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प्राची - मार्च 2016 - भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजा / डॉ. विद्या विंदु सिंह

संस्कृति

भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजा

डॉ. विद्या विंदु सिंह

संस्कृत साहित्य से लेकर आज तक प्रकृति का चित्रण अनेक रूपों में होता रहा है. प्रधानतया प्रकृति-चित्रण के निम्नलिखित रूप उपलब्ध होते हैं- आलम्बन रूप, उद्दीपन रूप, मानवीकृत रूप, आलंकारिक रूप, भीषण तथा कोमल रूप, मधुर रूप, दार्शनिक रूप, नारी रूप, परिगणात्मक रूप एवं शांत रूप.

लोकगीतों में प्रकृति के इन समस्त रूपों की झांकी है. लोककवि ने प्रकृति के उपकरणों को अपने पारिवारिक संबंधों तथ चित्र-मानव के रूप में भी ग्रहण किया. आकाश को पिता, धरती को मां कहकर सम्मान दिया है. वायु और बदली उसके संदेशवाहक बने हैं तथा सूर्य-चंद्रमा प्रिय संबंधी.

इसी प्रकार काव्य में षड़्ऋतु वर्णन और लोककाव्य में बारहमासा वर्णन भी मानव और प्रकृति के चिर-पुरातन एवं अन्यतम संबंध का परिचायक है.

लोकगीतों में काल-विवेचन भी मिलता है. कभी उषा, प्रातः, दिवस, मध्याह्न, संध्या और रात्रि आलंबन रूप में चित्रित हुए हैं तो कभी अलंकार रूप में.

आदिम युग से ही मनुष्य ने प्रकृति को पहले आश्चर्य से देखा, उससे भयभीत हुआ फिर उसकी कृपा पाकर उसके प्रति श्रद्धा से नत हुआ और उसकी तरह-तरह से पूजा करने लगा. प्रकृति के प्रति अनेक तरह के लोक विश्वास उसके मन में स्थान पाते रहे. प्रकृति पूजा की अनेकानेक विधियां प्रचलित हुईं. उसकी प्रशंसा में गीत रचे गये, कहानियां बनी और प्रार्थनाएं प्रारंभ हुईं. वैदिक युग में प्रकृति पूजा के मंत्र रचे गये.

प्रकृति निरंतर परिवर्तनशील रही उसकी इस परिवर्तनशीलता में नित नूतन सौंदर्य मनुष्य ने देखा और विभोर होकर प्रकृति के विभिन्न रूपों की स्तुतियां लिखीं गयीं और इस प्रकार प्रकृति पूजा प्रारंभ हुई.

प्रकृति ने ही उदर पोषण किया, तन ढकने के लिए सामग्री दी. शीत, ताप और वर्षा से बचने के लिए शरण दी और अपने उपकरणों से आश्रय बनाने, नीड़ बनाने की सीख दी. मनुष्य निरंतर उसकी कृपा से अभिभूत होता रहा. वह बीमार हुआ तो प्रकृति की जड़ी-बूटियों ने, पानी-पवन ने उसका कष्ट दूर किया. उसके उल्लास में उसे लगा कि प्रकृति भी उल्लसित है और अपने दुख के क्षणों में प्रकृति से लिपटकर रोते हुए वह अनुभव करता रहा कि प्रकृति उसके दुख से दुखी हो रही है.इस प्रकार प्रकृति की प्रशंसा में जो कुछ कहा गया वह लोक साहित्य बन गया. जो कुछ रंग-रेखाओं के माध्यम से व्यक्त हुआ वह लोक कलाएं बन गयीं. और यह परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती हुई आज भी हमारे बीच मौजूद है. इनमें आदिम इतिहास से लेकर आज के यथार्थ चित्र हैं और भविष्य की अनंत संभावनाएं भी हैं.

डॉ. रघुवंश ने मानवीय चेतना में निहित सौंदर्य और प्रकृति की रमणीयता के प्रतिबिंब भाव की व्याख्या करते हुए कहा है कि-

‘‘हमारी चेतना तथा हमारे प्राणों से सचेतन और सप्राण प्रकृति हमारी भावनाओं में निबद्ध होकर सुंदर लगती है. यह मानसिक अनुकरण का प्रकृति पर प्रतिबिंब भाव ही है, जो स्वयं को सुंदर लगने लगता है.’’

