चित्र वह हमें दे सकेंगी, वैसा पुरुष बहुत साधना के उपरांत भी शायद ही दे

सके. (3)

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह कहना उचित होगा कि आज की नारी अपनी परम्पराओं से हटकर जीवन जी रही है. उस पर पूरी तरह से पाश्चात्य संस्कृति का रंग चढ चुका है. नारी जिसे ममता, स्नेह की मूर्ति की संज्ञा दी गई है, वह आजकल लुप्त होती नजर आ रही है. इस संदर्भ में कहा गया है कि-

वर्तमान समाज में नैतिकता के मापदंड बेहद लचर हो गये हैं. नारी में भी नैतिकता का भारतीय परंपरागत भाव तिरोहित हो रहा हैं. समय और स्थान के अनुरूप मान्यताओं में शीर्षासन होता रहा है, लेकिन प्रदर्शन एवं विज्ञापन की होड़ में, वर्तमान नारी स्वयं चीरहरण में लगी है. सात्विक रुचि और कलात्मक उदारीकरण बयान में बहा है. संबंधों के बीच से प्रेम और स्नेह गायब हो रहा है. और नारी भी आत्मकेंद्रित हो रही है. भजन की स्वर लहरी पॉप-संगीत व रिमिक्स में बदल रही हैं और इसी के अनुरूप बदल रहा है नारी का मूलभाव.

हमारे दौर का यह हादसा भी क्या कम है

कि लोग जुगनू उठा लाये हैं, हवन के लिए. (4)

हमारे समाज पर इन सबका प्रभाव गलत पड़ रहा है. नारी को भोग्या समझा जाता है. नारी सिर्फ बातों में ही पूज्या हैं. आए दिन हम अखबार में नजर डालें तो पायेंगे कि बलात्कार की खबर स्थायी खबर बनकर रह गई हैं. चाहे खेत में, खलिहान में, गांव में, बगीचे में, संडास में, सड़क पर, थाने में, दफ्तर में, स्कूल में, रेल में, हवाई जहाज में, बस में, जवान हो या बुढ़िया या नन्हीं सी गुड़िया उम्र को नजर अंदाज करके सैकड़ों जिंदगानियां बरबाद हो रही हैं. स्त्री की दशा पर रहम आता है. इस संदर्भ में लेखिका ने कहा है कि-

अवाक् और गमगीन हैं हम उन बलात्कृत लड़कियों को देखकर, जिनका दर्द हमारी महिला नेताओं को उद्धेलित नहीं करता, उनके भीतर बेचैनी-बेकली सुन्न हो गई हैं, क्योंकि सिंहासन पर विराजमान राजसी ठाठ के आलोक में चकाचौंध से घिर गई हैं, कि कुछ दिखाई नहीं देता. कहते हैं आनंदलोक ऐसा ही लोक होता है, जहां संकट नहीं व्यापते जहां दुख और शोक नहीं फटकते, जहां अभावों की परछाई तक नहीं होती. हमारे नेता संभवतः उसी में लिप्त हैं.

कहा जाता है आज नारी को समान अधिकार प्राप्त हैं फिर भी वह दहेज की खातिर ईंधन की भांति क्यों जलाई जाती है. प्रत्येक कदम पर वह बहिष्कृत/तिरस्कृत होती है.

प्रख्यात साहित्यकार अमृता प्रीतम के शब्दों में-

‘‘मैं नहीं जानती कि यह सभ्यता का युग है- सभ्यता का युग तब आयेगा, जब औरत की मर्जी के बिना उसका नाम भी होंठों पर नहीं आयेगा, अभी तो बहुत से आशिक भी डंडे के जोर पर बनते हैं.’’ (6)

स्त्री विमर्श की चर्चा के दौरान अब दलित स्त्री विमर्श की भी बात कर ली जाए. दलित स्त्री विमर्श को केंद्र में लाने का श्रेय राजेंद्र यादव को है. दलित लेखन की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई, क्योंकि सामान्य लेखन ने दलित लेखन की पूरी उपेक्षा की. उसी प्रकार दलित स्त्री लेखन की उत्पत्ति होनी आवश्यक थी क्योंकि स्त्री लेखन में दलित स्त्री का हित विलोपित था. सामान्य तौर पर माना जाता है कि स्त्री लेखन में विमर्श भी है जो चौतरफा संघर्ष करता है- सवर्ण समाज, परिवार, दलित पुरुष एवं सामान्य स्त्री-विमर्श आदि. लेकिन सामान्य स्त्री-विमर्श ने इस विमर्श को लेकर या तो चुप्पी साध ली या विमर्श मानने से इंकार कर दिया. इस कारण विमर्श और उग्र होता गया. हिन्दी भाषा में कई लेखिकायें इस विमर्श हेतु अपनी लेखनी से समाज को अवगत करा रही हैं. लेखनी की उग्रता ने प्राकृतिक नियमों तक को चुनौती दे डाली, कुंठायें भी कहा जा सकता है. जहां एक ओर सामान्य स्त्री-विमर्श में तस्लीमा नसरीन जैसी महिलाएं अपने समाज की कुरीति/पाखंड से लोगों को अवगत करा रहीं हैं,वहीं दलित स्त्री लेखन भी अपना बजूद बनाने हेतु प्रयासरत है. (7)

आधुनिक नारी अपने स्वाभिमान की रक्षा करना जानती है, उसे अपनी सत्ता का पूर्ण भान हैं. नारी जिजीविषा के चलते वर्तमान सामाजिक संदर्भ में उसका अबला रूप निश्चित ही बदल चुका है, नारी सबल हो रही है, ऊर्जावान है. आज समाज में प्रजातांत्रिक दृष्टि है जिसकी आज आवश्यकता है. स्त्री सृष्टि की उसी अनंत परंपरा की प्रतिमा है जो प्रकृति की समस्त प्रेरणा और गतिशीलता सौंदर्य और मोहकता लिए हुए हमारे जीवन के इस रंगमंच पर विभिन्न रूपों में अभिनय करती है वह मनमोहनी है, प्रेयसी है, वह प्रेरणा है, वह जगत जननी है, वह हमारे हृदय की भावना भी है तथा उसका मन कोमल भावनाओं, कामनाओं, कल्पनाओं तथा अनुभूतिओं की अक्षय निधि है.

 

संदर्भ सूचीः- (पुस्तक/लेख)

1. स्त्री-विमर्श - कालजयी इतिहास, लेख- स्त्री-विमर्श समकालीन पुरुष लेखकों के विचार- पृष्ठ 179, लेखक- कमलापति शास्त्री

2. स्त्री-विमर्श का लोक पक्ष, पृष्ठ-41, लेखिका- अनामिका

3. स्त्री-विमर्श और हिन्दी लेखन-Web side&streevimarshblogspotoin/2011/5/blog&post-html& लेखिका-श्रीमती धर्मा यादव

3. नारी-विमर्श&w-w-w-swatantrwza-com/2nari&vimarshhtml-लेखिका उषा त्यागी

5. आवाज-पृष्ठ-91, लेखिका- मैत्रेयी पुष्पा

6. नारी-विमर्श- w-w-w-swatantrwza-com/2nari&vimarshhtml-लेखिका- उषा त्यागी

7. दलित साहित्य में स्त्री-विमर्श-w-w-w-deshbandhu-co-in/blogdetail/sanjeevkhud¢hÈ

सम्पर्कः डब्ल्यू जेड-21, हरीसिंह पार्क, मुल्तान नगर,

नई दिल्ली-110056

(मो।)9278720311

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