शनिवार, 5 मार्च 2016

प्राची - जनवरी 2016 - मुग्धा / लघुकथा / डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव

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मुग्धा

डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव

त्रिवेणी परिषद् की गोष्ठी के लिए घर से निकली थी. घरेलू हिंसा पर परिचर्चा थी. रनिंग ऑटो को हाथ देकर रोका. अन्दर कुछेक सवारियों के साथ एक खाई-पी सी महिला कस्बाई संस्कृति का परचम लहराती बैठी थीं. सहज मुस्कान के साथ उसने थोड़ा सरक कर मेरे लिये जगह बना दी.

अगले पड़ाव पर बाकी सवारियां एक साथ उतर गईं और एक दम्पति चढ़ने लगे. यही कोई 60-65 के आयु वर्ग का जोड़ा. उनके चेहरों के अनायास खिलते रंग को देखकर लगा कि विराजमान महिला उनकी चिर-परिचिता थी. पुरुष श्रेष्ठतर जीव है, इस बात की मूक घोषणा करते हुए पति अधिकारपूर्वक गद्दी वाली सीट पर बैठा और स्त्री मात्र अनुगामिनी है, निम्नतर श्रेणी की है, इसकी मौन स्वीकृति देती हुई स्त्री सामने वाली लोहे की छड़ों पर बैठ गई.

पुरुष के इस व्यवहार ने उसको ऊपर से नीचे तक परखने के लिए मुझे विवश कर दिया. उसके पहनावे और सुगठित शरीर को देखकर लगा कि वह किसी फैक्ट्री में मिस्त्री जैसे श्रमजीवी की भूमिका में रहा था. उसे दुबारा देखने की इच्छा नहीं हुई, किन्तु स्त्री के चेहरे पर जो लुभावनापन था, उसमें आंखें बंध-सी गईं. लगा, अंतस्तल की गहराई तक कोई संतोष, कोई आनन्द समाया बैठा है, जिसका प्रत्यालोक उस सरल, निश्छल मुख पर अनवरत पड़ रहा है.

पति पूछने लगा, ‘‘घर की चाबी किसे दे आई हो?’’ पत्नी ने जैसे सुना ही नहीं. दो एक और पूछा...फिर इतनी जोर से आवाज निकाली कि जैसे पत्नी वज्रबधिर हो. इस बार पत्नी ने सुन लिया और बड़ी शान्ति से किसी का नाम बतला दिया. साथ बैठी महिला ने उसे झकझोर कर पूछा कि आदमी इतनी देर से बोल रहा था, जवाब क्यों नहीं दे रही थी? वह खिलखिला कर हंस पड़ी- ‘‘अरे, मुझे सुनाई दे, तब न बोलूंगी.’’ महिला ने भी अपना स्वर ऊंचा करते हुए फिर पूछा- ‘‘तो क्या कोई चिल्लाकर बोलेगा, तभी सुन पाओगी?’’ वह बोली- ‘‘हां न! कान खराब हो गए हैं मेरे.’’ फिर स्नेह-भरी तिरछी नजर से पति की ओर देखकर बोली- ‘‘इन्होंने ही तो मार-मार कर कान फोड़ डाले.’’

फिर अपने पति के पौरुष पर गर्व करती हुई बखानने लगी- ‘‘बाई, जरा-जरा सी बात पर गुस्सा आता है इन्हें तो. ताव चढ़ा नहीं कि दिये हमारी कनपटी पर दो-चार. कितनी बार कान से खून की धार बही है. एक बार तो जब बाल पकड़कर दीवाल से हमारा सिर दे मारा था, तो लटकन ही भीतर घुस गया था.’’ कहते हुए उसने कुछ लजाकर, कुछ इतराकर, कुछ शिकायत-भरी मनोहारी दृष्टि पति पर डालते हुए कान के पीछे के घाव ऐसे दिखलाये, जैसे कोई रीतकालीन नायिका दन्तक्षत या नखक्षत का प्रदर्शन कर रही हो. फिर उसने नेत्रों में चंचलता भरकर अपनी तत्पर शरारती बुद्धिमता भी जता दी. नाक की ओर दिखाकर हाथ से इशारा किया कि देखा, इसीलिए तो हमने नाक की ठुली पहले ही निकाल दी.

सामने वाली महिला दयार्द्र होकर अवाक् हो चुकी थी और मैं सोच रही थी- वाह री! मुग्धा नायिका! वाह री, समर्पण की पराकाष्ठा! तो इसी का संतोष और आनन्द तुम हृदय में छुपाये हो. पर अरी मूर्ख औरत! तुम्हारे जैसी औरतें ही मर्दों को ज्यादती करने के लिए उकसाती हैं. तुमने ही पुरुष को दम्भी, अत्याचारी, बलात्कारी और निरंकुश बना दिया है. अपनी सर्वहारा स्थिति की जिम्मेदार तुम स्वयं हो. तुमने कितनी सहजता से अपने ऊपर हो रही प्रताड़ना को एक सामान्य सामाजिक व्यवहार मान लिया और कभी विरोध नहीं किया?

फिर खयाल आया कि करती भी क्यों? वह ऐसे ही समाज में पली-बढ़ी थी, जहां अपने पिता, मामा, भाई, ससुर का ऐसा ही रूप देखा होगा.

रह-रहकर आक्रोश बढ़ रहा था. आज के वक्तव्य के लिये रटे गये वाक्य रह-रहकर कण्ठ तक उछल रहे थे. कुछ कहना शुरू करती कि तभी उसका स्वर फिर सुनाई दिया, जिसमें किसी वेदना की टीस भी थी और अपनी असहाय स्थिति पर ग्लानि भी- ‘‘अब क्या बताऊं बाई, ये जब से रिटायर हुए हैं, संगी-साथी सब छूट गये. लड़कों-बच्चों को इनका गुस्सा बर्दाश्त नहीं होता. अलग घर बसा लिये हैं. अब ये हमीं से बोलते-बतियाते, तो हमारे कान भगवान ने ले लिये. अब हम कुछ काम के ही नहीं रहे.’’

वह एक हाथ से ऑटो की छत पकड़े हुए थी. आत्मविस्मृत होते हुये, किसी अपराध-बोध के साथ उसने दूसरे हाथ में आंचल समेट कर अपने मुंह पर रख लिया. उसका पति उसकी इस व्यथा-कथा की ओर से आंखे मूंदे सीट में धंसा था. मैं हत्बुद्धि थी कि हे प्रभु! कैसी सहनशक्ति और कैसी मन की गति देकर तूने नारी को बनाया है!

मेरा गन्तव्य आ गया था. कुछ नहीं कह पाई मैं उस

मुग्धा पतिपरायणा से! बस, उसके घुटने पर हल्के दबाव के साथ अपना हाथ क्षण भर को रखा और ऑटो से उतर गई.

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