(डॉ. रघुवंश- ‘प्रकृति और काव्य’ पृ.-59)

काव्य का मूल हेतु सौंदर्य को पुनर्सृजन की इच्छा है. प्रकृति में सुंदरम् तत्व प्रभूत मात्रा में उपलब्ध होता है. कवि शब्द-शिल्प के माध्यम से प्रकृति के सौंदर्य को रूपायित करता है. ‘‘प्रकृति के माध्यम से मानव समाज ने जितना ज्ञान और जितनी शिक्षा हासिल की है, उसकी तो कोई सीमा ही नहीं है. उसका तो कहीं विराम ही नहीं है.’’

(विजयदान देथा- ‘साहित्य और समाज’, पृ.-39)

प्रकृति और मानव प्रकृति का सहजात संबंध सृष्टि के प्रारंभिक काल से ही रहा है. वन, पर्वत, सरोवर, निर्झर, सरिता-सागर, पशु-पक्षी, पृथ्वी-आकाश, ग्रह-नक्षत्र, वायु-अग्नि, रत्न-धातु, जीव-जंतु, औषधि-वनस्पतियां आदि प्राकृतिक वस्तुएं मानवीय चेतना को प्रभावित करते आये हैं. प्रकृति के सौंदर्य से अनुराग, आकर्षण एवं प्रेरणा उसे प्राप्त होती रही. हमारी जिज्ञासा वृत्ति ने प्रकृति के रहस्य के प्रति एक और अनेक दर्शनों का सूत्रपात किया, तो दूसरी ओर काव्य में रहस्यवाद, सर्वात्मवाद आदि आध्यात्मिक विधाओं का भी सृजन किया है.

‘‘काव्य का अनुशीलन करने वाले मात्र जानते हैं कि काव्य-सृष्टि सजीव सृष्टि तक ही बद्ध नहीं रहती, वह प्रकृति के उस भाग तक जाती है, जो निर्जीव सा जड़ कहलाता है.’’

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल- ‘चिंतामणि’, पृ.-154)

कहाकवि कालिदास की शकुंतला प्रत्येक पुष्प के प्रसव पर उत्सव मनाती है.

‘‘कुसुम प्रसूति समये यस्था भवत्युत्सवः.’’

(महाकवि कालिदास- ‘अभिज्ञान शाकंतलम्’’ 4/9)

मानव के लिए सदा से प्रकृति अनुभूत्यात्मक व्यंजना रही है. प्रकृति में अपनी आत्मा की झांकी देखकर मानव पुलकित होता रहता है. ‘‘मानव और प्रकृति को हम अलग-अलग रूपों में नहीं देख सकते. दोनों में से प्रत्येक एक-दूसरे का पूरक हैं. जन्म-काल से ही मानव प्रकृति की गोद में पलता और बड़ा होता है. आरम्भ में प्रकृति मानव की सहज वृत्तियों का

समाधान करती है, और अव्यक्त रूप में मानव का उसके साथ संबंध स्थापित हो जाता है.’’

(डॉ. किरण कुमारी गुप्ता-

‘हिन्दी काव्य में प्रकृति चित्रण’ पृ.-15)

‘‘इस प्रकार उसकी भावनाओं का उन्नयन और परिष्कार भी होता है. मनुष्य अहं-भाव के संकुचित क्षेत्र से ऊपर उठकर पर प्रत्यय की अवस्था तक पहुंचता है. यह प्रकृति के अनुराग से अनुरंजित होकर आत्म-विभोर हो उठता है.’’ (वही, पृ.-14)

प्रकृति का दार्शनिक रूप भी चिन्तन का विषय रहा है. ‘‘भारतीय दृष्टिकोण से मनुष्य की व्यापक विराट-चेतना का एक अंश मात्र है. और यह विराट चेतना भौतिक जगत् में प्रकृति के जड़ और चेतन पदार्थों में देखी जा सकती है.’’

(डॉ. चिंतामणि उपाध्याय- ‘लोकायन’ पृ.-38)

लोक साहित्य हमारे आधुनिक जीवन के छंद के साथ भी मेल रखता है. क्योंकि वह सतत् परीक्षा करने के लिए एक संवेदनात्मक उपाय सिखलाता है. यह उपाय उसे प्रकृति से जुड़कर मिलता है.

