शनिवार, 5 मार्च 2016

प्राची - जनवरी 2016 - लघुकथाएँ

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कर्मफल

राजेश माहेश्वरी

एक शहर से लगी हुयी पहाड़ियों पर एक पुजारी जी रहते थे. एक दिन उन्हें विचार आया कि पहाड़ी से गिरे हुये पत्थरों को धार्मिक स्थल का रूप दे दिया जाय. इसे कार्यरूप में परिणित करने के लिए उन्होंने एक पत्थर को तराशकर मूर्ति का रूप दे दिया और आसपास के गांव में मूर्ति के स्वयं प्रकट होने का प्रचार प्रसार करवा दिया.

इससे ग्रामीण श्रद्धालु लोग वहां पर दर्शन करने आने लगे. इस प्रकार बातों बातों में ही इसकी चर्चा शहर भर में हेाने लगी कि एक धार्मिक स्थान का उद्गम हुआ है. इस प्रकार मंदिर में दर्शन के लिये लोगों की भीड़ लगने लगी. वे वहां पर मन्नतें मांगने लगे. श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ायी गयी धनराशि से पुजारी जी की तिजोरी भरने लगी और उनके कठिनाइयों के दिन समाप्त हो गये. मंदिर में लगने वाली भीड़ से आकर्षित होकर नेतागण भी वहां पहुंचने लगे और क्षेत्र के विकास का सपना दिखाकर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास करने लगे.

कुछ वर्षों बाद पुजारी जी अचानक बीमार पड़ गये. जांच के उपरांत पता चला कि वे कैंसर जैसे घातक रोग की अंतिम अवस्था में हैं. यह जानकर वे फूट-फूटकर रोने लगे और भगवान को उलाहना देने लगे कि हे प्रभु मुझे इतना कठोर दंड क्यों दिया जा रहा है. मैंने तो जीवन भर आपकी सेवा की है.

उनका जीवन बड़ी पीड़ादायक स्थिति में बीत रहा था. मृत्यु-शैया पर लेटे-लेटे वह अपने जीवन का लेखा-जोखा कर रहे थे. इन्हीं क्षणों में उन्हें याद आया कि अपने जीवन में उन्होंने कैसे-कैसे बुरे कर्म किए हैं-

एक बालक भूखा प्यासा मंदिर की शरण में आया था और अपने उदरपूर्ति के लिये विनयपूर्वक दो रोटी की मांग कर रहा था. परंतु उन्होंने उसकी एक ना सुनी और उसे दुत्कार कर भगा दिया. एक दिन एक वृद्ध बारिश में भीगता हुआ मंदिर में आश्रय पाने के लिये आया. उसे मंदिर बंद है, कहकर बाहर कर दिया. गांव के कुछ विद्यार्थीगण अपनी शाला के निर्माण के लिये दान हेतु आये थे, उन्हें शासकीय योजनाओं का लाभ लेने का सुझाव देकर विदा कर दिया. मंदिर में प्रतिदिन जो दान आता था उसे जनहित में खर्च ना करके अपनी तिजोरी में भरते रहे. एक विधवा के अकेलेपन का फायदा उठाकर उसे अपनी इच्छापूर्ति का साधन बनाकर उसका शोषण किया और बदनामी का भय दिखाकर उसे चुप रहने पर मजबूर किया.

इतने दुष्कर्मों के बाद भगवान को उलाहना देने का उन्हें क्या

अधिकार है? उनके कर्म कभी भी धर्म प्रधान नहीं रहे. जीवन में हर व्यक्ति को अपने कर्मां का फल भोगना पड़ता है. उनको भी भोगना पड़ेगा.

पुजारी जी की को अचानक ज्ञान प्राप्त हुआ था. पश्चाताप से उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी.

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संपर्कः 106, नया गांव, रामपुर, जबलपुर (म.प्र.)

मोः 94251-52345

 

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पिताजी यहां नहीं मरेंगे

कुंवर प्रेमिल

‘पिताजी यहां नहीं मरेंगे, चाहे जो हो.’ पत्नी जोर-जोर से चीख-चीखकर पूरा घर सिर पर उठा रही थी.

पति घबराकर बोला, ‘यह क्या कह रही हो, भाग्यवान!’ पिताजी सुनेंगे तो अपना सिर धुन लेंगे.’

‘पिताजी क्या सिर धुनेंगे, सिर तो हम लोग धुनेंगे. देखते नहीं हो, पिताजी सुबह से ही बेहोश हैं. चला-चली की बेला में हैं. इन्हें कहीं भी ले जाओ...पर उन्हें यहां नहीं मरने देना है, कुछ समझे?’

‘बड़े भैया के यहां से एक महीना रहकर कल ही तो आए हैं वह...अब यहां से कहां ले जाऊं मैं उन्हें.’

‘मैं कुछ नहीं जानती बस...पिताजी यहां किसी तरह भी नहीं मर सकेंगे...हमने बड़ी मुश्किलों से यह नया घर बनवाया है. अशुभ हो जाएगा, अशुभ.’

इतना हो-हल्ला सुनकर एक पड़ोसन दौड़ी यली आई. बस माजरा समझकर वह पत्नी के कान में बोली- ‘मूर्खा हो क्या? पिताजी के नये घर में मर जाने से शुभ होगा या अशुभ?’

पत्नी उलट-फेर में पड़ गई. उसने अपना स्वर नीचे करते हुए पति से कहा- ‘अरे नहीं-नहीं, मर जाने दो पिताजी को. आखिर वह तुम्हारे पिता हैं. ऐसी हालत में कहां जाएंगे भला? और लोग क्या कहेंगे आखिर-आखिर?’

पति खिसियाकर बोला- ‘सही कहा है, औरतों को देवता भी नहीं समझ पाए. हम तो आदमी हैं बेचारे. पल में तोला पल में माशा, तुमने अभी खड़ा कर दिया था न तमाशा?’

अंततोगत्वा पिताजी गुजर गए. नया घर शुभ हो गया. घर की अला-बला पिताजी साथ ले गए, ऐसा मानकर सभी खुश हो गए.

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सम्पर्कः एम.आई.जी.-8, विजय नगर, जबलपुर-2

मोः 9301822782

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