हर युग में लोक साहित्य ने लोक मानस का संस्कार किया है, उसे संघर्षों से जूझने की शक्ति दी है और विजयी होने पर जयगान किया है. उसके इस संघर्ष में प्रकृति साझीदार भी रही है और साक्षी भी.

प्रकृति अपने समूचेपन में मनुष्य के साथ जुड़ी है. समस्त अनुष्ठानों में प्रकृति की संपूर्णता को इसीलिए असपाहित किया जाता है कि वह अनुष्ठान एक विराट अनुष्ठान हो जिसमें सबकी साझेदारी हो. प्रकृति और मनुष्य में गति की जो समानांतरता है, उसे भारतीय लोक-साहित्य उद्घाटित करता है.

हमें यदि मानव परिवेश में सहानुभूति, करुणा आदि मानवीय गुणों को प्राप्त करना है तो लोक साहित्य से जुड़ना होगा. लोक साहित्य की शिवानुभूति प्रकृति से जुड़ने के कारण हैं. लोक साहित्य में अभिव्याप्त प्रकृति से जुड़ना होगा, उससे जुड़कर ही मानव परिवेश मनुष्य के लिए अनुकूल परिस्थितियां दे सकता है.

प्रकृति के नाना रंगों से मानव जीवन रंग पाता रहा है. प्रकृति मनुष्य के सहभाव की सृष्टि देती है. संस्कारों के अवसर पर अनुष्ठानों के लिए आवश्यक सामग्री प्रकृति से प्राप्त होती है जो गरीब अमीर सबके लिए एक सी अनिवार्य और सुलभ होती है.

संस्कारों के अवसर पर सद्भाव के प्रति मंगलमय अप्रतिहत विश्वास का भाव, मंगल की अवधारणा, सबमें प्रकृति का समावेश है. घर धन, जौ से भरा हो, गोरस से भरा हो, चिड़ियां चहक रही हों, यही कामना लोक गीतों में बार-बार कही गयी है. यह भरे-पूरे मन की कामना केवल भौतिक नहीं, मन के भरे रहने की भी है. आशीर्वाद भी दिया जाता है तो प्रकृति की तरह भरे पूरे रहने के लिए.

अन्याय के विरुद्ध स्वर उठता है तो वह भी किसी व्यक्ति या प्रकृति किसी के प्रति भी अन्याय हो रहा हो तो उसके

विरोध में होता है. अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाले की सहायता भी प्रकृति करती है. अन्याय का विरोध करने वाले की विजय निश्चित रूप से होती है. इससे स्पष्ट है कि प्रकृति केवल मंगल का विश्वास नहीं देती, संघर्ष में साथ देकर मंगल के अभ्युदय का अवसर भी देती है.

मनुष्य की सहायता के लिए प्रकृति के मुखर दूत भी हैं जैसे पक्षी, भवन, नदी, बादल आदि और मौन दूत भी हैं जैसे

धरती, वृक्ष आदि.

यहां पंचतत्व ‘‘क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर’’ किस तरह मानव के जीवन में अभिव्याप्त हैं, उसकी संक्षिप्त विवेचना लोक साहित्य के माध्यम से की गई है. तुषारापात, तूफान, अतिवृष्टि आदि को भी लोककवि भूला नहीं है. लोकगीतों में प्राकृतिक जलाशयों तथा वन, बाग-बगीचे एवं फुलवारी व वृक्षों आदि की छटा भी दर्शनीय है. पशु-पक्षी, जीव-जंतु सभी अपने स्वभावानुसार उपस्थित हैं.

प्रकृति चित्रण के विभिन्न रूप आलम्बन रूप में मिलते हैं. जब प्रकृति स्वयं साध्य बन जाती है उसके सौंदर्य के प्रति कवि अपने भावों को प्रकट करता है तो वहां आलम्बन रूप होता है. प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करके उसका संश्लिष्ट वर्णन किया गया है. लोक की अंतर्दृष्टि प्रकृति के सौंदर्य से अभिभूत होकर सहज रूप में अभिव्यक्त हुई है. लोक गीतों में नदी, पर्वत, वृक्ष सभी अलम्बन रूप में प्रस्तुत हुए हैं. लोक आत्मतल्लीन भाव से अपने आह्लाद और दुख दोनों को वाणी देता है.

‘‘आलम्बन की स्थिति में कवि की अनुभूति अधिक रहती है. प्रकृति का यह सौंदर्य रूपात्मक नहीं वरन् भावात्मक साहचर्य के आधार पर ही स्थित है. इस प्रकृति के सौंदर्य साहचर्य में कवि स्वयं अपने का सजग पाता है और यह सजगता विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त होती है.’’

(डॉ. रघुवंश- ‘प्रकृति और काव्य’ पृ.-92-93)

ऋतु गीतों में प्रकृति का आलम्बन रूप अधिक मुखरित है.

‘‘गमकल फुलवा फुलाने हो रामा चैत मासे,’’

प्रकृति का उद्दीपन रूप लोक साहित्य और प्रातिभ साहित्य में सर्वत्र भरा पड़ा है. ‘‘आश्रय को विशेष भाव-स्थिति में प्रकृति अपनी साहचर्य भावना के कारण आलम्बन विषयक किसी संबंध में उपस्थिति होती है और प्रकृति में यह भावना आश्रय की मनःस्थिति से संबंधित है. इस प्रकार प्रकृति की उद्दीपन शक्ति उसके सौंदर्य और साहचर्य के साथ परिस्थिति के संयोगों पर भी निर्भर है.

(डॉ. रघुवंश- ‘प्रकृति और काव्य’ पृ.-92-93)

प्रकृति का आलंकारिक रूप-मानव को सर्वाधिक प्रभावित करता है. उसकी संवेदनशीलता शब्द-शक्तियों और अलंकारों का आश्रय ग्रहण करती है.

‘‘सावन भादौं के अन्हियारी, तेहि पर डोलैं जुल्मी बयारी,

यादैं सभी सतावैं.’’

‘‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन है कि भावों का उत्कर्ष दिखाने और वस्तुओं का अधिक तीव्र अनुभव कराने में कभी-कभी सहायक होने वाली युक्ति का नाम अलंकार है. इस दृष्टि से प्रकृति सर्वाधिक प्रयुक्त हुई है.

प्रकृति के उपकरणों से तमाम उपमान लोकगीतों में ग्रहण किये गये हैं.

प्रकृति का मानवीकरण भी लोकसाहित्य में बहुत

मिलता है.

भारत एक ऐसा देश है जहां ऋतुएं अपने पूरे वैभव के साथ उतरती हैं. ये ऋतुएं वर्ष के बारहों महीनों के प्रभाव के रूप में मानव के सुख-दुख की कथा कहती हैं. मन का बारहमासी सुख-दुख, बारहमासा गीतों में और ऋतु गीतों में किस तरह व्याप्त है इस अनुभव को बांटने का प्रयास किया जाना है.

प्रकृति एक सहचरी है तो दूसरी ओर पूजनीय, वन्दनीय भी है. पर वंदनीय होते हुए भी पहुंच से परे नहीं है. प्रकृति के देवता को जब चाहे न्योतकर लोकमन बुला लेता है, बैठाता है, उसको अपने घर आंगन में उरेह लेता है और उसे अगली ऋतु तक के लिए विदा भी कर देता है.

मानव की यह चिर सहचरी अनेकानेक रूपों में मानव को सदा से प्रभावित करती रही है. मनुष्य ने प्रकृति से इतना सीखा है, इतना पाया है कि वह उससे कभी उऋण नहीं हो सकता.

लोकगीतों में प्रकृति के नित्य बदलते रूप, सौंदर्य के वर्णन के साथ ही गहरे आंतरिक संबंध व्यक्त हुए हैं. मनुष्य के सुख में प्रकृति हंसती है, दुख में रोती है, उसे ढांढ़स बंधाती है और सहायता करती है. प्रकृति के साथ मनुष्य के इसी गहरे

संबंध के बारे में जो कि लोक साहित्य में जगह-जगह व्यक्त हुए हैं, यहां चर्चा करना चाहूंगी.

लोकगीतों, कथाओं में जब भी मनुष्य संकट में रोता है, हंस का जोड़ा या कोई अन्य पशु-पक्षी अथवा वृक्ष उसका दुख पूछता है, मदद करता है.

लोकगीतों में प्रकृति पारिवारिक संबंधों में बंधी है. आकाश पिता है, धरती मां, वायु और बदली संदेश ले जाने वाले मित्र हैं. लोक में सूर्य, चंद्रमा, जल और अग्नि को ही महत्त्वपूर्ण अवसरों पर साक्षी बनाया जाता है. स्पष्ट है कि मनुष्य को मनुष्य से अधिक इन पर विश्वास है, भरोसा है.

बच्चे के जन्म के समय आपद-विपत्ति से रक्षा के लिए सबसे पहले आग, पानी और बेल का कांटा आदि सौर-गृह के दरवाजे पर रख दिया जाता है. बाहर से आने वाला पानी और आग का स्पर्श करके ही भीतर जा सकता है. वह वैज्ञानिक दृष्टि से स्वास्थ्यकर तो है ही इसके पीछे जो प्रकृति के स्पर्श से मिली ऊर्जा अथवा शक्ति और पावनता का बोध है, उसका भी महत्त्व कम नहीं. आग आदि की सुरक्षा में जच्चा-बच्चा अकेले भी छोड़े जा सकते हैं.

लोक साहित्य में नारी जब भी दुखी होती है प्रकृति की गोद ‘वन’ में भागकर जाती है. दुखी वंध्या नारी का रुदन सुनकर वन का पत्ता-पत्ता रो उठता है. कभी वन देवी, कभी गंगा माता उसे पुत्र का आशीर्वाद और सीख देती हैं. प्रकृति के पास आकर कोई खाली हाथ नहीं लौटता.

यहां स्मरणीय है कि प्रकृति अपने समूचेपन से मनुष्य के साथ जुड़ी है, केवल यही नहीं है कि जो सुन्दर, सुहावना, कोमल दिखता है वही मनुष्य के लिए है, जो भयावह है वह भी मनुष्य के जीवन का एक अंश है. क्योंकि भय भी मनुष्य का एक मनोभाव है. किसी भी अनुष्ठान में प्रकृति की संपूर्णता को इसीलिए आवाहित किया जाता है कि वह अनुष्ठान एक विराट अनुष्ठान हो जिसमें सबकी साझेदारी हो.

इसीलिए लोकगीतों में बेटी के लिए वर ढूंढ़ने तोता जाता है. विवाह की तिथि तय हो जाने पर निमंत्रण लेकर भंवरा

जाता है.

प्रकृति से इतना गहरा तादात्म्य लोक संस्कृति का ही मुख्य अभिलक्षण है. इतनी गहरी संवेदना हमें प्रकृति ही देती है. लोक साहित्य बार-बार कहता है कि प्रकृति से मनुष्य का जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त सहज मानवीय संबंधों का रिश्ता है.

प्रकृति हमें अभय देती है, हमारी रक्षा करती है, हमारे सुख-दुख की साक्षी है, अतः उससे जुड़कर ही हम सुखी रह सकते हैं. प्रकृति से हटकर हम नितांत अकेले हो जायेंगे, जी नहीं सकेंगे.

इसी वैचारिक चौखटे के भीतर क्रमशः मनुष्य और प्रकृति के संबंधों का सहज निरूपण करने का प्रयास किया जाना है और उसी के साथ-साथ प्रकृति के प्रति मनुष्य के दायित्व का पर्यवेक्षण भी किया जाना है. जिस प्रकार प्रकृति और मनुष्य में गति की समानान्तरता है, यह बात ऋतु चक्र और जीवन चक्र को आमने-सामने रखकर, भावना के स्तर पर स्पष्ट करने का प्रयास किया जाना है.

प्रकृति के रहस्य जब नहीं समझ में आये तब मनुष्य ने उन्हें समझने के लिए प्रयास करना प्रारंभ किया और प्रकृति के प्रति ज्ञान-विज्ञान के नये-नये आयाम और क्षितिज खुलते गये. मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए प्रकृति का दोहन प्रारंभ किया. जंगल कटने लगे, पहाड़ उजड़ने लगे, नदियों के जल दूषित किये जाने लगे और अपने किये का दण्ड मनुष्य की संताने भोगने लगीं. प्रकृति को देवता नहीं वस्तु समझा जाने लगा और उसके प्रति आदर और आत्मीयता का भाव धीरे-

धीरे तिरोहित होने लगा.

हमारे ग्रामीण जीवन और जनजातियों में आज भी अपनी परम्परा की धरोहर और विरासत के प्रति आदर भाव बना हुआ है. इसीलिए उनकी वाचिक परम्परा में आज भी प्रकृति के प्रति वही संवेदनात्मक लगाव शेष है.

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